वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४१
प्रशस्तपादभाष्यम्
भवति, तथाप्यतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मृतिरेवेति भवत्येषा चतु-
र्विधाऽविद्येति ।
विद्यापि चतुर्विधा-प्रत्यक्षलैङ्गिकस्मृत्यार्षलक्षणा ।
ज्ञान होता है, किन्तु वह अतीत के किसी ज्ञान के सदृश ही दूसरा
ज्ञान है, अतः स्मृति ही है, तस्मात् कथित रीति से 'अविद्या' रूप ज्ञान
के कथित चार ही प्रकार हैं।
९७. (अविद्या की तरह) विद्या भी चार प्रकार की है, उसके
१. प्रत्यक्ष २. लैङ्गिक ३. स्मृति और ४. आर्ष (ये चार) भेद हैं।
न्यायकन्दली
तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रारोहणाद्यधर्मसंस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धेषु स्वतः
परतश्चाप्रतीतेषु चन्द्रादित्यभक्षणादिषु ज्ञानं तददृष्टादेव, अननुभूतेषु संस्का-
राभावात् । यद्यपि संस्कारपाटवाद्धातुदोषाददृष्टाद् वा समारोपितबाह्यस्वरूपः
स्वप्नप्रत्ययो भवन्नत्तस्मिंस्तदिति भावाद् विपर्ययः, तथाप्यवस्थाविशेषभावित्वात्
पृथगुक्तः । कदाचित् स्वप्नदृष्टस्यार्थस्य स्वप्नावस्थायामेव प्रतिसन्धानं
भवति-अयं मया दृष्ट इति, तच्च पूर्वानुभूतस्य स्वप्नान्तेऽवसाने भवतीति
प्रवेश, सोने का पर्वत उदित सूर्यमण्डल प्रभृति वस्तुओं को स्वप्न में देखता है। जिस
पुरुष में कफ की प्रधानता रहती है या जिसका कफ दूषित रहता है, वह नदी और
समुद्रों में तैरने का एवं बर्फ के पर्वतादि का स्वप्न देखता है। स्वयं अनुभूत
किन्तु और स्थानों में अप्रसिद्ध, अथवा अपने से अननुभूत किन्तु और स्थानों में
प्रसिद्ध वर्त्तमान वस्तुओं के जो स्वप्न शुभ के ज्ञापक होते हैं, जैसे कि हाथी पर
चढ़ना, छत्र का लाभ प्रभृति-ये सभी स्वप्न, पुण्य और संस्कार से होते हैं। शुभ
के ज्ञापकों से विरुद्ध जितने भी स्वप्न हैं, जैसे कि तेल का मालिश, गदहे पर
चढ़ना, ऊँट पर चढ़ना-ये सभी स्वप्न अधर्म और संस्कार इन दोनों से होते हैं।
'अत्यन्त अप्रसिद्ध' अर्थात् अपने से या दूसरों से सर्वथा 'अज्ञात' चन्द्र सूर्यादि के
भोजन का स्वप्नात्मक ज्ञान केवल अदृष्ट से ही होता है, क्योंकि बिना अनुभव
किये हुए किसी वस्तु का संस्कार नहीं होता। यद्यपि संस्कार की पटुता, धातु के
दोष, अथवा अदृष्ट से उत्पन्न स्वप्नज्ञान में चूँकि बाह्य विषयों का ही समारोप होता
है, अतः तदभाव युक्त आश्रय में तत्प्रकारक होने के कारण वह विपर्यय ही है,
तथापि (और विपर्ययों से) विशेष अवस्था के कारण (विपर्यय से) अलग कहा
गया है। कभी कभी स्वप्न में देखी हुई वस्तु का स्वप्न में ही इस प्रकार से अनुसन्धान
होता है कि 'इसको मैंने देखा'। यह (अनुव्यवसाय) पहिले अनुभूत स्वप्न के
अन्त में होने के कारण 'स्वप्नान्तिक' कहलाता है। किसी का यह भी आक्षेप है
४४२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्षम् अक्षाणीन्द्रि-
याणि, घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि षट् । तद्धि द्रव्यादिषु
इनमें 'अक्षम् अक्षम् प्रतीत्योत्पद्यते यज्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है । (इस) 'अक्ष' शब्द के
अर्थ हैं 'इन्द्रिय' १. घ्राण २. रसना ३. चक्षु ४. त्वचा ५. श्रोत्र एवं
६. मन ये छः इन्द्रियाँ हैं ।
न्यायकन्दली
स्वप्नान्तिकमुच्यते । तदप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भावात् स्वप्नज्ञानमिति कस्यचिदाशङ्काम-
पनेतुमाह-स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भवति, तथाप्यतीतस्य पूर्वानुभूतस्य
स्वप्नज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणादनुसन्धानात् स्मृतिरेवेति । उपसंहरति-भवत्येषा
चतुर्विधाऽविद्येति ।
सम्प्रति विद्यां विभजते- विद्यापीति । न केवलमविद्या चतुर्विधा, विद्यापि
चतुर्विधेति । प्रत्यक्षमिति । आदौ प्रत्यक्षस्य निर्देशः कारणत्वात्, तदनन्तरमनुमानस्य
तत्पूर्वकत्वात्, तदनन्तरं स्मृतेः प्रत्यक्षानुमितेष्वर्थेषु भावात्, लौकिकप्रमाणान्ते संकीर्तन-
मार्षस्य लोकोत्तराणां पुरुषाणां तद्भावात् ।
प्रत्यक्षस्य लक्षणं तावत्कथयति-तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्ष-
कि यह ज्ञान भी कथित 'उपरतेन्द्रियग्राम' पुरुष को ही होता है, अतः यह भी
'स्वप्न' ही है (स्वप्नान्तिक नहीं) इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'स्वप्नान्तिकम्'
इत्यादि वाक्य लिखा गया है। कहने का तात्पर्य है कि यह स्वप्नान्तिकज्ञान यद्यपि
'उपरतेन्द्रियग्राम' पुरुष को ही होता है; फिर भी यह 'अतीत' अर्थात् पूर्वानुभूत
स्वप्नज्ञानों के 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् अनुसन्धान से उत्पन्न होने के कारण स्मृति ही
है । 'भवत्येषा' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
'विद्यापि' इत्यादि संन्दर्भ के द्वारा अब 'विद्या' (यथार्थज्ञान-प्रमा) का विभाग
करते हैं । (इस 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि) केवल अविद्या ही चार
प्रकार की नहीं है, किन्तु विद्या भी चार प्रकार की है । प्रत्यक्ष का निरूपण सबसे
पहिले इस हेतु से किया गया है कि वह (अन्य सभी ज्ञानों का) कारण है । प्रत्यक्ष
के बाद अनुमान का निरूपण इसलिए किया गया है कि वह सीधे प्रत्यक्ष से उत्पन्न
होता है । प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की ही स्मृति होती है, अतः
इन दोनों के निरूपण के बाद स्मृति का निरूपण हुआ है । आर्षज्ञान लोकोत्तर
पुरुषों को ही होता है, अतः उसका निरूपण लौकिक प्रमाणों के निरूपण के बाद
अन्त में किया गया है ।
'तत्राक्षमक्षम्' इत्यादि ग्रन्थ से क्रम के द्वारा प्राप्त प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं ।
'अक्षमक्षमप्रतीत्योत्पद्यते तन्प्रत्यक्षं प्रमाणम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रियों की प्राप्ति
(सम्बन्ध) से जितने भी ज्ञान उत्पन्न हों, वे सभी 'प्रत्यक्ष प्रमाण' हैं । इस प्रकार विशेष