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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३१
न्यायकन्दली
अत्रोच्यते-यदि रजतज्ञानं न शुक्तिकाविषयं किं त्वेषा रजतस्मृतिः, तदा तस्मिन्
ज्ञाने रजतार्थी पूर्वानुभूते एव रजते प्रवर्तेत, न शुक्तिकायाम्, स्मृतेरनुभवदेशे प्रवर्त्तकत्वात् ।
अथ मन्यसे-इन्द्रियेण रजतस्य साधारणं रूपं शुक्तिकायां गृहीतम्, न शुक्तिकात्वं
विशेषः, रजतस्मरणेन च तदित्युल्लेखशून्येनानिर्धारितदिग्देशं रजतमात्र-
मुपस्थापितम्, तत्रानयोर्गृह्यमाणस्मर्यमाणयोर्ग्रहणस्मरणयोश्च सादृश्याद् विशेषाग्रहणाच्च
विवेकमनवधारयन् शुक्तिकादेशे प्रवर्त्तते, सामानाधिकरण्यं शुक्तिकारजतयोरध्यवस्यति
रजतमेतदिति । तदप्ययुक्तम्, अविवेकस्याप्यग्रहणात् । रजताभेदग्रहो हि रजतार्थिनः
शुक्तिकायां प्रवृत्तिकारणं न सादृश्यम्, भेदग्रहणं च ततो निवृत्तिकारणम्,
तदुभयोरभावान्न प्रवर्त्तते न निवर्त्तत इति स्यात्, न तु नियमेन प्रवर्तेत, विशेषाभावात् ।
एवं सामानाधिकरण्यमपि न स्याद्भेदाग्रहणस्यापि वैयधिकरण्यहेतोः सम्भवात् । तथा च
प्रवृत्त्युत्तरकालीनो नेदं रजतमिति बाधकप्रत्ययोऽपि न घटते, शुक्तिकारजतयोर्भेदो न
गृहीतो न तु तादात्म्यमभूद्यत्सत्यं येनेदं प्रतिषिध्यते, भेदाग्रहणप्रसञ्जितस्य शुक्तिकायां रजत-
(उ.) इस प्रसङ्ग में हमलोग कहते हैं कि उक्त रजतविषयक ज्ञान में अगर
शुक्ति विषय न हो, वह केवल रजत की स्मृति ही हो, तो फिर इस ज्ञान के बाद
रजत को प्राप्त करने की इच्छा रखनेवाले पुरुष पहिले से अनुभूत रजत में ही
प्रवृत्त होते शुक्तिका में नहीं, क्योंकि स्मृति (अपने कारणीभूत) पूर्वानुभव के
विषय रूप देश में ही प्रवृत्ति का उत्पादन कर सकती है । (प्र.) प्रकृत में रजत
का साधारण रूप (इदन्त्व) ही इन्द्रिय से शुक्तिका में गृहीत होता है, शुक्तिका का
विशेष धर्म शुक्तिकात्व नहीं । पूर्वानुभव की विषय 'तत्ता' के सम्बन्ध से सर्वथा
रहित रजत की स्मृति से अनिश्चित केवल रजत ही जिस किसी देश में उपस्थित
किया जाता है । अनुभूत एवं स्मृत दोनों विषयों के एवं अनुभव और स्मृति दोनों
ज्ञानों के सादृश्य, एवं दोनों विषयों के असाधारण धर्मों का अज्ञान, इन दोनों से
रजत की इच्छा रखनेवाले पुरुष को शुक्तिका और रजत के भेद का निश्चय नहीं
हो पाता । अतः वह पुरुष शुक्ति रूप देश में ही रजत के लिए प्रवृत्त हो जाता
है । एवं शुक्तिका और रजत इन दोनों में अभेद को यह निश्चय करता है कि
'यह रजत है' । (उ.) किन्तु उक्त कथन असङ्गत है, क्योंकि (उक्त स्थल में)
अभेद का ज्ञान नहीं होता, एवं शुक्तिका में रजत के अभेद का ज्ञान प्रवृत्ति का
कारण है, दोनों का सादृश्य नहीं । एवं रजत और शुक्ति के भेद का ज्ञान
(शुक्तिका में रजतार्थी की) निवृत्ति का कारण है । इस प्रकार (शुक्तिका में 'इदं
रजतम्' इत्यादि स्थलों में) प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों में से एक भी
नहीं बनेगी, क्योंकि न वहाँ अभेद का ज्ञान है न भेद का । एवं उक्त ज्ञान

४३२ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय-
न्यायकन्दली
व्यवहारस्यायं प्रतिषेध इति चेन्न, अभेदाग्रहणादतद्वयवहारप्रवृत्तेरपि सम्भवात् । अस्ति
च शुक्तिकादेशे रजतार्थिनः प्रवृत्तिः, अस्ति च सामानाधिकरण्यप्रत्ययो रजतमेटदिति,
अस्ति च बाधकप्रत्यय इदन्ताधिकरणस्य रजतात्मतानिषेधपरः । तेनावगच्छामः
शुक्तिसंयुक्तेनेन्द्रियेण दोषसहकारिणा रजतसंस्कारसचिवेन सादृश्यमनुरुन्धता शुक्तिकाविषयो
रजताध्यवसायः कृतः ।
यच्चेदमुक्तं शुक्तिकालम्बनत्यमनुभवविरुद्धमिति, तदसारम् । इदन्तया नियतदेशाधि-
करणस्य चाकचिक्यविशिष्टस्य शुक्तिकारूकलस्यापि प्रतिभासनात् । हानादिव्यवहारयोग्यता
चालम्बनार्थः, स चात्रैव सम्भवति । योऽपि भेदाग्रहाच्छुक्तौ रजतव्यवहारप्रवृत्तिमिच्छति, तेनापि
विपर्ययोऽङ्गीकृतः, अतस्मिंस्तदिति व्यवहारप्रवृत्तेरेव विपर्ययत्वात् । यच्च शक्तिव्याघातहेतुत्वं
के बाद नियमपूर्वक होनेवाली प्रवृत्ति की भी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि
प्रकृत में कोई नहीं है । इसी प्रकार अभेद का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि
भेद के ज्ञान के कारण अभेद के अग्रहण की भी वहाँ सम्भावना है । एवं यहाँ
प्रवृत्ति के बाद जो 'नेदं रजतम्' इत्यादि आकार की बाधक प्रतीति होती है, वह
भी नहीं बन सकेगी, क्योंकि शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद ज्ञात ही नहीं
हैं, एवं दोनों का अभेद भी गृहीत नहीं है, फिर किससे उक्त प्रतिषेध की उपपत्ति
होगी ? (प्र.) शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद के अज्ञान से शुक्तिका में
रजतव्यवहार की जो सम्भावना होती है, उसी का निषेध 'नेदं रजतम्' इत्यादि से
होता है । (इस प्रकार से उपपत्ति) नहीं की जा सकती, क्योंकि उक्त अभेद के
अग्रहण मात्र से तो रजत से भिन्न (घटादि) व्यवहार भी हो सकता है । किन्तु
शुक्तिका के प्रदेश में ही रजत की इच्छा करनेवालों की प्रवृत्ति होती है, एवं अभेद
की यह प्रतीति होती है कि यह रजत है । एवं इदन्त्व के आश्रय शुक्तिका में
रजतस्वरूपत्व का निषेध करनेवाला (नेदं रजतम्) यह बाधक प्रत्यय भी है ।
इससे यह निश्चित रूप से समझते हैं कि शुक्तिका से संयुक्त इन्द्रिय ही शुक्तिका में
रजत विषयक निश्चय को उत्पन्न करती है । यह अवश्य है कि इन्द्रिय को इस
विशेष कार्य के लिए दोष रूप सहकारी की, रजतसंस्कार से सहायता की और
सादृश्य के अनुरोध की आवश्यकता होती है ।
यह जो कहा जाता है कि 'शुक्तिका रजतज्ञान का विषय हो, यह
अनुभव से बाहर की बात है' उसमें भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि इदन्त्व
का नियत अधिकरण एवं चाकचिक्य से युक्त शुक्तिका खण्ड, ये दोनों भी
तो उस प्रतीति में विषय हैं ही । जिस प्रतीति से जिसमें ग्रहण या त्याग की
योग्यता आवे, वही उस प्रतीति का विषय है । यह योग्यता (इस 'इदं रजतम्' इस
ज्ञान में भासित होनेवाले रजत में भी) है ही । जिनकी यह अभिलाषा है कि
भेद के अज्ञान से ही शुक्ति में रजत का व्यवहार और प्रवृत्ति दोनों की उपपत्ति