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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६५
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगवत् । विभागस्तु द्विविधः-कारणविभागात्, कारणाकारणविभागा-
च्च । तत्र कारणविभागात् तावत् कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नं
(उक्त नाम के दोनों) संयोगों की तरह हैं । (किन्तु) विभागज विभाग
दो प्रकार का है--१. केवल कारणों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला एवं
२. कारण और अकारण इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला ।
न्यायकन्दली
प्राप्तिविरोधी गुणविशेषः, स विभाग इति वाक्यार्थः । किं प्राप्तेः पूर्वावस्थानमात्रम् ?
किं वा विभागं प्रति हेतुत्वमप्यस्ति ? अवस्थितिमात्रमिति ब्रूमहे, संयोगस्य विभाग-
हेतुत्वेऽवयवसंयोगानन्तरमेव तद्विभागस्योत्पत्तौ द्रव्यानुत्पत्तिप्रसङ्गात् । कर्मसहकारी संयोगः
कारणमिति चेत् ? अन्वयव्यतिरेकाद्यद्गतसामर्थ्यं कर्मैव कारणमस्तु, न संयोगः, तस्मिन्
सत्यप्यभावात् । प्रध्वंसोत्पत्ताविव भावस्य । विभागोत्पत्तौ संयोगस्य पूर्वकालतानियमः,
विभागस्य तद्विरोधित्वस्वभावत्वात् ।
स च त्रिविध इति भेदकथनम् । अत्रापि चशब्दोऽवधारणे,
त्रिविध एव । अन्यतरकर्मज उभयकर्मजो विभागजश्च विभाग इति ।
गुण के विरोधी विभाग नाम के गुण का ही बोधक है (संयोग के अभाव का
नहीं) । 'प्राप्ति' (संयोग) के रहने पर जो 'अप्राप्ति' अर्थात् प्राप्ति का विरोधी
गुणविशेष वही 'विभाग' है । (प्र.) विभाग के उत्पन्न होने से पहले संयोग (प्राप्ति)
केवल रहता है या वह उसका उत्पादक भी है ? (उ.) हम तो कहते हैं कि विभाग
की उत्पत्ति के पूर्व (नियमतः) संयोग केवल विद्यमान रहता है (वह विभाग का
कारण नहीं है); क्योंकि संयोग अगर विभाग का कारण हो, तो फिर द्रव्यों की
उत्पत्ति ही रुक जाएगी; क्योंकि अवयवों में संयोग के होने के बाद उस संयोग से
अवयवों के विभाग उत्पन्न होंगे । अगर कहें कि (प्र.) (केवल) संयोग ही विभाग
का कारण नहीं है क्रिया भी उसकी सहायिका है ? (उ.) तो फिर अन्वय और
व्यतिरेक के द्वारा जिस क्रिया में विभाग का सामर्थ्य निश्चित है, वह क्रिया ही
विभाग का कारण है, संयोग नहीं । क्योंकि संयोग के रहते हुए भी बिना क्रिया
के विभाग की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः जिस प्रकार ध्वंस की उत्पत्ति से पहले
(उसके प्रतियोगी) भाव की नियमतः सत्ता (ही) रहती है (एवं वह ध्वंस का कारण
नहीं होता), उसी प्रकार संयोग भी विभाग से पहले नियमतः केवल रहता है, वह
उसका उत्पादक नहीं है; क्योंकि विभाग स्वभावतः संयोग का विरोधी है ।
'स च त्रिविधः' इस वाक्य के द्वारा विभाग के भेद कहे गये हैं । यहाँ भी 'च'
शब्द का अवधारण ही अर्थ है, (तदनुसार इस वाक्य का यह अर्थ है कि) विभाग
के ये तीन ही प्रकार हैं-(१) अन्यतरकर्मज, (२) उभयकर्मज और (३) विभागज ।

३६६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यदा तस्यावयवान्तराद् विभागं करोति, न तदाकाशादिदेशात् । यदा
त्याकाशादिदेशाद् विभागं करोति, न तदावयवान्तरादिति स्थितिः । अतोऽ-
इनमें कारण मात्र के विभाग से उत्पन्न होनेवाले विभाग का निरूपण करते
हैं । वस्तुस्थिति यह है कि कार्य से सम्बद्ध अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया
जिस समय अपने आश्रयरूप अवयव द्रव्य में दूसरे अवयव से विभाग
को उत्पन्न करती है, उस समय विभक्त अवयवों में आकाशादि देशों से
विभाग को उत्पन्न नहीं करती एवं जिस समय (वही क्रिया) अवयवों में
आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय एक अवयव में
न्यायकन्दली
तत्र तेषु मध्येऽन्यतरकर्मजोभयकर्मजौ संयोगवत् । यथा क्रियावता निष्क्रियस्य
संयोगोऽन्यतरकर्मजस्तथा विभागोऽपि । यथोभयकर्मजः संयोगो मल्ल्योर्मेषयोर्वा तथा
विभागोऽपि । विभागजस्तु द्विविध इति । तुशब्देनास्य पूर्वाभ्यां विशेषकथनम् ।
कारणयोर्विभागादेको विभागो भवति । अपरस्तु कारणाकारणयोर्विभागादिति द्वैविध्यम् ।
कारणविभागाच्च विभागः कथ्यते - कार्याविष्ट इत्यादिना ।
कार्याविष्टे व्याप्ते अवरुद्धे कारणे कर्मोत्पन्नं यदा तस्यावयवस्या-
वयवान्तराद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशकं विभागं करोति, न तदा द्रव्यावरुद्धा-
'तत्र' अर्थात् उनमें अन्यतरकर्मज और उभयकर्मज ये दोनों 'संयोगवत्' हैं, अर्थात्
जिस प्रकार क्रिया से युक्त एक द्रव्य का और क्रिया से रहित दूसरे द्रव्य का
संयोग अन्यतरकर्मज है, उसी प्रकार (निष्क्रिय एक द्रव्य के साथ क्रिया से युक्त
दूसरे द्रव्य का) विभाग भी (अन्यतरकर्मज) है । एवं जिस प्रकार (लड़ते हुए) दो
भेड़ों का (या) पहलवानों का संयोग उभयकर्मज है, उसी प्रकार उनका विभाग भी
(उभयकर्मज) है । 'विभागजस्तु द्विविधः' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द से
विभागज विभाग में कथित दोनों विभागों से भेद सूचित किया गया है । एक
प्रकार का विभागज विभागकारणीभूत दोनों द्रव्यों के ही विभाग से उत्पन्न होता है
और दूसरे प्रकार का विभागज विभागकारणीभूत एक द्रव्य और दूसरा
अकारणीभूत द्रव्य, इन दोनों द्रव्यों के विभाग से उत्पन्न होता है । विभागज
विभाग के ये ही दो भेद हैं ।
'कार्याविष्टे कारणे' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कारण (मात्र) के विभाग
से उत्पन्न (विभागज) विभाग का निरूपण किया गया है । वस्तुस्थिति यह
है कि कार्य से 'आविष्ट' अर्थात् नियत रूप से सम्बद्ध (अवयव रूप)
कारण में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय अवयवी द्रव्य के उत्पादक संयोग
के विनाशक विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय (वह क्रिया) उस द्रव्य के