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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथ कथंलक्षणः ? कतिविधश्चेति । अप्राप्तयोः प्राप्तिः
संयोगः । स च त्रिविधः - अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्च ।
(प्र.) उसका स्वरूप (लक्षण) क्या है ? एवं वह कितने
प्रकार का है ? (उ.) अप्राप्त (परस्पर न मिले हुए दो द्रव्यों
की प्राप्ति) मिलन (ही) संयोग है । वह १. अन्यतरकर्मज, २. उभय-
कर्मज और ३. संयोगज भेद से तीन प्रकार का है । इसमें (१)
न्यायकन्दली
सहिता सामग्री कारणम्, कदाचिदु द्वितीयमन्त्रादिसहिता कारणमित्यस्यां कल्पनायां को
विरोधः ? यदनुरोधाददृष्टमाश्रीयते । दृष्टो ह्येकपरस्यापि कार्यस्य सामग्रीभेदः, यथा
दारुनिर्मथनप्रभवो वह्निः सूर्यकान्तप्रभवश्चेति तर्कसिद्धान्तरहस्यम् । मीमांसासिद्धान्तरहस्यं
तत्त्वप्रबोधे कथितमस्माभिः ।
संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तमित्यवगतं तावत्; किन्त्वस्य स्वरूपं भेदश्च न
ज्ञायते तदर्थं परिपृच्छति-अथ कथंलक्षणः कतिविधश्चेति । अथेति प्रश्नोपक्षेपे
कथंशब्दः किंशब्दार्थे, यथा को धर्मः कथंलक्षण इति । लक्षणशब्दश्च
स्वरूपवचन इति किंस्वरूपः संयोगः ? कतिविधश्चेति कतिप्रकार इत्यर्थः ।
लक्षणं कथयति-अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । पूर्वमप्राप्तयोर्द्रव्ययोः पश्चाद्या
प्रतिबन्धकीभूत मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही कार्य को उत्पन्न करता है एवं
कभी द्वितीय (प्रतिबन्धक मन्त्रादि के विरोधी) मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही
उसका कारण होता है, इन दोनों कल्पनाओं में कौन-सा विरोध है कि जिसके
लिए आप (मीमांसक) अदृष्ट (शक्ति) का अवलम्बन करते हैं । एक तरह के
कार्यों की उत्पत्ति अनेक प्रकार के कारणों से देखी जाती है । जैसे कि काठ की
रगड़ से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है एवं सूर्यकान्तमणि से भी । (शक्ति के
विषय में) यही तार्किकों के सिद्धान्त का रहस्य है । (शक्ति पदार्थ की सत्ता के
प्रसङ्ग में) मीमांसकों के अभिमत सिद्धान्त के रहस्य का निरूपण मैंने 'तत्त्वप्रबोध'
नाम के ग्रन्थ में किया है ।
यह तो समझा कि 'ये परस्पर संयुक्त हैं' इस आकार की प्रतीति का कारण ही
संयोग है ; किन्तु यह तो नहीं समझ सके कि इसका स्वरूप क्या है ? इसके कितने
भेद हैं ? यही समझाने के लिए 'अथ कथं लक्षणः ? कतिविधश्च ?' इत्यादि प्रश्न
करते हैं । यहाँ 'अथ' शब्द का अर्थ है 'प्रश्न का आरम्भ करना' एवं 'कथम्' शब्द
'किम्' शब्द के स्थान में आया है । जैसे कि (शाबरभाष्य अ.१.पा.१. सू.१ के) 'को
धर्मः ? कथं लक्षणः ?' इत्यादि स्थलों में (ये शब्द) प्रयुक्त हुए हैं । प्रकृत में

३४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्रान्यतरकर्मजः क्रियावता निष्क्रियस्य, यथा स्थाणोः श्येनेन,
विभूनां च मूर्त्तः। उभयकर्मजो विरुद्धदिक्क्रिययोः सन्निपातः,
क्रिया से युक्त द्रव्य के साथ निष्क्रिय द्रव्य का संयोग अन्यतर कर्मज संयोग
है, जैसे कि सूखे वृक्ष के साथ बाज पक्षी का संयोग एवं विभु द्रव्यों के साथ
मूर्त्त द्रव्यों का संयोग । २. दो विरुद्ध दिशाओं में रहनेवाले क्रियायुक्त
दो द्रव्यों का संयोग उभयकर्मज है । जैसे (कि लड़ते हुए) दो पहलवानों का
न्यायकन्दली
प्राप्तिः परस्परसंश्लेषः स संयोगः । अप्राप्तयोरिति समवायव्यवच्छेदार्थम् । इदानीं तस्य
भेदं प्रतिपादयति-स च त्रिविध इति ।
चशब्दोऽवधारणे-संयोगस्त्रिविध एव । त्रैविध्यमेव दर्शयति-अन्यतरकर्मज इत्या-
दिना । द्वयोः संयोगिनोर्मध्ये यदन्यतरद् द्रव्यं तत्र यत्कर्म तस्माज्जातोऽन्यतरकर्मजः । उभयो-
र्द्रव्ययोः कर्मणी उभयकर्मणी ताभ्यां जात उभयकर्मजः । संयोगादपि संयोगो जायते । तत्रान्य-
तरकर्मजः । तत्र तेषां त्रयाणां मध्ये क्रियावता द्रव्येण निष्क्रियस्य द्रव्यस्य संयोगोऽन्यतर-
कर्मजः । अस्योदाहरणम्--यथा स्थाणोः श्येनेन विभूनां च मूर्त्तः । निष्क्रियस्य स्थाणोः
'लक्षण' शब्द का अर्थ है 'स्वरूप', तदनुसार उक्त वाक्यों का यह अभिप्राय है कि
संयोग का स्वरूप क्या है ? एवं उसके कितने भेद हैं ? 'अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः'
इस वाक्य से संयोग का लक्षण (स्वरूप) कहा गया है । पहले से अप्राप्त दो द्रव्यों
की बाद में जो 'प्राप्ति' अर्थात् सम्बन्ध (होता है), वही (सम्बन्ध) संयोग है । (इस
लक्षण वाक्य में) 'अप्राप्तयोः' यह पद समवाय में अतिव्याप्ति को हटाने के लिए है ।
'स च त्रिविधः' इत्यादि से अब इसके भेदों को समझाते हैं । (प्रकृत वाक्य
में) 'च' शब्द अवधारण के लिए है । तदनुसार प्रकृत वाक्य का यह अर्थ है कि
संयोग तीन ही प्रकार के हैं । 'अन्यतरकर्मजः' इत्यादि से वे तीनों भेद दिखलाये
गये हैं । संयोग के दोनों सम्बन्धियों में जो 'अन्यतर' अर्थात् एक द्रव्य है. केवल
उसी द्रव्य की क्रिया से उत्पन्न होनेवाले संयोग को अन्यतरकर्मज कहते हैं ।
'उभयोः द्रव्ययोः' इत्यादि व्युत्पत्ति के अनुसार 'उभयकर्मज' शब्द का वह संयोग
अर्थ है-जिसकी उत्पत्ति संयोग के सम्बन्धी रूप दोनों द्रव्यों की दोनों क्रियाओं से
होती है । उसी को 'उभयकर्मज' संयोग कहते हैं । संयोग से भी संयोग की
उत्पत्ति होती है (अर्थात् संयोग से उत्पन्न संयोग को ही संयोगज संयोग कहते हैं)।
'तत्रान्यतरकर्मजः' अर्थात् 'तेषां त्रयाणां मध्ये' अर्थात् उन तीनों संयोगों में से
क्रिया से युक्त एक द्रव्य के साथ तथा क्रिया से रहित दूसरे द्रव्य के साथ के संयोग
को 'अन्यतरकर्मज संयोग' कहते हैं । 'यथा स्थाणोः' इत्यादि वाक्य से अन्यतर-