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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३३
प्रशस्तपादभाष्यम्
एतावांस्तु विशेषः - एकत्वादिवदेकपृथक्त्वादिष्वपरसामान्याभावः, संख्या तु
विशिष्यते तद्विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति ।
संख्यात्वरूप पर-सामान्य से अतिरिक्त एकत्वत्वादि अपर-सामान्य भी हैं,
उस प्रकार से पृथक्त्व में एकपृथक्त्वत्वादि नाम का कोई भी अपर-
सामान्य नहीं है; किन्तु पृथक्त्व संख्या के द्वारा ही औरों से अलग रूप
में समझा जाता है; क्योंकि पृथक्त्व का व्यवहार संख्या से युक्त होकर
ही देखा जाता है ।
न्यायकन्दली
तस्य तु नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः संख्यया व्याख्याताः । तस्य द्विविधस्यापि
पृथक्त्वस्य नित्यत्वं चानित्यत्वं च निष्पत्तिश्च संख्यया व्याख्याताः । यथैकद्रव्यैकत्वसंख्या
परमाणुषु नित्या कार्ये कारणगुणपूर्विका आश्रयविनाशाच्च नश्यति, तथैकद्रव्यमेक-
पृथक्त्वम् । यथा अनेकद्रव्या द्वित्वादिका संख्या अनेकगुणालम्बनाया अपेक्षाबुद्धेरुत्पद्यते
तद्विनाशाच्च विनश्यति, क्वचिच्चाश्रयविनाशाद्विनश्यति, तथानेकद्रव्यद्विपृथक्त्वादि-
कमपीत्यतिदेशार्थः । नित्यं चानित्यं च नित्यानित्ये, तयोर्भावो नित्यानित्यत्वमिति द्वन्द्वात्
परं श्रूयणात् त्वप्रत्ययस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धः । अत्रापि वाक्ये तुशब्दो विशेषावद्योत-
नार्थः । तस्य नित्यत्वादयः संख्यया व्याख्याताः, न परिमाणस्येत्यर्थः ।
'तस्य तु नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः संख्यया व्याख्याताः' अर्थात् इन दोनों प्रकार
के पृथक्त्वों के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय संख्या के नित्यत्व और
अनित्यत्व के निर्णय के अनुसार समझना चाहिए । अर्थात् जैसे कि कार्यद्रव्य में
रहनेवाली एकत्व रूप 'एकद्रव्या' संख्या अनित्य है; क्योंकि आश्रय के नाश से
उसका नाश हो जाता है और परमाणु में रहनेवाली वही संख्या नित्य है । वैसे
ही एकपृथक्त्व भी अनित्य और नित्य दोनों है । एवं जिस प्रकार द्वित्वादिरूप
'अनेकद्रव्या' संख्या अनेक एकत्वरूप गुणविषयक अपेक्षाबुद्धि से उत्पन्न होती है
और उस (अपेक्षा) बुद्धि के विनाश से विनष्ट होती है, उसी प्रकार द्विपृथक्त्वादि
भी उत्पन्न और विनष्ट होते हैं । संख्या के धर्मों का पृथक्त्व में 'अतिदेश' का यही
अभिप्राय है । 'नित्यानित्यत्व' शब्द में 'त्वल्' प्रत्यय "नित्यञ्चानित्यञ्च
नित्यानित्ये, तयोर्भावो नित्यानित्यत्वम्" इस तरह के द्वन्द्व समास के बाद किया
गया है, अतः उसका सम्बन्ध (प्रयोग केवल अनित्य पद के बाद होने पर भी) उस
द्वन्द्व समास में प्रयुक्त प्रत्येक पद के साथ है । इस वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द इस
विशेष की सूचना के लिए है कि पृथक्त्वादि के नित्यत्वादि तो संख्या से व्याख्यात
हो जाते हैं; किन्तु परिमाण के नित्यत्वादि नहीं ।

३३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे पृथक्त्व-
न्यायकन्दली
एवं संख्या सह पृथक्त्वस्य साधर्म्यं प्रतिपाद्य वैधर्म्यं प्रतिपादयति-
एतावांस्त्विति । संख्यायाः सकाशात् पृथक्त्वस्यैतावान् भेदो यथा संख्यात्वपर-
सामान्यापेक्षयैकत्वद्वित्वादिकमपरसामान्यमस्ति, तथा पृथक्त्वत्वपरसामान्यापेक्षयैकपृथक्त्व-
त्यादिकमपरसामान्यं नास्तीति । कथं तर्ह्यनेकेष्वेकपृथक्त्यादिव्यवान्तरप्रत्ययविशेषस्त-
त्राह-संख्या तु विशिष्यत इति । अयमेकः पृथग् द्वाविमौ पृथगित्यादिसंख्या-
विशिष्टो व्यवहारः पृथक्त्वे दृश्यते । तत्रैकत्र द्रव्ये वर्तमानं पृथक्त्वमेकार्थसमवेत-
यैकत्वसंख्यया विशिष्यते, तद्विशेषश्चावान्तरव्यवहारविशेषः, अनुवृत्तिप्रत्ययश्च पृथक्त्व-
सामान्यकृत एवेत्यभिप्रायः । एतेन परमाणुपरिमाणेऽपि परमाणुत्वं सामान्यं प्रत्याख्येयम्,
परमशब्दविशिष्टतादेयाणुत्वसामान्याद् व्यवहारानुगमोपपत्तेः । अथ कस्मात् सर्वद्रव्यानुगत-
मेकमेव पृथक्त्वमेकत्यादिसंख्याविशेषणभेदात् प्रत्ययभेदहेतुरिति नेष्यते ? नेष्यते,
इस प्रकार संख्या के साथ पृथक्त्व का साधर्म्य दिखला कर अब 'एतावांस्तु'
इत्यादि ग्रन्थ से संख्या से इसमें जो असाधारण्य है, उसका प्रतिपादन करते हैं ।
अर्थात् संख्या से पृथक्त्व में इतना ही अन्तर है कि संख्या में संख्यात्व रूप
परसामान्य के अतिरिक्त एकत्वत्व द्वित्वत्वादि और अपरजातियाँ भी हैं; किन्तु
पृथक्त्व में पृथक्त्वत्व रूप परसामान्य को छोड़कर एकपृथक्त्वत्वादि कोई अपर
सामान्य नहीं है । (प्र.) तो फिर द्विपृथक्त्यादि विभिन्न पृथक्त्वविषयक प्रतीतियों में
अन्तर क्यों कर होता है ? 'संख्या तु विशिष्यते' इत्यादि से इसी प्रश्न का
समाधान किया गया है । अभिप्राय यह है कि 'अयमेकः पृथक्, द्वाविमौ पृथक्'
इत्यादि स्थलों में पृथक्त्व का व्यवहार संख्या के साथ ही देखा जाता है । इनमें
एक ही द्रव्य में रहनेवाला पृथक्त्व अपने आश्रयरूप द्रव्य में समवायसम्बन्ध से
रहनेवाली एकत्वसंख्या के द्वारा ही और पृथक्त्वों से अलग रूप में समझा जाता है ।
उस संख्यारूप विशेष से ही एकपृथक्त्वविषयक प्रतीति में द्विपृथक्त्यादिविषयक
प्रतीतियों से अन्तर होता है । विभिन्न पृथक्त्वविषयक सभी प्रतीतियों में
एकाकारत्व की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) तो पृथक्त्वत्व सामान्य से ही होता है ।
इसी रीति से परमाणुओं में रहनेवाले परिमाण में परमाणुत्व जाति का खण्डन
करना चाहिए; क्योंकि ('परम' शब्द से युक्त सभी अणुओं में रहनेवाले अणुत्व
रूप पर) सामान्य से ही सभी परमाणुओं में परमाणुत्व के व्यवहार का अनुगम
होगा । (प्र.) इस प्रकार सभी द्रव्यों में रहनेवाला एक ही पृथक्त्व क्यों नहीं
मानते ? उसी से संख्यारूप विशेषण के बल से (एकपृथक्त्व, द्विपृथक्त्यादि) विशेष
प्रकार के व्यवहारों की उपपत्ति होगी । (उ.) इसलिए नहीं मानते हैं,
चूँकि क्रमशः उत्पन्न होनेवाले द्रव्यों में सामान्य की तरह (उत्पत्तिक्षण में ही)