वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३१
प्रशस्तपादभाष्यम्
च महदानीयतामिति विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति । अणुत्वह्रस्वत्वयोस्तु पर-
स्परतो विशेषस्तद्दर्शिनां प्रत्यक्ष इति । तच्चतुर्विधमपि परिमाणमुत्पाद्य-
माश्रयविनाशादेव विनश्यतीति ।
बोधक प्रमाण है । अणुत्व और ह्रस्वत्व के अन्तर का प्रत्यक्ष तो उसके
आश्रयीभूत (परमाणु एवं द्व्यणुक) के प्रत्यक्ष से युक्त पुरुष को ही होता
है । उत्पत्तिशील ये चारों प्रकार के परिमाण आश्रयों के विनाश से ही
विनाश को प्राप्त होते हैं ।
न्यायकन्दली
द्व्यणुकवर्तिनोरणुत्वह्रस्वत्वयोस्तु भेदो योगिनां प्रत्यक्ष इत्याह-अणुत्वह्रस्वत्वयो-
स्त्विति । अस्मदादीनां तु भाक्तयोरणुत्वह्रस्वत्वयोर्भेद तन्मुख्ययोरपि भेदानुमानम् । एतच्च-
तुर्विधमपि परिमाणमाश्रयविनाशादेव विनश्यति नान्यस्मादिति नियमः । उत्पाद्यग्रहणेन
परमाणुपरमह्रस्वपरममहत्परमदीर्घव्यवच्छेदः । अणुत्वमहत्त्वयोः दीर्घत्वह्रस्वत्वयोश्च परस्परा-
पेक्षाकृतत्वम्, न तु स्वाभाविकमिति चेत् ? तत्र केवलावस्थायां हस्तवितस्त्यादिपरिमितस्य
परिमाणस्य सापेक्षावस्थायामपि भेदानुपलब्धेः, उदयाभावप्रसङ्गाच्च । किमर्थं तर्ह्यपेक्षा ?
'अणुत्वह्रस्वत्वयोस्तु' इत्यादि से कहते हैं कि द्व्यणुक में रहनेवाले ह्रस्वत्व
एवं अणुत्व इन दोनों को योगीजन ही अपने (असाधारण) प्रत्यक्ष के द्वारा
देख सकते हैं । 'यह नियम है कि ये चारों प्रकार के उत्पन्न होनेवाले परिमाण
अपने-अपने आश्रयों के नाश से ही नष्ट होते हैं' । (इस अर्थ के ज्ञापक
वाक्य में) 'उत्पाद्य' पद के उपादान से (परमाणु में रहनेवाले) परमह्रस्वत्व
एवं परमाणुत्व तथा (आकाशादि में रहनेवाले) परममहत्त्व एवं परमदीर्घत्व
को (आश्रय के नाश से नष्ट होनेवाले परिमाणों से) पृथक् करते हैं । (प्र.) अणुत्व
एवं ह्रस्वत्व, दीर्घत्व एवं महत्त्व ये सभी तो आपेक्षिक हैं, स्वाभाविक नहीं । (उ.)
एक हाथ या एक बीता भर द्रव्य जिस समय केवलावस्था में रहते हैं (अर्थात्
किसी ऐसे दूसरे द्रव्य के साथ नहीं रहते जिनकी अपेक्षा इनमें ह्रस्वता या दीर्घता
का व्यवहार होता हो) और जब कि वही द्रव्य न्यून या अधिक परिमाणवाले
किसी दूसरे द्रव्य के साथ रहते हैं, तब उन दोनों अवस्थाओं के द्रव्य के परिमाण
में अन्तर की प्रतीति नहीं होती है एवं (एक की अपेक्षा से अगर दूसरे
की उत्पत्ति मानें तो, परस्परापेक्ष होने के कारण) इनकी उत्पत्ति ही असम्भव हो
जाएगी । (प्र.) (एक द्रव्य के परिमाण में ह्रस्वत्व या दीर्घत्व के व्यवहार के लिए)
दूसरे कीं अपेक्षा क्यों होती है ? (उ.) जिन दो परिमाणों में न्यूनाधिक
व्यवहार की प्रतीति उनके आश्रयीभूत द्रव्यों के ग्रहण से ही होती है, उन दोनों
परिमाणों में न्यूनाधिकभाव की प्रतीति के लिए ही दूसरे द्रव्य की अपेक्षा
३३२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे पृथक्त्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पृथक्त्वमपोद्धारव्यवहारकारणम् । तत्पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यं च ।
तस्य तु नित्यत्वानित्यत्वनिष्पत्तयः संख्या व्याख्याताः ।
'अपोद्धार' अर्थात् 'इससे यह पृथक् है' इस व्यवहार (ज्ञान और
शब्दप्रयोग) का कारण ही 'पृथक्त्व' है। यह भी १. एकद्रव्य और २.
अनेकद्रव्य भेद से दो प्रकार का है। इसके नित्यत्व और अनित्यत्व की
सिद्धि भी संख्या की भाँति ही समझनी चाहिए । (किन्तु संख्या से
पृथक्त्व में इतना ही अन्तर है कि) जिस प्रकार एकत्वादि संख्याओं में
न्यायकन्दली
प्रत्येकमाश्रयग्रहणे गृहीतयोरेव परिमाणयोः प्रकर्षभावाभावप्रतीत्यर्था, ययोरधिगमा-
दिदमस्माद्दीर्घमिदं ह्रस्वमिति व्यवहारः स्यात् ।
पृथक्त्वमपोद्धारव्यवहारकारणम् । अपोद्धारव्यवहार इदमस्मात् पृथगिति ज्ञानं
व्यपदेशश्च, तस्य कारणं पृथक्त्वमिति । व्याख्यानं पूर्ववत् । इतरेतराभावनििमित्तोऽयं
व्यवहार इति चेत्, न, प्रतिषेधस्य विधिप्रत्ययविषयत्वायोगात् । तत्पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यं
च। एकं द्रव्यमाश्रयो यस्य तदेकद्रव्यम्, अनेकं द्रव्यमाश्रयो यस्य तदनेकद्रव्यम्, पुनःशब्द
एकद्रव्यवृत्तेः परिमाणात् पृथक्त्वस्यैकानेकद्रव्यवृत्तित्वविशेषापद्योतनार्थः । परिमाणमेक-
द्रव्यम्, एकपृथक्त्वं पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यं चेति विशेषः ।
होती है, जिन दोनों की प्रतीति से 'इससे यह ह्रस्व है' या 'इससे यह दीर्घ है'
इत्यादि व्यवहार होते हैं ।
'पृथक्त्वमपोद्धारव्यवहारकारणम्' कथित व्याख्या की तरह 'यह इससे पृथक्
है' इस आकार का ज्ञान एवं इस आनुपूर्वी के शब्द का प्रयोग ये दोनों ही
'अपोद्धारव्यवहार' शब्द के अर्थ हैं । (प्र.) उक्त व्यवहार तो (अवधि और
आश्रय) इन दोनों में रहनेवाले भेद से ही होता है । (उ.) भेद से (पृथक्त्व की)
प्रतीति नहीं होती है; क्योंकि प्रतिषेध (अभाव) विधि प्रत्यय (बिना नञ्पद के
वाक्य) का विषय नहीं हो सकता । 'तत्पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यञ्च' इस वाक्य के
'एकद्रव्य' शब्द की व्युत्पत्ति 'एकं द्रव्यम् आश्रयो यस्य' इस प्रकार की है । उक्त
वाक्य के 'पुनः' शब्द से पृथक्त्व में परिमाण से इस अन्तर की सूचना दी गयी है
कि परिमाण एक ही आश्रय (द्रव्य) में रह सकता है; किन्तु पृथक्त्व दोनों प्रकार
का है । कोई पृथक्त्व एक ही द्रव्य में रहता है (जैसे कि एकपृथक्त्व) और कोई
पृथक्त्व अनेक द्रव्यों में रहता है (जैसे कि द्विपृथक्त्वत्वादि) ।