वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३०३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३०३
न्यायकन्दली
वित्तक्षणः स्वेनात्मना सह सर्वान् प्राणिनो युगपदुपलभ्यते । न च तेषां सार्वज्ञ्यज्ञानाभेद
इत्यनैकान्तिकत्वमिति चेत् ? न, अनियमात् । क्षणाभिप्रायेण तावद् ययोः सहोपलम्भस्त-
योरसौ नियत एव, क्षणयोः प्रत्येकं पुनरनुपलम्भात्; किन्तु स न विवक्षितः सन्ताना-
भिप्रायेण सहोपलम्भनियमः । न च सर्वज्ञसन्तानस्य चित्तान्तरसन्तानेन सह युगपदुप-
लम्भोऽस्ति, सर्वज्ञस्य कदाचित् स्वात्ममात्रप्रतिष्ठस्यापि सम्भवात् । न च तदानीमसर्वज्ञः,
सर्वज्ञात् सामर्थ्यसम्भवात् । अपचन्नपि पाचको यथा, तथा यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न
भिद्यते, यथात्मा ज्ञानस्य, वेद्यन्ते च नीलादयः । भेदे हि ज्ञानेनास्य वेद्यत्वं न स्यात् ,
तादात्म्यस्य नियमहेतोरभावात्, तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् । अन्येनान्यस्यासम्बद्धस्य
वेद्यत्वे चातिप्रसङ्गादिति भेदे नियमहेतोः सम्बन्धस्य व्यापकस्यानुपलब्ध्या भेदाद्विपक्षाद्
ही है, तात्त्विक नहीं; क्योंकि चन्द्र वस्तुतः एक ही है । (उ.) सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान
का क्षण तो अपने साथ सभी आत्माओं का ग्रहण करता है; किन्तु
सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान और आत्माओं में तो अभेद नहीं है, अतः 'सहोपलम्भ-
नियम' रूप हेतु व्यभिचरित है । (प्र.) यह व्यभिचार दोष नहीं है; क्योंकि यह
कोई नियम नहीं है कि सर्वज्ञ-चित्त-विषयक ज्ञान के साथ और सभी चित्त अवश्य
ही गृहीत हों । क्षण (प्रत्येक विज्ञान में भासित होनेवाले प्रत्येक क्षण में स्थित चित्त
या आत्मा) के अभिप्राय से जिन दोनों (सन्तानियों के समूह में स्थित प्रत्येक
व्यक्ति) के सहोपलम्भ का नियम है, उन दोनों में अभेद भी अवश्य ही है; क्योंकि
उन दोनों में से प्रत्येक की अलग से उपलब्धि नहीं होती है; किन्तु सर्वज्ञत्व ज्ञान
के समय जो और सभी आत्माओं की उपलब्धि होती है, वह सन्तान के अभिप्राय
से है, सन्तान (समूह) में स्थित प्रत्येक के अभिप्राय से नहीं; क्योंकि कभी सर्वज्ञत्व
की प्रतीति अगर आत्माओं को छोड़कर केवल स्वमात्रविषयक भी हो सकती है;
किन्तु इससे उस समय भी वह असर्वज्ञ नहीं हो जाता; क्योंकि उस समय भी उस
पुरुष से सर्वज्ञ पुरुष से होनेवाले असाधारण कार्य के सम्पादन की सम्भावना बनी
रहती है । जैसे कि पाक न करते समय भी रसोइया 'पाचक' कहलाता ही है ।
अतः जिस ज्ञान के द्वारा जो गृहीत होता है, वह उससे भिन्न नहीं है । जैसे कि
आत्मा ज्ञान से भिन्न नहीं है । नीलादि भी ज्ञात होते हैं । अतः नीलादि और
उनके ज्ञान अगर भिन्न हों तो फिर नीलादि उनसे ज्ञात ही नहीं होंगे । (घट-
विषयक ज्ञान से घट ही ज्ञात होता है इस) नियम का कारण (उक्त ज्ञान और
घटादि विषयों का) तादात्म्य तो है नहीं और उसकी उत्पत्ति भी नियामक नहीं है
(उत्पत्ति और अभेद ये दो ही व्याप्ति के ग्राहक हैं), परस्पर असम्बद्ध दो वस्तुओं
में से एक को अगर दूसरे का ज्ञापक मानें (घट ज्ञान से पट भी ज्ञात हो इत्यादि)
आपत्तियाँ होंगी, अतः ज्ञान और विषय इन दोनों में भेद का ज्ञापक और
३०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
व्यावर्तमानं वेद्यत्वमभेदेन व्याप्त इति हेतोः प्रतिबन्धसिद्धिरिति ।
एतेनाहमित्याकारस्यापि ज्ञानादभेदः समर्थितः । यच्चायं ग्राह्यग्राहकसंवित्तीनां पृथगव-
भासः स एकस्मिंश्चन्द्रमसि द्वित्वावभास इव भ्रमः । तत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्रवाहाभेद-
वासनैव निमित्तम् । यथोक्तम्-
"भेदश्चाभ्रान्तिविज्ञाने दृश्यतेन्दाविव द्वये" इति ।
ननु बाह्याभावे येयं नीलाद्याकारवती बुद्धिरुदेति तस्याः किं कारणम् ? यथोक्तम्-
अर्थबुद्धिस्तदाकारा सा त्याकारविशेषणा ।
सा बाह्यादन्यतो वेति विचारमिममर्हति ॥
अत्रापि वदन्ति-बाह्यसद्भावेऽपि तस्याः किं कारणम् ? नीलादिरर्थ इति
चेत् ? न तावदयं दृश्यतेऽर्थस्य सदातीन्द्रियत्वात् । कार्यवैचित्र्येण
कल्पनीय-इचेत् ? दृश्यस्य समनन्तरप्रत्ययस्यैव शक्तिवैचित्र्यं कल्प्यताम्, येनस्वप्न
ज्ञानेऽप्याकारवैचित्र्यं घटते, न हि तत्र देशकालव्यवहितानामर्थानां
भेद का व्यापक दोनों के सम्बन्ध की उपलब्धि नहीं होती है । ज्ञान के द्वारा समझ
में आनेवाले घटादि ज्ञान से भिन्न नहीं हो सकते । इस प्रकार वेद्यत्व भेदरूप विपक्ष
से हट जाता है एवं अभेद के साथ व्याप्त हो जाता है । 'अहम्' इस आकार के
ज्ञान का विषय (आत्मा) और ज्ञान के अभेद का भी समर्थन हो जाता है ।
विषय, प्रमाण एवं ज्ञान इनमें जो परस्पर भिन्नत्व की प्रतीति होती है, वह एक ही
चन्द्रमा में द्वित्व के अवभास की तरह भ्रम है । इस भ्रम में भी अनादि एवं सतत
प्रवाहित होनेवाली वासना ही कारण है । जैसा कहा है कि भ्रान्तिरूप ज्ञान में ही
चन्द्रमा में द्वित्व की तरह भेद भासित होता है । अगर नीलादि बाह्य विषयों की
सत्ता ही नहीं है तो फिर नीलादि आकारों से युक्त इन विविध बुद्धियों का कारण
कौन है ? जैसा कहा है कि "अर्थविषयक बुद्धि अर्थाकार होती है", अतः बुद्धि
आकाररूप विशेषण से युक्त अवश्य है, अतः यह विचार उठता है कि यह
आकारविशिष्ट बुद्धि बाह्य वस्तु से होती है या और किसी वस्तु से ? इस
विषय में विज्ञानवादी कहते हैं कि (प्र.) बाह्य वस्तुओं की सत्ता मान लेने के पक्ष
में आकारविशिष्ट बुद्धि का कारण कौन होगा ? अगर नीलादि अर्थों को
कारण मानें तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि वे कभी देखे नहीं जाते ; क्योंकि
अर्थ सदा ही इन्द्रिय के अगोचर हैं । अगर कार्यों की विचित्रता से उसका
अनुमान करते हैं तो फिर अतीन्द्रिय अर्थ में उस शक्ति की कल्पना क्यों नहीं कर
लेते ? जिससे कि स्वप्नज्ञान में भी आकार की विचित्रता की उपपत्ति हो
सके । स्वप्नज्ञान में भासित होनेवाले एवं देश और काल से व्यवहित विषयों में