वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
पेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता, द्वित्वसामान्यतत्सम्बन्धतज्ज्ञानेभ्यो द्वित्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमा-
नेतेत्येकः कालः । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशाद् द्वित्वगुणस्य
अपेक्षाबुद्धि के विनाश की सम्भावना उत्पन्न होती है । द्वित्व
संख्यारूप गुण का द्वित्वसामान्य के साथ सम्बन्ध और
द्वित्व गुण में द्वित्वसामान्य का ज्ञान इन सबों से गुणरूप द्वित्व-
विषयक बुद्धि की उत्पत्ति की सम्भावना, इतने काम एक काल में होते
हैं । इसके बाद उसी समय अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुणरूप द्वित्व
न्यायकन्दली
चास्योपलक्षणाद्विशेषः । उपलक्षणमपि व्यवच्छिनत्ति, न तु स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुः । न
हि यथा दण्डीति दण्डोपसर्जनता पुरुषे प्रतीयते तथा जटाभिस्तापस इति तापसे जटोप-
सर्जनता, दण्डोपसर्जनतापुरुषस्य प्राधान्यं चार्थक्रियायामुपभोगातिशयाऽनतिशायापेक्षया ।
नन्वेवं तर्ह्यापेक्षिकोऽयं विशेषणविशेष्यभावो न वास्तवः, किं न दृष्टो भवद्भिः कर्तृ-
करणादिव्यवहार आपेक्षिको वास्तवश्चेति कृतं विस्तरेण संग्रहटीकायाम् ।
द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता । उभयगुणालम्बना बुद्धिरपेक्षा-
बुद्धिरित्युच्यते । तस्या द्वित्वसामान्यज्ञानाद्विनश्यत्ता विनाशकारणसान्निध्यं
द्वित्वसामान्यात् । तस्य द्वित्वगुणेन सह सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च द्वित्वगुणबुद्धे-
अपने आश्रय को दूसरों से भिन्न रूप में समझाता तो है; किन्तु उसमें अपनी
उपसर्जनता की प्रतीति को उत्पन्न नहीं करता; क्योंकि 'दण्डी' इस प्रतीति से जिस
प्रकार पुरुष में दण्डरूप विशेषण की उपसर्जनता प्रतीत होती है, उसी प्रकार
'जटाभिस्तापसः' इस प्रकार के स्थलों में जटादि से युक्त तापसादि का जटा से
शून्य तापसादि से विलक्षण रूप में भान यद्यपि होता है, फिर भी जटादि
उपलक्षणों की उपसर्जनता की प्रतीति तापसादि में नहीं होती । दण्ड से युक्त
(दण्डी) पुरुष में दण्ड से रहित पुरुष की अपेक्षा विशेष प्रकार का उपभोग
मिलता है, इसी दृष्टि से दण्डी पुरुष में प्रधानता और दण्ड में उपसर्जनता है ।
(प्र.) तो फिर यह कहिये कि विशेष्यविशेषणभाव आपेक्षिक है, वास्तविक नहीं ?
(उ.) क्या आप लोगों ने कर्तृत्वकरणत्वादि के आपेक्षिक, वास्तविक दोनों
प्रकार के व्यवहार नहीं देखे हैं ? टीकादि रूप संग्रह ग्रन्थों में इससे अधिक
लिखना व्यर्थ है ।
(द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता) गुणस्वरूप दो एकत्वों को विषय करनेवाले
एक ज्ञान को 'अपेक्षाबुद्धि' कहते हैं । जातिस्वरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) के ज्ञान से उसकी
(अपेक्षाबुद्धि की) 'विनश्यत्ता' अर्थात् उसको विनष्ट करनेवाले कारणों की समीपता
संघटित होती है (फलतः विनाश को उत्पन्न करनेवाली सामग्री का संवलन होता है) ।
२८० न्यायकन्दलीसंविलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनश्यत्ता, द्वित्वगुणज्ञानम्, द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणम्, द्वित्व-
गुणतज्ज्ञानसम्बन्धेभ्यो द्वे द्रव्ये इति द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।
के विनाश की सामग्री का संवलन, गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, सामान्यरूप
द्वित्वविषयक ज्ञान के विनाशक गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, गुणरूप द्वित्व और
उसका ज्ञान एवं गुणरूप द्वित्व का (अपने आश्रय द्रव्य के साथ) सम्बन्ध
इन तीनों से 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यविषयक ज्ञान की सामग्री का
न्यायकन्दली
रुत्पद्यमानता उत्पत्तिकारणसान्निध्यम् । द्वित्वसामान्यज्ञानमपेक्षाबुद्धेर्विनाशकं गुणबुद्धेर्भो-
त्पादकम् । तेन तदुत्पत्तिरेवैकस्य विनश्यत्तापरस्य चोत्पद्यमानतेत्युपपद्यते विनश्यत्तोत्पद्य-
मानतयोरेककालत्वम् । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वविनाशस्य कारणम्, तत्सद्भावे
तस्यानुपलम्भात् । अतोऽपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वस्य विनश्यत्ता । दृष्टो गुणानां निमित्त-
कारणादपि विनाशो यथा मोक्षप्राप्त्यवस्थायामन्त्यतत्त्वज्ञानस्य शरीरविनाशात् ।
द्वित्वगुणज्ञानं द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणं बुद्धेर्बुद्ध्यन्तर-
विरोधात् । तथा द्रव्यज्ञानस्यापि कारणम् । अतो गुणबुद्ध्युत्पाद
एवैकस्योत्पद्यमानताऽपरस्य विनश्यत्ता स्यात् । द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्य इति ।
जातिरूप द्वित्व का गुणस्वरूप द्वित्व के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध का ज्ञान इन
दोनों से गुणस्वरूप द्वित्व की 'उत्पद्यमानता' अर्थात् द्वित्व संख्या को उत्पन्न करने
वाले कारणसमूह परस्पर समीप हो जाते हैं (द्वित्वोत्पत्ति की सामग्री एकत्र हो
जाती है) । जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) का ज्ञान अपेक्षाबुद्धि का नाशक एवं
गुणस्वरूप द्वित्व (संख्या) विषयक बुद्धि का उत्पादक भी है, अतः जातिरूप द्वित्व-
विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक (अपेक्षाबुद्धि) की 'विनश्यत्ता' एवं दूसरे
(गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि) की उत्पद्यमानता दोनों ही है । सुतराम् उक्त
विनश्यत्ता एवं उक्त उत्पद्यमानता दोनों का एक ही समय रहना युक्ति से सिद्ध है
(असङ्गत नहीं) । उसके बाद के क्षण में अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, यही (नाश)
द्वित्व के नाश का कारण है; क्योंकि अपेक्षाबुद्धि के विनाश के बाद द्वित्व की
उपलब्धि नहीं होती है, अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश ही द्वित्वबुद्धि की
'विनश्यत्ता' है । जिस प्रकार मोक्षप्राप्ति की अवस्था में शरीररूप निमित्तकारण के
विनाश से अन्तिम तत्त्वज्ञानरूप गुण का विनाश होता है, उसी प्रकार (यह मानना
पड़ेगा कि) निमित्तकारण के विनाश से भी अन्य गुणों का विनाश होता है ।
गुणस्वरूप द्वित्व का ज्ञान जातिरूप द्वित्वविषयक ज्ञान का विनाशक है,
क्योंकि एक बुद्धि दूसरी बुद्धि की विनाशिका है । एवं (गुणस्वरूप द्वित्वविषयक यह