वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५३
न्यायकन्दली
रविशेषात् । तस्मात् पूर्वं द्रव्यस्य विनाशस्तदनु रूपस्य, आशुभावात् क्रमस्याग्रहणमिति
युक्तमुत्पश्यामः ।
ये तु रूपद्रव्ययोस्तादात्म्यमिच्छन्तो द्रव्यकारणमेव रूपस्य कारण-
माहुस्ते इदं प्रष्टव्याः-किं परमाणुरूपं रूपान्तरमारभते न वा ? आरभ-
माणमपि किं स्वात्मन्यारभते ? किं वा स्वाश्रये परमाणौ ? यदि नारभते ? यदि
वा स्वात्मनि स्वाश्रये चारभते ? द्व्यणुके रूपानुत्पत्तौ तत्पूर्वकं जगद्रूपं स्यात् । अथ
तद् द्व्यणुके आरभते, अविद्यमानस्य स्वाश्रयत्वायोगादुत्पन्ने द्व्यणुके पश्चात्तत्र
रूपोत्पत्तिरित्यवश्यमभ्युपेतव्यम्, निराश्रयस्य कार्यस्यानुत्पादात् । तथा सति तादा-
त्म्यं कुतः ? पूर्वापरकालभावात् । किञ्चावस्थित एवँ घटे रूपादयो वह्निसंयोगाद्वि-
नश्यन्ति तथा सति जायन्ते चेति भवतामभ्युपगमः, यस्य चोत्पत्तौ यस्यानुत्पत्ति-
रहनेवाले रूप के प्रति कारण न होते हुए भी अवयवों का संयोग अपने नाश से
अवयवी में रहनेवाले रूप का नाश कर सकता है, तो फिर वही संयोग कपालादि
अवयवों में रहनेवाले रूप का नाश क्यों नहीं कर सकता ? अतः हम यही युक्त
समझते हैं कि पहले द्रव्य का नाश होता है, उसके बाद तद्गत गुण का नाश होता
है । द्रव्य एवं तद्गत गुण के नाश का यह क्रम मालूम इसलिए नहीं पड़ता है कि
दोनों के मध्य में अत्यन्त थोड़े समय का व्यवधान रहता है ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि (प्र.) द्रव्य एवं गुण दोनों अभिन्न हैं, अतः जो
द्रव्य का कारण है, वही गुण का भी कारण है । (उ.) उनसे यह पूछना चाहिए
कि परमाणुओं के रूप किसी दूसरे रूप को उत्पन्न करते हैं या नहीं ? अगर
उत्पन्न करते हैं तो कहाँ ? अपने में ही ? या अपने आश्रय परमाणु में ? अगर
यह मान लें कि परमाणु के रूप किसी भी दूसरे रूप को उत्पन्न नहीं करते हैं या
फिर यही मान लें कि परमाणु के रूप अपने आश्रय में एवं अपने में भी रूप को
उत्पन्न करते हैं-हर हालत में द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति न हो सकेगी, जिससे
समूचे जगत् को ही रूपशून्य मानना पड़ेगा । अगर परमाणुओं के रूप से द्वयणुक
में रूप की उत्पत्ति मानें .तो फिर द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति के पहले द्वयणुक
की उत्पत्ति माननी ही होगी । अतः यही कहना पड़ेगा कि द्वयणुक के उत्पन्न
हो जाने पर पीछे उसमें रूपादि की उत्पत्ति होती है; क्योंकि बिना आश्रय के
कार्य की उत्पत्ति नहीं होती । अगर यह स्थिति है तो फिर रूप (गुण) और
द्रव्य का अभेद कैसा ? क्योंकि द्रव्य पहले उत्पन्न होता है और रूप पीछे ।
और भी बात है, वह्नि के संयोग से घटगत रूप का नाश घट के रहते ही हो
जाता है, अतः यही मानना पड़ेगा कि अग्नि के संयोग से ही उसी घट में दूसरे
रूप की उत्पत्ति होती है । अतः यही रीति माननी होगी कि जिसकी उत्पत्ति से
२५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्पर्श-
प्रशस्तपादभाष्यम्
रसो रसनग्राह्यः पृथिव्युदकवृत्तिर्जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तं रसनसहकारी
मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत्।
रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला (गुण ही) 'रस' है । वह पृथिवी
और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है एवं जीवन, पुष्टि, बल और
आरोग्य का कारण है । प्रत्यक्ष के उत्पादन में रसनेन्द्रिय का सहायक
है । वह मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त भेद से छः
प्रकार का है । नित्यत्व एवं अनित्यत्व के प्रसङ्ग में इसकी सभी बातें
रूप की तरह हैं ।
न्यायकन्दली
र्यन्निवृत्तौ चानिवृत्तिर्न तयोस्तादात्म्यमिति प्रक्रियेयम् । न चात्यन्तभेदे पृथगुपलम्भ-
प्रसङ्गः, सर्वदा रूपस्य द्रव्याश्रितत्वात् । एतदेव कथम् ? वस्तुस्वाभाव्यादिति
कृतं गुरुप्रतिकूलवादेन ।
सम्प्रति बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यस्य प्रत्यक्षद्रव्यवृत्तेर्विशेषगुणस्य निरूपण-
प्रसङ्गेन रसगन्धयोर्व्याख्यातव्ययोरुभयद्रव्यवृत्तित्वाविशेषेणादौ रूपं व्याख्याय
रसं व्याचष्टे-रसो रसनग्राह्य इति । गुणेषु मध्ये रस एव रसनग्राह्यो रसनग्राह्य
एते रसः । पृथिव्युदकवृत्तिः । पृथिव्युदकयोरेव वर्तते । जीवनपुष्टिबला-
ही जिसकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो जाती एवं जिसके विनाश से ही जिसका विनाश
सिद्ध नहीं हो जाता, वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते । (प्र.) अगर रूप और द्रव्य
अत्यन्त भिन्न हैं, तो द्रव्य को छोड़कर भी रूप की प्रतीति होनी चाहिए । (उ.)
नहीं; क्योंकि रूप सभी कालों में द्रव्य में ही रहता है । (प्र.) यहीं क्यों होता है ?
(उ.) यह तो वस्तुओं का स्वभाव है । गुरुचरणों के विरुद्ध व्यर्थ की बातों को
बढ़ाना व्यर्थ है ।
अब एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले एवं प्रत्यक्ष योग्य द्रव्यों में ही
रहने वाले गुणों का निरूपण करना है । इस प्रसङ्ग में रस और गन्ध इन दोनों
की व्याख्या समान रूप से प्राप्त हो जाती है; किन्तु इन दोनों में गन्ध एक ही द्रव्य
में रहता है और रस दो द्रव्यों में, इस विशेष के कारण रूप के निरूपण के बाद और
गन्ध के निरूपण से पहले 'रसो रसनग्राह्यः' इत्यादि से रस का निरूपण करते हैं । गुणों
में से केवल रस ही रसनेन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः रसनेन्द्रिय से गृहीत होने-
वाला गुण ही रस है । 'पृथिव्युदकवृत्तिः' अर्थात् यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में
रहता है । 'जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तम्' प्राण के धारण को 'जीवन' कहते हैं । शरीर
के अवयवों की वृद्धि ही 'पुष्टि' है । विशेष प्रकार के उत्साह को 'बल' कहते हैं ।