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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २११

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २११
न्यायकन्दली
तथात्मैकत्वेऽपि देहभेदादनुभवादिव्यवस्थेति चेत् ? विषमोऽयमुपन्यासः, प्रतिपुरुषं
व्यवस्थिताभ्यां धर्म्माधर्म्माभ्यामुपगृहीतानां शब्दोपलब्धिहेतूनां कर्णशष्कुलीनां व्यवस्था-
नायुक्ता तदधिष्ठाननियमेन शब्दग्रहणव्यवस्था । ऐकात्म्ये तु धर्म्माधर्म्मयोरव्यव-
स्थानाच्छरीरव्यवस्थाभावे किं कृता सुखदुःखोत्पत्तिव्यवस्था ? मनस्सम्बन्धस्यापि
साधारणत्वात् । यस्य तु नानात्मानः, तस्य सर्वेषामात्मनां सर्वगतत्वेन सर्वशरीर-
सम्बन्धेऽपि न साधारणो भोगः । यस्य कर्म्मणा यच्छरीरमारब्धं तस्यैव तदुपभोगायतनं न
सर्वस्य, कर्मापि यस्य शरीरेण तस्यैव तद्भवति नापरस्य, एवं शरीरान्तरनियमः
कर्म्मान्तरनियमादित्यादिः । अथ मतम्, एकत्वेऽपि परमात्मनो जीवात्मनां परस्परभेदाद्
व्यवस्थेति तदसत्, परमात्मनो भेदेऽद्वैतसिद्धान्तक्षतिः, "अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरवाणि" इति जीवपरमात्मनोस्तादात्म्यश्रुतिविरोधाच्च । अविद्याकृतो
जीवपरमात्मनोर्भेद इति चेत् ? कस्येयमविद्या ? किं ब्रह्मणः ? किमुत जीवानाम् ?
के लिए आत्मा को नाना मानने की आवश्यकता नहीं है) । (उ.) प्रत्येक पुरुष के
शब्दोपलब्धि के अदृष्ट से कर्णशष्कुली रूप कारण की कल्पना की गयी है ।
अतः यह ठीक है कि उसी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से युक्त आकाश
(श्रवणेन्द्रिय) से ही शब्द का प्रत्यक्ष होता है, औरों से नहीं; किन्तु आत्मा को एक
मान लेने से धर्म और अधर्म की कोई व्यवस्था नहीं रहेगी, फिर सुखदुःखादि की
भी व्यवस्था नहीं होगी, फिर सुखदुःखादि का भी नियम नहीं रहेगा; क्योंकि मन
का सम्बन्ध तो सभी देहों में समान ही है, अतः उक्त आक्षेप असङ्गत है ।
यद्यपि जिनके मत में आत्माएँ अनेक हैं, उनके मत में भी (व्यापक होने के
कारण प्रत्येक) आत्मा सभी मूर्त द्रव्यों के साथ सम्बद्ध है, फिर भी भोग के
सर्वसाधारणत्व की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि जिस आत्मा के कर्म (अदृष्ट)
से जो शरीर उत्पन्न होगा वह शरीर उसी आत्मा के भोग का 'आयतन'
होगा, दूसरी आत्माओं के भोग का नहीं एवं जिस आत्मा के शरीर से जो कर्म
(अदृष्ट) उत्पन्न होगा, वह कर्म उसी आत्मा का होगा और आत्माओं का नहीं ।
इसी प्रकार अन्य शरीर और अन्य कर्मों की भी व्यवस्था समझनी चाहिए । (प्र.)
जीवात्मा और परमात्मा ये दो मान लेने से ही (शरीर भेद से अनन्त जीव न
मानने पर भी) सभी व्यवस्थायें ठीक हो जाती हैं ? (उ.) यह मान लेने पर
भी अद्वैत सिद्धान्त तो विघटित हो ही जायगा । एवं 'अनेन जीवेन' इत्यादि
श्रुतियाँ भी विरुद्ध हो जायेंगी । (प्र.) जीव और ईश्वर वास्तव में तो अभिन्न ही
हैं; किन्तु 'अविद्या' से अर्थात् अज्ञान से दोनों में भेद की कल्पना की जाती है ।
(उ.) यह अविद्या किसकी ? जीव की ? या ब्रह्म की ? ब्रह्म की तो

२१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्यायकन्दली
न तावद् ब्रह्मणोऽस्त्यविद्यायोगः, शुद्धबुद्धस्वभावत्वात् । जीवाश्रयाविद्येति चान्योन्या-
श्रयदोषपराहतम्, अविद्याकृतो जीवभेदो जीवाश्रयाविद्येति । बीजाङ्कुरवदनादिरविद्या
जीवप्रभेद इति चेत् ? बीजाङ्कुरव्यक्तिभेदवदविद्याजीवयोः पारमार्थिकत्वाभावानुपपन्नं
व्यक्तिभेदेन च बीजाङ्कुरयोरन्योन्यकारणता, जीवस्तु सर्वासु भवकोटिष्वेक एव,
मानुषपशुपक्ष्यादियोनिप्रत्यग्रजातस्य शिशोर्जातिसाम्यादाहारविशेषाभिलाषेण तासु तासु
जातिषु जन्मान्तरकृतस्य तत्तदाहारविशेषस्यानुमानपरम्परया तस्यानादिशरीरयोग-
प्रतीतेः, तत्राविद्याकृतो जीवभेदो जीवभेदाच्चाविद्येत्यसङ्गतिः । ब्रह्मवज्जीवस्याप्य-
नादिनिधनत्वेन ब्रह्मप्रतिबिम्बता, तस्मात् "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं
विभाति" इति श्रुतिप्रामाण्यादनादिनिधनं ब्रह्मतत्त्वमेवेदं सर्वदेहेषु प्रतिभासत इति न
वाच्यम्, तथा सति चानुपपन्ना व्यवस्थितिरिति सूत्रं 'नानात्मानो व्यवस्थतः' इति ।
वह हो नहीं सकती है; क्योंकि वे शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव के हैं । अगर
अविद्या का आश्रय जीव को मानें, तो फिर अन्योन्याश्रय दोष होगा; क्योंकि
अविद्या से ही जीव की कल्पना की जाती है और वह अविद्या उसी में आश्रित
है । अविद्या के रहने से ही वह जीव होगा एवं जीव के रहने से ही अविद्या की
सत्ता रहेगी, इन दोनों में पहले कौन होगा ? और पीछे कौन ? यह निर्णय
असम्भव है, अतः इस निर्णय के बल पर कोई भी निर्णय सम्भव नहीं है । (प्र.)
बीज और अङ्कुर की तरह जीव और अविद्या का सम्बन्ध भी अनादि है । (उ.)
जब बीज और अङ्कुर नाम की दो स्वतन्त्र वस्तु है, तब यह स्वीकार करना
पड़ता है कि अङ्कुर के कारण बीज का भी कोई दूसरा अङ्कुर ही कारण है ।
अतः अन्योन्याश्रय से दूषित होते हुए भी बीज और अङ्कुर का सामान्य
कार्यकारणभाव मानना पड़ता है; किन्तु जीव और अविद्या वास्तव में दो व्यक्ति
नहीं हैं, अतः यहाँ अन्योन्याश्रयदोष को सह्य करना उचित नहीं है । (प्र.)
संसार के सभी देहों में जीव एक ही है । मनुष्य, पशु, पक्षी प्रभृति जिस योनि में
अभी उसका जन्म होता है, उस जाति के विशेष प्रकार के भोजन की अभिलाषा
से उस जीव में इससे पहले जन्म में भी इस प्रकार के आहार का अनुमान होता
है और यही अनुमान की परम्परा जीव में शरीर के अनादि सम्बन्ध को
प्रमाणित करती है । (उ.) इस पक्ष में भी अविद्या के कारण जीवों में भेद एवं
जीवभेद के कारण अविद्या, यह असङ्गति है ही । (प्र.) ब्रह्म की तरह जीव भी
आदि और अन्त से रहित है, फलतः जीव ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है । "तमेव
भान्तम्" इत्यादि श्रुतियाँ भी इस अर्थ को पुष्ट करती हैं, अतः आदि और अन्त
से रहित ब्रह्मतत्त्व ही सभी देहों में प्रतिभासित होता है । (उ.) इस पक्ष में भी