वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २०५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २०५
प्रशस्तपादभाष्यम्
त्यादयावद्द्रव्यभावित्वाद् बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वाच्च, तथाऽहंशब्देनापि पृथिव्यादि-
शब्दव्यतिरेकादिति ।
(३) जब तक उनके आश्रय विद्यमान रहें, तब तक रहते ही नहीं हैं
(अयावद्द्रव्यभावी हैं) । (४) एवं बाह्य इन्द्रियों से उनका प्रत्यक्ष नहीं
होता है । १०. 'अहम्' शब्द से भी आत्मा का अनुमान होता है;
क्योंकि पृथिवी प्रभृति अन्य द्रव्यों के लिए 'अहम्' शब्द का मुख्य प्रयोग
कहीं नहीं देखा जाता है ।
न्यायकन्दली
प्रत्यक्षप्रत्ययत्वात्, तस्मान्न सुखादयोऽपि न शरीरेन्द्रियविषयाः । किञ्च, योऽनुभविता
तस्यैव स्मरणमभिलाषः, सुखसाधनपरिग्रहः, सुखोत्पत्तिः, दुःखप्रद्वेष इति सर्वशरीरिणां
प्रत्यात्मसंवेदनीयम् । अनुभवस्मरणे च न शरीरेन्द्रियाणामित्युक्तम् । ततोऽपि सुखादयो न
तद्विषयाः । युक्त्यन्तरञ्चाह-प्रदेशवृत्तित्वादिति । दृश्यते प्रदेशवृत्तित्वं सुखादीनां पादे मे
सुखं शिरसि मे दुःखमिति प्रत्ययात् । ततश्च शरीरेन्द्रियगुणत्वाभावः । तद्विशेषगुणानां
व्याप्यवृत्तित्वाव्यभिचारात् । सुखादयः शरीरेन्द्रियविशेषगुणा न भवन्ति, अव्याप्यवृत्तित्वात् ।
ये तु शरीरेन्द्रियविशेषगुणास्ते व्याप्यवृत्तयो दृष्टाः, यथा रूपादयः, न च तथा सुखादयो
व्याप्यवृत्तयः, तस्मान्न शरीरेन्द्रियगुणा इति व्यतिरेकी । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नस्य नभोदेशस्य
में 'हेतु' और 'शब्द' इन दोनों की (अर्थात् अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण
की) अपेक्षा नहीं है । (यतः शरीर और इन्द्रिय अहम् प्रत्यय के विषय नहीं हैं)
अतः सुखादि भी शरीर और इन्द्रिय के धर्म नहीं हैं । एवं यह सभी शरीरधारियों
का अनुभव है कि स्मरण, अभिलाषा, सुख के साधनों का ग्रहण, सुख की
उत्पत्ति, दुःख के प्रति द्वेष प्रभृति अनुभव करने वाले को ही होते हैं । यह कह
चुके हैं कि अनुभव और स्मरण दोनों शरीर और इन्द्रियों को नहीं हो सकते ।
इस हेतु से भी शरीरादि सुखादि के आश्रय नहीं हैं । 'सुखादि के आश्रय
शरीरादि नहीं हैं' इसमें 'प्रदेशवृत्तित्वात्' इत्यादि से दूसरी युक्ति भी देते हैं । 'पैर
में सुख है और शिर में वेदना है' इत्यादि प्रतीतियों से समझते हैं कि
सुखादि प्रदेशवृत्ति हैं, अर्थात् अपने आश्रय के किसी एकदेश में ही रहते हैं । इससे
यह सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर इन्द्रियों के गुण नहीं हैं; क्योंकि सुखादि
विशेष गुण कभी 'व्याप्यवृत्ति' अर्थात् अपने आश्रय के समस्त अंशों में रहनेवाले
नहीं होते । शरीर और इन्द्रियों के जितने भी विशेष गुण हैं, सभी व्याप्यवृत्ति
अर्थात् अपने आश्रय के सभी अंशों में रहने वाले होते हैं, जैसे कि रूपादि ।
सुखादि रूपादि-विशेष गुणों की तरह व्याप्यवृत्ति नहीं हैं, अतः सुखादि शरीर और
इन्द्रियों के गुण नहीं हैं । यह व्यतिरेक व्याप्तिजनित अनुमान भी ('सुखादि
२०६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्यायकन्दली
श्रोत्रेन्द्रियभावमापन्नस्य यश्शब्दो गुणो भवति स तद्विवरव्यापीत्यव्यभिचारः । इतोऽपि न
शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो भवन्ति, अयावद्द्रव्यभावित्वात्, व्यतिरेकेण रूपादय एव
निदर्शनम् । इन्द्रियगुणप्रतिषेधे तु नायं हेतुः, श्रोत्रगुणेन शब्देनानैकान्तिकत्वात् । इतोऽपि
न शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वात् । शरीरेन्द्रियगुणानां द्वयी गतिः-
अप्रत्यक्षता गुरुत्वादीनाम्, बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षता रूपादीनाम् । विधान्तरन्तु सुखादयस्तस्मान्न
तद्गुणा इति शरीरेन्द्रियगुणत्वे प्रतिषिद्धे परिशेषात्तैरात्मानुमीयत इति स्थितिः ।
ननु सुखं दुःखञ्चेमौ विकाराविति नित्यस्यात्मनो न सम्भवतः । भवतश्चेत्
सोऽपि चर्म्मवदनित्यः स्यात् । न, तयोरुत्पादविनाशाभ्यां तदन्यस्यात्मनः
शरीरादि के गुण नहीं हैं') इसका साधक है । यद्यपि आकाशरूपी विभु-श्रोत्रेन्द्रिय
का विशेष गुण शब्द अव्याप्यवृत्ति प्रतीत होता है, तथापि विभु आकाश श्रोत्रेन्द्रिय
नहीं है; किन्तु कर्णशष्कुली से सीमित आकाश ही श्रोत्रेन्द्रिय है और इस आकाश
में शब्द व्याप्यवृत्ति ही है । अतः 'इन्द्रियादि के विशेष गुण अवश्य ही व्याप्यवृत्ति
होते हैं' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । 'सुखादि शरीर और इन्द्रियों के
गुण नहीं हैं' इसमें यह हेतु भी है कि 'वे अयावद्द्रव्यभावी' हैं (अर्थात् वे
आश्रयरूप द्रव्य के विद्यमान समय तक बराबर नहीं रहते ), अयावद्द्रव्यभावित्व
हेतु के न्याय-प्रयोग में भी रूपादि ही व्यतिरेक दृष्टान्त हैं । 'सुखादि इन्द्रिय के
विशेष गुण नहीं हैं' अयावद्द्रव्यहेतुक अनुमान इसका साधक नहीं है (इस
अनुमान से केवल यही सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर के गुण नहीं हैं); क्योंकि
यह हेतु श्रोत्रेन्द्रिय के शब्दरूप गुण में व्यभिचरित है । इस हेतु से भी सुखादि
शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं; क्योंकि सुखादि का बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष
नहीं होता है । वस्तुस्थिति यह है कि शरीर और इन्द्रियों के गुण दो ही प्रकार के
हैं-(१) किन्हीं गुणों का तो किसी भी प्रकार प्रत्यक्ष ही नहीं होता है, जैसे कि
गुरुत्वादि का, या फिर (२) बाह्य इन्द्रियों से ही प्रत्यक्ष होता है, जैसे कि रूपादि
का । सुखादि दोनों प्रकारों से भिन्न तीसरे प्रकार के हैं, अतः शरीरादि के गुण
सुखादि नहीं हैं । इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि 'सुखादि शरीर और
इन्द्रियों के गुण नहीं हैं' इन सुखादि हेतुओं से होनेवाले परिशेषानुमान से भी
आत्मा का अनुमान होता है ।
(प्र.) सुख और दुःख ये दोनों तो विकार हैं, अतः वे नित्य आत्मा के गुण नहीं
हो सकते, अगर विकारस्वरूप सुखादि भी आत्मा के गुण हों, तो फिर आत्मा चर्म
की तरह अनित्य वस्तु होगी । (उ.) नहीं, क्योंकि सुख और दुःख दोनों की
उत्पत्ति और विनाश से उन दोनों से भिन्न आत्मा के स्वरूप में कोई विघटन नहीं