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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १९
न्यायकन्दली
मभ्यस्यतः प्रकृष्टविनिवर्त्तकधर्मोपचये सति परिपक्वात्मज्ञानस्यात्यन्तिकशरीरवियोगस्य
भावात् । दृष्टो विषयाणामहिकण्टकादीनां परित्यागो विशेषदोषदर्शनपूर्वकाभि-
सन्धिकृतनिवर्त्तकात्मविशेषगुणात् प्रयत्नात् । तेन शरीरादीनामात्यन्तिकः परित्यागो
विषयदोषदर्शनपूर्वकाभिसन्धिकृतनिवर्त्तकात्मविशेषगुणनिमित्तो विज्ञात इति मोक्षाधिकारे
वक्ष्यामः ।
धर्मोऽपि तावन्न निःश्रेयसं करोति यावदीश्वरेच्छया नानुगृह्यते । तेनेदमुक्तम्-
"ईश्वरचोदनाभिव्यक्ताद्धर्मादिवे"ति । चोद्यन्ते प्रेर्यन्ते स्वकार्येषु प्रवर्त्यन्तेऽनया भावा
इति चोदना ईश्वरचोदना ईश्वरेच्छाविशेषः । अभिव्यक्तिः कार्यारम्भं प्रत्याभिमुख्यम् ।
ईश्वरचोदनायाभिव्यक्तादीश्वरचोदनाभिव्यक्ताद् ईश्वरेच्छाविशेषेण कार्यारम्भाभिमुखीकृता-
द्धर्मादेव निःश्रेयसं भवतीति वाक्ययोजना । तच्चेति चकारो द्रव्यादिसाधर्म्यज्ञानेन सह
धर्मस्य निःश्रेयसहेतुत्वं समुच्चिनोति ।
निष्काम कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ आत्म-ज्ञान का अभ्यास करता है । इन
आचरणों से निवृत्तिजनक धर्म की वृद्धि होने पर जब आत्मज्ञान परिपक्व हो
जाता है, तब उससे (आत्मा का ) शरीर के साथ अत्यन्त-वियोग (मोक्ष) की
उत्पत्ति होती है । यह देखा जाता है कि सर्प और कण्टकादि पदार्थों में पहले इस
प्रकार के दोष का ज्ञान होता है कि ये सभी दुःखजनक हैं । फिर उन्हें त्यागने की
इच्छा होती है । इस इच्छा से निवृत्तिजनक (निवर्त्तक) प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ।
आत्मा के विशेषगुण इस प्रयत्न से जीव उन दुष्ट (सर्पादि) पदार्थों को छोड़ देता
है । यही बात हम मोक्ष-निरूपण में कहेंगे ।
धर्म भी तब तक अकेला मोक्ष का सम्पादन नहीं कर सकता, जब तक उसे
ईश्वर की इच्छा की सहायता न मिले । इसीलिए प्रशस्तपाद ने "तच्चेश्वर-
चोदनाभिव्यक्ताद्धर्मादेव" यह वाक्य लिखा है । "चोद्यन्ते स्वकार्येषु प्रेर्यन्तेऽनया
भावाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस 'इच्छा' से (कारणरूप वस्तु अपने कार्यों
में उसके उत्पादन के लिए) प्रेरणा प्राप्त करे वही 'इच्छा' प्रकृत 'चोदना' शब्द का
अर्थ है । 'ईश्वरस्य चोदना' इस विग्रह के अनुसार 'ईश्वर की इच्छा' ही
'ईश्वरचोदना' शब्द का अर्थ है । प्रकृत 'अभिव्यक्ति' शब्द से कारणों की कार्य्य
करने की उन्मुखता इष्ट है । "ईश्वरचोदनाभिव्यक्तात्" यह पञ्चम्यन्त पद
"ईश्वरचोदनयाऽभिव्यक्तात्" इस तृतीया समास से बना है । उपर्युक्त व्युत्पत्तियों
के अनुसार 'तच्च' इत्यादि वाक्य का फलित अर्थ यह है कि ईश्वर के
इच्छाविशेष से कार्य्य के प्रति उन्मुख धर्म से ही 'मुक्ति' होती है । 'तच्च' इस
वाक्य में प्रयुक्त 'च' शब्द इस समुच्चय का बोधक है कि पदार्थों के साधर्म्यादिरूप
तत्त्वविषयक ज्ञान के साथ मिलकर ही धर्म में मोक्ष की साधनता है ।

२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथ के द्रव्यादयः पदार्थाः, किञ्च तेषां साधर्म्यं वैधर्म्यञ्चेति ।
तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि सामान्यविशेष-
संज्ञोक्तानि नवैवेति । तद्व्यतिरेकेणान्यस्य संज्ञानभिधानात् ।
द्रव्यादि कौन-कौन पदार्थ हैं ? एवं उनके साधर्म्य और वैधर्म्य
क्या हैं ?
उन पदार्थों में १. पृथिवी २. जल ३. तेज ४. वायु ५. आकाश
६. काल ७. दिक् ८. आत्मा और ९. मन, ये नौ ही द्रव्य सूत्रकार के
द्वारा सामान्य (द्रव्यसंज्ञा) और विशेष (पृथिव्यादिसंज्ञा) संज्ञाओं से कहे
गये हैं । क्योंकि पदार्थों के उपदेश के लिये सर्वज्ञ महर्षि ने इन नवों
को छोड़कर और किसी द्रव्य का नाम नहीं लिया है ।
न्यायकन्दली
एवं षट्पदार्थज्ञानस्य पुरुषार्थोपायत्वं प्रतीत्य तेषां प्रत्येकं भेदजिज्ञासार्थं परिपृच्छति-
अथ के द्रव्यादय इति । कानि द्रव्याणि ? के गुणाः ? कानि कर्माणीत्यादि योजनी-
यम् । नावश्यं धर्मिणि ज्ञाते धर्मा ज्ञायन्त इति, तेन धर्मेषु पृथक् प्रश्नः - किञ्च
तेषामित्यादि । अत्रापि चः समुच्चये ।
उत्तरमाहः -तत्रेत्यादि । तेषु द्रव्यादिषु मध्ये, द्रव्याणि पृथिव्यादीनि,
सामान्यविशेषसंज्ञया सामान्यसंज्ञया द्रव्यसंज्ञया, विशेषसंज्ञया प्रत्येकमसा-
इस प्रकार द्रव्यादि छः पदार्थों में मुक्ति की कारणता को समझाकर, उन
पदार्थों में से प्रत्येक की जिज्ञासा के लिये प्रशस्तदेव 'अथ के द्रव्यादयः' इत्यादि
प्रश्नभाष्य लिखते हैं-
"अथ के द्रव्यादयः" इत्यादि प्रश्नभाष्य की व्याख्या 1 'द्रव्य कितने हैं ?'
'गुण कितने हैं ?' इत्यादि रीति से करनी चाहिए । धर्मी के ज्ञात हो जाने पर
यह आवश्यक नहीं है कि धर्म भी ज्ञात ही हो जाएँ । अतः "'किञ्च तेषाम्'"
इत्यादि से धर्म के विषय में अलग प्रश्न करते हैं । यहाँ भी 'च' शब्द समुच्चय
का ही बोधक है ।
(कथित दोनों प्रश्नों का समाधान क्रमशः करते हैं) 'तत्र' अर्थात् उन छः पदार्थों
में, 'द्रव्याणि' अर्थात् पृथिव्यादि नौ द्रव्य, "सामान्यविशेषसंज्ञाया" सामान्यसंज्ञा से अर्थात्
द्रव्य नाम से, विशेषसंज्ञा से अर्थात् पृथिव्यादि विशेष नामों से-पृथिवीत्व, जलत्व,

  1. अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि भाग वाक्य के पहले का 'तत्र के द्रव्यादयः' ? इत्यादि
    प्रश्नवाक्य केवल यहाँ के लिये ही नहीं है, किन्तु गुणादि के विभाग वाक्यों