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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में

भूमिका । ५६
अर्थात् निर्गुणोपासन में असमर्थ सगुणोपासन करें, चित्त के
निश्चल होने पर वही निर्गुण (निरुपाधि-ब्रह्म) प्रकट होगा।
उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में
प्रधानतः अग्नि, इन्द्र और देवता; उनकी भक्ति अर्थात् लोक,
सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, कर्म; तथा भक्तिविशेष
(अवान्तर भेद) और उन्हींको संस्तावक देवता; तथा ८ वसु,
११ रुद्र, १२ आदित्य, १ इन्द्र और १ प्रजापति का यजन
व्यष्टिरूप से कहा है । वैसा इस उपासनाकाण्ड में भी प्रधानतः
विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य इन पांच देवताओं का
यजन कहा है । इन सब के अवान्तर भेद अपरिच्छिन्न
हैं। जैसे चतुर्दश विद्या-प्रस्थान, वा अष्टादश विद्या-प्रस्थान का
संक्षेप (बीज) प्रणव (ओ ३ म् ) है; अर्थात् वाङ्मयमात्र
का बीज प्रणव (अक्षर) है। वैसाही सब देवताओं का मूल
ईश्वर (अक्षर) है। अर्थात् देवतामात्र ईश्वर से अभिन्न है।
और देवताओं की विभूति के विषय में यह श्रुति है-
'त्रीणि शता त्रीणि सहस्रायग्निं
त्रिंशच्चदेवा नवं चासपर्यन् ।' य. ३३ । ७ ।
'त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्रीं च सहस्रेति' बृ. ।
१-४ 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष. ईश्वरः १ । २४' अविद्या
आदि क्लेश, शुभाशुभ कर्मों के फल और वासना से निर्लेप पुरुष विशेष (पुरुषो-
त्तम) ईश्वर है। 'तस्य वाचकः प्रणवः १ । २७' उस ईश्वर का वाचक (बोधक)
प्रणव है। अर्थात् ईश्वर वाच्य और प्रणव वाचक है। ये सब उपासना के विषय
योगदर्शन में स्पष्ट हैं । प्रणव की महिमा माण्डूक्य में कही है । प्रणव वह
'अक्षर' है जो शब्दतः भी ईश्वर से अलग नहीं है । व्याससूत्र में लिखा है
कि 'अक्षरमम्बरान्तधृतेः १ । ३ । १०' इससे अर्थावगति के अभाव में भी मन्त्र जप
से ईश्वर का प्रसन्न होना निर्विवाद है । उपास्य ईश्वर, उपासक (योगी) से
परमार्थ में पृथक् नहीं है। उपनिषद में कहा है कि 'तत् त्वम् असि' इत्यादि ।

६० मनुस्मृति ।
फिर बृहदारण्यक में 'महिमान एवैषां—' इस कथन से
एकही देवता के अनेक रूप बतलाये हैं। इसी वैदिक दर्शन
से भगवान् व्यास ने 'विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्ते-
र्दर्शनात् १।३।२७' यह विग्रहसूचक सूत्र बनाया और
पुराण इतिहासों में विष्णु, शिव, शक्ति आदि भिन्न भिन्न
विग्रह तथा एकही विष्णु आदि के अनेक विग्रह कहे गये हैं।
और महाभारत के प्रारम्भ में पुराण तथा इतिहास के
द्वारा वैदिक ज्ञान को बढ़ाने को कहा—
'इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ॥'
आजान सिद्ध देवताओं की महिमा का तो कहना ही क्या
है; पर कर्मसिद्ध योगियों की महिमा भी श्रुति स्मृति से
विलक्षण ज्ञात होती है—
'पृथ्व्यप्तेजोनिलखे समुत्थे
पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥'
श्वेता० २।१२.
'आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ ।
योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥


१ मन्त्रलिङ्गों से ज्ञात देवविग्रहादिकों का संग्राहक श्लोक—
'विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता ।
फलप्रदानमित्येतत् पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥'
शारीरकव्याख्या.

भूमिका । ६१
प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ।
संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥ '
शारीरकभाष्य.
समानतन्त्र-सांख्यदर्शन में भी लिखा है कि-
'योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ५।१२८'
औषध मन्त्रसिद्धि के समान योगसिद्धि भी निराकरण
करने योग्य नहीं है । यही दृष्टान्त न्यायदर्शन में वेद के
प्रामाण्य सिद्ध करने में दिया गया है । योगसिद्धि पातञ्जल-
दर्शन के विभूतिपाद में लिखी हैं, इन्हींके न जानने से भारत
के क्षुद्रहृदय ( अभागे ) पौराणिक वा ऐतिहासिक विषयों
को गप्प कहा करते हैं ।
दैवतभाषण । प्रणव आदि इष्टमन्त्र के यथाविधि जप
करने से इष्टदेवता के साथ संभापणादि व्यवहार की सिद्धि
होती है यह बात पातञ्जलदर्शन में लिखी है-
'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः २ । ४४ '
और 'भावं तु बादरायणोऽस्ति हि १।३।३३' इस
ब्रह्मसूत्र के भाष्य में भगवत्पाद ने भी कहा है-
'तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति
स्मर्यते । यस्तु ब्रूयाद् इदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवा-
दिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधयेत् । इदानी-
मिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात्, ततश्च
राजसूयादिचोदना उपरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरे-
१ ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् २ । १ । ६७ '

६२ मनुस्मृति ।

ऽप्यव्यवस्थितप्रायान् वर्णाश्रमधर्मान् प्रतिजानीत, ततश्च
व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद् धर्मोत्कर्षवशा-
चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते ।' इति ।
अवतार। जब उक्त श्रुति स्मृति पुराण इतिहास से देवता
जडरूप भौतिकमात्र नहीं हैं; किंतु योगियों के समान ऐश्वर्य-
वान् चेतन हैं; एकही काल में नानाविधरूप धारण करने को
समर्थ हैं; जगत् के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप कर्मों के अनुसार
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र हैं; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ
नाम से विभक्त कर्मेन्द्रिय के अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मृत्यु और
प्रजापति नाम से विख्यात अधिष्ठाता हैं; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु,
रसन और घ्राण नाम से विभक्त ज्ञानेन्द्रिय के दिक्, वात,
अर्क, वरुण और अश्वी नाम से प्रसिद्ध अधिष्ठाता हैं; मन,
बुद्धि, चित्त और अहंकार नाम से विभक्त अन्तःकरण के
चन्द्र, चतुर्मुख, शंकर और अच्युत नाम से प्रसिद्ध स्वामी हैं;
तथा वे पिण्डाण्ड में ब्रह्माण्ड के दैवत भावनानुसार नाना-
नामधारी हैं; और इस जगद् की सारी व्यवस्था (प्राकृतिक
नियम) एकस्वामिक के समान व्यवस्थित देखने में आती
है; न कि 'मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती' के
न्याय से जैसे अनेक अधिकारियों से एक अधिकार अव्यव-
स्थित होता है, वैसी जगत् की कोई व्यवस्था अव्यवस्थित
नज़र आती है; तब अगत्त्या गुणकर्मानुसारी नानाविध नाम-
रूप का उपसंहार करके जगत् का एकस्वामी 'परमेश्वर'
अङ्गीकार करना पड़ता है । ऐसी दशा में जगत् के कल्या-
णार्थ गुणकर्मानुसारी नामरूपधारी अवतार अङ्गीकार करने
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; यदि कहाजाय कि व्याप-

[Header]
भूमिका । ६३
[/Header]

कता नहीं बनपड़ेगी, सो भ्रममात्र है; देखो-अग्नि विद्युद्रूप
से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता में क्या बाधा है ? कुछ
भी नहीं; वायु वात्यारूप से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; जगत् के बहुतेरे कार्य
सामान्यरूप से नहीं सिद्ध होसकते किंतु विशेषरूप से ही
सिद्ध होते हैं जैसे सामान्य अग्नि से पाक नहीं होसकता,
सामान्य वायु अग्नि को नहीं चमका सकता, सामान्य जल
पिपासा को नहीं शान्त करसकता .... .... इत्यादि ।
कितने एक अवतारों का लेख वेद में भी प्राप्त होता है ।
जैसे शतपथब्राह्मण के हविर्यज्ञ नामक प्रथमकाण्ड में
अग्निहोत्र वेदी के इतिहास प्रसङ्ग में ‘ वामनो ह विष्णुरास ’
इत्यादि से विष्णु के वामने बनने का उल्लेख, तथा संहिता
के सौमिक वेदी प्रतिपादक पञ्चमाध्याय के पन्द्रहवें मन्त्र से
विष्णु के त्रिविक्रमत्व का उल्लेख, तथा शतपथ के प्रथम
काण्डही में ‘ मनवे हवै प्रातः—’ इत्यादि श्रुति से मत्स्या-
वतार की कथा । एवं त्रिपुर आदि का इतिहास । बलराम
और कृष्णका अवतार निम्न लिखित श्रुतियोंसे स्पष्ट होताहै-
‘ जज्ञान एव व्यबाधत स्पृधः
प्रापश्यद् वीरो अभिपौंस्यं रणम् ।
अवश्चिदद्रिमत्र सस्यदः सृज-
दस्तभ्नान्नकं स्वपस्यया पृथुम् ॥ ’
१ सामान्यशब्द का अर्थ कार्यानुसार व्यवस्थित स्वीकार किया गया है ।
२ विस्तार भय से श्रुतियां छोड़ दी हैं । इसी बहाने जिज्ञासु लोग उनकी
देखभाल करें ।

६४ मनुस्मृति ।
जिसने (जज्ञान एव) प्रकट होतेही (स्पृधः) स्पर्धा
करनेवाले पूतनादि शत्रुओं को (व्यबाधत) बाधित किया।
(अद्रिं) गोवर्धन पर्वत को (अवशिश्चद्) धारण किया।
(सस्यदः) धान्य देनेवाले वर्षते मेघों को (अवसृजत्)
विसर्जित किया। (स्वपस्यया) अपनी माया से (पृथुं)
महान् (नाकं) इन्द्र को (अस्तभ्नात्) स्तम्भित किया।
(वीरः) महावीर होकर भी (अभिपौंस्यं) पौरुषसाध्य
(रणं) भारत युद्ध को निरस्त्र (प्रापश्यत्) देखा।
‘द्वे विरूपे चरतः स्वर्थे
अन्यान्‍या वत्समुपधापयेते ।
हरिरन्यस्यां भवति स्वधावा-
ञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः ॥’
(अन्यान्‍या) अलग अलग (स्वर्थे) कार्य में तत्पर
(विरूपे) निराली छविवाले (द्वे) वे दो बालक (चरतः)
विचर रहे हैं। (वत्सं) बछरों को (उपधापयेते) समीप में
दूध पिलावरहे हैं। उनमें (अन्यस्यां) एक (स्वधावान्)
अखण्डैश्वर्य (हरिः) श्यामवर्ण (भवति) है, (अन्यस्यां)
दूसरा (सुवर्चाः) तेजस्वी (शुक्रः) गौरवर्ण (ददृशे)
दिखलाई देता है।
‘पूर्वापरं चरतो माययैतौ
शिशू क्रीडन्तौ परियातो अध्वरम्।
विश्वान्यन्यो भुवनानि चष्ट
ऋतून्यन्यो विदधज्जायते पुनः ॥’
तैत्तिरीयश्रुति.

[Header]
भूमिका । ६५

[Main Text]
(एतौ) ये दोनों राम-कृष्ण (पूर्वापरं) आगे पीछे
(चरतः) विचरते हुए (मायया) माया से (शिशू) बाल-
रूप (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते करते (अध्वरं) कंस के धनु-
र्यज्ञ को (परियातः) जा पहुँचे। इनमें (अन्यः) एक कृष्ण
योगेश्वर होने से (विश्वानि-भुवनानि) सारे ब्रह्माण्ड को
(वि-चष्टे) जानता है। (अन्यः-पुनः) दूसरा राम (ऋतून्-
दधत्) समयानुसार (जायते) अवतीर्ण हुआ। अर्थात्
बलराम ने कृष्ण के समान 'तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं-'
इत्यादि अद्भुतरूप से नहीं अवतार का ग्रहण किया।

नाम-रूप-लिङ्ग। परमेश्वर के नाम-रूप-लिङ्ग का दिग्द-
र्शन किया जाता है जिसके जानने से साकारोपासना तथा
निराकारोपासना की दृढ़ता होती है। पहले अवतारों की सिद्धि
होचुकी है वे श्रीमद्भागवतानुसार ये हैं—

पहिला अवतार हिरण्यगर्भादि पदवाच्य, दूसरा वराह
(रसातल में गई पृथ्वी के उद्धर्ता) तीसरा नारद (देवर्षि
भाव को प्राप्त होकर सात्वततन्त्र अर्थात् पञ्चरात्रनामक वैष्ण-


[Footnotes]
१ 'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं
द्यामुतेमाम्' इति ऋक्श्रुति । 'स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदि-
कर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्त्तत ॥' इति स्मृतिः । 'जगृहे पौरुषं रूपं-' इत्यादि
भागवत ।

६६ मनुस्मृति ।
वागप के कर्ता ) चौथा नर-नारायण ( धर्मपत्नी से उत्पन्न
होकर दुश्चर तप करनेवाले ) पांचवां कपिल ( कालवशसुप्त-
सांख्य को आसुरिनाम ब्राह्मण को बतलानेवाले ) छठां
दत्तात्रेय ( अत्रि से अनसूया में जन्म लेकर प्रह्लाद आदि को
अध्यात्म-विद्या पढ़ानेवाले ) सातवां यज्ञ ( रुचि से आकूति में
पैदा होकर अपने यामादिक पुत्रों के साथ स्वायंभुव मन्वन्तर
के पालक ) आठवां ऋषभ ( नाभि से मेरुदेवी में उत्पन्न-
अत्याश्रमी ) नवां पृथु ( पृथ्वी को दुहनेवाले ) दशवां मत्स्य
( मनु के रक्षक ) ग्यारहवां कूर्म ( समुद्र-मथन के समय मन्दराद्रि
को अपने पीठ पर धारण करनेवाले ) बारहवां धन्वन्तरि
( आयुर्वेदके प्रकाशक ) तेरहवां मोहिनी ( स्त्रीरूप से असुरों
को मोहित करके सुरों को अमृत पिलानेवाले ) चौदहवां नृसिंह
( हिरण्यकशिपु के नाशकर्ता ) पन्द्रहवां वामन ( बलिको बांध-
नेवाले ) सोलहवां परशुराम ( इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार
करनेवाले ) सत्रहवां व्यास ( पराशर से सत्यवती में जन्म
लेकर वेदों के विभाग करनेवाले ) अठारहवां राम ( दशरथ
के पुत्र बन कर रावण के विध्वंसक ) उन्नीसवां राम-कृष्ण
( यदुकुल में प्रकट होकर भूभार के हर्ता ) बीसवां बुद्ध ( अजन
के पुत्र देवद्वेषियों के मोहक ) इक्कीसवां कल्कि का अवतार
( विष्णुयशा के पुत्र चौरप्राय राजाओं के विनाशक ) ।
१-३ कहीं राम, तथा कृष्ण की अलग २ अवतार संख्या दी है; नर और
नारायण की एकही संख्या दी है; बुद्ध के पितृनाम में 'जिन' यह पाठान्तर
श्रीधरी टीका से प्राप्त होता है ।
४ ' अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः ' इससे अवतारों की असंख्ये-
यता, तथा ' एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । मायागुणैर्विरचितं महदादिभि-
रात्मनि ॥ ' इससे रूपाभ्यास, तथा ' यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।
एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ' यह दृष्टान्त दिया है । देखो श्रीधरी ।

और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है—

' भूमिका । ६७
और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है—
' मत्स्यः कूर्मोऽथ वाराहो नरसिंहोऽथ वामनः ।
रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ '
उक्त अवतारों से औपासनिक नाम-रूप-लिङ्ग का बोध
स्पष्टरूप से होता है । परन्तु वैदिक निघण्टु में ऐसे नाम नहीं
प्राप्त होते जिनसे चतुर्भुजादि आकार का परिचय हो; विष्णु
आदि नाम प्राप्त होकर भी पूर्वकाण्ड में अग्नि आदि अन्य
देवता के समान हविर्मात्र के भागी हैं; उत्तरकाण्ड में निरा-
कार हैं; ' अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' इत्यादि स्थल में उपास-
नार्थ साकार होकर भी किसी नियत आकार के बोधक नहीं
हैं; जहां विष्णु आदि नाम नामान्तर के साथ पढ़े हैं—जैसे
' आग्नावैष्णवं—' इत्यादि—वहां पर भी अर्थान्तर के बोधक
हैं; और ' यथाभिमतध्यानाद्वा ' इत्यादि दार्शनिक लिङ्ग
भी नियत आकार के व्यवस्थापक नहीं हैं। ऐसी दशा में विष्णु
आदि पदार्थ के उपबृंहक इतिहास-पुराण ही शरण हैं; उनमें
जिस आकार का जो उपबृंहक प्रकरण है उसके अनुसार
आकार-प्रतिपादक नाम और सहपठित निराकार-प्रतिपादक
नाम, व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दशा की सिद्धि के लिये
पर्यायरूप मानने चाहिये । अतएव अग्निपुराण आदि के
आधार से रचे नाम-लिङ्गानुशासनों ( कोषों ) में ब्रह्मादि
देवताओं के नाम एकत्र किये गये, जिनमें वैदिक सिद्धान्त-
सिद्ध भेदक और अभेदक ये दोनों नाम हैं । यह विषय आगे
स्पष्ट होगा ।

६८ मनुस्मृति ।
नाम-रूप-लिङ्ग की उपबृंहक श्रुतियां—
“अथ यो ह खलु वा वास्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं
ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वा वास्य तामसोंऽशोऽसौ स योऽयं
रुद्रः, अथ यो ह खलु वा वास्य सात्त्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं
विष्णुः” इति मैत्रेयोपनिषत् ।
“उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं
त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम् ।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं
समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥”
कैवल्योपनिषत् ।
“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां
हैमवतीं ताँह् होवाच किमेतद् यक्षमिति ।”
सामवेदीय-तलवकारोपनिषत् ।
“तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ॥
दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसितरसे नमः ॥”
नारायणोपनिषत् ।
इत्यादि ।
पदार्थ के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप अवस्था भेद के अनु-
सार परमेश्वर के ब्रह्मा-विष्णु-रुद्ररूप अवस्था भेद वेद-दृष्टि
१ ‘त्र्यम्बकं यजामहे—’ (य० ३ । ६१) इत्यादि ।
२ ‘नीलग्रीवः—’ (य० १६ । ७) इत्यादि ।
३ ‘या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाह भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥’
(य० १६ । ४६)
४ अन्य देवताओं के आकार के विषय में एवंविध मन्त्रलिङ्ग चारो वेद की
मन्त्रसंहिताओं में तथा तैत्तिरीयमन्त्रसंहिता में नहीं प्राप्त होते (एक बार तो
पढ़ देखिये)।

भूमिका । ६६

`से उत्पन्न हुए; और जड़ तथा चेतन रूप से विभक्त स्थावर-
जङ्गमात्मक पदार्थ के भीतर ऊष्मा, बाहर प्रकाश की आवश्य-
कता के कारण अग्नीषोमात्मक सूर्य उत्पन्न हुए; पदार्थ और
उसकी अवस्था सिद्धि के लिये गणेश उत्पन्न हुए; पदार्थों के
यथायोग्य अवस्थान के निमित्त शक्ति उत्पन्न हुई । उक्त ब्रह्म-
कार्य-उत्पत्ति को शक्ति में अन्तर्भूत मान कर परमेश्वर की
विष्णु आदि पञ्चदेवतात्मक उपासना प्रवृत्त हुई, जिसका
विस्तार विष्णुपुराण, शिवपुराण, मार्कण्डेयपुराण, सूर्यपुराण
और गणेशपुराण में भली भांति किया है । किं बहुना; सारे
पुराण, उपपुराण और इतिहासों का उपसंहार इन्हीं विष्णु-
शिव-शक्ति-गणेश तथा सूर्य की विभूतियों में हुआ है। जैसे
पदार्थ के उत्पत्ति आदि तीन भाव-विकार से ब्रह्मा आदि
तीन देवता कहे हैं वैसे ही पदार्थ के ऊष्मा तथा प्रकाश के कारण
अन्य भाव-विकार से सूर्य, और नियमित भाव-विकार के
लाभार्थ गणेश कहे हैं । और भाव-विकार ही से वेदान्त-दर्शन
में परमेश्वर का तटस्थ-लक्षण किया है । शब्दार्थरूप जगत् में
यह अर्थ-सृष्टि की व्यवस्था है, एवं शब्द-सृष्टि की भी व्यवस्था
जाननी चाहिये ।


१ पदार्थ की अवस्था ।
२ "जायतेऽस्ति, विपरिणमते वर्धते,ऽपक्षीयते विनश्यति" वाष्र्यायणि ।
३ 'विनायकः कर्म विघ्न--' याज्ञवल्क्य ।
४ 'जन्माद्यस्य यतः' वेदव्यास ।
५ 'नित्यानन्दवपुर्निरन्तरगलत्पञ्चाशदर्णैः क्रमाद् व्याप्तं येन चराचरात्मकमिदं
शब्दार्थरूपं जगत् । शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यमन्तर्गतं तद्वोऽव्यादनिशं
शशाङ्कसदृशं वाचामधीशं महः ॥' शारदातिलककार ।

७० मनुस्मृति ।
परमेश्वरैक्य । चित्त के अत्यन्त चञ्चल होने से परमेश्वर
की निराकारोपासना पूर्वकाल में भी दुर्घट थी, वर्तमान काल
में तो अत्यन्त दुर्घट क्या बल्कि असम्भव सी है । शिव महिमा
में कहा है—
‘ अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
: रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
: स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य त्रिपयः
: पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥’
: अतएव मध्यमाधिकारी और मन्दाधिकारी के चित्तविश्रा-
: मार्थ पञ्चदेवात्मक साकारोपासना वेददृष्टि से कही है और
: उन पञ्चदेवताओं में श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के अनुसार
: भेद नहीं है, किन्तु अभेद ही है । इस विषय में पहिले कुछ
: श्रुतियां दिखलाई जाती हैं—
: ‘ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु-
: रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
: एकं सद् बहुधा विप्रा वदन्ति
: अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥’
: ( ऋ० सं० २ अ० ३ अं० २२ अनु० )
: ‘ तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः ।
: तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥’
: ( य० सं० ३२ । १ )
: ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
: १ ‘ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथिवलवद्दृढम् ’ ( गीता ६ । ३४ )
: २-३ वर्तमान काल के उपासक मध्यम तथा मन्द नाम से चिढ़ेंगे क्योंकि उनके
: विचार में निराकारोपासना मौसी का घर है ।

तथा, गायत्री-मन्त्र-प्रतिपाद्य एकही ब्रह्म सन्ध्या-प्रकरण

· भूमिका । ७१
स॑ ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ।
स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥' १
( कै० उ० प्रथम ख० ८ म० )
तथा, गायत्री-मन्त्र-प्रतिपाद्य एकही ब्रह्म सन्ध्या-प्रकरण
में काल और स्थान भेद से ब्रह्मा-विष्णु-शिव रूप से ध्येय
कहा है—
‘ पूर्वा संध्या तु गायत्री सावित्री मध्यमा स्मृता ।
या भवेत्पश्चिमा संध्या सा तु देवी सरस्वती ॥
रक्ता भवति गायत्री सावित्री शुक्लवर्णिका ।
कृष्णा सरस्वती ज्ञेया संध्या-त्रयमुदाहृतम् ॥ ’
‘ नीलोत्पलदलश्यामं नाभिदेशे प्रतिष्ठितम् ।
चतुर्भुजं महात्मानं पूरकेणैव चिन्तयेत् ॥
कुम्भकेन हृदिस्थाने ध्यायेच्च कमलासनम् ।
ब्रह्माणं रक्तगौराङ्गं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥
रेचकेनेश्वरं ध्यायेल्ललाटस्थं महेश्वरम् ।
शुद्धस्फटिकसंकाशं निर्मलं पापनाशनम् ॥ ’
आचारादर्श ।
तथा, ‘ पञ्चायतन ’ पूजा में विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश
और सूर्य, इन पांचों ब्रह्मधारा में प्रत्येक को प्रधान मान कर
अन्य चारों को गौण माना है; इस प्रकार प्रत्येक देवता
प्रधान और गौण सिद्ध होता है, यह बात परमार्थ-दृष्टि से
अभेद मानने ही से संगत होती है अन्यथा मत्तप्रलाप समझी
जायगी । इसी अभिप्राय से वेदव्यास ने विष्णुपुराण आदि
१ इसी मन्त्र के पूर्व में ‘ उमासहायं—’ यह उक्त मन्त्र है ।
२ आदि शब्द से कहीं पुराण और कहीं पुराण के प्रकरण का ग्रहण करना चाहिये ।

[Page 72]
[Header]
७२ मनुस्मृति ।

[Body]
में विष्णु को, शिवपुराण आदि में शिव को, देवीभागवत
आदि में शक्ति को, गणेशपुराण आदि में गणेश को और
सूर्यपुराण आदि में सूर्य को कारण ब्रह्म मानकर उनका
उत्कर्ष और अन्यों को कार्यब्रह्म मानकर उनका अपकर्ष
वर्णन किया है । अन्यथा अनेक ब्रह्मवाद लोक-वेद-विरुद्ध
होगा, यह बात विद्वद्वर नीलकण्ठ ने महाभारत की टीका के
मुखबन्ध में कही है । पञ्चायतन पूजा का क्रम यह है—
‘शम्भौ मध्यगते हरीनहरमूर्द्धन्यो, हरौ शंकरे—
भास्येनागसुता, रवौ हरगणेशाजाम्बिकाः स्थापिताः ।
देव्यां विष्णूहरेभवक्त्ररवयो, लम्बोदरेऽजेशरेनाम्बाः,
शंकरभागतोऽति सुखदा व्यस्तास्तु हानिप्रदाः ॥’
( निर्णय सिन्धु )
तथा, वेद,पुराण,इतिहास और तन्त्र में परमेश्वर के पञ्च
देव संबन्धी जो नाम प्राप्त होते हैं उनमें से निराकार के स्पष्ट
लिङ्गक नाम ( अभेदक ) लेने से अभेद और साकार के नाम
(भेदक) लेने से भेद सिद्ध होता है । नाम दो प्रकार का; एक
ओ३म् आदि, दूसरा विष्णु आदि । इनमें पहिला मन्त्र कह-
लाता है, दूसरा नाम-मन्त्र कहलाता है । मन्त्र, केवल वैदिक-
केवल तान्त्रिक और वैदिकतान्त्रिक भेद से तीन प्रकार
के हैं; नाम-मन्त्र भी तीन प्रकार के हैं परन्तु उनका पूर्वोक्त भेद
ही में उपसंहार है। केवल वैदिक मन्त्र- ‘सहस्रशीर्षा-’ आदि ।
केवल तान्त्रिकमन्त्र-‘श्रीकृष्णः शरणंमम’ आदि । उभयात्मक
मन्त्र-‘ओ३म् नमो नारायणाय’ आदि । अब पहिले
तान्त्रिक मन्त्रों के विषय में कुछ विचार करके बाद नाम द्वारा
पञ्च देवताओं का अभेद दिखलाया जायगा ।

भूमिका । ७३
तान्त्रिकमन्त्र के उल्लेख से 'तन्त्र' क्या पदार्थ है, इस
बात की जिज्ञासा होती है। यद्यपि तन्त्र-शब्द का अर्थ दर्शन
है तो भी यहां तन्त्र से विष्णु-शिव प्रोक्त ग्रन्थ विवक्षित हैं।
जैसे कर्म के उपबृंहक कल्पसूत्र-मन्वादि स्मृति, उपासना के
उपबृंहक शाण्डिल्य विद्या-पारमहंस संहिता, ज्ञान के उपबृंहक
उपनिषद्-योगवासिष्ठ हैं; तथा कर्म-उपासना-ज्ञान के उप-
बृंहक पुराण-उपपुराण-इतिहास हैं; वैसे ही प्रधान रूप से
उपासना तथा ज्ञान के उपबृंहक तन्त्र हैं। जैसे उक्त ग्रन्थों में
निराकार किंवा साकार ब्रह्म-भावनानूसार ज्ञाननिष्ठा और
कर्मनिष्ठा का प्रयत्नपूर्वक निरूपण है; वैसे ही इस तन्त्र में
ज्ञान-कर्मनिष्ठा की धूम है। जैसे उक्तग्रन्थों में उत्तम, मध्यम
और मन्द अधिकारियों के अनुसार ही ज्ञान-कर्म तथा उनके
अवान्तर भेदों का विनियोग कहा है-एवं तन्त्र में भी है। जैसे
वैदिक-संपत्ति, शाखा-भेद आदि से अपरिच्छिन्न है-एवं
तान्त्रिक-संपत्ति भी है।
अत एव ये वचन हैं-
'सांख्यं योगः पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
श्रुतिप्रमाणान्येतानि हेतुभिर्न विरोधयेत्॥'
योगि-याज्ञवल्क्य।
'सांख्यं योगः पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
कृतान्त (सिद्धान्त) पञ्चकं विद्धि ब्रह्मणःपरिमार्गणे॥' १
(विष्णु धर्मोत्तर)
'सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते।
१ श्री रामानुजाचार्यकृत श्रीभाष्य में उत्तरार्ध यों है-
'आत्मप्रमाणान्येतानि न हन्तव्यानि हेतुभिः।'

७४ मनुस्मृति ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥
अपांतरतमाश्चैव वेदाचार्य्यः स उच्यते ।
प्राचीनगर्भं तमृर्षि प्रवदन्तीह केचन ॥
उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ॥
पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता तु भगवान् स्वयम् ।
महाभारत ।
पञ्चरात्रादि तन्त्रों की गणना-पञ्चरात्र (नारद पञ्चरात्र)
पाशुपतज्ञान अर्थात् शिवसूत्र, परशुराम सूत्र, चतुःषष्टितन्त्र,
तथा दक्षिणामूर्ति संहिता, सनत्कुमार संहिता, परमानन्द, कुलार्-
णव आदि। चतुःषष्टि तन्त्रों का अनुगत विभाग यह है—
१ महामाया, २ शम्बर, ३ योगिनी, ४ जालशम्बर, ५
तत्त्वशम्बरक, ६ भैरवाष्टक, १४ बहुरूपाष्टक (ब्राह्म्यादि सप्त
माता और शिवदूती के प्रतिपादक-बहुरूप तन्त्र ८) २२
यामलाष्टक (ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, रुद्रयामल, लक्ष्मी
यामल, उमायामल, स्कन्दयामल, गणेशयामल, जयद्रथयामल)
२३ चन्द्रज्ञान, २४ वासुकि, २५ महासंमोहन, २६ महोच्छुष्म,
२७ वातुल, २८ वातुलोत्तर, २९ हृद्भेद, ३० भेद, ३१ गुह्य, ३२
कामिक कलावाद, ३४ कलासार, ३५ कुब्जिकामत, ३६ ततोत्तर,
३७ वीणास्य, ३८ चोतुल, ३६ श्रोतलोत्तर, ४० पञ्चामृत, ४१
रूपभेद, ४२ भूतोडामर, ४३ कुलसार, ४४ कुलोड्डीश, ४५
कुलचूडामणि, ४६ सर्वज्ञानोत्तर, ४७ महाकालीमत, ४८ महा-
लक्ष्मीमत, ४९ सिद्धयोगेश्वरीमत, ५० कुरूपिकामत, ५१
देवरूपिकामत, ५२ सर्ववीरमत, ५३ विमलामत, ५४ पूर्व, ५५
पश्चिम, ५६ दक्ष, ५७ उत्तर, ५८ निरुत्तर, ५६ वैशेषिक,

भूमिका । ७५
६० ज्ञान, ६१ वीरावलि, ६२ अरुणेश, ६३ मोहिनीश, ६४
विशुद्धेश्वर ।
' एवमेतानि शास्त्राणि तथान्यान्यपि कोटिशः ।
भवतोक्तानि मे देव सर्वज्ञानमयानि च ॥'
यह उपसंहार-वाक्य है ।
तन्त्रों में शिव-शक्ति का संवाद जो लिखा है उसका यह
अभिप्राय है कि परमशिव, प्रकाश तथा विमर्शसंज्ञक दो रूप
धारण करके विमर्शांश से स्वात्मा को पूछा है और प्रकाशांश
से स्वात्मा को उत्तर दिया है । यह बात इन प्रमाणों से जानी
जाती है—
' गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयमेव सदाशिवः ।
प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ॥'
स्वच्छन्दतन्त्र ।
' स जयति महाप्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।
कथमिव तस्मिन् दृष्टे सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे ॥
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपस्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो' जगदुत्पादयति संहरति ॥'
वरिवस्यारहस्य ।
इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है किं तन्त्र-शास्त्र प्रमाणभूत है ।
और जो अपरार्क आदि कतिपय धर्मशास्त्री तन्त्र के प्रामाण्य में


१ शिव नाम की निरुक्ति यों कही है-
' हिसिधातोः सिंहशब्दो वशकान्तौ शिवः स्मृतः ।
वर्णव्यत्ययतः सिद्धः पश्यकः कश्यपो यथा ॥'
इतना धावन ' इच्छाशक्त्याश्रय ' अर्थ के लाभार्थ ।

७६ मनुस्मृति ।

आशङ्का करते हैं वे 'अतिप्रमाणान्येतानि—' इत्यादि पूर्वोक्त
वाक्यों से समाधेय हैं ।
और जो भावजन्य दोष तन्त्र के कतिपय अंश में हैं वे
समस्त किंवा व्यस्तरूप से वेद में भी उपलब्ध हैं । इस
कारण दोनों की एक गति है । महाभारत के अनुक्रमणिका
अध्याय में लिखा है कि—
' तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः
स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः ।
प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्क-
स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥ '
और जो तन्त्र के अंश प्रत्यक्ष श्रुति-विरुद्ध हैं वे विरोधा-
धिकरणन्याय से जबतक मूल श्रुति का लाभ न हो तबतक
आचरण के योग्य नहीं हैं । और जो—
“ वामं पाशुपतं सोमं लाङ्गलं चैव भैरवम् ।
न सेव्यमेतत्कथितं वेदवाह्यं तथेतरत् ॥
कापालं पञ्चरात्रं च यामलं वाममर्हतम् ।
एवंविधानि चान्यानि मोहनार्थानि तानि तु ॥ ”
इत्यादि पाशुपत विशेष, पञ्चरात्र विशेष तथा अन्यान्य जो
सर्वांश से वेदविरुद्ध हैं वे महापातक-दूषित-वेद-भ्रष्ट तथा
अन्यान्य जाति के लिये कहे हैं यह सब बात ईन वाक्यों से
स्पष्ट है—


१ 'ततस्तु सप्तमे- ' मनु० १२ । २५ ।
२-३ पाशुपत तथा पञ्चरात्र के द्वैविध्यते 'विशेष' पद का दान किया है ।
४ यहां कतिपयवचन विद्वद्वर श्रीमल्लछेदरामप्रणीत सनातनधर्मोद्धार से
लिखे हैं ।

भूमिका । ७७
‘ पाञ्चरात्रं भागवतं तथा वैखानसाभिधम् ।
वेदभ्रष्टान् समुद्दिश्य कमलापतिरुक्तवान् ॥
श्रुतिभ्रष्टः श्रुतिप्रोक्तप्रायश्चित्ते भयं गतः ।
क्रमेण श्रुतिसिद्ध्यर्थं मनुष्यस्तन्त्रमाश्रयेत् ॥ ’
साम्बपुराण ।
‘ अथांशुः सात्त्वतो नाम विष्णुभक्तः प्रतापवान् ।
महात्मा दाननिरतो धनुर्वेदविदां वरः ॥
स नारदस्य वचनाद् वासुदेवार्चने रतः ।
शास्त्रं प्रवर्तयामास कुण्डगोलादिभिः श्रितम् ॥
तस्य नाम्ना तु विख्यातं सात्त्वतं नाम शोभनम् ।
प्रवर्त्तते महाशास्त्रं कुण्डादीनां हितावहम् ॥ ’
कूर्मपुराण ।
‘ तेनोक्तं सात्त्वतं तन्त्रं यज्ज्ञात्वा मुक्तिभाग् भवेत् ।
यत्र स्त्रीशूद्रदासानां संस्कारो वैष्णवः स्मृतः ॥ ’
श्रीभागवत ।
इत्यादि दुर्व्यवस्थाओं से ही वेदान्तदर्शन के सूत्र-भाष्य
में पाञ्चरात्रिक भागवत-प्रक्रिया और पाशुपत-प्रक्रिया का
खण्डन किया है, न कि पारमार्थिक वैष्णव शैव प्रक्रिया का ।
प्रकृत में नाम द्वारा पञ्च देवताओं का अभेद यों है—
विष्णु के कृष्ण ( श्याम-संवलिया ) केशव ( अच्छे घुंघु-
वाले बालवाला ) पीताम्बर ( चमकदार पीले वस्त्रों को
१ ‘ अमृते जारजः कुण्डो मृते भर्तरि गोलकः । ’
२ ‘ पत्युरसामञ्जस्यात् । उत्पत्त्यसंभवात् ’ इत्यादि सूत्रों के शारीरकभाष्य में ।
३ पारमार्थिक-वैष्णव-प्रक्रिया नृसिंहतापिनी, गोपालतापिनी, रामतापिनी
(उपनिषद्) आदि ग्रन्थों में स्पष्ट है ।

७८ मनुस्मृति ।
धारण करनेवाला ) आदि नाम; शिव के चन्द्रशेखर,
त्र्यम्बक, भूतेश आदि नाम; शक्ति के सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी
आदि नाम; गणेश के हेरम्ब, लम्बोदर आदि नाम; तथा
सूर्य के विकर्त्तन, विरोचन आदि नाम; आकारोपाधिक होने
से कृष्ण आदि पांच आकार ( विशेष्य ) के बोधक होते हैं ।
यदि विष्णु ( वेवेष्टि ) शिव ( शिवयति ) शक्ति ( शक्नोति )
गणेश ( गणानामीशः ) और सूर्य ( सुवति ) एकत्व विवक्षा से
ग्रहण किये जायं तो आकारोपाधिक ( नियत रूप के बोधक )
न होनेसे परस्पर विशेषण-विशेष्य-भाव को प्राप्त होकर एक
व्यक्ति ( परमेश्वर ) के बोधक होते हैं । यही रहस्य पञ्चा-
यतन की मुख्य गुण-भाव-कल्पना में भी है । किं बहुना,
पौराणिक तान्त्रिक सहस्रनाम-स्तोत्रों में ये दोनों प्रकार के
नाम ( भेदक-अभेदक ) पढ़े हैं और इन्हीं विष्णु आदि नाम
के अनुरोध से वैष्णव आदि उपासकों की संज्ञा हुई है !
और जो—
' छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि
भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत-
तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥'
( श्वे० उ० ४-५, १० )
इत्यादि उपनिषद् वाक्यों के अनुसार माया ( शक्ति ) और
मायावान् ( शक्तिमान्-परमेश्वर ) ये धर्मधर्मि-भेद से दो
पदार्थ कल्पना किये हैं, इनको चाहे लक्ष्मी और विष्णु शब्द