मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
अध्याय में बहुत कुछ लिखा है । अष्टकादि आश्वयुजीपर्यन्त
भूमिका । ३६
अनन्तर ही पूर्वकाल में आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अथर्व
वेद की शिक्षा प्राप्त की जाती थी ) इनमें भी पञ्चमहायज्ञ
गृहस्थ का नित्यकर्म है, जिसके बारे में भगवान् मनु ने तृतीय
अध्याय में बहुत कुछ लिखा है । अष्टकादि आश्वयुजीपर्यन्त
सात स्मार्तकर्म पाकनिष्ठ हैं, अग्न्याधानादि सौत्रामणीपर्यन्त
सात श्रौतकर्म हविपनिष्ठ हैं और अग्निष्टोमादि आप्तोर्याम-
पर्यन्त सात श्रौतकर्म सोम ( पूतिका ) निष्ठ हैं । उक्त चालीस
संस्कारों के अलावा ये आठ आत्मगुण हैं—१ दया,
२ क्षान्ति, ३ अनसूया, ४ शौच, ५ अनायास, ६ माङ्गल्य,
७ अकार्पण्य, ८ अस्पृहा । आन्तरक्रिया साध्य होने से
इनका भी उल्लेख संस्कारप्रकरण में किया है ।
' गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं जातकर्म नामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनं चत्वारि वेदव्रतानि स्नानं सहधर्मचारिणी-
संयोगः पञ्चानां यज्ञानामनुष्ठानमष्टका पार्वणं श्राद्धं श्रावण्या-
ग्रहायणी चैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकसंस्थाः अग्न्याधानमग्नि-
होत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यान्याग्रयणेष्टिर्निरूढपशुबन्धः
सौत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थाः अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थः
षोडशी वाजपेयोऽतिरात्र आप्तोर्याम इति सप्त सोमसंस्था इत्येते
चत्वारिंशत्संस्काराः । अष्टावात्मगुणा दया सर्वभूतेषु क्षान्ति-
रनसूया शौचमनायासो माङ्गल्यमकार्पण्यमस्पृहेति ॥ , '
गौतम ।
' सर्वथापि-३ । ४ । ३४ । ' इस ब्रह्मसूत्र के शारीरक
व्याख्यानुसार ' १ निरशनसंहिताध्ययन, २ प्रायणकर्म,
१ वर्तमानकालिक मनुष्यशिक्षा का वर्णन ' चातुर्वर्ण्यशिक्षा ' में देखो ।
४० मनुस्मृति ।
३ जप, ४ उत्क्रमण, ५ दैहिक, ६ भस्मसमूह्न, ७ अस्थि-
संचयन, ८ श्राद्ध, ' ये आठ संस्कार और प्राप्त होते हैं
इनको लेने से अड़तालीस संस्कार होते हैं ।
' यस्यैते अष्टाचत्वारिंशत् संस्कारा इत्याद्या च '
शारीरक ।
आङ्गिरा ने ये पचीस संस्कार कहे हैं—
' पञ्चविंशतिसंस्कारैः संस्कृता ये द्विजातयः ।
ते पवित्राश्च योग्याश्च श्राद्धादिषु सुयन्त्रिताः ॥
गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो बलिरेव च ।
जातकृत्यं नामकर्म निष्क्रमोऽन्नाशनं तथा ॥
चौलकर्मोपनयनं तद्व्रतानां चतुष्टयम् ।
स्नानोद्वाहौ चाग्रयणमष्टका च यथायथम् ॥
श्रावण्यामाश्वयुज्यां च मार्गशीर्ष्यां च पार्वणम् ।
उत्सर्गश्चाप्युपाकर्म महायज्ञाश्च नित्यशः ।
संस्कारा नियता ह्येते ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥ '
ये पचीस संस्कार नैमित्तिक, वार्षिक, मासिक और नित्य
भेद से चार प्रकार के होते हैं यह अश्वलायन ने कहा है—
' नैमित्तिकाः षोडशोक्ताः समुद्राहावसानकाः ।
सप्तैवाग्रयणाद्याश्च संस्कारा वार्षिका मताः ॥
मासिकं पार्वणं प्रोक्तमसक्तानां तु वार्षिकम् ।
महायज्ञास्तु नित्याः स्युः सन्ध्यावच्चाग्निहोत्रवत् ॥ '
इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त सोलह संस्कार नैमित्तिक
और आग्रयण-आदि उपाकर्मपर्यन्त सात संस्कार मासिक,
किंवा वार्षिक हैं । पञ्चमहायज्ञ, संध्योपासन तथा अग्निहोत्र
के समान नित्य हैं ।
भूमिका । ४१
व्यास ने ये सोलह संस्कार कहे हैं—
‘ गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च ।
नामक्रिया-निष्क्रमणेऽन्नाशनं वपनक्रिया ॥
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः ।
केशान्तः स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः ॥
त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्काराः षोडश स्मृताः ।
नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्जं क्रियाः स्त्रियः ॥
विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्यामन्त्रतो दश ॥’
इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त चौदह संस्कार, पंद्रहवां स्मार्त्त
अग्न्याधान, सोलहवां श्रौत अग्न्याधान है ।
सारांश यह है कि अपने अपने कल्पसूत्र ( स्मार्त्तसूत्र श्रौत
सूत्रों) के अनुसार अधिक अथवा न्यून जितने संस्कार प्राप्त
होवें उनका ही करना योग्य है । और पहिले जो संस्कारों
की अधिक वा न्यून संख्या लिखी है वह सब वैदिक शाखा
सूत्रों के भेद से है । इसीलिये गोत्र, प्रवर के समान शाखा-
सूत्र का भी स्मरण रखना अत्यावश्यक है । नहीं तो किस
किस वाक्य के अनुसार संस्कार किया जायगा । सर्वथा
संस्कार का उच्छेद होगा या दूसरे का बेटा बनना पड़ेगा ।
उक्त व्यवस्था में यह गृह्यपरिशिष्टकार का वाक्य है—
‘ बह्वल्पं वा स्वगृह्योक्तं यस्य यावत् प्रकीर्तितम् ।
तस्य तावति शास्त्रार्थे कृते सर्वः कृतो भवेत् ॥’
इसी प्रकार कात्यायन का वाक्य है—
‘ ऊनो वाऽप्यतिरिक्तो वा यः स्वशाखास्थितो विधिः ।
तेन संतनुयाद् यज्ञं न कुर्यात् पारशाखिकम् ॥
४२ मनुस्मृति ।
परशाखोऽपि कर्तव्यः स्वशाखायां न नोदितः ।
सर्वशाखासु यत् कर्म एकं प्रत्यवशिष्यते ॥'
ऐसी दशा में अन्यान्य स्मृतियों की उपेक्षा करके अपनी
अपनी गृह्यस्मृति (स्मार्तसूत्र) के अनुसार यावच्छक्य गर्भा-
धानादि संस्कारों का अनुष्ठान करना न्यायप्राप्त है। जैसे
शुक्लयजुर्वेदीय-माध्यंदिनी शाखावालों को उनकी गृह्यस्मृति
(पारस्करस्मार्तसूत्र) के अनुसार ये संस्कार करने चाहियें-
(१) आर्तव (ऋतु) काल में गर्भाधान ।
(२) दूसरे वा तीसरे मासमें गर्भचलन के पूर्व पुंसवन ।
(३) छठे वा आठवें मास में सीमन्त (सीमन्तोन्नयन) ।
(४) उत्पन्न होने पर जातकर्म ।
(५) ग्यारहवें दिन नामकर्म ।
(६) चौथे मासमें निष्क्रमण (बालक को घर से बाहर लाना)
(७) छठे मास में अन्नप्राशन ।
(८) पहिले वा तीसरे वा कुलाचार के अनुसार चूडा
(चौल) । (गृह्यस्मृति वा याज्ञवल्क्य में अनुक्त कर्णवेध, चौल
वा उपनयन के साथ यथाचार अनुष्ठेय है)
(९) गर्भाधान से आठवें वा आठवें वर्ष में ब्राह्मण का,
गर्भाधान से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का, बारहवें में वैश्य का,
उपनयन संस्कार कहा है। यदि उक्त काल से दूना गौण
काल (१६, २२, २४ वर्ष) व्यतीत हो जाय तो बाद
'व्रात्यस्तोम' नामक प्रायश्चित्त किये बिना वे सब
१। इस समय पंचगौडों में तो उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त और समावर्तन
ये चारों संस्कार एक ही दिन में खतम कर दिये जाते हैं ।
२। स्मार्त व्रात्यस्तोम कर्म दुर्लभ होरहा है ।
भूमिका । ४३
(ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य के अभागे लड़के) उपनयन के अधिकारी
कथमपि नहीं हो सकते और यह भी स्मरण रखने योग्य है
कि यदि इस काल के अभ्यन्तर स्त्रीपरिग्रह हो जाय तो अधि-
काधिक प्रायश्चित्त के भागी बनेंगे । जातकर्मार्दि चूडान्त पांच
संस्कार कन्या के अमन्त्रक (मन्त्रवर्जित) होते हैं और कन्या
का उपनयन-संस्कार नहीं होता है । अतएव वेदारम्भ-के-
शान्त-समावर्तन भी नहीं होते हैं ।
(१०) उपनयन के अनन्तर वेदारम्भ (स्वशाखाध्यय-
नारम्भ) ।
(११) यथासंभव अध्ययन के बाद केशान्तकर्म
(गोदानविधि) ।
(१२) केशान्तकर्म के अनन्तर समावर्तन ।
(१३) सोलहवें वर्ष के अनन्तर विवाह । यह विवाह-
संस्कार कन्या का आठवें वर्ष से ग्यारहवें वर्ष तक होना
आवश्यक है और विवाह संस्कार के पहिले साधारण शिक्षा
पश्चात् विशेष शिक्षा ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अवश्य कर्त्तव्य है ।
(१४) विवाह के अनन्तर ही वा भाइयों से पृथक् होने पर
आवसथ्याधान (गृह्याग्निस्थापन) ।
(१५) यथाकाल पञ्चमहायज्ञ ।
(१६) श्रावण की पौर्णमासी में उपाकर्म ।
१। स्त्रियों की शिक्षाविधि ‘विद्या’ और ‘चातुर्वर्ण्यशिक्षा’ में देखो ।
२। ‘आवसथ्याधान’ किये बिना भी ‘पञ्चमहायज्ञ’ हो सकता है और
गृहस्थ को अत्यन्त आवश्यक है ।
४४ मनुस्मृति ।
( १७ ) पौष मास के रोहिणी नक्षत्र में वा कृष्णाष्टमी में
उत्सर्ग । .... .... .... इत्यादि ।
इसी प्रकार माध्यंदिनी शाखावालों को कात्यायन श्रौत
सूत्रानुसार अग्न्याधानादि श्रौतकर्म करना चाहिये ।
( १ ) अग्न्याधान । इसका आरम्भ ब्राह्मण-द्विज वसन्त
ऋतु में, क्षत्रिय-द्विज ग्रीष्मऋतु में, वैश्य-द्विज शरद् ऋतु में
करते हैं । अग्न्याधान में अध्वर्यु, होता, उद्गाता और ब्रह्मा
ये चार ऋत्विक् होते हैं । अग्न्याधान-शाला में पश्चिम की
ओर 'गार्हपत्य' नाम अग्नि का वृत्ताकार कुण्ड होता है । इस
से पूर्व की ओर 'आहवनीय' नाम अग्नि का चतुरस्र कुण्ड
होता है । दक्षिण की ओर 'अन्वाहार्यपचन' नाम अग्नि
का वृत्तार्धाकार कुण्ड होता है । गार्हपत्य और आहवनीय
कुण्ड के अन्तराल भूमि में एक विशिष्ट वेदिका बनाई जाती
है, जिसका पूर्व भाग 'अंश' पश्चिम भाग 'श्रोणि' कहलाता है ।
( २ ) अग्निहोत्र । यह सायं और प्रातः वेदमन्त्र से
जो अग्नि में आहुति दी जाती है उस कर्म का नाम है ।
' यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत ।
एवं, सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ॥ '
( छां. उ. )
( ३ ) दर्शपौर्णमास । यह इष्टि आहिताग्नि ( अग्न्याधान-
कर्ता ) को प्रतिमास करना पड़ता है .... इत्यादि ।
इसी प्रकार आश्वलायन-शाङ्खायन आदि सूत्रों के अनुसार
ऋग्वेदियों के कर्म; आपस्तम्ब-हिरण्यकेशीय-सत्याषाढ
१-स्मार्त कर्म में ' अष्टका ' आदि कतिपय कर्म और श्रौतकर्म में आगिले
सभी भाग छोड़ दिये हैं । उनमें राजसूय, अश्वमेध क्षत्रिय के विषय हैं ।
भूमिका । ४५
आदि सूत्रों के अनुसार कृष्णयजुर्वेदियों के कर्म; गोभिल-
कौथुम आदि सूत्रों के अनुसार सामवेदियों के कर्म और
शौनक सूत्रानुसार अथर्ववेदियों के कर्म होते हैं। और यह
स्मरण रहे कि सर्वत्र स्मार्तकर्म में स्मार्तसूत्र और श्रौतकर्म में
श्रौतसूत्र ही शरण हैं। शाखा-सूत्र के विस्मरण में वा उच्छेद
में अन्यान्य स्मृतियों का शरण लेना यह अगतिक गति है।
एवं, प्रेतकर्म में गरुड़पुराण का शरण लेना भी अपनी अपनी
गृह्यस्मृति के अभावदशा में है। क्योंकि प्रायः पुराणों में
सर्वशाखीय कर्मों का निरूपण है इस कारण पौराणिक-कर्म लेने
से गृह्यस्मृति का अनादर होता है वह सर्वथा विरुद्ध है।
प्रेतकर्म-श्राद्ध । मरीचि ने कहा है—
' प्रेतं पितॄंश्च निर्दिश्य भोज्यं यत् प्रियमात्मनः ।
श्रद्धया दीयते यत्तु तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम् ॥ '
मृतपित्रादि 'सपिण्डीकरण' श्राद्ध के पहिले "प्रेत =
प्र + इत " शब्द से कहे जाते हैं। मृतपित्रादिकों के उद्देश्य
से जो आत्मप्रिय भोजनादि ब्राह्मण को श्रद्धा से दिया जावे
वह 'श्राद्ध' कहलाता है। श्राद्ध चार प्रकार का है-एकोद्दिष्ट,
सपिण्डन; पार्वण और नान्दी। एकोद्दिष्ट तीन प्रकार का
है—नव, नवमिश्र और पुराण।
(१) मरण दिन से लेकर दशवें दिन तक जो श्राद्ध कहे
हैं वे 'नव' हैं।
(२) एकादशाहादि ऊनवार्षिक पर्यन्त श्राद्ध 'नव-
मिश्र' हैं।
१ इस समय ब्राह्मण सपत्ति के अभाव से अपात्रक श्राद्ध ही बहुधा होता है।
४६ मनुस्मृति ।
( ३ ) वार्षिकश्राद्ध 'पुराण' हैं ।
( ४ ) बारहवें दिन का श्राद्ध ' सपिण्डन ' कहलाता
है । जिसका यह स्वरूप है—
' पित्रर्घ्यपात्रापिण्डेषु मेलनं येन भाव्यते ।
प्रेतार्घ्यपिण्डयोस्तद्धि सपिण्डनमुदीर्यते ॥ '
और पित्रादि एक के उद्देश से एक पिण्डयुत विश्वेदेव-
हीन जो श्राद्ध किया जाता है वह 'एकोद्दिष्ट ' है ।
( ५ ) पित्रादि तीन पुरुष के उद्देश से जो श्राद्ध होता है—
वह ' पार्वण ' है ।
( ६ ) पुत्रजन्म, विवाह, अग्न्याधान, सोमयाग आदि
शुभ कर्म के प्रारम्भ में जो श्राद्ध किया जाता है वह 'नान्दी'
श्राद्ध कहलाता है । इन आवश्यक श्राद्धों से अतिरिक्त 'काम्य-
श्राद्ध' हैं जो 'कात्यायनश्राद्धसूत्र' के नौमी कारिका में
तथा याज्ञवल्क्यस्मृति आदि में लिखे हैं ।
उपसंहार । कतिपय आवश्यक विषयों का निरूपण करके
कर्मकाण्ड समाप्त कियाजाता है । यह जरूर है कि धार्मिक
क्रिया अनेक अंशों में अदृष्ट फलार्थ है, पर ऐसा भी नहीं है
कि दृष्टफल न हो । विचार दृष्टि से गर्भाधानादि संस्कारों में
दृष्टफल बहुत मिलेंगे जिनका क्षेत्र-बीज-फल पुष्टि के साथ
घनिष्ट संबन्धहै। और यह भी जरूरहै कि क्रिया देश, काल,
पात्र की अपेक्षा करती है, देश, काल, पात्र के संघटन के
लिये अनेकानेक विधि हैं, उनके विघटन दशामें दोष उपस्थित
होते हैं, विधि में दोष न उत्पन्न हों इसलिये अनेक निषेध
वाक्य और दोषमार्जन के लिये अनेक उपाय हैं, बहुधा ये
उपाय विषय विभाग से प्रायश्चित्त, शान्तिक, पौष्टिक शब्द से
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भूमिका । ४७
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कहेजाते हैं । यह विषय यहां तक पहुँचा कि ऋषियों ने देश,
काल, पात्र का संकोच देखकर 'विरोधे त्वनपेक्षं स्याद् असति
ह्यनुमानम्' इस श्रुति प्राबल्य व्यवस्थापर विशेष दृष्टि न देकर
लोकरक्षार्थ 'कलिवर्ज्य' प्रकरण बनाया । इधर स्वार्थान्ध
लोगों ने संकीर्ण ग्रन्थों की बहुतायत करदी जिसका कलकल
'प्रत्यक्षीक्रियते-' पहिले लिखा जाचुकाहै ।
ऐसी कष्टदशा में 'अस्वर्ग्यं लोकविद्विष्टं धर्ममप्याचरेन्न तु'
इस योगीश्वर के शिक्षानुसार अपने कल्पसूत्रोक्त श्रौत-स्मार्त
कर्म धर्मसंरक्षणार्थ यथासंभव अवश्य कर्तव्य हैं । और बालकाल
में होनेवाले संस्कारों पर माता पिता को बाद के संस्कारों
पर स्वयं विचार करना जरूरी है । काल की महिमा से बहुतेरे
पुरुष यह कहते हैं कि-हम संसारी हैं, नाक दबाकर बैठने का
समय नहीं है-उन महाशयों से यह कहाजाता है कि विचार
कीजिये चौबीस घंटेमें एकआध घंटेका समय सबको मिल सकता
है, यदि आप अपनी तन्दुरुस्ती ठीक बना रक्खा चाहते हैं तो
'नाक दबाने' को वैद्य-हकीम-डाक्टर की दवा में शुमार
कीजिये । और यों त्रैवर्णिकपनेकी लीक भी चलती रहेगी ।
यह अवश्य कहना पड़ेगा कि 'गृह्यस्मृति' के कुछ विषय बहुत
बढ़े चढ़े नजर आने लगे बाक़ी-के लुप्त होगये, पहिले ऐसा न था।
जबसे वैदिक ज्ञान लुप्तप्राय होगया स्वशाखीय वा परशाखीय कर्मों
का बोध उठगया अत्यावश्यक, आवश्यक, अनावश्यक विषयों
का विवेक डूब गया और वर्णाश्रमधर्म का अधरोत्तर भया। अज्ञान
[Footnote]
१। कलिवर्ज्य का उल्लेख बहुत स्थलों में है। जैसा कि 'निर्णयसिन्धु' में
तीसरे परिच्छेद के पूर्वार्ध के अन्त में। निबन्धग्रन्थों के उद्धृत वाक्यों को मूल
ग्रन्थ से मिलाने की अत्यावश्यकता है ।
अथवा स्वार्थपरायणता से नानाविध कर्मकाण्डकी पद्धतियां
४८ मनुस्मृति ।
अथवा स्वार्थपरायणता से नानाविध कर्मकाण्डकी पद्धतियां
जगमगाहट करने लगीं तबसे गरीबों का धनाभाव से अमीरों
का अवज्ञा से प्रायः बहुत कर्म छूटगया।
चातुर्वर्ण्यशिक्षा में कहा है कि—
'सांस्कारिकं कर्म विधातुकामाः
पृच्छन्ति यत्तत् सुनिरूप्य लेख्यम् ।
न वा जिघृक्षाससंश्रयेण
नानाविधं वस्तु विमोहनाय ॥
निक्षिप्यतां दृष्टिरितस्ततो वा
विमृश्यतां वा मनसा निकामम् ।
अपव्ययाद् भारतभूतलेऽस्मिन्
संस्कार एष ( शाखी ) प्रलयं नु यातः ॥
भूरिक्रियाक्लप्तिनिरूपितश्री-
रास्तां स सोमादिविशेषयागः ।
न स्मर्यते क्वापि स जातियोगी
संस्कारशाखी बहुवित्तसाध्यः ॥'
इत्यादि ।
कल्पसूत्रों का अन्यान्य स्मृतियों से उपबृंहण (फैलाव)
हो। पर उसका यह प्रयोजन नहीं है कि कल्पसूत्रही एक कोने
में कर दिये जायँ। हां, यह जरूर है; जैसे गृह्यस्मृति और ज्योतिष
के संहिताभाग में संस्कार के लिये कालशुद्धि लिखी है तो
गृह्यस्मृतिका अनुरोध करके ज्यौतिषिक कालशुद्धि लेनी चाहिये।
अतएव कितने ही कर्म सिंहस्थ-मकरस्थ गुरु आदि दुष्टकाल
में भी किये जाते हैं उसमें यह दिग्दर्शन है—
'अधार्यकन्यकोद्वाहोऽधार्यपुत्रोपनयनम् ।
गयागोदावरीयात्रो सिंहस्थेऽपि न दुष्यति ॥'
धर्माधिकारि नन्द पण्डित ।
यही दुर्दशा शान्तिक-पौष्टिक आदि की है। जहां पर
शान्तिक कर्म का विधान नहीं है वहां पर भी वह एक
विशालस्वरूप धारण करके यजमान को बाधित कर
डालता है। जैसे उपनयन-विवाह आदि में । उस कर्म को
'ग्रहशान्ति' वा 'ग्रहयज्ञ' कहा करते हैं, उसका उल्लेख
'याज्ञवल्क्यस्मृति' में इस प्रकार है-
'श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत् ।
वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्नपि ॥ २६५ ॥'
और इसकी इतिकर्त्तव्यता (विधि) भी वहीं लिखी है,
परंतु प्रचलित ग्रहशान्ति की पद्धति बहुत बढ़ाई गई है और
अनेक प्रकार की प्राप्त होती है। किसको क्या कहा जाय ?
यही दशा संस्कारभास्कर आदि की है।
पुनर्विवाह । जैसे उपनीत त्रैवर्णिक का अनेक कारणों
से फिर 'उपनयन' संस्कार करना प्राप्त होता है वैसा विवा-
हिता त्रैवर्णिक स्त्रीका फिर 'विवाह' करना नहीं प्राप्त होता।
अतएव पुनर्विवाह का विधान् किसी 'गृह्यस्मृति' में नहीं
किया है। और मनु ने आठवें तथा नवें अध्याय में "पाणि-
ग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ॥२२६॥" "पाणिग्रहणिका
१ यह पुस्तक राजपूताना प्रान्त में बहुधा व्याप्त है ।
२ इस विषय का पूर्ण विचार 'विधवोद्वाहशङ्कासमाधि' नामक ग्रन्थ में
किया है। यहां तो दिग्दर्शनमात्र है ।
५० मनुस्मृति ।
मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् ॥ २२७ ॥ ” “ नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु
नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ॥ ६५ ॥ ” इत्यादि वाक्यों से पुन-
र्विवाह का निषेध किया है। और शास्त्रीय युक्ति भी है कि
जब एक बार कन्याद्रव्य का दान वरको करदिया गया, तब
दाता का पुनः कन्याद्रव्य में अधिकार न रहा, और अधिकारी
वर मृत हो गया तथा अन्यद्रव्य के समान अधिकारी के संवं-
धियों का अधिकार नहीं प्राप्त होता, उस दशा में ‘विधवा’
को देनेलेनेवाला चोर के सिवाय और कौन हो सकता है ?
और-
‘नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतितेऽपतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥' (४अ. ३०श्लो.)
इस पराशरस्मृति वचन से जो पुनर्विवाह की सिद्धि
करते हैं उनकी बड़ी भूल है; क्योंकि प्रथम तो वैवाहिक श्रुति
(मन्त्र) के साथ उक्त स्मृति का विरोध होता है, जिस के बारे
में भगवान् मनु ने लिखा है कि 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्या-
स्वेव प्रतिष्ठिताः' (८ अ. २२६ श्लो. )। दूसरे, गृह्यस्मृतियों
में पुनर्विवाह विधिके न होने से उक्त स्मृति का गृह्यस्मृतियों के
साथ विरोध स्पष्ट है। तीसरे, पतिके पतित होने पर ‘आशुद्धेः
संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः' (आ. ७७ श्लो. ) इस
याज्ञवल्क्य-स्मृति के अनुसार पत्यन्तर की प्राप्ति नहीं होती,
किंतु प्रायश्चित्त करने बाद वही पति व्यवहार्य होता है। अत-
एव यह कहा जा सकता है कि उक्त, स्मृति-वाक्य स्वतन्त्ररूप
१ पति स्त्रीका दाता किसी अवस्था में होता है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र...।
२ 'अर्यमणं तु देवं कन्या अग्निमयक्षत' इत्यादि मन्त्र और प्रस्तुतविचार विद्यासुधाकर में स्पष्ट है।
भूमिका । ५१
से 'पुनर्विवाह' अथवा 'नियोग' का विधायक नहीं
हो सकता, किंतु व्यवस्था की अपेक्षा रखता है। जैसा—
वाग्दान के बाद पाणिग्रहण के पहले अपति, अर्थात् पतिभिन्न
पति सदृश वर; यदि लापता हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी
हो जाय, वा नपुंसक हो जाय, वा महापातक से दूषित हो जाय
इन पांच आपत्तियों में 'च' कार से यदि विकर्मा, वा विरुद्ध-
धर्मा, वा समान गोत्र, वा समान प्रवर ज्ञात होय तो कन्या
दूसरे वर को दी जाय। यही आशय धर्माधिकारि नन्द पण्डित
ने विद्वन्मनोहरा में दिखलाया है ।
नियोगकर्म । यह इन्द्रियदौर्बल्य के कारण कलि में सर्वथा
असंभव है। इसीलिये वृहस्पति ने कहा है—
'उक्ता नियोगा मुनिना निषिद्धाः स्वयमेव तु ।
युगक्रमादशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥'
इत्यादि ।
और मनु ने भी कहा है—
'अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।'
( ९ अ. ६६ श्लो. )
नियोग कर्म तो दूर रहा, इस समय भी पुनर्विवाह त्रैवर्णिक-
कातिरिक्त शूद्र जाति में हीनदृष्टि से व्यवहार्य है। भले ही
त्रैवर्णिक-महाशय उसकी कोशिश में रहें। और "अक्षमाला
वशिष्ठेन—' ९ । २३ 'अजीगर्तः सुतं हन्तुं—' १० । १०५
१ 'अपति' ऐसा छेद करने से 'उत्पत्स्यमानपतित्ववान्' ऐसी व्याख्या
की आवश्यकता नहीं है और नञ्समास होने से 'अपतौ' की साधुता भी
हो जाती है।
२ देखिये भारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा पाण्डवों की उत्पत्ति के
प्रकरण ।
५२ मनुस्मृति ।
'श्वमांसमिच्छन्–' १० । १०६ 'भरद्वाजः–' १० । १०७
'विश्वामित्रः–' १० । १०८ ।" इत्यादि मनूक्तवृत्तान्त; तथा
तारा, मन्दोदरी, द्रौपदी आदि के कतिपय वृत्तान्त वर्तमान
काल में कथमपि दृष्टान्त बनकर विधेय नहीं होसकते।
यज्ञ और पशु । 'कलिवर्ज्य' के अनुसार अग्निहोत्र
संन्यास आदि कतिपय कर्म कलि में वर्जित हैं तो भी उनका
विधान (प्रतिप्रसववाक्य) प्राप्त होता है—
'यावद्वर्णविभागोऽस्ति यावद्वेदः प्रवर्तते ।
संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत्कुर्यात्कलौयुगे ॥'
अर्थात् जब तक वेद और वर्णविभाग चल रहा है तब
तक अग्निहोत्र और संन्यास का भी चलाना इष्ट है । 'च'
कार से यथासंभव कर्मान्तर और आश्रमान्तर का ग्रहण करना
योग्य है । अतएव यथा कथंचिद् ब्रह्मचर्य, चातुर्मास्य, सोमयाग
आदि कतिपय कर्म कहीं कहीं शिष्टजनों में दिखाई पड़ते हैं
(अकरणान्मन्दकरणं श्रेयः) ।
और जो यह व्यासवचन है—
'चत्वार्यब्दसहस्राणि चत्वार्यब्दशतानि च ।
कलेर्यदा गमिष्यन्ति तदा त्रेतापरिग्रहः ।
संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता ॥'
कलि के चार हज़ार चार सौ वर्ष व्यतीत होने बाद सुज्ञ
ब्राह्मण, अग्निहोत्र और संन्यास का ग्रहण न करें । यह
निषेध भी वर्तमानकालिक वर्णाश्रमव्यवहार को सूक्ष्मदृष्टि से
देखने से समुचित ज्ञात होता है ।
और जो यज्ञ में 'पशु' के संज्ञपने को भ्रान्तिमूलक सिद्ध
१ संज्ञपन=आलम्भ, यह 'संज्ञप॑यान्वगग्नित्येव ब्रूयात् ६।५।२१' इस
कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार भाष्य है ।
' भूमिका । ' ५३
करते हैं, वा उसको सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म बतलाते हैं,
वा उसको पिष्टपशुसाध्य कहते हैं, वे सब भ्रान्त अथवा
स्वार्थान्ध हैं। जब ' पशुसंज्ञपन ' की चर्चा एक स्थल में
नहीं हज़ार स्थलों में है, वेद से लेकर पुराणतक संज्ञपन छिपा नहीं
है, वेदद्रोही उसपर 'पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति ।
स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते ॥' इत्यादि मज़ाक
करते आये हैं, तब क्या संज्ञपन हमारे छिपाने से छिप सकता
है ? कथमपि नहीं, और सच्ची बात छिपाकर पापभागी क्यों
बना जाय ? जैसे 'अश्वालम्भ' 'अश्वमेध' शब्द का 'अश्व-
संज्ञपन' अर्थ छोड़कर 'अश्वस्पर्शन' वा 'अश्वसंगम' अर्थ करते
हैं सो सरासर झूठा है। क्योंकि इस कपोलकल्पित अर्थ के
अभिप्राय से उक्त शब्द का प्रयोग कहीं न मिलेगा ....इत्यादि ।
ऐसी दशा में संज्ञपन भ्रान्तिमूलक क्योंकर सिद्ध हो सकता
है ? और इस बारे में श्रीभाष्याचार्य-श्रीरामानुजाचार्य ने
तथा वेदान्तपारिजातसौरभाचार्य श्रीनिम्बार्काचार्य के
शिष्य-वेदान्तकौस्तुभाचार्य श्रीश्रीनिवासाचार्य ने यह श्रुति
लिखी है—
'न वा उ एतन् म्रियसे न रिष्यसि देवान् इदेषि पथिभिः
सुगेभिः। यत्र यन्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्रत्वा देवः सविता
दधातु ॥'
१-२ ' अश्वः आलभ्यते वध्यतेऽत्र । अश्वः मेध्यते वध्यतेऽत्र ' यों ये
योगरूढ़ शब्द हैं, केवल यौगिक नहीं हैं । देखिये, वाल्मीकीय रामायण बाल-
काण्ड १४ सर्ग ।
५४ मनुस्मृति ।
और पूर्णप्रज्ञ दर्शनाचार्य श्रीमध्वाचार्य ने यह वाराह-
पुराण का वाक्य लिखा है—
' हिंसा त्ववैदिकी या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत् ।
वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथंचन ॥'
यह विचार ' अशुद्धमिति चेन्न, शब्दात् ३ । १ । २५ ।'
इस ब्रह्मसूत्र के भाष्य में किया है। इस व्यवस्था से
' ओषधयः पशवः- ' ४ । ४० यह मनुवचन भी सहानुभूति
रखता है।
और जो सांख्यकारिका में आनुश्रविक-कर्म ( त्रेताग्नि-
साध्य अनुष्ठान ) को अविशुद्धि, क्षय, अतिशय, इन तीन
दोषों से ग्रस्त बतलाया है उसमें कर्मसाध्य स्वर्ग को अनि-
त्यता से क्षयवान्, और कर्मफल को न्यूनाधिकभाव से
अतिशयवान् बतलाना न्यायसिद्ध है; परंतु कर्म में एकान्ततः
अविशुद्धि बतलाना न्यायविरुद्ध है और उपजीव्य ( सांख्य-
दर्शन ) से बहिर्भूत है; क्योंकि किसी सांख्यसूत्र से उक्तकर्म
की अविशुद्धि नहीं सिद्ध होती प्रत्युत ' अशुद्धमिति चेन्न,
शब्दात् ' इस ब्रह्मसूत्र के साथ विरोध खड़ा होता है और इसी
सूत्र के शारीरकभाष्य में आचार्य श्री ६ शंकर स्वामी ने
' न हिंस्यात् सर्वाभूतानि' इस शास्त्र को उत्सर्ग और 'अग्नी-
षोमीयं पशुमालभेत ' इस शास्त्र को अपवाद व्यवस्थित किया
है। और ' अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ४।१। १३,
इस ब्रह्मसूत्र से आनुश्रविक-कर्म विशेष का ज्ञान में उपयोग
बतलाया है । ऐसी स्थिति में 'अविशुद्धिः=सोमादियागस्य
पशुबीजादिवधसाधनता ' यह लेख कारिकार्पक्ष-रक्षणार्थ
टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन
भूमिका । ५५
है। इस विषय पर 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' की 'विद्वत्तोषिणी'
टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन
परिणामिका एक विशाल वक्तृता दिखलाई है जिसके प्राति-
स्विक विचार का अवकाश यहां नहीं है।
और 'संज्ञपन' को सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म भी नहीं
स्थिर कर सकते क्योंकि 'चत्वार्यब्दसहस्राणि-' इस व्यास-
वाक्य से भी त्रेताग्निनसाध्य कर्मों का अनुष्ठान कलि में प्राप्त
होता है, वह देशकालपात्र के संकोच से कुछ दिन के लिये
कहागया है यह दूसरी बात है। और 'गोसंज्ञप्तिश्च गोसवे'
इत्यादि विशेष संज्ञपन तो श्रुति-स्मृति से सुतरां निषिद्ध हैं।
पर अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, सोम आदि कतिपय यज्ञ निषिद्ध
नहीं हैं, अतएव उनके प्रातिस्विक निषेध वाक्य भी नहीं
प्राप्त होते और वे दाक्षिणात्यशिष्टों में अद्य भी कथमपि किये
जाते हैं। रहगया 'कलिवर्ज्य' प्रकरण लेख, वह 'श्वानं
युवानं मघवानमाह' इस के समान है। यह अवश्य विचार-
णीय क्या बल्कि महान् विचारणीय विषय है कि जब स्मृति
से श्रुति का बाध नहीं हो सकता और देश, काल, पात्र के
संकोच से अनेक कर्मों के अनुष्ठान से सुकृत के बदले दुष्कृत
खड़े होने की पूरी आशङ्का है तब महानुभावों ने 'कलिवर्ज्य'
व्यवस्था की। जिसमें श्रुतिविहित, स्मृतिविहित, सामर्थ्य-
विहित और आचारविहित कितने एक कर्मोंका निषेध तथा
१ आपने स्वपरिष्कृत पातञ्जलयोगभाष्य के प्रारम्भ में एक 'योगतत्त्वसमीक्षा'
नाम की भूमिका लिखी है जिसमें वेदान्त सिद्धान्तों को आड़े हाथों से संभाला है,
उसका उद्धार वेदान्तपरिभाषा की सगणप्रभा-शिखामणि टीका की भूमिका
में श्रीगोविन्द सिंह निर्मल साधुने किया है।
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५६ मनुस्मृति ।
[Main Text]
किसी किसी निषिद्ध का विधान भी किया है । और वैदिक
' पशुसंज्ञपन ' पिष्टपशु साध्य है, यह भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि ' न वा उ एतन्म्रियसे-' इस उक्त श्रुति का विरोध
होता है, तथा ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि '
इत्यादि श्रुतियों का पैष्टिक पशु में अत्यन्त बाध है तथा
पिष्टपशु करने का विधिवाक्य भी नहीं है जो ' श्रूयते हि पुरा
कल्पे नृणां व्रीहिमियः पशुः ' इत्यादि वाक्यों से विधि की कल्पना
की जाती है वह ' पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते '
इसके समान उपेक्षणीय है । और जिस लक्ष्य से पिष्टपशु का
विधित्व माना जाता है उससे भी छूटना असंभव है क्योंकि-
' व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वशप्रवृत्तायाम् । म्रियतां जीवो
मा वा धावतये ध्रुवं हिंसा ॥ ' तो अशास्त्रीयकर्म में अहंभाव से
पड़कर क्या फल है ? धन, नहीं निधन....इत्यादि ।
अग्निपुराण की शिक्षा है कि-
' अग्निष्टोमादिकर्माणि सापायानि कलौयुगे ।
गङ्गास्नानं हरेर्नाम निरपायमिदं द्वयम् ॥ '
संस्कार-व्यय । जातीय संस्कार ( द्विजत्वघटक-संस्कार )
में अल्पव्यय है । यदि ऐसा न होता तो धनिक ही जातिमान्
बन सकते; यह बात गृह्यस्मृतियों के देखने से साफ जाहिर है ।
पारस्कर गृह्यस्मृति के प्रधान व्याख्याता कर्काचार्य आव-
सथ्याधान के ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' इस अन्तिम सूत्र की
व्याख्या में सिद्धान्त करते हैं कि एक ब्राह्मण भोजन कराना ।
आशय यह है कि जहां प्रकृत के समान संख्या का ज्ञान न
हो वहां एक ब्राह्मण लेना और जहां ' ब्राह्मणान् भोजयित्वा'
[Footnote]
१ बृहन्नार में ।
भूमिका । ५७
ऐसा लिखा है वहां पर तीन ब्राह्मण लेना योग्य है । भगवान्
मनु ने भी कहा है कि-
‘ द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ ’
यद्यपि यह श्राद्ध का विषय है तो भी आतिदेशिक विधि
के अनुसार कर्मान्तर में भी इसका अनुरोध करना अनुचित
न होगा, यदि कोई प्रामाणिक विशेष वाक्य न उपस्थित हो।
यदि गृह्यस्मृति के अनुसार ब्राह्मण संख्या न्यून प्रतीत हो
तो इस यज्ञपार्श्व के वाक्य का आलम्बन करो-
‘ गर्भाधानादिसंस्कारे ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ।
शतं विवाहसंस्कारे पञ्चाशन्मेखलाविधौ ॥
आवसथ्ये त्रयस्त्रिंशच्छ्रौताधाने शतात्परम् ।
अष्टकं भोजयेद् भक्त्या तत्तत्संस्कारसिद्धये ॥
सहस्रं भोजयेत् सोमे ब्राह्मणानां शतं पशौ ।
चातुर्मास्ये तु चत्वारि शतानि पञ्च सुराग्रहे ॥
अयुतं वाजपेये च ह्यश्वमेधे चतुर्गुणम् ।
आग्रयणे प्रायश्चित्ते ब्राह्मणान् दश पञ्च च ॥’
२ । उपासनाकाण्ड । सर्वोपास्य-परमेश्वर, निर्विशेष
और सविशेष अर्थात् निर्गुण (अवाङ्मनसगोचर), सगुण
( वाङ्मनसगोचर ) श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास में अनेक
प्रकार से वर्णित है ।
निर्विशेष-परमेश्वर ( ब्रह्म )-
‘ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
५८ मनुस्मृति ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ '
कठोपनिषत्.
इस यजुर्वेदीय-कठशाखीय-श्रुति से ज्ञेय है । और
सविशेष परमेश्वर ( ब्रह्म )-
' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्य-
श्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः, तस्य यथा
कप्यासपुण्डरीकमेवमक्षिणी, तस्योदिति नाम, स एष सर्वेभ्यः
पाप्मभ्य उदितः, उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद,
इत्यधिदैवतम् । '
इस सामवेदीय-छान्दोग्य श्रुति से विज्ञेय है ।
विश्वरूपधारी श्रीनारायण ने नारद मुनि से कहा है कि-
' माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ।
सर्वभूतगुणैर्युक्तं, नैवं मां ज्ञातुमर्हसि ॥ '
शारीरकभाष्य.
अर्थात् हे नारद ! मैंने यह माया रची है जिससे तुम
मेरे को सविशेष देख रहे हो; नहीं तो तुम मेरे को ऐसा नहीं
जान सकते ।
इसी अभिप्राय से ' अन्तस्तद्धर्मापदेशात् १ । १ । २० '
इस ब्रह्मसूत्र के ' कल्पतरु ' में यह वचन लिखा है-
' निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्पन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ '