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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 649 में से

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पृष्ठ 51

'अधार्यकन्यकोद्वाहोऽधार्यपुत्रोपनयनम् ।
गयागोदावरीयात्रो सिंहस्थेऽपि न दुष्यति ॥'
धर्माधिकारि नन्द पण्डित ।
यही दुर्दशा शान्तिक-पौष्टिक आदि की है। जहां पर
शान्तिक कर्म का विधान नहीं है वहां पर भी वह एक
विशालस्वरूप धारण करके यजमान को बाधित कर
डालता है। जैसे उपनयन-विवाह आदि में । उस कर्म को
'ग्रहशान्ति' वा 'ग्रहयज्ञ' कहा करते हैं, उसका उल्लेख
'याज्ञवल्क्यस्मृति' में इस प्रकार है-
'श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत् ।
वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्नपि ॥ २६५ ॥'
और इसकी इतिकर्त्तव्यता (विधि) भी वहीं लिखी है,
परंतु प्रचलित ग्रहशान्ति की पद्धति बहुत बढ़ाई गई है और
अनेक प्रकार की प्राप्त होती है। किसको क्या कहा जाय ?
यही दशा संस्कारभास्कर आदि की है।
पुनर्विवाह । जैसे उपनीत त्रैवर्णिक का अनेक कारणों
से फिर 'उपनयन' संस्कार करना प्राप्त होता है वैसा विवा-
हिता त्रैवर्णिक स्त्रीका फिर 'विवाह' करना नहीं प्राप्त होता।
अतएव पुनर्विवाह का विधान् किसी 'गृह्यस्मृति' में नहीं
किया है। और मनु ने आठवें तथा नवें अध्याय में "पाणि-
ग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ॥२२६॥" "पाणिग्रहणिका
१ यह पुस्तक राजपूताना प्रान्त में बहुधा व्याप्त है ।
२ इस विषय का पूर्ण विचार 'विधवोद्वाहशङ्कासमाधि' नामक ग्रन्थ में
किया है। यहां तो दिग्दर्शनमात्र है ।