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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 649 में से

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पृष्ठ 45

भूमिका । ४३
(ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य के अभागे लड़के) उपनयन के अधिकारी
कथमपि नहीं हो सकते और यह भी स्मरण रखने योग्य है
कि यदि इस काल के अभ्यन्तर स्त्रीपरिग्रह हो जाय तो अधि-
काधिक प्रायश्चित्त के भागी बनेंगे । जातकर्मार्दि चूडान्त पांच
संस्कार कन्या के अमन्त्रक (मन्त्रवर्जित) होते हैं और कन्या
का उपनयन-संस्कार नहीं होता है । अतएव वेदारम्भ-के-
शान्त-समावर्तन भी नहीं होते हैं ।
(१०) उपनयन के अनन्तर वेदारम्भ (स्वशाखाध्यय-
नारम्भ) ।
(११) यथासंभव अध्ययन के बाद केशान्तकर्म
(गोदानविधि) ।
(१२) केशान्तकर्म के अनन्तर समावर्तन ।
(१३) सोलहवें वर्ष के अनन्तर विवाह । यह विवाह-
संस्कार कन्या का आठवें वर्ष से ग्यारहवें वर्ष तक होना
आवश्यक है और विवाह संस्कार के पहिले साधारण शिक्षा
पश्चात् विशेष शिक्षा ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अवश्य कर्त्तव्य है ।
(१४) विवाह के अनन्तर ही वा भाइयों से पृथक् होने पर
आवसथ्याधान (गृह्याग्निस्थापन) ।
(१५) यथाकाल पञ्चमहायज्ञ ।
(१६) श्रावण की पौर्णमासी में उपाकर्म ।
१। स्त्रियों की शिक्षाविधि ‘विद्या’ और ‘चातुर्वर्ण्यशिक्षा’ में देखो ।
२। ‘आवसथ्याधान’ किये बिना भी ‘पञ्चमहायज्ञ’ हो सकता है और
गृहस्थ को अत्यन्त आवश्यक है ।