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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages
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चतुर्थ श्रेणी—शौचकी वस्त्र और स्थानादिकी स्वच्छता है यद्यपि वर्हि-
ग शौच अन्तरङ्गकी अपेक्षा तुच्छ कहा जाता है तो भी इसकी बहुत श्रेष्ठता
है, पर बहिर शौचमें नीचे लिखी बातोंका अवश्य ध्यान रखना चाहिये ।

प्रथम^१^ बहिरंग शौच स्नानादिमें इतनी अधिकता न करे कि, उससे
किसी आवश्यक काममें हानि हो। प्रायः पाखण्डी लोग बारंबार स्नान करके भी
अपनेको अशुद्धही मानते हैं, दिनभर विक्षिप्त चित्तोंके समान सन्देहमेंही पड़े
रहते हैं । ऐसे लोगोंसे लोक परलोकका कुछभी उत्तम साधन नहीं होसक्ता ।
जैसे विद्यार्थी अथवा परिश्रमी जिनको [ स्वयम् परिश्रम करके रोटी उपार्जन
करनी पड़ती है ] “पुरुषों” को शौच स्थानमें अधिकता करना हानिकारक है ।

द्वितीय—दम्भ और पाखण्डसे बचता रहे, स्नादिकी अधिकतासे दम्भी
मनुष्य अपनेको संसारमें बड़ा माहात्मा एवं शुद्ध प्रगट करते हैं अज्ञानी लोग
उनको प्रशंसा और बड़ाई करते हैं जिससे वे बारंबार उसीमें अधिक प्रवृत्त होते
हैं । जैसा कि कुछ लोग करते हैं ।

तृतीय—अवकाश और सामर्थ्य रहते हुये आलसादि कारणोंसे स्नानादि
शौचकी क्रियाका कभी त्याग न करे ।

चतुर्थ^२^—जिस शौचादि क्रियासे किसी जीवधारीको दुःख होता हो उसे
त्याग देना चाहिये क्योंकि, वह शुचि हिंसाजनक होनेसे अधर्म है । कोई पुरुष


१—कोई कोई पुरुष संशय युक्त चित्तबाले होते हैं उनके मनमें सन्देहही बना रहता है कि,
न जाने यथार्थ शुद्ध हुई कि, नहीं ? ऐसे सन्देह में पड़ा हुआ मनुष्य शुचिके यथार्थ साधनों को
छोड़कर पाखण्डमें फँस जाता है । जैसा कि, प्रथम तो भोग और कामको अशुचि — जान
उसके संयममें लगता है फिर उसमेंभी सन्देह उठाकर भोग और कामकी प्रवृत्तिकोही शुचिका
हेतु समझकर उसकी प्रवृत्तिमें लग जाता है । फिर क्या या धृष्टताके साथ खुल ख़ेलता है
अपने उत्तम पदसे पतित हो जाता है । ऐसे पुरुषोंको कोई योग्य महात्मा पुरुष यथार्थ शुचिताका
उपदेश करे तो उसमें संशययुक्त हो बारम्बार संकल्प विकल्प करता हुआ मनही मन विचार
करता है कि, न जाने यह यथार्थ स्नान है कि, नहीं ? इस स्नानसे मैं शुद्ध होऊँगा कि नहीं ?
जो मुझे उपदेश करता है वह स्वयम् पवित्र महात्मा है कि नहीं ? ऐसे २ संशय करके उसके
उपदेशको छोड़ दूसरेकी शिक्षा सुननेमें लग जाता है । इसी प्रकार होते होते किसीकी बाहिरी
चटक मटक और गपोड़में फँसकर उसके दोषोंको न विचारता हुआ अनाचार्यमें प्रवृत्त हो पापका
भागी बनता है । दुःख पड़नेपर उससे विरक्त हो अन्यके पास जाता है वहाँसे भी दूसरेकी
शरण लेता है । ऐसे संशयात्मक पुरुषोंको कभी भी पवित्रता नहीं दीखती कभी न सुखकीही
प्राप्ति होती है वरन् सर्वदा शोकित रहता है ।

२ आजकल प्रायः दाम्भिक लोग ऐसा करते हैं कि, उनकी मण्डलीमें कोई किसी रोगके
कारण नहा न सके तो उसे छूनेमेंभी पाप समझते हैं । जबतक वह स्नान न करले तबतक
चाहे वह प्याससे मर भी जाय पर जल देना नहीं चाहते वरन् उसे भ्रष्ट, अशुद्ध आदि कठोर
शब्दोंसे दुखी करते हैं ।

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किसीसे मिलना चाहता हो पर वह अपने शुद्धिके अभिमानमें उससे घृणा करे तो यह कुकर्म हैं इसे त्यागना उचित है ।

पंचम—भोजनमें संयम आवश्यक है । शुद्ध भोजन ग्रहण करे अशुद्ध न करे ।

षष्ठम—संयममें इतनी अधिकता न करे जिससे दूसरोंको हानि पहुँचे । कोई तो किसीके आवश्यक कामको छोड़ करभी खड़ा रहे पर यह स्नान करनेमेंही दो चार घण्टा लगा दे ।

स्नानके भेद—स्नान दो प्रकारका है १ अन्तरङ्ग, २ बहिरङ्ग । अन्तरङ्ग । स्नान तीन प्रकारसे होता ॥ १—अन्तरङ्ग स्नान यह कि, सब अंगोंको पापसे शुद्ध रखे ।

दूसरा—बुरी आदतोंसे अन्तःकरणको शुद्ध रखे ।

३—ईश्वरके सिवा दूसरेको न देखे ।

बहिरङ्ग शुद्धि—भी तीन प्रकारकी है ?

१—देह गेहूको मृत्तिका जलादिसे शुद्ध रखे ।

२—बिना माँगे किसीके पदार्थमें स्वत्व न रखे ।

३—शारीरके बाल, नख आदि पदार्थोंसे शुद्ध रखे, आँख, कान, नाक आदिको शुद्ध करता रहे । बहिरङ्ग शुद्धि जल और मिट्टीसे होती है । अन्तरङ्ग शुद्धि विचार और विवेकसे होती है ।

सूर्य, चन्द्र तथा देवस्थान अथवा किसी प्रतिष्ठित स्थानकी ओर पीठ करके मुत्र पुरीष करने न बैठे । अग्नि, जल, राख, पृथ्वीका छिद्र, कठिन और तपी हुई पृथ्वी, गौली पृथ्वी आदिमें भूलसे भी मल मूत्र न त्यागे ।

धर्मका तीसरा चरण—दान है । दान बहुत तरहके हैं । यदि दान सुपात्रको


१—काममें तीन दोष प्रधान हैं वे चोरी, व्यभिचार और हिंसा ये हैं ।

वाणीमें तीन दोष हैं—निन्दा, गाली और मिथ्या लाप ।

मनके—क्रोध, ईर्षा, मान, छल ये चार दोष हैं ।

२ दीन पुरुषोंपर दया करके अन्न, वस्त्र, धन आदिसे सहाय करनेको “दान” कहते हैं यद्यपि इसमें देशकाल पात्रका भी विचार आवश्यक है तो भी यथार्थ दाता इस विलम्बको योग्य नहीं समझता क्योंकि, मनका स्वभाव है कि, क्षणमात्रमेंही अनेक संकल्प विकल्प कर लेता है, क्या जाने कुछ क्षण पीछे देनेका संकल्पही जाता रहे । इसी कारण उदार पुरुषको जिस समय दानकी बुद्धि होती है उसी समय दान करता है विलम्ब नहीं करता ।

दो प्रकारका दान है ।

एक उत्तम और दूसरा अनुत्तम । वह उत्तम दान है जो कि, दीनको देखकर द्रवित-

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दिया जाये तो अति उत्तम हो, बहुत पदार्थोंका दान दिया जाता है, वे चीजें—हाथी, घोड़ा, गाय, बैल, सोना, चांदी, वस्त्र, अनाज और कन्या पुस्तक आदि हैं। यदि दान गुप्त दिया जाये तो अति उत्तम हो। अपनी शक्ति और योग्यके अनुसार दान देना चाहिये। दानका पद बड़ा पुण्यमय है। दान पात्रको दान दिया हुआ उत्तम फल दायक है। जैसे सुपच सुदर्शनजीके पाँच कौल खानेहीसे महाराजा युधिष्ठिरका यज्ञ पूरा हो गया। यदि कोई ऐसा विचार करता रहे कि, सुपच सुदर्शनजी जैसा कोई साधु मिलेगा, तो दान देंगे, यह उसकी भूल है। इस प्रकार उदारता न करके तर्क वितर्क उठानेसे मनुष्य कृपण होकर दान जैसे उत्तम कर्मसे वंचित रहकर पापका भागी होता है। जो कृपणताके वश हुआ वह महानीच पापी होता है।

उससे उचित है कि, शूरवीर, धर्मबन्धु, सुकृत, विरक्त, दीन दास, दासी, विद्यार्थी, ऋणी आदि सब प्रकारके मनुष्य अथवा कोई भी जिसको जिस पदार्थकी आवश्यकता हो उसे दान दे। क्योंकि वही दानका अधिकारी है। मनुष्यको उचित है कि—

जो काहूके होय उपकारी । मन वच कर्म करि लेई विचारी ॥

पशुआ होयसो आँख छिपावे । मानुष बुद्धि सपने नहीं पावे ॥

दरिद्रतामें पड़े हुये किसी प्रतिष्ठित आदमीको, अपने धर्ममें आने वालेको चाहिये कि, अपने बालबच्चों, परिवार और सम्बन्धी, पड़ोसी और अतिथि आदि सब प्रकारके पुरुषोंकी सहायता कामना बिना करे। दुःखी पथिक अर्थात् अपने देशसे दूर देशमें किसी प्रकारसे दुःखी पड़े हुये मनुष्योंकी सहायता सब प्रकारसे करे। इसी प्रकार आवश्यकतानुसार बहुत प्रकारके दान हैं देशकालको विचारकर अवश्य इस अमूल्य पुण्यका संचय करे।

दान देनेकी रीति ।

१ दान देनेमें जहाँतक हो शीघ्रता करना चाहिये।

२ किसी पुण्य तिथिपर अथवा जब दान देना हो गुप्तदान दे। क्योंकिक गुप्तदानका फल अनन्त है।


—होकर दिया जाता है। अनुत्तम दान वह है जो कि, मान अथवा व्याप्तिके लिये अथवा किसी दूसरे दाताको जीतनेको बदलेकी आशा रखकर दिया जाय। दान केवल धन मात्रसेही नहीं होता वरन् विद्या दान, निर्भयता दान, मान दान आदि अनेक प्रकारके दान हैं जिन्हें निर्धन भी कर सकते हैं। यदि दानके विशेष विवरण देखने हों तो स्मृति ग्रन्थोंको देखो तथा उच्च कोटिके साहित्य देखो।

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३ दान देनेमें दम्भ और पाखण्ड न करे ।

४ किसीको दान देतीवार अपनी कृतज्ञता प्रकट न करे ।

५ दान लेनेवालेको तुच्छ न समझे बरन् श्रेष्ठ समझकर निरभिमान हो अपना हाथ नीचे रखकर दे ।

६ अपनेको दाता जान अभिमान न करे बरन् ऐसा समझे कि, "लेनेवालेकी अत्यन्त कृपा है कि, जो मेरे दानको स्वीकार कर रहा है ।"

७ अपने धनमें जो उत्तम पदार्थ हो वही दानमें दे ।

जिसके घरसे भिक्षुक निराश फिरकर जाता है वो अपना सब पाप वहाँही छोड़कर जाता उस घरमें देवता सात दिनतक दृष्टि नहीं देते घरवालेका सब पुण्य फिरे हुये भिक्षुकको प्राप्त होता है ।

दान लेनेवालेका कर्तव्य ।

दान लेनेवालेको दान लेनेके प्रथमही विचार करलेना चाहिये कि, दान किस प्रकारका है। दाता किस लिये दान देता है जहाँतक हो सके सकाम दानको न ले । जो श्रद्धाहीन पुरुष केवल अपनी बड़ाई और ख्यातीके लिये अथवा लोक निन्दाके भयसे दान देता हो उसको न ले । जो कठोर वचन कहकर दान दे अथवा भोजन करावे उसका भी न ग्रहण करे । ऐसी ही बहुतसी बातोंका विचार करना चाहिये ।

गुरुकी आज्ञानुसार दान पुण्य करना चाहिये सब कर्तव्योंसे यदि गुरुकी सेवा और आज्ञाकारिता हो । उदार पुरुषोंका पद अत्यन्त श्रेष्ठ है । जो लोग अपनी आवश्यक वस्तुको भी देकर दूसरोंकी आवश्यकता पूर्ण करते हैं वे श्रेष्ठ उदार पुरुष ईश्वरके पूरे कृपापात्र होते हैं । उदार दानी पुरुष ईश्वरके मित्र हैं ऐसे पुरुषके सब अपराध क्षमा किये जाते हैं । दानीको जब किसी प्रकारका कष्ट उपस्थित होता है तो उसकी सहायता स्वयम् परमात्मा करता है । जिस पदार्थको देनेकी सामर्थ्य रखनेपर भी जो न दे उसे कृपण कहते हैं, जो संग्रह करनेके पदार्थको अवसर बिना व्यय करे उसे फजूल खर्ची कहते हैं ।

ईश्वरके मार्गमें अपने तन मन धनका मोह न करनाही सर्वोच्च उदारता है । जो निष्काम होकर उदारताका अवलम्बन करता है वह धन्य है । धन्य है वह पुरुष जो मृत्युको नहीं भूलता क्योंकि, ऐसा पुरुष कृपण नहीं हो सकता ।

दया ।

सब धर्मोंमें दया सबसे शिरोमणि है । किसी भी प्रकारकी तपस्या एवं भजन क्यों न करे यदि दयामें कुछ भी न्यूनता हुई, तो सब निष्फल हो जावेंगे ।

विद्याभिमानियों को उपदेश ईश्वर प्रेमियोंको उपदेश

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जो संसारके जीवोंके साथ दया न करेगा उसपर ईश्वरकी भी दया न होगी। सृष्टिमें ईश्वर है, सृष्टि ईश्वरमें है। जो संसारमें किसीको दुख देता है वह ईश्वरको दुख देता है। दयाहीन कभी भी ईश्वरका पात्र नहीं हो सकता। पशु मनुष्य सब दुख दर्दमें एक बराबरही हैं। भेद इतनाही है कि, एक प्रबल एवं दूसरा निबल है। जो प्रबल निबलको दुख पहुँचावेगा वह यमराजके कोपानलका ईंधन बनेगा। जो किसीको सुख पहुँचावेगा वह दया सिन्धुकी कृपाका अवश्यही अधिकारी होगा।

तूने जो कुछ बोया है सो दरौ। गेहूँसे गेहूँ उगे जौ से जौ ॥

शब्द ॥ १० ॥ संतो राह दुनो हम दीठा ॥

हिन्दू तुरुक हटा नहि माने स्वाद सबनको मीठा ॥

हिन्दू वरत एकादशी साधें दूध सिंधारा सेती ॥

अन्नको त्यागें मन नहि हटके पारन करै सगौती ॥

तुरुक रोजा निमाज गुजारें बिस्मिल बाँग पुकारे।

उनकी विहिस्त कहाँसे होइहें सांझे मुर्गी मारे ॥

हिन्दूकी दया मिहर तुरुकनकी दोनो घटसे त्यागी।

वे हलाल वे झटका मारे आग दुनो घर लागी ॥

हिन्दू तुरुककी एक राह है सतगुरु यही बताई।

कहै कबीर सुनो हो संतो राम न कहूँ खुदाई ॥ १० ॥

बहुत प्रकार दया होती है। जिसके हृदयमें दया आई उसका बेंडा पार हुआ।

जैन साहित्यका मेष कुमार।

एक समय हाथियोंने ऐसा विचार किया कि, बनमें आग लगनेपर बहुत जीव भरते हैं, यदि कोई मैदान घास फूस और वृक्ष रहित हो तो आग लगनेके समय वहाँ जाकर सब बचसकें, निश्चय करके बहुतसे हाथियोंने मिलकर जङ्गलके एक भागसे वृक्ष आदि उखाड़ कर फेंक दिये जिससे एक स्वच्छ मैदान बन गया।

एक समय अग्नि लगनेपर हाथियोंसहित सब बनके जीवधारी उसी मैदानमें जा ठहरे। समस्त मैदान पशुओंसे भर गया कि, पौंव रखनेकी भी जगह नहीं रही।

हाथियोंका राजा विशालदन्त विशाल शरीरवाला भी सबके मध्यमें खड़ा था बहुत देर खड़े रहनेके कारन पैर सीधा करनेके लिये गजराजने अपना पग ऊपरको उठाया इतनेहीमें एक शशा खाली स्थान पाकर उसी स्थानपर आ

भारतवर्षकी धार्मिकावस्था

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बैठा । गजराजने दयासे द्रवित हो शसाके दब जानेके विचारसे पग नीचे नहीं रखा । तीन पगपर खड़ा रहा । तीन दिनके पीछे जब अग्नि शांत हुई तो सब जीवोंके साथ शसाके चले जानेपर गजराजने पग सीधा करना चाहा पर अत्यन्त कष्ट सहित तीन पग परही खड़ा रहनेके कारण शारीरिक परिश्रम व रगोंके चढ़ जानेसे सीधा पग नहीं हो सका बरण मुंहके बल गिरकर मर गया । उस दयाके प्रतापसे गजराज मरकर मगध देशका चक्रवर्ती राजा हुआ । जिसदिन महाराजा श्रेणकके घर उसका जन्म हुआ उसी दिन इतनी वर्षा हुई कि, वर्षोंसे अवर्षणके कष्टको सहती हुई प्रजाको महान् सुख प्राप्त हुआ इसी कारण कुमार का नाम मेघकुमार रखा गया ।

पश्चात् बहुत कालतक सुख भोगकर संसार विरक्त हो मोक्षका भागी हुआ इसी प्रकार दयाके बहुत दृष्टान्त हैं । धन्य हैं, वे जीव, जो दयाको अपना धर्म जानते हैं । उनके ऊपर धिक्कार है जो शक्ति रहते हुये भी दया नहीं करते ; परोपकारसे भागते हैं । धिक्कार उनकी अवस्थापर शोक और बारम्बार है जो कि, सहस्रों प्रकारकी हिंसा करते हुये भी स्वर्गकी आशा रखते हैं ।

मनुष्यको चाहिये कि, किसी प्रकारका दुःखी रोगी और दुर्बल, बुद्धि आदि जीवकी रक्षा करे अपनी शक्तिके अनुसार कभी पीछे पग न टारे ।

धर्मके चार वैरी ।

जिस प्रकार धर्मके चार मूल बतलाये हैं, उसी तरह धर्मके चार शत्रु भी हैं । उनका नाम-१ काम, २ क्रोध, ३ लोभ और ४ मोह है ।

काम-ऐसा प्रबल शत्रु है कि, मनुष्यको अंधा बना देनेमें इससे बढ़कर दूसरा कोई भी नहीं है । आठ प्रकारके मैथुनसे बचना अत्यन्त कठिन काम है । बड़े २ सिद्ध साधु तपस्वी महात्मा किसी न किसी प्रकार कामके वश हो जाते हैं । सहस्रों ऋषि मुनि और तपस्वियोंको इसने वारंवार नीचा दिखलाया है ।

मुसद्दस ।

मलिक व जिन्न व इन्स और इशरात । सारा आलम है तेरेही बरकात ॥
तुझसे कायम तनासुल आलात । रूह सारे फँसे व मज खूर फ़ात ॥

१ यह कथा जैन धर्मग्रन्थोंमें आई है मेघकुमारके श्रान्त होनेपर महावीर स्वामीने उसे इसके पूर्वजन्मकी कथा सुनाई थी वह थकनका मारा महावीर, स्वामीसे कह उठा था कि, महाराज ! अब मुझसे इस घाममें नहीं चला जाता, अब निर्गन्थियोंकी तपस्याके कष्ट नहीं उठाये जा सकते । उस समय चौबीसवें तीर्थंकरने उसके पूर्व जन्मकी कथा तथा उसी पुण्यसे राजकुमार होनेका वर्णन किया था । जैन साहित्य ऐसीही दिव्य कथाओंसे भरा पड़ा है । सच पूछिये तो वास्तविक जैन मत तो दया है ।

परधर्म और पर विद्यामें श्रद्धा

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छोड़ हरगिज नता दम सुकराद । तुफ्फ तुझ पर ऐ शहवात वह जात ॥
मायाने मार सबको काम छुरा । करदिया पहले काल हाल बुरा ॥
रही ब्रह्माको भी न शर्म जरा । विष्णु तन, घरके बघरको फिरा ॥
शिव ऊपर लाई मोहिनी आकात । तुफ्फ तुझ पर ऐ शहवात बद जात ॥
शृंगी ऋषिसे बुजुरगें शाहिदथे । जो उवादतमें अहद वाहिद थे ॥
हवस नफ़सानीके न शाहिदथे । गैवके मूजिदव मनाहिद थे ॥
उनके सर परभी धर दिया तू लात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बद जात ॥
भडकी शहवतकी आग जब अन्दर । इन्दर विल्ली हुये नारद वन्दर ॥
सग बनाया तुही विश्वामितर । चन्द्रमाँ मूर्ग कोई हरिण तीतर ॥
आरिफोंको दिया तू यह दरजात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
जाहिदोआविदो धर्म मूरत । दिल मनौवर हो देख जो सूरत ॥
कौड़ीकां कर दिया है यह औरत । अन्ध गलताँ हो गलवये शहवत ॥
रह बदकारीकी बताया घात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
रहते जो खुशक बर्गको खाकर । निकली उस-तनसे शहवत अखगर ॥
रोज रोशनको कर दिया था रात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
लंक रावणका कर दिया बरबाद । महाभारत भी द्रौपदी फिरियाद ॥
जंग तिरौचन भये उसे कीजे याद । मर गये बेशुमार हो नाशाद ॥
जिनकी कोई कभी न पूछे बात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
बाद शाहतको तू मिला दे गर्द । गाज़ी और पहलवान करे दिल सर्द ॥
आजिज इस सा न कोई बेदर्द । ओलिया अम्बिया करे बेपर्द ॥
यह बड़ा एक खवीस है हैहात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥

प्रारब्ध और पुरुषार्थ ।

६५ प्रश्न—शूर वीरतासे प्रारब्ध मिट जाता है ?

उत्तर—उदारता, दीनता, न्याय और शील ये चारों पुण्यके मूल हैं । जो कोई इनको भलीप्रकार धारण करेगा, जिसमें ये चारों गुण अखण्ड रहेंगे, वह प्रारब्धको भी मिटा सकता है । ये गुण जिसमें होते हैं उसको ईश्वरी सहायता मिलती है । पर कोई २ प्रारब्धही ऐसी होती है जिसको भोगे बिना छुटकारा नहीं होता ।

योग वासिष्ठकी कथा—एक समय भृगुमुनि अखण्ड ध्यानमें निमग्न हो तपस्या कर रहे थे । उनके पुत्र शुक्रजी सेवा करते हुए योग्यतानुसार भजन भी किया करते थे । एक समय एक अप्सरा उधरसे आ निकली । शुक्रको देख-

उचित कर्तव्य कैसा धर्मस्वीकार करना चाहिये

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कर मोहित होगई । शुक्र बड़े सुन्दर और कान्तिमान् थे । शुक्रकी दृष्टि भी उस अप्सरापर पड़ी । यह भी उसपर मोहित होगये । वह स्वर्गको चली गई । इधर उसीकी चिन्तामें शुक्रजीका शरीर छूट गया । अब दिव्य शरीर पाकर शुक्र स्वर्ग लोक पहुँचे राजा इन्द्रने शुक्रको आते देखकर सिंहासनसे उठ बहुत आदर मानसे बैठकर कहा कि, आपने बड़ा अनुग्रह किया, आप कुछ काल तक यहीं निवास कीजिये । शुक्र वहीं रहने लगे । एक दिन नन्दनवनमें भ्रमण करते २ वही अप्सरा दृष्टि पड़ी अप्सराने भी उन्हें देखा । अब क्या था दोनों ओरसे प्रेमसे ऐसी उमङ्ग मारी कि, दोनों एक क्षणभी अलग न रह सकें । लज्जावश हो शुक्रजीने तपोबलसे कुहेरा उत्पन्न किया चारों दिशामें अंधेरा छागया शुक्र और अप्सरा दोनोंने कामविलास करना आरम्भ किया, स्वर्गीय आयु क्षीण होनेपर दोनोंने स्वर्गसे गिरकर पृथ्वीपर जन्म धारण किया । शुक्रने तो एक ब्राह्मणके घर और अप्सराने एक राजाके घर जन्म लिया । समय पाकर राजकन्याने पूर्वके पतिके लिये शिवका आराधन आरम्भ किया । कुछ काल बीते पीछे राजकुमारीका स्वयंवर रचा गया। अनेक देशोंके राजकुमार आये उसके साथ २ ब्राह्मण भी अपने पुत्रसहित वहाँ आया । राजकुमारीने ब्राह्मण कुमारको माला पहिनायी । वो राजमहलमेंही रहने लगा । राजाको इस पुत्रीके सिवा दूसरी संतान न होनेके कारण वही ब्राह्मणकुमार राज्याधिकारी हो, बहुत कालतक राज्यकर मृत्युको प्राप्त हो, क्रमशः मछुआ और हिरण हो अंतमें फिर एक ब्राह्मणके घरमें जन्मा । अबकी बार पहिले पुण्यके प्रतापसे उसे संसारसे वैराग्य हुआ सबसे विरक्त हो गंगातटपर बैठे ध्यानमें निमग्न हुआ । इधर समय पाकर जब भृगुमुनिका ध्यान खुला तबतक शुक्रके पाँच जन्म हो चुके थे,

आंख खोलकर पुत्रका चारों ओर अन्वेषण करनेपर पुत्रको नहीं पाया वरन् उसकी सूखी हुयी मृतक देह मिली । यह देखतेही कालपुरुष पर अत्यन्त क्रोधित हो भृगुजीने कालपुरुषको शाप देना चाहा तो वो उनके सम्मुख आकर कहने लगा ।

उस समय कालपुरुषकी मूर्ति महाभयानक दीख पड़ती थी उसकी तीनों आंखें तीन सूर्योंके समान प्रकाशित और प्रदीप्त हो रहीं थीं । हाथमें त्रिशूल लिये हुये था । त्रिशूलमेंसे आगकी ज्वालाएँ निकलती थीं कालपुरुषने कहा कि तुम्हारे भस्म करनेसे मैं भस्मभी नहीं हो सकता । जो जैसा कर्म करता है मैं उसको वैसाही फल देता हूँ । तुम्हारे पुत्रने स्वयम् अपने कर्मानुसार फल पाया है । इतना कहकर कालपुरुषने शुक्रका सब हाल कह सुनाया ।

बीजककी रमैनी

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भृगुमुनिने कहा कि, मुझे उस ब्राह्मणके पास गंगातटपर ले चलो। फिर दोनों योग्यबलसे शीघ्रही तपस्वी ब्राह्मणके पास पहुँच गये। वहाँसे उसको साथ लेकर भृगुजीके आश्रम पर पहुँचे। कालपुरुषने शुक्रका पूर्व शरीर, दिखलाकर अनुरोध किया कि, अब तुम इसमें प्रवेश करो। पर उसने स्वीकार नहीं किया, कालपुरुषने बहुत समझाया कि, इसी शरीरसे तुम्हें दैत्योंकी गुरुआई करनी है। उधर भृगुजीने जल डालकर तपोबलसे मृतक शरीरको हूट पृष्ठ बनाया ब्राह्मणने उसमें प्रवेश किया उसी शरीरसे शुक्र दैत्योंके गुरु बने।

इस कथाके लिखनेका आशय यह है कि, प्रारब्ध कितना प्रबल है देखो ! कितने जन्म धारण करने पर भी भावीको भोगनेके लिये उसी पूर्वशरीरमें आना पड़ा।

६६ प्रश्न—गुरु और अधिकारी, आजकल अच्छे गुरु तो मिलतेही नहीं जिससे मोक्षमार्गकी प्राप्ति हो ?

उत्तर—ऐसा, कहना ठीक नहीं, क्योंकि, गुरुका अभाव नहीं है। सब प्रकारके मार्ग बतानेवालेगुरु सदा वर्तमान हैं। अधिकारीके अभावसे गुरुका अभाव जान पड़ता है।

कालपुरुष और सत्य पुरुष।

प्रश्न—आपने कहा था कि, काल पुरुषने सबकी बुद्धिपर आवरण डाल दिया है जिससे कोई पुरुषकी भक्तिमें नहीं लगता इससे प्रमाणित होता है कि, काल पुरुषसे भी प्रबल है।

उत्तर—कालपुरुष सत्यपुरुषसे प्रबल नहीं है पर सत्यपुरुषने काल-पुरुषको तीन लोकका राज्य दिया है दी हुई वस्तुका ले लेना उचित नहीं है। वह समय आवेगा जब कि, कालपुरुष अपना नियत समय व्यतीतकर स्वयम् अलग हो जावेगा।

कबीर साहिब और सत्य पुरुषकी एकता।

६८ प्रश्न—आपने कहा था कि, कबीर साहब सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर आये। इससे स्पष्ट है कि, कबीर साहब और सत्यपुरुष दो हैं। कबीर साहब केवल अहंदी हैं।

उत्तर—कबीरसाहब और सत्यपुरुष दो नहीं, केवल जीवोंके अज्ञानसे दो दीखते हैं। जिनको ज्ञान है उनकी द्वैतदृष्टि नहीं होती। संसारका व्यवहार द्वैत बिना नहीं चलता इस कारण कबीरसाहब और सत्यपुरुष दो कहे जाते हैं।

ब्राह्मणका कत्त

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नहीं तो यथार्थमें एकही हैं, क्योंकि, सत्पुरुषके बिना दूसरा कौन है जो काल-पुरुषके ऊपर जय पासके ।

तुलना ।

६९ प्रश्न--कितने साधु सन्त ऐसे होगये हैं जो कि, मारने काटनेसे भी न कटे न मरे तो क्या उन्हें भी कबीरसाहबके सम्मान समझना चाहिये ।

उत्तर--इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, प्रह्लाद आदिक जैसे भक्त जन अपनी भक्ति और प्रेमके प्रताप तथा विष्णुभगवान्की सहायतासे किसी २ बातमें पूरे देखे जाते हैं पर कबीरसाहबकी तुल्यता नहीं हो सकती वह अपने सम्मान आपही हैं उसकी सम्मानता दूसरा कोई नहीं कर सकता ।

निर्वासन मुक्त है ।

७० प्रश्न--जिसको वासना नहीं है वह पुरुष मुक्त है कि, नहीं ?

उत्तर--जो सत्यही वासना रहित हो जावे वह पुरुष भुक्त हो जाता है पर वासना ऐसी सूक्ष्म है कि पूर्ण विवृत हुई मालूम होने परभी समय पाकर प्रकट हो जाती है ।

७१ प्रश्न--जिनको कबीर साहबका पूरा पता मिल गया वे कैसे होते हैं ?

उत्तर--जैसे लोमश ऋषि, आदि क्रोड़ों हंस संसारमें प्रगट रहते हैं उनको कभी जन्ममरणका दुःख नहीं भोगना पड़ता, ज्ञान सदा एक सम्मान रहता है वे सदा वासना विहीन रहते हैं ।

७२ प्रश्न--हंस कबीरके अतिरिक्त दूसरा कोई निर्वासना है कि, नहीं ?

उत्तर--कबीर साहबके बिना वासना निवृत्त होना कठिन है ।

७३ प्रश्न--यथार्थ ज्ञानका मूल, स्वसम्बेद कैसे है, इसका प्रमाण क्या है ?

उत्तर--कोई शास्त्र और वेद किताब उस प्रकार सत्य और स्पष्ट वर्णन नहीं करते, जिस प्रकार कि, स्वसम्बेद कहता है ।

यथार्थसे मुक्ति ।

७४ प्रश्न--चारों युगमें सब ऋषि, मुनि तथा सर्व वर्णाश्रमी गायत्रीके जापसे मुक्ति मानते आये हैं । वो क्या बात है ?

उत्तर--यदि गायत्रीसे मुक्ति होती तो ब्रह्मा विष्णु आदि पहले ही मुक्त हो जाते । पर वो हुआ नहीं ।

“गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय मुक्ति किन पाई ॥”

पर वे यदि गायत्रीका भी सत्य पुरुषपरक अर्थ समझे तो मुक्त हो जायेंगे ।

गुरुपदके योग्य, ईश्वरार्पण दान

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७५ प्रश्न—अज्ञान किसको लगा ?

उत्तर—अज्ञान, अहंकार और देहाभिमानको लगा है ।
रक्षकका अवतार ।

७६ प्रश्न—जब संसारमें पापकी वृद्धि होती है भक्तों तथा पुण्यात्माओं पर कष्ट पड़ता है तब विष्णुका अवतार होता है कबीरसाहबका अवतार क्यों नहीं होता ?

उत्तर—जब संसारमें अत्याचार और अन्याय होता है, उस समय संसारके रक्षकको आनेकी आवश्यकता है । ऋषि, मुनि, पीर पैगम्बरोंकी आवश्यकता नहीं ।

जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति ।

७७ प्रश्न—वशिष्ठ ऋषिने वेदानुसार जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति रामचन्द्रजीको कही है उसका आशय क्या है ?

उत्तर—जितने ऋषि, मुनि, सिद्ध साधु, पीर पैगम्बर और नानाभक्तोंके आचार्य हुए हैं वे सब बालकके समान खेलमें लगे हुए हैं, जिनको जो अच्छा लगा उसीको उसने ग्रहण कर लिया । दूसरोंको भी वही बतलाया । जिसकी जिसने मानिन्दी करली वह उसीमें आनन्द मान रहा है । जब सब े लने खेलाने-बालेको ज्ञान प्राप्त होगा तब वे कबीर साहबके शरण जाकर सत्य पदको पावेंगे ।

७८ प्रश्न—वशिष्ठजी तो रघुवंशकी गुरुआईके लिये शरीर धारण करते हैं, क्योंकि, अधिकारी लोगोंको बारम्बार शरीर धारण करना आवश्यक हैं ।

उत्तर—वे प्रारब्धके अनुसार रघुवंशकी गुरुआईके लिये देह धर कर रहे हैं, शिष्योंके लिये पक्षी भी बनना है, पड़ा प्रारब्धको भोग कर फिर फिर अमर पदपर स्थिर हो जायेंगे यही अन्योंकी भी बातें हैं ।

७९ प्रश्न—ऐसे २ माहात्मा पुरुषोंको पशु पक्षियोंकी योनि क्यों धरनी पड़ती है ?

उत्तर—उस समय यही प्रारब्धमें होगा उसको भोगकरही नष्ट होना था पर ज्ञान उनका उस देहमें भी पूरा था ।

शब्द—बहुरि नहीं आवना यह देश ॥

जो जो गये बहुरि नहिं आये, को घर कहें संदेश ॥

सुर न मुनि और पीर औलिया, देवी गौरि गणेश ॥

धरि अवतार सबी मुनि प्रगटे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥

मनुष्य और पशुका विवेक

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पण्डित चण्डित मुण्डित मोहे, राजा रंक नरेश ॥
षट् दर्शन पाखण्ड छ्यानवे, सबी बनाये भेश ॥
कहैं कबीर सो तीर न लागे, विनु सत गुरु उपदेश ॥

८० प्रश्न—देहवानसे विदेह किस प्रकार मिल सकता है ?

उत्तर—जिस शरीरधारीने अपनी देह मिथ्या जान अपनी वासना उठाली वह अवश्य विदेहको प्राप्त होगा ।

८१ प्रश्न—आश्चर्य है कि, विश्वामित्र जैसे ऐश्वर्यमान् महात्मा नवीन सृष्टिके कर्ता हुये वे मुक्त न हों ?

उत्तर—विश्वामित्र आदिकी कथा पढ़नेसे ज्ञात होगा कि, वे अपने २ कर्मोंका फल पाकर और उसे भोगकर फिर अधिकाराखुद हो गये, न तो किसीको वह प्रकाशही मिला न किसीकी स्थितिही हुई जिससे कि, मुक्ति होती है पर वो जो चाहते थे वो उन्हें अवश्य मिला ।

हस्त क्षेत्र ।

८२ प्रश्न—जब सतपुरुषने निरंजनको तीन लोकका राज्य दे दिया तो फिर कबीर साहबका उसके (निरञ्ज) राज्यमें हस्तक्षेप करनेका क्या स्वत्व है ?

उत्तर—वह सर्व शक्तिमान् है जो चाहे सो करे । निरञ्जन को इसलिये राज्य नहीं दिया है कि, जीवोंपर अत्याचार करे । निरञ्जनने सत पुरुषका नाम छिपाकर अपना प्रगट किया तपके बलसे बड़ा प्रबल हो महा अहंकारी बन गया आद्याको निगल गया । कूर्मजीके तीन शिर काट लिये । अक्षरके साथ युद्धकर उसे भगा दिया । योग जीतके साथ युद्ध करने उन्हें मारनेको सन्मुख आया । तीन लोकमें अन्यायद्वारा सब जीवोंको छल और कपटसे बन्धनमें डाल लिया । सत् लोक जानेका मार्ग रोक लिया । ऐसी युक्ति बनाई कि कोई मनुष्य भी किसी प्रकार सत् लोकका मार्ग नहीं पासका । किताबोंके फन्दोंमें सबको फँसाकर सबका सत्य ज्ञान हर लिया । जब सत्य पुरुषने निरंजनका ऐसा अत्याचार देखा तो स्वयम् सत्यलोकसे चलकर जानी, सतमुक्त सत् कबीर आदि नामोंसे प्रगट हो काल पुरुषसे कहा कि, यदि तू अब अवज्ञा करेगा तो तुझे नाश कर दूंगा । कालपुरुष अधीन होकर सतगुरुके चरणोंमें पड़ा अपने अपराधकी क्षमा माँगी ।

धर्मके इष्ट देव,

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साधुका द्रव्यग्रहण ।

८३ प्रश्न—साधुको द्रव्य ग्रहण करना चाहिये वा नहीं ?

उत्तर—विरक्तको द्रव्यका संग्रह उचित नहीं पर किसी शुभ पुण्यमय आवश्यक कार्य्यवश ग्रहण करनेमें कुछ दोष भी नहीं जैसे जो मठ धारी साधु है अथवा महंत सच्चे हृदयसे अभ्यागतोंकी सेवा करते हों उन्हें द्रव्यादि ग्रहण करलेना चाहिये ।

त्यागी—सच्चे भावसे अन्तःकरणमें वासना रहित होनेका नाम त्यागी है । जो ऊपरसे विरक्तोंका स्वोंग बनाके फिरता है भीतर नाना प्रकारकी वासना रखता है, नानाप्रकारकी झूठी और रोजक बातोंसे अथवा किसी युक्तिसे सेवक सती अथवा अन्य संसारियोंसे द्रव्य लेनेकी इच्छा रखता है वा लेता है, वह चोर और ठगसे भी नीच अधम पापी है । ऐसे धुतारे कपटीके लोक परलोक दोनोंही भ्रष्ट हैं ।

जिसने सच्चे भावसे अहंकारको तर्क किया वही सच्चा वैरागी है । रुपिया पैसा अथवा द्रव्य न छूनेका डौल बनानेवाला सच्चा वैरागी नहीं हो सकता ।

तर्क हंकार तर्क दुनिया है । और दूसरा कोई न मुनिया है ।

ग्रहण न करनेका कारण ।

८४ प्रश्न—क्यों स्वसंबेदके मार्गको सब लोग ग्रहण नहीं करते ?

उत्तर—मिथ्या स्थूलविद्याके अभिमानियोंने मनुष्योंको ऐसा बहकाया है कि, जिस कारणसे भ्रममें पड़े हुये मनुष्य सत्य मार्गपर नहीं आते । विद्वान् दो प्रकारके हैं ।

एक वे हैं जो जीवोंको मुक्तिमार्ग बतलाते हैं । दूसरे वे हैं जो जीवों को भटकाकर कुमार्गमें डालते हैं । वे ऐसे दुराचारी होते हैं कि, इनको कभी सच्चाई अथवा सदाचारकी बातही पसन्द नहीं होती । वे निरे अभिमानी और देहात्मवादी होते हैं । ऐसेही शठ दुराचारियोंने सब धर्मोंमें दुराचारका प्रचार किया है इन्हींके कारण मनुष्य सदाचारमें प्रवृत्त नहीं हो सकते बुद्धिहीन मूर्ख ऐसोंहीके अनुशासनमें ही रहकर अपना सर्वस्व नाश करते हैं ।

हिकायत मनजूम ।

कोहसे एक आरिफ सेहरामें आ । देखा अज्राज्रील वहाँ था खड़ा ॥

दिल अलम बसूसःसे था दुरस्त । दीदः नैरंग जमानः से मुस्त ॥

मूर्खोंकी मूर्खता

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उससे किया आरिफने बाज पुरसँ । छोड़ा है क्यों कार गहे खुद मदर्सँ ॥
तबअ थी तेरी क्यों बसबाससे । मोम हुआ जो सख्त इलमाससे ॥
कार तू दर मसजिदो खानकाह । बन्दःको बतलाओ जो तारीक राह ॥
बाज रह खुद बद तीनतसे क्यों । फ़ारिग खोय शौतनियतसे क्यों ॥
रखनः गरे सिल्क जमाअतन क्यों । तफ़रक्कावखश सफे ताअतन क्यों ॥
जादू तेरा उरबदःजोय कहाँ । मक व फरेब बद खोय कहाँ ॥
रहजनै दौरौ दिया यों जबाब । बरकते उलमाने छुड़ाये अजाब ॥
कार मेरा करते फ़कीहाने अहद । मुझको रही बाकी न जहो जेहद ॥
एक तन उसे तायफ़ासे बुलहवस । वासते गुमरीहीके हैं बस ॥

ऐसे दुराचारियोंने अनन्त जीवोंको कुमार्ग में लगा दिया और लगाते जाते हैं । किसी पुस्तकमें देखा था कि, एक बादशाह ऐसा हो गया जो ऐसे दुराचारियोंकी खबर जहाँ सुनता था वहाँसे पकड़वा कर उसके शरीरकी खाल खिचवालेता था । वह स्पष्ट कहता था उसे पूर्ण विश्वास भी था कि, ऐसेही स्वार्थी, दुराचारी, मूर्खोंने सब धर्मोंमें भ्रष्टता डाल दी है ।

शून्यके हथियार ।

८५ प्रश्न—आपने कहा कि, इस संसारके सर्व व्यवहार शून्य हैं तो मुक्ति आदिक भी शून्यही होवेगा ?

उत्तर—निस्सन्देह इस संसारका सर्व व्यवहार शून्य है पर परमात्माने प्रत्येक मनुष्यको दो ऐसे शस्त्र प्रदान किये हैं जिनसे कि असत्यको काटकर शून्यके पार पहुँच जावे । उन दोनों हथियारोंका नाम विचार और विवेक है जो कोई इन दोनोंसे उचित कार्य करेगा वह अवश्य अपना अभीष्ट सि कर सकेगा ।

अन्य धर्मोंकी आवश्यकता ।

८६ प्रश्न—यदि केवल कबीर पंथसेही मुक्ति मिल सकती है, तो अन्य धर्मोंकी क्या आवश्यकता है क्योंकि, धर्मका मुख्य प्रयोजन मोक्ष है ?

उत्तर—भिन्न धर्मोंका होनाभी अत्यन्त आवश्यक है । क्योंकि, वर्णमाला पढ़े बिना कोई पुस्तकोंको नहीं पढ़ सकता । शास्त्र पढ़े बिना कोई विद्वान् नहीं हो सकता, विद्वान् हुये बिना उच्चपद नहीं पासकता । जैसे पाठशालेमें भिन्न २ श्रेणी होती हैं उनमें भिन्न २ ज्ञानके विद्यार्थी शिक्षापाते हैं पर योग्य तभी समझे जाते हैं, प्रशंसा पत्र तभी पासकते हैं जब कि, सर्वोच्च श्रेणीमें परीक्षोत्तीर्ण हो जाते हैं, इसी प्रकार अन्य अन्य धर्मोंके विषयमें जान लेना और कबीर पंथको सर्वोच्च श्रेणी धर्मका समझना चाहिये । जबतक पूर्ण ज्ञान और सत्य धर्मकी

तुलसीदासजी भवतारणका उपाय

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प्राप्ति नहीं होती तबतक मनुष्य अन्य २ धर्मोंमें प्रवृत्त रहता है। कबीर पन्थका अधिकारी नहीं होता। जब मनुष्यके अंतःकरणसे भली प्रकार मल विक्षेप आदि दोष दूर हो निर्वासना पदको प्राप्त करे तबही कबीर पन्थका आधिकारी होता है।

८७ प्रश्न—पश्चिमीयोंके घृणितोंके ग्रहणका कारण, पश्चिमीय नबी और पैगम्बर आदि धर्माचारियोंने मद्यमांसादि घृणित पदार्थोंका निषेध क्यों नहीं किया ?

उत्तर—पश्चिमीय धर्मोपदेशक लोग स्वयम् मद्य मांसके ग्रहण करनेवाले थे। इसमाईल और इब्राहीम आदि नबी प्रसिद्ध शिकारी थे। जिकियाका पुत्र योहन टिडियोंको मार मार कर खाता था।

८८ प्रश्न—कबीर साहबके विषयमें तो किसी नबीने भविष्यत् नहीं कहा ?

उत्तर—एक लाख अस्सी सहस्र पैगम्बर भविष्यत वादी हुये वे सब निरञ्जनके पुत्र उसीके लोककी सुधि जानते थे। उन्हें सत्य लोककी क्या खबर थी ? उसके बिना उसका समाचार। कौन कहसक्ता है ? जो हंस कबीर उसकी सुधि जानते हैं वे सर्वदा उसकी स्तुति और प्रार्थना करते रहते हैं।

पृथ्वीका निरूपण।

८९ प्रश्न—पश्चिमीय विद्वानोंका मत है कि, पृथ्वी चलती है और गोल है सो सत्य है कि, नहीं ?

उत्तर—निस्सन्देह पश्चिमीय विद्वानोंका मत है यही बरन कितनेही भारतवासी, जो नबीन शिक्षाके पक्षपाती हैं, वैसाही विचार रखते हैं। जिस प्रकार भारतके विद्वानोंके इस विषयमें भिन्न भिन्न मत हैं वैसेही योरोपिय विद्वानोंके भी मत हैं। क्योंकि, कितने विद्वान् लोग पृथ्वीको स्थिर मानते हैं। योरोपियन लोगोका यह कहना है कि, हम सच्चे और भारतवासी झूठे हैं, महान तुच्छ और असत्य है।

तौरत और इञ्जील आदिकमें तो इस विषयमें कुछ तो लिखा ही नहीं है पर पश्चिमीय विद्वानोंने केवल अपने अनुमान और कल्पनासे कुछ कुछ लिखा है।

(१) वे (योरोपियन्स) कहते हैं कि, पृथ्वी गोल है। इसमें कोई विवाद नहीं क्योंकि, भारतीय विद्वान्, भी पृथ्वीको गोलही कह गये हैं।

(२) योरोपियन्स कहते हैं कि, पृथ्वी चलती है। पृथ्वीकी गतिको प्रमाणित करनेके लिये कुछ क्षुद्र युक्तियाँ भी प्रकाशित करते हैं। जैसे—नदीमें

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चलती हुई नावपर बैठे हुये मनुष्योंको किनारेके वृक्ष आदि चलते हुये देख पड़ते हैं पर वे चलते नहीं यथार्थमें नौकाही चलती है ।

वे लोग यह भी कहते हैं कि, चन्द्रमा स्वयम् प्रकाशित नहीं है पर सूर्य के प्रकाशसे प्रकाशित है ।

पश्चिमी लोगोंका उपरोक्त कथन मुझे ठीक नहीं जान पड़ता वे लोग भारतीय विद्वानोंकी बातोंको प्रमाण न करनेमें पुराणके कुछ वचनोंकी विरोधताका प्रमाण देते हैं जैसा पृथ्वीके विषयमें भिन्न भिन्न पुराणोंमें लिखा है ?

(१) पृथ्वी अण्डाकार है ।

(२) पृथ्वी कमलाकार है ।

(३) पृथ्वी कमल पत्रके आकारकी है ।

(४) पृथ्वी चौकोर है ।

(५) पृथ्वी चिपटी है ।

इसी प्रकारके परस्पर विरोधी वचनोंको देखकर योरोपियन्स भारतीय विद्वानोंकी सम्पत्तिको सत्य नहीं मानते । इस कारण भारतीय विद्वानोंके मतको पुष्ट करनेवाली युक्ति और अनेक प्रमाण लिखता हूँ ।

(१) पृथ्वीके गोल होनेमें तो सब एक मत हैं ।

(२) पृथ्वी कमलाकार है यह बात भी सत्य है क्योंकि, कमल बहुत तरहका होता है कोई गोल, कोई लम्बा ।

पृथ्वीको गोल कहनेमें जो बुद्धिकी सूक्ष्मता है उसको योरोपीय विद्वानोंने नहीं समझा वास्तविक बात यह है कि, जल गोल है पृथ्वी नहीं है क्योंकि, पृथ्वीसे पूर्व जल था, जलका आकार गोल है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि, समुद्रका पानी भंवरमें ऊंचा उठा हुआ जान पड़ता है, उसका कारण केवल यही है कि, जलका आकार गोल है । जैसा समुद्रवैसाही बुन्द, दोनोंका रूप एक समानही गोल होगा । कोई बड़ा कोई छोटा भलेही हो पर आकारमें कुछ भेद नहीं होगा जैसे पिण्ड और ब्रह्माण्डदोनोंका रूप एकही है ग्रन्थोंमें कबीर साहबने कहा है कि, पृथ्वीसे पहिले जल था, जिस प्रकार दूध यर मलाई जमती है उसी प्रकार जलपर पृथ्वीकी सृष्टि हुई । यही बात सबमें है कि, पहले पानी था, उस गोल पानीके ऊपर पृथ्वी जमाई गई इसी कारण पृथ्वी गोल दिखाई देती है । पानीकी गोलाईके कारण पृथ्वी गोल जान पड़ती है । जैसे घड़ेके ऊपर कुछ गाढ़ा तरल पदार्थ जमादेनेसे घड़ेकी गुलाईके कारण वह भी गोल दीख पड़ता है पर यथार्थमें गोल नहीं होगा । इसी प्रकार पृथ्वी जलके फेनके समान जमकर

कालकी फांसीसे त्राण २४ अध्याय प्रश्नोत्तर

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कठिन बन गई है, गोल पानीपर जमकर गोल दीख पड़ती है। यदि पृथ्वीको पानीसे अलग किया जावे तो गोल न दीखेगी। हाँ पानीके साथ तो गोल होनेमें कुछ सन्देहही नहीं।

(३) हिन्दू कहते हैं कि, पृथ्वी कमलके पत्तेके आकार है वो बात भी ठीक है क्योंकि, पृथ्वी जलके ऊपर जमाई गई तो गोल जमाई गई जो कुछ गोल पदार्थ पानीपर जमाया जाता है उसके नीचे गावडुमी स्थान शून्य रहता है इसी कारणसे पृथ्वीको कमलके पत्तेके आकारका कहा है।

(४) पृथ्वी चौकोर है यह भी कहना ठीक है क्योंकि, स्वरौदय आदिमें पृथ्वीतत्त्वको चतुर्कोणही बताया है, जो तत्त्वदर्शी होते हैं, स्वरोंको साधकर तत्त्वोंके आकारोंको देखते हैं चारों तत्त्वोंके रङ्ग, ढङ्ग, चाल और उसके सबगुण दोषोंको जानते हैं वे पृथ्वीको चतुर्कोणही देखते हैं। स्वोंसके साथ चारों तत्त्व का रूप प्रत्यक्ष देख पड़ता है। आकाश तत्त्व स्वरके अन्तरमें रहता है बाहर दिखाई नहीं देता। इससे भी पृथ्वीको चौकोर कहा गया है।

पृथ्वी चौकोर, जल गोल, अग्नि त्रिकोन, वायु और आकाश भी गोल है।

(५) पृथ्वीको चिपटी कहनेकाभी वही पानीपर जमाया जाना कारण है क्योंकि, कोई गाढ़ा तरल पदार्थ गोल पदार्थपर जमाया जाय तो वह चिपटे आकारमेंही जमेगा। भारतीय विद्वानों तथा पुराणोंका कथन बहुत ठीक और सत्य है पर उसके समझनेके लिये बुद्धिकी आवश्यकता है। भारतीय विद्वानों और महात्माओंके कथनमें असत्यका गन्ध भी नहीं हो सकता क्योंकि, वे प्रकाशित हृदय और पूर्ण ज्ञानवान तथा त्रिकालदर्शी अंतर्धर्मी हुये हैं।

हिन्दू लोग कहते हैं कि, पृथ्वी अचल है चल नहीं इसका कारण यह है कि, पृथ्वीको कोशोंमें, धरा, स्थिरा, अचला और धरणी आदि नामसे लिखा है, जिनसे स्पष्ट सिद्ध होता है कि, पृथ्वी अचल है। यदि पृथ्वी गतिवाली होती तो उसे धरणी आदि नामसे क्यों कहते? बरन् अचलाके स्थानमें चला कहते।

इसीपर मुसलमानी धर्मके विद्वान्— 'पृथ्वीको स्थितही बतलाते हैं जैसा हजरत शेख सादी सिराजी लिखते हैं कि—

जमीं अज तप लरजः आमद सतोह ।

फरोकोपत बर दामनश मेख कोह ॥

इसका भावार्थ यह है कि, सृष्टिके आदिमें परमात्माने पृथ्वीको बनाया उस समय यह कांपती हुई डगमगाती थी, पीछे पहाड़ोंका खूँटा ठोककर स्थिर कर दिया गया है।

ब्रह्म और माया दर्शन हुआ या नहीं

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जो योरोपियन्स पृथ्वीको चलती बतलाते हैं उसके लिये प्रमाण और युक्ति लाते हैं वे ऐसे तुच्छ और तर्कखण्डित हैं कि, उनसे किसीके भी मनका समाधान नहीं हो सकता ।

यदि पृथ्वी चलती होती तो नावपर चढ़ेहुँके समान किनारेके सब पदार्थ दृष्टिसे छिपते हुयेके मान अन्तर्धान होते जाते पर ऐसा नहीं होता ध्रुव आदि तारागण नित्य एकही स्थानपर जैसेके तैसे जान पड़ते हैं यह कदापि सम्भव नहीं हो सकता कि, पृथ्वी तो चले और सदा सब समय ध्रुव आदि एक समान नहीं दिखाई दें ।

सर आइज़क न्यूटनने पृथ्वीकी दो गति बतलई है । १ वार्षिक २ दैनिक ।

वार्षिक गतिसे ऋतुओंका हेर फेर होता है और दैनिकसे दिन रात होता है । सो यदि ये दोनों चाल सत्य होती तो दोनों चालोंसे तारे और ग्रह दृष्टिसे अंतर हो जाते अथवा छोटे बड़े दीख पड़ते पर ऐसा न होकर उलटा ग्रह और तारे गण ज्योंके त्यों एक समान दीख पड़ते हैं पृथ्वी इससे भी अचलही सिद्ध होती है ।

ध्रुव तारेकी ओर दृष्टि डालनेसे भी पृथ्वी स्थिरही प्रमाणित होती है । क्योंकि, जब दक्षिणायन अथवा उत्तरायण होता है उस समय पृथ्वी बहुत दूरी पर चली जाती । ध्रुव बहुत छोटा दिखाई देता पर यह किसीने नहीं देखा बरन् सबको ध्रुव सदा एक समानही देख पड़ता है । इससे पृथ्वीकी दोनों गति अप्रमाणित नहीं होती ।

फिर न्यूटन साहबने चन्द्रमाको प्रकाश रहित बतलाया है । इसका कोई भी प्रबल प्रमाण उनके पास नहीं है । उन लोगोंका कथन है कि, सब ग्रहोंके साथ २ अनेक २ चन्द्रमा हैं वे सब प्रकाशित हैं पर यह हम लोगोंका चांद प्रकाशित नहीं, वाह इस हमारे चांदने क्या अपराध किया कि, ईश्वरने और चन्द्रमाओंको तो प्रकाशित बनाया इसको अन्धकार मय ।

देखो तौरीतमें पैदायशके प्रथम बाबके १३ से १९ आयत तक लिखा है कि ईश्वरने दो प्रकाश बनाये एक छोटा दूसरा बड़ा । बड़ेको सूर्य कहा, छोटा रात शासन करनेके लिये बनाया गया । जब कि, उनके ईश्वर कृत पुस्तकमें ऐसा लिखा है तो उनको चन्द्रमाको अन्धकारमय कहना ठीक नहीं है ।

कबीर साहब कहते हैं कि, चन्द्र और तारे दोनों विराट् पुरुषकी आंख हैं खूब प्रकाशमान हैं । दक्षिण नेत्र सूर्य और वामनेत्र चन्द्रमा हैं । जब सूर्य चन्द्रमा विराट्के नेत्र हैं तो दोनोंके प्रकाशित होनेमें कोई सन्देहही नहीं है ।

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वेद प्रमाण भी ऐसाही है जैसा कि, कबीर साहब कहते हैं।

सर्व ब्रह्म ज्ञानियोंके गुरु कबीर साहब कहते हैं वेद तौरीत उसके ऊपर साक्षी भरते हैं फिर कौन है कि, चन्द्रमाको अंधकारमय बतलाये ? केवल लोगोंको भ्रम हो गया है इस कारण सत्यको छोड़ असत्यको लिये बैठे हैं। उसी पर विश्वास किये बैठे हैं। सत्य झूठका निर्णय नहीं करते।

जब चन्द्रमा बेप्रकाश होगा तो विराट पुरुष भी काना ही होगा इसमें सन्देह नहीं कि, “जो ब्रह्मण्डे सोई पिण्डे” तब तो विराटके काने होनेके कारण सब जीवधारीको काना होना चाहिये।

पर इसके उलटा मनुष्य दो आँखवाले देख पड़ते हैं।

इस संसारमें जितने निश्चय हैं सब बुद्धके ठहराये हुये हैं पर स्वयम् सत्य एवं अनित्य हैं उसके निश्चय नित्य और सत्य कैसे हो सकते हैं।

भिन्न २ भाषाओं और देशोंमें अनेक मतवाले अनेकही विद्वान् हो गये हैं सबके विचारमें कुछ न कुछ भेद है पर भारतीय विद्वानों और महात्माओंका जो कुछ कथन है यह उनके अंतरीय प्रकाशके बलसे है उसमें किसी प्रकार भी असत्यता नहीं हो सकती।

टाम्की, टकोड, बराह, कोप निक्स और सर आजक नियुटन ये चार भूगोल विद्याके जाननेवाले विदेशमें हुए हैं। उन लोगोंके कथनोंमें परस्पर बहुत विरोध है, कोई पृथ्वीको गति वाली तो कोई अचल बतलाता है। जबतक नया कोई वक्ता न उठ खड़ा हुआ तबतक योरोपियन्स पुरानोंकीही बातोंको ईश्वरी लेख समझते हैं पर जब कोई नया युक्ति प्रौढ़ बादसे अथवा और किसी रीतिसे अपना कथन पुष्ट करे तो पिछलेको तृणवत् त्याग देते हैं दो सौ वर्षोंसे पश्चिमी लोगोंने सबके कथनको असार समझकर सर आइजक नियुटनके कथन पर अवलम्ब किया है देखें यह अवलम्ब उनका कबतक ठहरता है। सर आइजकका भी सार माना गया सिद्धान्त कबतक सार रहता है ? कबतक लोग विवेक और विचारके विरुद्ध इस प्रकारके विश्वास करते रहते हैं।

यद्यपि चतुर लोगोंने अपनी चतुराईसे कितने सिद्धान्त बनाये और बनाते जाते हैं पर किसीकी स्थिति नहीं हुई न होगी। प्राकृतिक जन उनकी अनुसरता कर करके पछताये और पछतावेंगे। सन्तोंने अंतरीय प्रकाश और ज्ञानके बलसे जो कुछ कहा है वही सत्य है। उन्हींका वचन माननेसे भाग्यमान् हो सकता है।

दृष्टान्त समीक्षा

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परमात्मा सर्व शक्तिमान् है, जिसको चाहे क्षणमें विद्वान् करदे, जिसको चाहे क्षण में मूर्ख । मूसा और खरकईल आदिको क्षणभरमेही ज्ञान प्रदान किया साबल आदिका ज्ञान क्षणमें हरण कर लिया । राजाको रंक और रंकको राजा करना उसका कौतुक मात्र है । उसकी ऐसी प्रबल माया है कि, उसे जाननेको कोई समर्थ नहीं । कोई कौसा भी जानी और विद्वान् क्यों न हो उसके कार्यायमें स्वास भी नहीं हो सकता ।

एक रूप ।

९० प्रश्न—साधु और साहेब मिलकर किस प्रकार एकरूप हो जाते हैं ?

उत्तर—जो साधू लोग परमात्माके सच्चे प्रेमी हैं, वे लोक परलोक सबको तुच्छ समझते हैं । जानमाल आदि सब संसारको अनित्य समझकर उसकी ओर कभी दृष्टि नहीं देते केवल प्यारेके स्मरणमें लगे रहते हैं । ऐसे ईश्वर प्रेमियोंको वासना किञ्चित मात्रभी शेष नहीं रह जाती । अपने देहकी भी सुधि भूलकर प्यारेके चिन्तनमें विदेह हो ध्यान करते २ उसीके रूपमें मिल जाते हैं अथवा वही हो जाते हैं । उनमें मैं तूका लेशमात्र भी बखेड़ा नहीं रहता ।

दृष्टांत—लुधियाने नगरमें एक महात्मा साधु जो कि, सिद्ध भी सुने जाते थे एक अति सुन्दर यौवन और रूप पूर्ण गोकली नामकी स्त्री पर मोहित हो गये । क्रमशः वह इतने आशिक हुए कि, मान मर्यादा त्यागकर गोकलीके पीछे पीछे फिरने लगे । लोगोंने उनकी बहुत निन्दा की उनको बहुत धिक्कारा पर उसको किसी बातकी परवाह न हुई ।

एक दिन गोकली कई एक स्त्रियोंके साथ नदीमें स्नान करने गई, साधु भी उसके पीछे पीछे पहुँचा गोकलीने जैसे जलमें डुबकी मारी उसी प्रकार साधूने भी डुबकी मारी । गोता लगाकर बाहर निकलने पर संत भी गोकली हो गया । यह कौतुक देखकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।

वर्तमानकालमें कितने लोग इंगरेजी शिक्षा प्राप्त करते हैं । उच्च २ परीक्षा देकर कोई बी. ए. कोई एम्. ए. कोई एल्. एल्. बी. कोई २ डी. डी. कोई डी. एल्.एल्. आदि नाना प्रकारकी उपाधि प्राप्त कर उच्च पदको प्राप्त करते हैं । उसी प्रकार सत ईश्वरी परीक्षा पासकरके ईश्वर बन जात हैं । इस प्रकार साहब साधु दोनों एक हो जाते हैं ।

साखी—तू तू करते तू हुआ, मुझमें रही न हूँ ।

आपा परका मिट गया, जित देखूं तित तूं ॥