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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

कबीर साहिब और स्वामी रामानन्द- जीकी गोष्ठी

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उसने उसी तिलको नानक शाहके समक्ष रक्खा । नानक शाहने कबीरसाहबसे कहा कि, मैं इस तिलको इतने साधुओंमें किस प्रकार बाँटूँ ? कबीर साहबने कहा कि, इस तिलको जलमें घोटकर सकल साधुओं में बाँटों, नानक शाहने कहा कि, यहाँ जलभी नहीं है । किसे घोटें ? यह बल तो आपहीमें है, इसको बाँटिये । उस स्थानपर एक शुष्क नदी थी, उसको कबीर साहबने जारी किया । उसमेंसे जल भरकर उस तिलको घोटा, सब साधुओंको पिलाया । जिससे उन्हें अत्यंत आनंद आया । कबीरजीसे कहा कि, कबीरजी ! माँगो जो माँगोगे वही हमलोग आपको देंगे । कबीर साहबने कहा कि, तुम लोग तो दरिद्री जान पड़ते हो । मैं तुमसे क्या माँगूँ तुम मुझको क्या दोगे ? उन लोगोंने कहा कि, जो कुछ तुम माँगोगे वह सब हम तुमको देंगे । कबीर साहबने कहा कि, पाँच पैसेभर दरिद्रता मुझको दो । नवनाथ चौरासी सिद्धोंने परामर्श किया कि, यह गुण तो हम लोगोंमें नहीं । कारण यह कि, हम लोगोंको तो अपनी सिद्धि जप तपका मान है । चलो ब्रह्मासे पाँच पैसेभर दरिद्रता माँगें । ब्रह्मलोकमें जा पाँच पैसेभर दरिद्रता ब्रह्माजीसे माँगो, ब्रह्माजीने विचार कर उत्तर दिया कि, मेरे पास दरिद्रता कहाँ ? मैं तो इस बातपर अहंकार करता हूँ कि, मैं सृष्टिका उत्पन्न करता हूँ । तब नवनाथ और सब सिद्ध कंलासमें शिवजीके पास जा वही प्रश्न किया । शिवजीने भी वही उत्तर दिया कि, मुझमें दरिद्रता नहीं क्योंकि, मुझमें तो यह अहंकार है कि, मैं मिटाता हूँ । सब ओर दूँदते २ थक गये परन्तु दरिद्रता कहीं न मिली । अन्तमें विष्णुके पास गए दरिद्रताके लिये प्रार्थना की । विष्णुने कहा कि, ए सिद्ध साधुओ ! पाँच पैसेभर दरिद्रता या जो कुछ दरिद्रता है वह सब उसीके पास है जिसने तुमको भेजा है । मेरे पास तो केवल तीन पैसे भरही दरिद्रता है, जिसके कि कारण, मैं सारे संसारका रचयिता कहलाता हूँ । दरिद्रताके समूह तो स्वयम् कबीर साहबही हैं दूसरा कोई नहीं । तब सब सिद्ध साधु कबीर साहबके पास लौट आए । आपको दण्डवत् प्रणाम करके प्रदक्षिणा की, सारी बातें प्रगट कीं । कबीर साहबने कहा कि, क्या मैंने तुमसे पहिलेही न कहा था कि, तुम लोग तो दरिद्री हो, मैं तुमसे क्या माँगूँ ।

इससे यह परिणाम निकला कि, अहंकारसे सब फँसे हुए हैं । दरिद्रता तथा नम्रता यह गुण सबसे विशेष हैं । क्योंकि अहंकारके वश यह जीवन अपने स्वरूपसे गिरा इसीसे यह इतना बड़ा सिद्ध शौतान और नारकी हुवा । अहंकारहीके कारण हारूत मारूत जैसे भले देवता बाबिलके कुएँमें बंद किए गए । अहंकारने मनुष्य जातिको सदाके लिये बंधनमें डाल दिया है ।

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कबीर साहब नानक साहबके पास पञ्जाब देश आए, नानक शाहने अत्यंत आवभगत तथा सम्मानके साथ उनसे मिलकर कहा कि, जिस सेवाके निमित्त आप आज्ञा दें उसको मैं करूँ । कबीर साहबने आज्ञा दी कि, पाँच दिवसकी उत्पन्न हुई बछियाके स्तनमें दूध दुहकर मेरा कमण्डलु भर दो । नानक शाहने कहा कि, पाँच दिनकी पैदा हुई बछिया कैसे दूध दे सकती है ? कबीर साहबने कहा कि, यही मेरी सेवा है इसे ही तुम करो । नानक शाहने ढूँढ ढाँढ कर पाँच दिनकी उत्पन्न हुई बछियाको ला उपस्थित किया । उसके समीप दूध लेने गये । वह बछिया लात चलाकर भाग गई । नानक शाहसे कबीर साहबने कहा कि, अब तुम जाओ, मेरे नामसे उस बछियासे दूध माँगकर कमण्डलु उसके स्तनके नीचे रख दो, नानक शाहने बछियाके नीचे कमण्डलु रखकर कबीर साहबके नामसे दूध माँगा । बछियाके स्तनसे आपसे आप इतना दूध निकला कि, वह भर गया । कबीर साहबने नानक साहबसे कहा कि, ऐ नानकजी ! आपने बंदना तो बहुत की परन्तु अभीतक आपकी कमाईमें कमी है । आपका पंथ चलेगा बहुत लोग आपकी आज्ञामें चलेंगे । भविष्यत्में ये रङ्ग ढङ्ग होंगे । ऐसा बहुत कुछ नानक शाह से कबीर साहबने कहा । इसी ग्रंथमें नानक शाहके विषयमें भविष्य वाणी है । नानक धर्मका विवरण किया गया है जो कि, भविष्यत्में होनेवाला है । इसी स्थानपर यह साखी है । “तिल घोंटतारे लगे” इत्यादि है और इसी स्थानपर यह है :—

ऐसो दाता सत्य कबीर, सूखी नदी बहावे नीर ।

शूखेको खिलावैं खीर, नङ्गेको पहनावे चीर ॥ इत्यादि ॥

महाराजा श्रीरामचन्द्रजीको कबीर साहब (मुनीन्द्रजी) ने योगयुक्ति सब कुछ सिखलायी । सीताके चुराये जानेके समय अत्यंत कठिनाता उपस्थित हुई समुद्रोल्लंघन करना अत्यंत कठिन था । रामचन्द्रजीपर कबीर साहब की दया हुई । पत्थरोंपर सत्य नाम लिखा । उसके कारण बहुतेरे पर्वत तथा पत्थर तैरने लगे, पुल बन गया । इसी साहबकी दयादृष्टिसे लंकापर विजय पाकर मङ्गल-पूर्वक अपने घर पहुँचे । देखो ग्रंथ ज्ञानसंबोध तथा अन्यान्य ग्रंथोंमें ।

कृष्णचन्द्र बाँसुरी बजाकर गोपियोंका मन चुरा लिया करते थे, कबीर साहबने बाँसुरी बजायी, तीनों लोक मोह गये, जड़ चैतन्य सभी मोहित हुए । यमुना नदीका जल स्थिर होगया । स्थावर जङ्गल सभीको आनन्द आगया वह बाँसुरी ऐसी बजी कि, फिर कभी न बजी होगी । लोगोंने जाना कि, कृष्णचन्द्रने बजायी थी । गोप तथा गोपियोंकी बड़ी कामना थी कि, वैसी बंसी फिर बजे क्योंकि, उस बाँसुरीके बजानेवाले तो सत्य पुरुष थे । अभेद भावनामें होते हैं ।

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कबीर साहब, इस बाँसुरीकी प्रशंसा हंस कबीर किया करते हैं जिनको इसका ज्ञान है ।

जब प्रथम कबीर साहबका गोरखनाथसे सामना हुवा, गोरखनाथ कबीर साहबकी श्रेष्ठता तथा कीर्तिते अनभिन्न थे, तब गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, आओ हम तुम वाद-विवाद करें। उस समय गोरखनाथने अपना त्रिशूल गाड़कर कहा कि, आओ कबीर साहब ! उस त्रिशूलकी एक शाखापर बैठ जाओ मैं बैठता हूँ पीछे वाद-विवाद करेंगे, कबीर साहबने सूकते एक तारको आकाशकी ओर चलाया । और शून्यमें उस सूकते ऊपर बैठकर कहा कि, नाथजी ! आओ, हम और तुम इस सूतपर बैठकर वाद-विवाद करें क्योंकि, तुम्हारा त्रिशूल तो पृथ्वीसे लगा हुवा है । कबीर साहबकी यह लीला देखकर गोरखनाथजी दङ्ग हो गए ।

गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, मैं छिपता हूँ आप मुझे ढूँढ निकालें । गोरखनाथ मेंढक बनकर जलमें छिप गये कबीर साहब उस मेंढकको पकड़ लिये कहने लगे कि, अब किधर जाओगे, तब गोरखनाथ पुनः अपने असली रूपमें आ गए । पीछे कबीर साहबने कहा कि, अब मैं छिपता हूँ तुम ढूँढलो । कबीर साहबने जलमें डुबकी मारी । जल होकर जलके साथ मिल गए । गोरखनाथ ढूँढते २ थके तीनों लोकमें ढूँढते फिरे परन्तु कहीं पता नहीं लगा । पीछे विवश होकर बैठे कबीर साहबने देखा कि, अब तो गोरखनाथ हारके बैठ गए हैं उसी समय कमण्डुल के जलमेंसे कबीर साहब प्रगट होगए ।

गोरखनाथने कबीर साहबके पास दो सर्प भेजे । वे दोनों सोंप कबीर साहबके पास आए । आपने उनको अपने शरीरमें लगा लिया । बहुत विलंब हुवा पर पलटकर नहीं गए तब स्वयम् गोरखनाथजी कबीर साहबके गृह पधार कर पुकारा कि, कबीर साहब ! बाहर आइए । कबीर साहबने भीतरसे उत्तर दिया कि, नाथजी ! मेरे गृह दो अतिथि आए हैं मैं उनके सेवा सत्कारमें लगा हुवा हूँ । गोरखनाथने जाना कि, कबीर साहब कैसे प्रतिष्ठित पुरुष हैं । आपमें कौसी क्षमा तथा संतोष है । प्रथम तो गोरखनाथने कबीर साहबसे बहुत वाद विवाद किया बहुत कौतुक देखे पीछे भलीप्रकार जान लिया कि, आप अद्वितीय हैं मनुष्य मात्रमें दूसरा ऐसा कोई नहीं । कबीर साहबने गोरखनाथको भलीप्रकार संतुष्ट कर दिया बहुत कुछ कहा । सब कौतुक दिखलाए । गोरखनाथको भलीप्रकार निश्चय करा दिया कि, कबीर साहब स्वयम् अलख अविनाशी हैं । तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिर शिष्य होकर परमगति पागये । योगयुक्ति आदि सबको व्यर्थ जाना ।