कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गुप्तमुनि
हेतु अनेक शिक्षायें दीं । परन्तु शाहंशाह कुछ दिनोंतक शिक्षाका याद रखके फिर भूल गया । एक दिवस शिकार खेलने गया । शिकारमें एक कबूतर पर अपना बाज छोड़ा । उस बाजने कबूतरको पकड़कर तोड़ डाला । लोग बड़ी प्रशंसा करन लगे कि, बाजने कौसी फुरतीसे कबूतरको पकड़कर तोड़ डाला । इनकी बातें सुनकर बादशाह अत्यंत हर्षित हुआ । इतनेमें फिर कबीर साहब बादशाहके सामने आये । समझाया कि, हे बादशाह ! इसी प्रकार तुमको एक दिवस यमराज पकड़कर तोड़ डालेगा, जैसे कि, बाजने कबूतरको तोड़ा है । सावधान ! यमसे तुम्हारा बल नहीं चलेगा । सैन्य और भंडारा आदि काम नहीं आवेंगे । इतना कहकर कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । बादशाहके मनमें परमेश्वरका भय उत्पन्न हुआ और सत्यगुरुकी शिक्षा हृदयमें बैठ गई । फिर एक दिवस जब कि बादशाह बड़ेही सुख सम्भोगमें अचेत सो रहा था तब आकाशसे आवाजें आने लगीं । उस आकाश बानीने बादशाहको उपदेश दिया कि, “ऐ बादशाह ! तू सचेत हो, क्यों अचेत हो रहा है ?” तब बादशाह आश्चर्यनिवृत्त होकर इधर उधर देखने लगा कि, कौन मुझे शिक्षा देता है ? चारों ओर देखा पर कोई स्वरूप कहीं दिखाई नहीं दिया । तब निस्तब्ध होकर बैठ रहा ।
एक दिवस बादशाह अपने महलमें बैठा था कि, एक मनुष्यको अपनी छतपर फिरते पाया । उससे पूछा, तू कौन है ? मेरी छतपर क्यों फिरता है ? उसने उत्तर दिया कि, मैं $\times$ बूलूच हूँ मेरा ऊँट खोया गया है, दूँदता फिरता हूँ । तब बादशाहने कहा क्या छतपर ऊँट चढ़ सकता है ? तू कैसा बुद्धिहीन है ? तब बूलूचने उत्तर दिया कि, मैं तो मूर्ख नहीं वरन् ऐ बादशाह ! तू बिना बुद्धिका है । कारण यह कि, ऊँटका छतपर फिरना तो सरल है पर यह कठिन है कि, तू जो आशा रखता है कि, मैं बादशाही करता हुआ वैकुण्ठको जाऊँगा यह तो महामूर्खताका काम है । इतना कहकर वह बूलूच तो अन्तर्धान हो गया । बादशाहके मनमें अन्तदिवसकी गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हुई । फिर भी बादशाहको अचेत देखकर एक दिवस कबीर साहबने एक कुत्तेको उत्तेजित किया । वह दौड़कर बादशाहके सन्मुख आया । उसके समस्त शरीरमें घाव थे, जिसमें कि, बहुतसे कीड़े पड़े हुए थे, जो कि, उसके मांसको खाते थे जिससे वह अत्यन्त व्यथित और व्यग्र हो रहा था । जब वह बादशाहकी ओर दौड़कर चला । तब बादशाहकी लौडियोंने बहुत रोका और हटाने लगीं, तथापि उस कुत्तेने एक भी न माना, सुलतानके सामने जा खड़ा हुआ । मनुष्यकी भाषामें यों कहने लगा कि,
$\times$ बूलोचिस्थान देशके रहनेवालेको “बूलूच” कहते हैं ।
“ऐ सुलतान इब्रामहीम अद्वम ! मैं भी किरमान देशका बादशाह था । बहुत आखेट किया करता था । अब तू देख कि, मैं कुत्ता हो गया हूँ । जिन २ जीवोंको मैंने मारा और उनका माँस खाया वे सब जीव मेरा माँस खाते हैं, कीड़े होकर मेरे शरीरसे लगके अपना प्रतिशोध ले रहे हैं । इनसे अब मेरा छुटकारा नहीं हो सकता, अब मैं क्या करूँ । तू आखेट करता है तो तेरी भी यही दशा होगी” इतना कहकर, वह कुत्ता भाग गया । बादशाहके मनमें जीववध करने (आखेट करने) के कारण बड़ी बुरी चिन्ता उत्पन्न हुई, परन्तु थोड़े दिनोंके बाद, फिर भी भूल गया । ‘एक दिन शाहजु चलै शिकारा’ यहाँसे लेकर ‘नहीं वह कुत्ता नहीं दवैशा’ यहाँतक का यह हिन्दी अनुवाद है कि, एक दिवस बादशाह शिकार खेलनेको निकला, शिकारके पीछे अपना घोड़ा डाल दिया । जब अपनी सैन्यसे दूर निकल गया तब उसको बड़ी कड़ी प्यास लगी । उसके सब सेवक बहुत दूर हो गये थे । कहीं जलका चिन्ह न मिला, इस कारण बादशाहने विवश होकर अपना घोड़ा आगे बढ़ाया तो एक वटवृक्ष दिखाई दिया । बादशाह अपना घोड़ा दौड़ाकर इस वृक्षकी छाँहकी ओर चला । जब उस वृक्षकी छाया में पहुँचा, तो क्या देखता है कि, इस वृक्षके नीचे एक विरक्त बैठे है उसके दोनों ओर जलसे भरे दो कोरघडे रखे हैं, उनपर कोरें प्याले रखे हैं । उस महात्माने बादशाहको जल पिलाया । जब वह जल पीकर ठण्ढा हुआ तो क्या देखता है कि, उस महात्माके दोनों ओर दो कुत्ते बँधे हैं और एक भेख (खूँढा) खाली है । उस विरक्तने घी, मैदा, भाँति भाँतिके मेवे तथा मिश्री आदि निकालकर उन दोनों कुत्तोंके सामने मलीदा बनाकर रखवा, परन्तु उन कुत्तोंने वह मलीदा न खाया । वह महात्मा सोटेसे उन कुत्तोंको धमकाने लगा कि, मलीदा खाओ, नहीं तो मैं तुमको दण्ड दूंगा । पर वे कुत्ते मलीदेमें मुंह भी न लगाते थे । बादशाहने कहा कि साई साहब ! ये मलीदा खाना क्या जाने, उनको आप क्यों आँख दिखाते हैं ? फकीरने उत्तर दिया कि, “ऐ बादशाह ! यह बात नहीं; यह दोनों इसलिये यह पदार्थ नहीं खा सकते कि, इन्होंने पूर्वजन्ममें कुछ दान पुण्य नहीं किया है । यदि दान पुण्य करते तो निस्सन्देह खा सकते थे ।” बादशाहने पूछा कि, पूर्वकालमें ये दोनों कौन थे ? सन्तने उत्तर दिया कि ये, दोनों बलख बुखारेके बादशाह थे—(उन दोनोंका नाम भी कहा) तब शाहंशाहने
- इब्राहीमका पिता कौन था इसके विषयमें पूर्वही लिख चुके हैं कि, सच्चे साधु, अद्वम शाह थे । जिसने सच्चे भक्तोंका दर्शन पाया वो कुत्तेकी योनिमें जावे यह सच्ची श्रद्धाके प्रति-कूल बात है । ऐसी ही बातोंको लेकर बोधसागरके इसी प्रकरण पर भारत पथिक कबीर पन्थी स्वामी युगलानन्दजीने एक टिप्पणी लिखी है कि, “जो शाह इब्राहीम अद्वमके बाप बाबाको-