कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextउससे किया आरिफने बाज पुरसँ । छोड़ा है क्यों कार गहे खुद मदर्सँ ॥
तबअ थी तेरी क्यों बसबाससे । मोम हुआ जो सख्त इलमाससे ॥
कार तू दर मसजिदो खानकाह । बन्दःको बतलाओ जो तारीक राह ॥
बाज रह खुद बद तीनतसे क्यों । फ़ारिग खोय शौतनियतसे क्यों ॥
रखनः गरे सिल्क जमाअतन क्यों । तफ़रक्कावखश सफे ताअतन क्यों ॥
जादू तेरा उरबदःजोय कहाँ । मक व फरेब बद खोय कहाँ ॥
रहजनै दौरौ दिया यों जबाब । बरकते उलमाने छुड़ाये अजाब ॥
कार मेरा करते फ़कीहाने अहद । मुझको रही बाकी न जहो जेहद ॥
एक तन उसे तायफ़ासे बुलहवस । वासते गुमरीहीके हैं बस ॥
ऐसे दुराचारियोंने अनन्त जीवोंको कुमार्ग में लगा दिया और लगाते जाते हैं । किसी पुस्तकमें देखा था कि, एक बादशाह ऐसा हो गया जो ऐसे दुराचारियोंकी खबर जहाँ सुनता था वहाँसे पकड़वा कर उसके शरीरकी खाल खिचवालेता था । वह स्पष्ट कहता था उसे पूर्ण विश्वास भी था कि, ऐसेही स्वार्थी, दुराचारी, मूर्खोंने सब धर्मोंमें भ्रष्टता डाल दी है ।
शून्यके हथियार ।
८५ प्रश्न—आपने कहा कि, इस संसारके सर्व व्यवहार शून्य हैं तो मुक्ति आदिक भी शून्यही होवेगा ?
उत्तर—निस्सन्देह इस संसारका सर्व व्यवहार शून्य है पर परमात्माने प्रत्येक मनुष्यको दो ऐसे शस्त्र प्रदान किये हैं जिनसे कि असत्यको काटकर शून्यके पार पहुँच जावे । उन दोनों हथियारोंका नाम विचार और विवेक है जो कोई इन दोनोंसे उचित कार्य करेगा वह अवश्य अपना अभीष्ट सि कर सकेगा ।
अन्य धर्मोंकी आवश्यकता ।
८६ प्रश्न—यदि केवल कबीर पंथसेही मुक्ति मिल सकती है, तो अन्य धर्मोंकी क्या आवश्यकता है क्योंकि, धर्मका मुख्य प्रयोजन मोक्ष है ?
उत्तर—भिन्न धर्मोंका होनाभी अत्यन्त आवश्यक है । क्योंकि, वर्णमाला पढ़े बिना कोई पुस्तकोंको नहीं पढ़ सकता । शास्त्र पढ़े बिना कोई विद्वान् नहीं हो सकता, विद्वान् हुये बिना उच्चपद नहीं पासकता । जैसे पाठशालेमें भिन्न २ श्रेणी होती हैं उनमें भिन्न २ ज्ञानके विद्यार्थी शिक्षापाते हैं पर योग्य तभी समझे जाते हैं, प्रशंसा पत्र तभी पासकते हैं जब कि, सर्वोच्च श्रेणीमें परीक्षोत्तीर्ण हो जाते हैं, इसी प्रकार अन्य अन्य धर्मोंके विषयमें जान लेना और कबीर पंथको सर्वोच्च श्रेणी धर्मका समझना चाहिये । जबतक पूर्ण ज्ञान और सत्य धर्मकी