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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

नानकशाह साहिब दादुरामजी

ढङ्ग है। आठ पत्तोंके कमलमें यह मन रहता है। जिस पत्तेके ऊपर यह मन बैठ जाता है इस जीवका वैसाही ध्यान हो जाता है सब जीव विवश होकर वही काम करने लगते हैं।

इस मनकी गतिसे मनुष्य अज्ञानी और अन्धा हो जाता है। यही मन कालपुरुष निरंजन है। तीनोंलोकोंमें गरजता फिरता है। यही सब जीव धारियोंको गतिका मान करता है। यह मन कुण्डलिनी शक्तितसे जीवित होता है। इस कुण्डलिनीकी फुँफकार ही वासनाएँ हैं। वह पूर्णतया विष है। उसी विषसे इस मनकी स्थिति है अर्थात् वासनानेही इसको स्थिर कर रक्खा है यदि वासना न हों तो वह अवश्यही नष्ट हो जाय। जब यह मृत हो तो बन्धन न रहे। यही सबके बन्धनका कारण है उसकी वासनाका विष चारों खानिके जीवोंमें व्याप रहा है। इस कारण कोई जीव वासना रहित नहीं हो सकता। इन तीनों लोगों में ऐसा कोई सामर्थ्यवान् नहीं कि, वासनासे बच सके, ये तीनोंलोक वासनाओंसे पूर्ण हो रहे हैं। इस तीन लोकोंका वासी ऐसा कोई वैद्य नहीं कि, वासनाके रोगको दूर कर सके। इस वासनाका विष सब जीवोंकी नस नसमें समा रहा है। इस विषको नसोंसे पृथक् करना अत्यंत कठिन है। साधुओंने तपस्या करके मनको मुरदा करनेका बहुत प्रयत्न किया तो भी यह न मरा। प्रत्यक्षमें तो वासना पृथक् हुई जान पड़ती है परन्तु समय पाकर पुनः उभर आती हैं एवं मनुष्यको पुनः पूर्वावस्थामें डाल देती है इस कारण वासनाओंका दूर होना असम्भव है। कोई युक्ति करो और किसी साधनसे मन मारो फिर भी आन दबावेगा आकर पराजित कर लेगा। केवल उसी सत्यगुरुकोही वासना पृथक् करनेकी युक्ति मालूम है दूसरे किसीको कुछ सुधि नहीं। सब ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु तथा पीर पैगम्बर इत्यादि मनके दास बने रहे हैं। जबतक मनकी विजय न किया जावे तबतक बन्धन है, जीवका कल्याण होना असंभव है, माया पकड़कर फिर भी बन्धनमें डाल देती है। इसी बातको लेकर कबीर साहिबने भी कहा है कि—

कोइ कोई पहुँचे ब्रह्मलोकको, धरि माया ले आई।

आनि विके यम कालके फन्दे, फिर फिर गोता खाई ॥

साधु लोग तो ऊपर दूर दूर तक जाते हैं। पर माया बहोसे उनको फिर पृथिवीपर धर पटकती है फिर पड़े भवसागरहीमें गोता खाते हैं। जिधरको मन झुकता है उसी ओर विवश होकर जीव ध्यान देता है। जो कोई कहे कि, मनुष्य कर्म करनेमें स्वतंत्र हैं यह उसकी मूर्खतामात्र है। भलाजी ! स्वतंत्र

कहो है ? जब मनके वशमें पड़कर विवश हो कार्य करना पड़ता है, समस्त व्यवहार मनके अधीन रहा फिर स्वतंत्रता कहो रही । इस कारण स्वतंत्रताकी झूठी डींग मारनी मूर्खता नहीं तो और क्या है । मन पर विचार करनेसे सजीवका कार्य स्वतन्त्रताका, अभिमान तो मिथ्या हो चुका । अब तो केवल इतनी बातका उज्र रह गया कि, यदि मैं अपने कार्यमें स्वतन्त्र नहीं हूँ तो फिर मैं दोषी काहेको ठहराया जाता हूँ । इसका हेतु यह है कि, यह अपने आपको नहीं जानता इस कारण अपराधी होता है, जो अपने यथार्थ स्वरूपको जानले तब फिर कोई दोषी ठहराने वाला नहीं हो सकता । जबतक अपने यथार्थ स्वरूपको न जानले तबतक अवश्यही दोषी रहकर बन्धनमें पड़ा रहेगा । जब अपनेको पहचान लेगा तब फिर कहने सुननेका स्थान न रह जावेगा । अपने यथार्थस्वरूपके प्राप्त करनेकी यही युक्ति है कि, सच्चे साधु और सद्गुरुकी सेवा करे, बिना इसके कदापि छुटकारा न होगा । दिन दिन बन्धन अधिक होता जावेगा । सच्चे साधु गुरुकी सेवा समस्त कठिनाइयोंको सरलकर ज्ञानके कपाटको खोल देती है ।

जो मनकी गति और स्थितिसे अनभिज्ञ हैं वे अचेत कीडेमकोडेके बराबर हैं बड़े बड़े ऋषीश्वर करोड़ों वर्ष तप करके भी इस मनका दमन न कर सके किन्तु इस मनने सबके ऊपर अधिकार करके उनकी तपस्याको नष्ट कर दिया । तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं है जो इस मनपर विजय प्राप्त करसके, जब बड़े बड़े सिद्धोंकी भी वो चटनी कर गया तो दूसरे किसकी शक्ति है जो इसका सामना कर सके, मन मायाकी चक्की चल रही है सारे जीव इसीमें पीसे जाते हैं । सब देवता इसीके गुलाम हैं । यह सारे संसारका सर्व शक्तिमान् अधिकारी है, यह सारे संसारमें व्याप रहा है इसी कारण इसे कई सुयोग्य व्यक्ति महत्त्व कहकर भी स्मरण करते हैं, इसके बलका कोई ठिकाना नहीं है ॥

हृदयकी व्याख्या

सीनेके भीतर कमलकोश जैसा नीचेकी ओर मुख करके लटका हुआ हृदय कमल है मन इसीमें विराजा करता है इस कारण मनको भी हृदय कहते हैं । "हृ धातुसे कयन् प्रत्यय तथा दुक्" का आगम होकर उक्त शब्द बनता है इन्द्रियाँ, विषयसंबन्ध इसीकी प्रेरणासे करती हैं, यह इन्द्रियोंसे विषय तक भी पहुँचता है, जीव इसीमें रहता है, परमात्माका भी निवास इसीमें है, जिसके लिये कबीर साहिबने भी कहा है, कि—“खोज दिल बीच जहाँ वसत हक्का” इन कारणोंसे यह हृदय कहलाता है, इसीने सबको भुला रखा है, संसारमें यह बड़ा दुर्दन्त वैरी है, जीव अपने त्राणका उपाय करता हुआ भी इसके वशमें

आजाता है। गुरुआ लोग मिलते हैं वे भी हृदयके आधरे ही होते हैं उनसे भी यही दशा होती है कि—

साखी—जानंता पूछी नहीं, पूछि किया नहिं गौन।

अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥

गजल—पुर जह्न सर तापाय है उस सौपनीका सौप है।

खालिक है लोक और वेदका सब भेद मख्जन आप है ॥

बरतर यही शौतान है विष्णु यही भगवान है।

पीर और पैगम्बर औलिया सिद्ध साधुका यह जाप है ॥

ऋषि मुनि इसीकी बगलमें भूले सब उसकी दगलमें।

दोनों करम उसके धरम कहीं पुण्य और कहीं पाप है ॥

नेकी बदी यह कर जुदी जाँदार पर दोनों लदी।

दोजख विहिश्त एराफ़में सब तौल और सब माप है ॥

इस सौपके दो दौत हैं माया व ब्रह्म दो भाँत हैं।

काटा है सब मुरदा हुये घेरे जो तो तीनों ताप हैं ॥

आलमको यह अजदर लड़े आजिज कदम सतगुरु पड़े।

आदम बेचारा क्या करे चारा यही एक थाप हैं ॥

यह गजल भी मनकी कल्पनाओंका ही खोंका खींचता है कि, जो कुछ है सो यह है, यह भवसागर एक अगम्य समुद्र है वेग पूर्वक इसकी लहरें बह रही हैं। सब जीव उसीमें बहे जाते हैं। कोई भी जीव ठौर ठिकानेपर नहीं पहुँच सकता। सब इसीमें पड़े गीते खा रहे हैं। कोई सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर पैगम्बर, सत्यपुरुषकी सहायता बिना कदापि नहीं निकल सकता। यह मन इस समुद्रमें मस्त होकर मौज मारता फिरता है, किसीके रोकनेसे नहीं रुकता। यह मन भवसागर है और भवसागरही मन है, समस्त संसारमें इसीकी पूजा हो रही है। जिसको पूर्ण पारख प्राप्त हो वह इस मनके भेदको जाने। जितने औलिया, अम्बिया ऋषि, मुनि हो गये, तथा अब हैं और होते हैं सबमें थोड़ा बहुत ज्ञानका प्रकाश रहता है। परन्तु ऐसा प्रकाश किसीमें न हुआ कि, सब भेदको जाने। कितने ऐसे पैगम्बर हुए कि, जो केवल आकाश वाणीसे जानते और उसीके अनुसार चलते थे। इसका तो उनको तनिक भी ज्ञान नहीं था कि, यह आकाशवाणी स्वयम् जगदीश्वरकी ओरसे है अथवा भूत पिशाचकी ओरसे है। भाँति भाँतिकी कामनाओंमें फँसकर परमेश्वरसे प्रार्थना करते थे और उनकी इच्छानुसार आकाशवाणी होती थी। उस आकाशवाणीको वे परमेश्वर-