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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड

आचार्य-४ धर्मशास्त्र-५ पढ़ाने तथा सिखानेवाले साधु । इन्हींको जैन ईश्वर करके पूजते हैं, दूसरा कोई परमेश्वर नहीं, इन्हींको परमेश्वर कहो अथवा कुछ कहो । सो ये इनमें भी समस्त मनुष्योंके समान लोग विवश हुए हैं । इन पाँचोंमें प्रथम श्रेणी अरहंत अर्थात् तीर्थङ्करकी है, इनकी मूर्ति बनाकर जैनी लोग मन्दिरमें रखते हैं । इस मूर्तिके आगे गाते नाचते औ ढोल बजाते हैं । समस्त तीर्थङ्कर केवल ज्ञानी कहलाते हैं । उनका नाममात्रके लिये कैवल्य ज्ञान है । उसमें अंधेरा है, अंधेरा न होता तो वे सब कुछ जान सकते । कारण यह कि, ये लोग ज्ञान उत्पत्तिके उपरान्त अपनी अज्ञानताके कारण अठारह दोषोंमें फँसते हैं । अपने पापोंका प्रायश्चित्त करते हैं । यदि उनमें कैवल्य ज्ञान होता तो न उनको पापोंमें पड़ता पड़ता एवं न उनको प्रायश्चित्त करना पड़ता । कारण यह कि, कैवल्य ज्ञान वही है, जो कि, समस्त दोष गुण बुराइयोंसे विज कर दे । इस प्रकार समस्त मनुष्य खराबियोंमें लगे हैं उनमें तनिक भी सोच विचार नहीं है ।

परमेश्वरकी प्रशंसा तो सब कर रहे हैं । गुणभी सभी गाते हैं, पर उन लोगोंके मनमें तनिक भी सोच समझ नहीं कि, वे विचार करें कि हम किसकी प्रशंसा करते हैं तथा किसको पूजते हैं ? जिनका पूजन वे करते हैं उनमें ये गुण हैं या नहीं, वे अनभिज्ञ अनभिज्ञोंके साथ लड़ते झगड़ते हैं । समस्त पृथ्वीके मनुष्योंकी यही दशा है । तीन वेद तथा तीन अक्षरोंसे यह समस्त संसार दिखाई देता है । सो तीन वेद किस स्थान तक पहुँचा सकते हैं । चौथा स्थान किसी ज्ञानीके निमित्त नियक्त है । उस श्रेणीका ज्ञान जिसे हो वह वहाँ पहुँचे वेद-पाठियोंमें से थोड़े लोग इस पुरुषका समाचार देते हैं । इस कारण ब्रह्माण्डके चित्रमें इस पुरुषका चित्र नहीं बनाया । उस सर्वश्रेष्ठ स्थानके केवल मन्दिरका चित्र बना दिया । इस सर्वोच्च स्थानमें अक्षर पुरुष रहता है इस अक्षर पुरुषको महायश कहते हैं । महा ब्रह्माभी कहते हैं । यह अक्षर पुरुष इस स्थान पर विराजमान है, उसकी अधोद्भिनी योगमाया उसके साथ है । यहाँ बड़े चमक दमकके साथ वह रहता है । उसकी मूर्ति श्वेत और बड़ीही सुन्दर है उसका चित्र प्रारंभके चित्रोंमें है ।

यही योगमाया अक्षर माया कहलाती है इससे आगे वेद तथा पुस्तकोंको तनिक भी सुध नहीं, क्षर तथा अक्षरतक वेद और पुस्तकें कह सकती हैं । निरक्षरका समाचार कोई नहीं जानता इस निरअक्षर पुरुषको जो जाने सो मुक्ति मार्ग पावे । क्षर तथा अक्षर में सब भूल रहे हैं । यह चित्र ब्रह्माण्डके ऊपरकी

है जहाँ पहले चित्र नहीं बनाया गया यहाँही पर्य्यंत वेद और पुस्तकोंकी पहुँच है, आगेकी सुध किसीको नहीं है। वेद तथा पुस्तकोंके श्रेष्ठ विद्वान्गण इस स्थानतक पहुँचते हैं। जो कोई इस स्थानपर्य्यन्त पहुँचे वो सबका राजा है, यह श्रेणी उर्फान द्वारा प्राप्त होती है। जिसके पहुँचसे यह श्रेणी प्राप्त होती है वह विद्या किसी किसी योगीमें होती है। वेद और पुस्तकोंकी तो यहाँतक सीमा है। आगेका समाचार सूक्ष्म वेद देता है, स्थानोंका विवरण विस्तारपूर्वक लिखता है। सबका ठीक ठीक विवरण करता है।

जब कालपुरुषने चार खान चौरासी लाख योनि बनाई। तब इसी चार वेद छः शास्त्र छः दर्शन और छानवें पाखण्ड समस्त धर्म इत्यादि स्थिर किए, इसीसे नरक बैकुण्ठ तथा उसके आस पासका स्थान सब कुछ नियत हुवा। जिस योनिमें जिस स्थानपर और जिस अवस्था, स्वरूप, गुण तथा धर्ममें उसके कार्य्य उसको दृढ़ करते हैं वही उसको अच्छा लगता है। अपनी करनीका खिंचा हुआ जीव जिस अवस्थामें पैठ जाता है उसीसे उसको प्रेम हो जाता है, उसीसे प्रसन्न तथा दूसरोंसे दुःखी होता है। जिस धर्म रीति और व्यवहारको स्वयम् स्वीकार करता है। वही दूसरोंको सिखलाता भी है। उसको भले बुरेकी तनिक भी सुध नहीं। वह अपने जातिका अगुवा बनकर अन्यान्य लोगोंको भी वही सिखाता, दूसरे सब उसका पीछा करते हैं। जैसे एक काग बोलता है कान, तब समस्त काग कान कान करने लगते हैं। सब गीदड़ोंका अगुवा पहले बोलता है कि, मैं राजा हूँ तब समस्त गीदड़ बोलते हैं, तू हो, तू हो, तू हो, ऐसेही समस्त कीड़ोंका अगुवा आगे निकलकर चलता है। उसके पीछे समस्त कीड़े मकोड़े चलते हैं। सारे मकोड़ोंकी फौज उस अगुवाका चूतड़ देखते और सुंघते चली जाती है। समस्त दुर्बुद्धि अपने पथदर्शकके पीछे होते हैं। इसी प्रकार सारे भेड़ोंके पीछे भेड़े चलती हैं। यही हाल सारे आदमियोंका है। इस कारण वह सब मनुष्यतासे न्यारे हैं। उनमें कोई मनुष्य नहीं सब पशु हैं। कारण यह कि, इन सबमें पाशविक बुद्धि है। जो कोई मनुष्य होगा सो कदापि ऐसी आदत अपनी न बनावेगा मिथ्यासे सर्वतोभावसे पृथक् होकर सत्यको ग्रहण करेगा परमेश्वरको सत्य भला जान पड़ता है मिथ्या नहीं।

कबीर साहबकी आज्ञा है कि, मनुष्यको उचित है कि, परमेश्वरके स्थानमें अपने गुरुका भी पूजन किया करे। जो ध्यान ज्ञान गुरु बतावे उसीके अनुसार चला करे। कारण यह है कि, परमेश्वरको कोई देख नहीं सकता, गुरुके दिखानेसे देखने तथा जाननेका बल प्राप्त करता है। इस कारण गुरुकी श्रेष्ठता गोविंदसे