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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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साधुका द्रव्यग्रहण ।

८३ प्रश्न—साधुको द्रव्य ग्रहण करना चाहिये वा नहीं ?

उत्तर—विरक्तको द्रव्यका संग्रह उचित नहीं पर किसी शुभ पुण्यमय आवश्यक कार्य्यवश ग्रहण करनेमें कुछ दोष भी नहीं जैसे जो मठ धारी साधु है अथवा महंत सच्चे हृदयसे अभ्यागतोंकी सेवा करते हों उन्हें द्रव्यादि ग्रहण करलेना चाहिये ।

त्यागी—सच्चे भावसे अन्तःकरणमें वासना रहित होनेका नाम त्यागी है । जो ऊपरसे विरक्तोंका स्वोंग बनाके फिरता है भीतर नाना प्रकारकी वासना रखता है, नानाप्रकारकी झूठी और रोजक बातोंसे अथवा किसी युक्तिसे सेवक सती अथवा अन्य संसारियोंसे द्रव्य लेनेकी इच्छा रखता है वा लेता है, वह चोर और ठगसे भी नीच अधम पापी है । ऐसे धुतारे कपटीके लोक परलोक दोनोंही भ्रष्ट हैं ।

जिसने सच्चे भावसे अहंकारको तर्क किया वही सच्चा वैरागी है । रुपिया पैसा अथवा द्रव्य न छूनेका डौल बनानेवाला सच्चा वैरागी नहीं हो सकता ।

तर्क हंकार तर्क दुनिया है । और दूसरा कोई न मुनिया है ।

ग्रहण न करनेका कारण ।

८४ प्रश्न—क्यों स्वसंबेदके मार्गको सब लोग ग्रहण नहीं करते ?

उत्तर—मिथ्या स्थूलविद्याके अभिमानियोंने मनुष्योंको ऐसा बहकाया है कि, जिस कारणसे भ्रममें पड़े हुये मनुष्य सत्य मार्गपर नहीं आते । विद्वान् दो प्रकारके हैं ।

एक वे हैं जो जीवोंको मुक्तिमार्ग बतलाते हैं । दूसरे वे हैं जो जीवों को भटकाकर कुमार्गमें डालते हैं । वे ऐसे दुराचारी होते हैं कि, इनको कभी सच्चाई अथवा सदाचारकी बातही पसन्द नहीं होती । वे निरे अभिमानी और देहात्मवादी होते हैं । ऐसेही शठ दुराचारियोंने सब धर्मोंमें दुराचारका प्रचार किया है इन्हींके कारण मनुष्य सदाचारमें प्रवृत्त नहीं हो सकते बुद्धिहीन मूर्ख ऐसोंहीके अनुशासनमें ही रहकर अपना सर्वस्व नाश करते हैं ।

हिकायत मनजूम ।

कोहसे एक आरिफ सेहरामें आ । देखा अज्राज्रील वहाँ था खड़ा ॥

दिल अलम बसूसःसे था दुरस्त । दीदः नैरंग जमानः से मुस्त ॥