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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

" इबराहीम और इसहाक आदि " दाऊद और सुलेमान " मूसा

भीतरके अन्धे ।

जितने विद्वान् हैं सब विषयानन्दी भीतरी प्रकाशसे अन्धे हैं । ये अन्धे यथार्थ तात्पर्य तो समझ नहीं सकते । अपढ़ों तथा अपनेसे कम पढ़ोंको भटकाते हैं, इस कारण अपढ़ तथा कम पढ़े हुवे साधुओंकी शिक्षा मान लेते हैं । जो कुछ अधिक पढ़े हैं वे अपनी धूर्तता तथा चालाकी किये बिना नहीं रहते । इस कारण साधु लोग उनको शिक्षा नहीं देते । कारण यह कि, वे साधु जो पहुँचे हुये हैं उनके सामने अरस्तू और अफलातून इत्यादि ऐसे हैं जैसे किसी विद्वान्के समक्ष एक हलवाहा हो । पहुँचे हुवोंकी शिक्षा पर विद्वानोंका खण्डन मण्डन ऐसीही बात है जैसे कि हलवाहा, लुकमान तथा सुकरात आदिको शिष्य बनाना चाहता है । पण्डितों तथा विद्वानोंकी क्या सामर्थ्य है पहुँचेहुवोंकी शिक्षाको काट सकें ? पहुँचेहुवोंसे बढ़कर ब्रह्मज्ञानी है ब्रह्मज्ञानीसे बढ़कर विज्ञानहंस है । जो पूर्ण विज्ञानहंस हो उसकी सबपर श्रेष्ठता है । जो जो ऋषि मुनि हुए तथा अब वर्तमान हैं और वे लोग जितना प्रकाश बन्दना पूजाका रखते हैं । ज्ञानकी जिस सीमापर अधिकृत हैं, विद्वानोंसे उनकी श्रेणी सम्यक् प्रकारसे बढ़कर है । साधनाके प्रकाश बिना, केवल पुस्तकपाठसे आत्मिक प्रकाश प्राप्त कर नहीं सकता । विद्वानोंके हृदय खण्डन मण्डन तथा घमण्डसे भरे होते हैं । इस कारण साधुलोग हलवाहेको लेखनीधारीसे अच्छा समझते हैं । कारण यह कि, हलवाहा तो सेवा स्वीकार करता है । पढ़े लिखोंसे यह बात नहीं होती ।

कालपुरुष किससे डरता है ?

ऐसेही मूसः तो नाममात्रको थे कालपुरुषने सबको परदेसे मारकर गर्दमें मिला दिया । काल तथा उसके समस्त पुत्र समस्त संसारके प्रबन्धक हैं । जैसी उनकी इच्छा होती है किया करते हैं । इस कालपुरुषके राज्यमें बिना कबीर साहबके दूसरेका वश नहीं है कि, बाधा दे सके कारण यह कि, कालपुरुषसे प्रबल अन्य कोई नहीं । केवल कबीर साहबसे वह भयभीत होता है, दूसरा कोई नहीं ; केवल कबीर साहबसे वह डरता है और दूसरा कोई उसका सामना कर नहीं सकता । न उसको अधीन कर सकता है । कौन है जो उसको दबा सके एकभी नहीं । सब इससे भागते तथा दबते हैं । यह बड़ा बलिष्ठ है ।

माया ।

यह समस्त संसार मायापूजक है । जैसे मदिरा पीकर जब मनुष्य अचेत होता है तब मदिराकोही जल समझता है उसको तनिक भी सुध नहीं रहती । इसी प्रकार यह समस्त संसार अज्ञान और विषयोंके आनन्दमें मग्न हो रहा है ।

इस कारण माया और ब्रह्मका कुछ ज्ञान नहीं रहता है। यह शक्तिको सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर समझकर उसका पूजन किया करता है। जबलें यह सच्चे सत्यगुरुको नहीं पहचानता उसके पीछे नहीं चलता तबतक यह शक्तिपूजनमें डूबा रहता है। जब सत्यगुरुका चिह्न मिलेगा और एकको पहचानेगा तब परमेश्वरपूजक होगा। बिना सत्यगुरुके चिह्नके जो एक परमेश्वरके पूजनेकी बात कहता है वह झूठा है। एक परमेश्वरका पूजन बिना पारख गुरुके चिह्न दिये हुए सम्भव नहीं। झूठे दावा करनेवालोंसे दूर भागो। उनके साथ रहनेसे हृदय अन्धकारमय हो जाता है। वे स्वयम् भटकते हैं तथा दूसरोंको भटकाते हैं माया इस जगत्को धोखा दिया करती है। मायाही धोखेमें आती है। वह शुद्ध ब्रह्म न धोखेमें आता है और न किसीको धोखा देता है। तीनों कालके ऋषि मुनि जिनको ब्रह्म शुद्ध नहीं मिला वेही धोखा खाते हैं। वेही दूसरोंको धोखा देते आये हैं। ये लोग अपने अज्ञानही को ज्ञान समझकर घमण्डी तथा मस्त हो रहे हैं। अपने अज्ञानके पृथक करनेकी कुछ चिन्ता न की। इस कारण वे सदैव इसी अज्ञानमें बँधे रहे। जिस किसीपर सत्यगुरुकी कृपा तथा दया हुआ करती है वेही आपसे आप अचेत निद्रासे जागकर सत्यगुरुके चरणको पकड़ते हैं। वेही उसकी रक्षामें जाते और उसका खूंट अत्यंत दृढ़ताके साथ पकड़ते हैं कि, फिर न छूटने पावे, युग युगसे भटकते तथा गोता खाते हुए अब तो सत्यगुरुको पहचान पाया अबकी बार छोड़नेसे फिर कहाँ ठिकाना लगेगा? जो सत्यगुरुके अड़कुरी जीव हैं वे इङ्गित करतेही दौड़कर सत्यगुरुके चरणोंसे लिपट जाते हैं। जो कालपुरुषके जीव हैं वे समझानेसे भी नहीं समझते, सदैव भवसागरमें पड़े गीते खाया करते हैं।

भला सौचने तथा समझनेकी बात है कि, शिव ऐसे योगी मोहिनीके लिय विवश होकर तथा सुध बुद्धि गँवाकर पीछे फिरे। भृंगी ऋषि ऐसे तपस्वी भी स्त्रियोंके फंदेमें आये। रामचन्द्र जैसे, वसिष्ठसे जानी मोहमें रोते फिरे। नारद ऐसे जानी वेदपाठी स्त्रीके पीछे नष्ट हो गये। ऐसे ऐसे श्रेष्ठ तथा जानी लोगोंकी प्रशंसा जो समस्त संसारमें प्रकाशित है वासनाके पीछे कैसे नष्ट होते फिरे हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तुरीया इनमें कालपुरुषने समस्त जीवोंको बांध लिया है। कोई उसके पञ्जेसे निकल नहीं सकता। सबके सब इन्हींमें फँस गये। जो नहीं फँसे हैं, वे लीलासे तमाशा कर जाते हैं। दिखा जाते हैं कि, अपनेको सिद्ध समझकर भी उस प्रपंचमें न पड़ना।

क्या ऋषियोंने युक्तियों करनेमें त्रुटी की ? पर क्या करें उनका कुछ वश नहीं कि, वासनाओंसे पृथक् हों। सब बिलकुल विवश होकर बैठे रहे। वासनाओंसे कोई पृथक् हो नहीं सका। तपस्यासे इस जीवको ऋषियोंने मुरदा समझ रक्खा था। पर एक बार जो ऐसी आग भड़की कि, समस्त तपस्याको भस्म कर दिया क्योंकि त्यों रह गये। जितने जीव ब्रह्माण्डके भीतर हैं सब काल-पुरुषके पेटमें हैं। समस्त पिंडियाँ कालपुरुषके पेटमें बसी हैं। सो सब उसका भोजन हैं जो सत्य पुरुषकी शरण जाते हैं वे इस मायासे पार होते हैं दूसरे नहीं होते।

चक्रनिरूपण ।

कबीर साहिबने ज्ञानसागरमें अष्ट कमलोंका निरूपण किया है कि, "अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहँ प्रकट दिखाऊँ ॥" यहाँसे प्रारंभ किया है। उस प्रकरणका तात्पर्य यहाँ लिखे देते हैं। (१) चार दलका मूल कमल है जहाँ गणेशजी ऋद्धि सिद्धियोंके साथ रहते हैं। (२) छः दलका कमल है यहाँ सावित्री समेत, ब्रह्माजी रहा करते हैं। (३) आठ दलका कमल है यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् रहते हैं। (४) बारह दलका है यहाँ शिवजी निवास करते हैं। (५) सोलह दलका है यहाँ जीवात्मा निवास करता है। (६) तीन दलका है यहाँ सरस्वती निवास करती है। (७) दो दलका कमल है यहाँ ब्रह्माका वास है। (८) सुरति कमल जो देहसे बाहिर हो वहाँ उड़कर पहुँचता है। इस प्रकार आठ कहकर देहमें तो छः ही कहते हैं कि, "षट्चक्र बाँधे देहमें तब जो मुद्रा सार हो। प्रेमको बाजें पखावज प्रतिदिना सत्कार हो।" ये छः चक्र कहे हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धरेखा, आज्ञा, ये छः चक्र हैं। क्रमसे ४, ६, १०, १२, १६ और २ दलोंवाले हैं वहाँ कबीर साहिबने यद्यपि इनका नाम निर्देश नहीं किया है पर दलोंके विषयमें किसी योगीका मतभेद नहीं देखते इस कारण वहाँ भी यह माननेके लिये विवश होते हैं कि, यह उन्हींका निर्देश है। किन्तु देवताओंके विषयमें मतभेद देखते हैं। पं० बुलाकीरामजीका जुदा पथ है बाकी सब एकही पैमानेपर बैठ जाते हैं। गुदाके स्थानमें मूलाधार, लिंग मूलमें स्वाधिष्ठान, नाभिचक्रके मूलमें मणिपूर, हृदयमें अनाहत, कण्ठमें विशुद्धरेखा (तालुमें तालुचक्र) भ्रुकुटिके मध्यमें आज्ञाचक्र, ब्रह्म रन्ध्रमें कालचक्र तथा नौमा आकाश चक्र है इससे परे शून्य है। यानी इस नौमे चक्रकीही महाशून्य संज्ञा है क्योंकि इससे परे शून्यही शून्य है।

कबीर साहिब तोसरे मणिपूरचक्रको आठ ही दलोंका मानते हैं बाकी सब योगी दशदलका मानते हैं । बाकी आज्ञाचक्रके दो दलोंतक किसीका मत भेद नहीं है । योगबिन्दु सातवेंमें ६४ दल अमृत भरे आठवेंमें १०० तथा नौवेंमें १००० दल माने है । शिवसंहिताने आज्ञाचक्रके बाद ब्रह्मरंध्रमें एक हजार दलका कमल माना है । इस तरह गोरक्षनाथजीके मतसे ६ शिवसंहितासे ७ कबीर साहिबके ८ तथा योग बिन्दुके मतमें ९ होते हैं, आत्माराम भी ९ चक्र तथा १२ ब्रह्मके गुप्त स्थान जिनमें नौवें चक्र तथा नासिका मन और कुंडलिनी आजाती है । इनके तारतम्यको दिखानेके लिये नीचे नकशा दिखाये देते हैं ।

चक्रादिकोंका मानचित्र ।

यही स्थान अखण्ड परमानन्दका है ।

इसीकी एक मात्रासे सारा संसार सुखी है ॥

<table border="0"> <tbody> <tr> <td>१२</td> <td>महासिद्धचक्र</td> <td>१०००</td> <td>सबकी हृद</td> </tr> <tr> <td>११</td> <td>कमलजात्य धरणी पीठ</td> <td>‘‘मूर्धा</td> <td>सिद्धपुरुषका स्थान</td> </tr> <tr> <td>१०</td> <td>अमृतपूर्णचक्र</td> <td>तालु‘‘</td> <td>अमृत धारा</td> </tr> <tr> <td>९</td> <td>आज्ञा चक्र</td> <td>भ्रूमध्य</td> <td>तेज</td> </tr> <tr> <td>८</td> <td>बलवान् चक्र</td> <td>नासिका</td> <td>ओंकार</td> </tr> <tr> <td>७</td> <td>विशुद्ध रेखाचक्र</td> <td>कंठ‘‘</td> <td>तेजस्वी पुरुष</td> </tr> <tr> <td>६</td> <td>अनाहत चक्र</td> <td>हृदय‘‘</td> <td>जीव यहीं विराजता है</td> </tr> <tr> <td>५</td> <td>मनोचक्र</td> <td></td> <td></td> </tr> <tr> <td>४</td> <td>मणिपूर</td> <td>‘नाभि</td> <td>विष्णुभोलक्ष्मीसहित यह</td> </tr> <tr> <td>३</td> <td>कुण्डलिनी</td> <td></td> <td>प्राणको सुषुम्नामें नहीं जाने देती</td> </tr> <tr> <td>२</td> <td>स्वाधिष्ठानचक्र</td> <td>लिङ्ग‘</td> <td>ब्रह्माजी सावित्रीसहित</td> </tr> <tr> <td>१</td> <td>आधार चक्र</td> <td>गुदा‘‘</td> <td>गणेशजी सिद्धिबुद्धिसहित</td> </tr> </tbody> </table>

इस चित्रमें चक्रोंकी व्यवस्थाके अनुसार नीचे ऊंचेका क्रम लेकर इसका निर्णय किया है । नं १२ वैसे ही इसका विशेष विवरण भी पढ़नेको मिलेगा—
ॐ प्रथमः सहजो ब्रह्मा सहजाच्छून्यः शून्यादीश्वरः ईश्वरादाजगद्गीर्यपराक्रमः
तत्प्रकृतिः प्रकृतिपुरुषयोर्मध्ये हेतुः हेतोरग्निरमहत्तमो महत्तमादहंकारः अहं-
कारात्पंचतन्मात्राः पंचतन्मात्राभ्यः पंचमहाभूतानि पंचमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत् ।
अनुक्रमणिका ५-१-२-३-४-५-१०-११-१४-१७-२४-२६ ॐ नमः
परमात्मने । पूर्वपक्षामिदं प्रोक्तं परमानंदगिरिकृतम् । अनुभवात्कथितं शास्त्रे