कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको चेताना और कथां दूसरी बार कलियुगमें कबीर साहिबके पृथ्वीपर प्रकट होनेका वृत्तान्त
जिन्ह कलमा कलीमांहि पढ़ाया । कुदरत खोज उनहु नहि पाया ॥
करमत करम करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥
करमत सो जो गरभ औतरिया । करमत सो जो नामहि धरिया ॥
करमत सुन्नति और जनैऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥
पानी पवन संजोयके, रचिया ई उत्पात ॥
सून्यहि सुरत समानिया, कासो कहिये जात ॥
इतनेमें काजी और मुल्लाओंको बिगड़ते देखकर वहाँ भीड़ जम गयी और कितने पक्षपाती हिन्दू भी वहाँ इकट्ठे हो गये, । तब काजीको उसकाने और क्रोधको बढ़ानेके लिये एक हिन्दूने कहा—“क्यों जी कबीर तुमको अपने धर्मका नियम मानना और काजी और मुल्ला जो धर्मके रक्षक और उपदेशक हैं उनकी आज्ञा पर चलना चाहिये । सो काजीजीकी आज्ञानुसार सुन्नत कराकर अपने धर्ममें मिलो । देखो, हमारे यहाँभी जब बालककी जनैऊ होती है तब वह संस्कारी बनता है, जबतक जनैऊ नहीं होती तबतक उसको शूद्रके तुल्य मानते हैं । वैसेही तुम्हारे धर्मका नियम सुन्नत कराना है, उससे क्यों भागते हो !” इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—
जो तोहि कर्ता वरण विचारत । जन्मत तीन दंड अनुसारत ॥
जन्मत सूद्र मुये पुनि सूद्रा । किरतिम जनैऊ घाल जगदुद्रा ॥
जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मनी जाये । और राहासे काहे न आये ॥
जो ये' तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काह न सुन्नति कराये ॥
कारी पीरी दूहौ गार्ई । ताकर दूर देहु बिलगार्ई ॥
छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कबीर भजु सारंगपानी ॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण अवाक् होकर रह गया । तब काजीने कहा, देखो यह लड़का शरअसे बाहर बातें करता है इसकी बात सुननी उचित नहीं है । काजीकी इस बात पर उस लज्जित हुए ब्राह्मण और उसके साथियोंने भी जोर लगायी और सब एक मत होकर कहने लगे कि, इस लड़केके कहनेमें क्या आते हो, इसको तो पकड़ कर बांधो और सुन्नत करो । फिर क्या था ? पानीपर चढ़े हुए काजीने कई मांस हारी मुस्टेंडे मुसलमानोंको आज्ञा दिया कि, इस बालकको बांधो । देखतेही देखते थोड़ीही देरमें कबीर साहबको एक रस्सीमें बांधकर उन लोगोंने पछाड़ दिया और नाईकी खोज करने लगे । किन्तु नाई विचारा तो प्रथमही पाँच लिंग देखकर ऐसा भयभीत होकर भागा था कि
उसने पीछे फिरकर भी नहीं देखा था। अब उनको नाई मिलता तो कहोसे ! अब तो नाईके बिना काजी बहुत घबराया, चारों ओर लोग 'नाई ! नाई !' कहते दौड़ने लगे। उस समय कबीर साहबने काजीको सम्बोधन करके यह शब्द कहा—
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
अंखत बकत रहौ निसि बासर मति एको नहि जाना ॥
सकति न मानो सुनति करत ही मैं न बदोंगा भाई ॥
जो खुदाय तुब सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥
इतना कहकर वहाँ खड़े ब्राह्मण (हिन्दुओं) की ओर दृष्टि करके घालि जनेऊ ब्राह्मण होना, मेहरी क्या पहिराया ।
वह तो जन्मकी सूर्यन पिरोसी, सो तुम क्यों खाया ॥
हिन्दु तुएक कहाँसे आया, किन यह राह चलायी ।
दिलमें खोज खोज दिलहीमें, विहिस्त कहाँ किन पायी ॥
इतना कहकर कबीर साहब उठ खड़े हुए। उनके शरीरका बन्धन सब आपही खुलकर गिर पड़ा यह देखकर लोग बहुत आश्चर्यित हुये।
फिर कबीर साहबने काजीसे कहा—
कहै कबीर सुनोहो काजी। यह सब अहै शैतानी बाजी ॥
छिः!! छिः!! क्या इसीको मुसलमानी कहते हैं ?
यहि तरीका जो मुसलिम होई। तोपै दोजख परै न कोई ॥
फिर मुस्कुराते हुए कबीर साहबने काजीसे कहा, भाई ! अबतक तो खुद तुम्हें मुसलमानीकी खबर नहीं है, तब तुम मुझे कैसे मुसलमान करने आये थे ?
तुम तो मुसलिम भये नहि भाई। कैसे मुसलिम करहू आयी ॥
यदि तुम मुसलमानीका यथार्थ मार्ग जानते हो तो मुझसे कहो
जेहि तरीक सो साहिब राजी। सो तरीक मोहि कहिय काजी ॥
मारफ़तकी मुसलमानी, कहिये हजरत मोहि ॥
पाक जात केहिविधि मिले, सो मैं पूछौं तोहि ॥
यह सुनकर काजीने कहा, हम शरआके पाबन्द हैं, हमको मारफ़तकी बातमें जवान हिलानेकाभी हुक्म नहीं है—
काजीके उत्तरको सुनकर कबीर साहबने कहा, बस इतनेही पर काजीपना करनेका अभिमान करता है ? फिर यह शब्द कहा—