कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
नबियों और उनके खुदापर एकदृष्टि
वह भी उठ खड़ा हुआ । फिर राजाकी देहको जीवित कर दिया और वह भी उठकर निजकार्यमें संलग्न हुआ । इसी प्रकार इस संन्यासीने अपनी सब देहोंको जगाया । उसने ज्ञानी होकर अपनी सारी देहोंको जीवित किया और अपना सारा समाचार कह सुनाया । प्रथम वह एक संन्यासी था । फिर कितनी जुदी २ मूर्तियाँ भाँति भाँतिके स्वरूप बन गये । एकही शरीर और एक आत्मासे कितनी अनगिनती और भाँति भाँतिके बहुततर शरीर तथा आत्मायें बन गईं । उसी समय उसी घड़ीसे अनेक हो गये । न बहुतेरे शरीर परमेश्वरने उत्पन्न किये थे न बहुतसी आत्मायेंही की थीं, इस कारण एक और अनेक कुछ कहाही नहीं जाता । एक भी है और अनेक भी है । ब्रह्मज्ञानीको अधिकार है कि जैसा स्वरूप चाहे स्वीकार करले । अब जानना चाहिये कि, जिसने यह संसार उत्पन्न किया, वह भी एक बड़ा ज्ञानी है ।
उस संन्यासीका गुरु शिव था और उसका ध्यान शिवमें था । अंतको परिणाम यह हुआ कि, वह स्वयम् शिव हो गया । यही परमेश्वर है यही सेवक है । ज्ञानकी अवस्था परमेश्वरी की है अज्ञानी होकर दास हो रहा है । जैसे मैंने पहले राजा विपश्चितका उदाहरण लिखा था, वैसेही यह उदाहरण संन्यासी और महादेवका है । वैसाही अग्नि देवता और पूर्वोक्त राजाकी अवस्थाको जानना चाहिये । जो कोई जिस देवताकी भक्ति करता है, अन्तको वही हो जाता है । स्वप्नवत् यह आवागमन करता जाता है । सिद्ध साधु तथा सामान्य आदि सभी आवागमनमें फँसे हुये हैं, किसीको कभी छुटकारा नहीं मिलता है ।
स्वप्नकी देह—सन् १८४२ ई० में जब मैं काशी नगरीमें था वहाँके मनुष्योंमें एक ऐसा रोग हुआ कि, कोई कोई रातको खा पीकर अपने पलंगपर लेटे जब सबेरा हुआ तब मुरदा पाये गये । ग्रंथोंमें यह बात विशेष विवरणके साथ लिखी गयी है कि, जो रातको सोता है यदि देरतक उसको स्वप्न आता है बहुत देरतक उसी स्वप्नको देखता रहता है तब उसका वह शरीर छूट जाता है । स्वप्नवाली देह ठीक हो जाती है । उसके स्वप्नमें साथ जो देह थी वही सूक्ष्म शरीर स्थूल होकर जाग पड़ती है । उसका प्रथम शरीर मृतक तथा निर्जीव हो जाती है । इस प्रकार सूक्ष्मसे स्थूल तथा स्थूलसे सूक्ष्म हो जाता है । जिसको वेद पुराणोंमें आधिभौतिक अन्तर्वाहिक देह कहा है ।
६१ मनशूरका सम्स तबरेज और बल्लेशाह होना— मुसलमानोंके फकीर स्पष्ट कहते हैं कि, जो मनशूर था वही शम्स तबरेज हुआ जो शम्सतबरेज था वही सरमद हुआ जो सरमद था वही बुल्लेशाह हुआ ।
६२ भूल— मुहम्मदियोंका ऐसा विश्वास है कि, एक बार उत्पन्न होकर करोगे, मरकर फिर जीवित होंगे, फिर कभी न मरोगे। इससे वे महाप्रलयके जीवनको समझते हैं। वो बात नहीं बरन् यह परमेश्वरमें लीन हो जानेकी बात है।
६३—बहुतरे महम्मदी अज्ञानतावश समझते हैं कि, मुझे निर्दोषकी परमेश्वरने नरकी बनाया। अथवा कष्टोंमें फँसाया।
अमीर खुसरो
न्याव न कीन कीन ठकुराई । विन कीने लिखि दीन बुराई ।
मौलवी रूम
हफ्तसद हफ्ताद कालिब दीदः अम् ।
बारहा चूँ सबजये रुईदः अम् ॥
मगज कुरआं अज जहाँ बरदाश्तम् ।
उस्तख्बों पेशे सगां अन्दा खतम् ॥
अर्थात् सात सौ सत्तर देह मैंने धरी, अनेक बार घास पातके संदूश जमा। कुरानका सार मैंने लिया, उसकी हड़डी (निःसार) कुत्तोंके सामने डालदी
६४—सयद भषशाहका वचन —
लख चौरासी बेलि लगाई । बेलि भरम भूलो मत भाई ॥
६५—इमाम जाफर साहिब—हयातुलकल्लबमें लिखा है हजरत इमाम जाफर साहबने फरमाया है कि, जब खुदाने जिबरईल इत्यादिको पृथ्वी पर मिट्टी लेनेको भेजा जिसमें कि, वह आदमकी प्रतिमा बनावे, उस समय पृथ्वी रोई चिल्लाई, क्योंकि, पृथ्वी अत्यन्त प्राचीन है इससे मनुष्योंके कुकम्मोंको सदैवसे जानती है। नहीं तो यह पृथ्वी कदापि रोती चिल्लाती नहीं। मनुष्योंके कुकम्मोंको यह जानती है।
६६ आदम और बेलकी बात — हदीसोंमें आया है कि, जब हजरत आदमको खुदाने बैकुण्ठसे निकाल दिया। इसके पीछे जिबराईलको भेजा कि, आदमको हल जोतना सिखलावे वँसाही हुआ। आदमने बेलको एक डण्डा मारा। बेलने कहा कि तू मुझको निर्दोषको क्यों मारता है? तू स्वयम् दोषी है। इससे प्रगट हुआ कि, मनुष्यमें पशु तथा पशुमें मनुष्य गमन कर रहा है। दोनोंमें एक, आत्मा है।
मसी हुद्ज्जाल ।
६७—लिखा है कि, महाप्रलयके पूर्व मसीहुद्ज्जाल प्रगट होगा।
उसका स्वरूप ऐसा होगा कि, उसका मूँह मनुष्यकासा और शिरपर गायकी सीगें होंगी, उसकी गायकी पूछ, घोड़ेकी गरदन, चीतेकी पीठ, हरिणकापेट, बन्दरके हाथ, ऊँटके पाँव होंगे और उसके एक हाथमें मुसलमानकी अगूठी तथा दूसरे हाथमें मूसाका ङ्ण्डा होगा । जिसको वह मूसाका सोटा छुलावेगा उसी समय उसका स्वरूप वैकुण्ठवासियोंकासा हो जायगा, जिसके माथेपर मुलेमानकी अगूठीका चिन्ह कर देगा उसी समय वह नरकका हो जावेगा । इस स्वरूपको मसीहूद्दज्जाल और दाबतुलअरज भी कहते हैं । प्रगट हुआ कि इस दाबतुलअरजमें खुदा गमन कर रहा है । नहीं तो उसको ऐसी शक्ति न हो तो यदि खुदा उसमें पैंठा न होता तो यह बल तथा सामर्थ्य कहाँ हो सकता था ?
६८—महाप्रलयका समाचार जड़ तथा चैतन्य सब कहेंगे । इसी कारण जड़में चैतन्य और चैतन्यमें जड़ गमन किया करता है ।
६९—शैतानका नरक जाना—मुसलमान कहते हैं कि, शैतान धिक्कारके योग्य है । भला पहले तो खुदाने कहा था कि, मेरे आतुरिक्त किसीको दण्डवत न करना, फिर खुदाने मिट्टीके पुतलेको दण्डवत करनेको कहा । यह तो खुदाहीकी ओरसे अधिकता थी । यह भी मान लिया कि, खुदाई आज्ञाको मानना उचित था । पर यह भी लिखा है कि, लौहमहफूज पर जब शैतान गया तब वहाँ लिखा हुआ था कि, एक मनुष्य सत्तर सहस्र वर्षतक तपस्या करेगा, अन्तमें वह नरकमें जायगा । शैतान सहस्र वर्ष तक रोता रहा तो भी नरकमें गया । उसकी कोई युक्ति काम न आई ।
मुसद्दस—छः लाख बरस बन्दगी में दिल जो दिया था ।
उस्ताद बदोनेक हयाते आब पिया था ॥
सालह वही इबलीसलकब दोनों लिया था ।
लाहासिल रोना सदहा तोबा किया था ॥
यह देखिले अब अगले करम जीवके जागे ।
तद्बीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
आदमसे कहे आदि पुरुष मानलै फरमान ।
हो जाबिता बाहोश व रख साबित ईमान ॥
एकरार खबरदार अदो तेरा है शैतान ।
बेसूद हुआ पन्द जो दुख द्रन्द घेरे आन ॥
दिन आधे ही आदम सो अदन छोड़के भागे ।
तद्बीर नहीं चलती है तकदीरके आगे ॥