कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
तीनों देवोंकी प्राकट्य
कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
अस कह मृत्यु लोक पगु धारा । पुनि परमारथ शब्द पुकारा ॥
छोडया लोक लोककी काया । नरकी देह धरि तब आया ॥
मृत्यु लोकमें हम पगु धारा । जीवन सो सत शब्द पुकारा ॥
करुनामय तब नाम धराया । द्वापर जुग जब मंहिमें आया ॥
कोइ न बूझे हेला मेरी । बांधे काल विषय भ्रम बेरी ॥
रानी इन्द्रमती कथा ।
गढ गिरनार जबहिं चलि आये । चंद्रविजय नृप तहाँ रहाये ॥
तेहि नृप ग्रह रह नारि सयानी । पूजे साधु महात्म जानी ॥
चढी अटारी बाट निहारे । संत दरस कहैं काया गारे ॥
रानी प्रीति बहुत हम जाना । तेहि मारग कहैं कीन्ह पयाना ॥
मोहि पहुँ द्रिष्टि परी जब रानी । त्रिषली रसना कह यह बानी ॥
इन्द्रमती वचन ।
मारग बेगि जाहु तुम धाई । देखहु साधु आनु गहि पाई ॥
दासी वचन ।
त्रिषली आय चरन लपटानी । नृप वनिता मुख भाष सयानी ॥
कही त्रिषली रानि अस भाषा । तुव दरशन कहैं बहु अभिलाषा ॥
देहु दरश मोहि दीनदयाला । तुम्हरे दरस मिटे सब साला ॥
करुणामय वचन—दासी प्रति ।
तब ज्ञानी कंहि वचन सुनावें । राज राव घर हम नहिं जावें ॥
राज काज है मान बढाई । हम साधु नृप गृह नहिं जाई ॥
दासीवचन—रानी प्रति ।
चलि त्रिषली रानीपहुँ आयी । दुई कर जोरे विनय सुनाई ॥
साधु न आवे मोर बुलावें । राज राव घर हम नहिं जावें ॥
यह सुन इन्द्रमती उठि धाई । किन्ह दंडवत टेक्यो पाई ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे साहिब मोपर करु दया । मोरे गृह अब धरिये पाया ॥
कह रानी चलु मन्दिर मोरे । होब सुखी दरसन लिये तोरे ॥
कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
प्रीति देख हम भवन सिधारें । राजा घर तबहीं पग धारे ॥
प्रीति देखि तेहि भवन सिधाये । दीन्ह सिंहासन चरन खटाये ॥
चरन धोय पुनि राखेसि रानी । ले चरनाम्रित जन्म सुभ जानी ॥
इन्द्रमतीवचन ।
पुनि प्रसादको अज्ञा मांगी । हेप्रभु मोकहैं करहु सुभागी ॥
जूठन परै मो गृह माही । सीत प्रसाद लै हमहैं खाहीं ॥
कुरुणामय वचन ।
सुनुरानी मुहि छुधा न होई । पंच तत्त्व पावे जेहि सोई ॥
अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥
देह हमारी तत्त्व गुन न्यारी । तत्त्वप्रकृतिहि काल रचिवारी ॥
असी पंच किहु काल समीरा । पंचतत्त्वकी देह खमीरा ॥
तामहैं आदि पवन इक आही । जीव सोहंगम बोलत ताही ॥
यह जिव अहै पुरुषको अंसा । रोकसि काल ताहि दे संसा ॥
नाना फंद रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहिं फांसै ॥
जिव तारन हम यहि जग आये । जो जिव चीन्ह ताहि मुकताये ॥
धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेक जीव कहैं दीन्हा ॥
नीर पवन कृत्रिम किय काला । विनसि जाय बहु करै बिहाला ॥
तन हमार यहि साजहिं न्यारा । मम तन नहिं सिरज्यो करतारा ॥
सब्द अमान देह है मोरा । परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति ।
सुनत वचन अचरज भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी ॥
रानी इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥
छन्द— इन्द्रमति आधीन होय कहै, कृपा करहु दयानिधी ।
एक एक बिलोय बरनहु, सब मोहिते सकलहु विधी ॥
विस्तु सम दूजा नाहिं कोई, रुद्र चतुरानन मुनी ।
पंचतत्त्व है खमीर तन तिहि, तत्त्वनके वश गुन गुनी ॥
सोरठा—तुम प्रभु अगम अपार, बरनो माने किन भये ।
मेटहु त्रिषा हमार, अपने परिचय मोहि कहु ॥
हे प्रभु अस अचरज मोहि होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥
कौन आहु कहवाँते आये । तन अर्चित प्रभु कहैवा पाये ॥
कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरनि कहो मोहि भेवा ॥
हम का जानहिं भेद तुम्हारा । ताते पूछा यह व्यवहारा ॥
करुणामय वचन ।
इन्द्रमती सुन कथा सुहावन । तोहि समुझाय कहों गुनपावन ॥
देस हमार न्यार तिहुँ पुरते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुरते ॥
तहाँ नहीं जम कर परवेसा । आदि पुरुषको जहवाँ देसा ॥
सत्य लोक तेहि देस सुहेला । सत्य नाम गहि कीजे मेला ॥
अद्भुत जोति पुरुष की काया । हंसन सोभा अधिक सुहाया ॥
आदि पुरुष सोभा अधिकारा । पटतर कहा देहुँ संसारा ॥
द्वीपकरी सोभा उजियारी । पटतर देहुँकाहि संसारी ॥
यहि तीनों पुर अस नहि कोई । जाकर पटतर दीजै सोई ॥
चन्द्र सूर यदि देश मंझारा । इन सम और नहीं उजियारा ॥
सत्य लोककी ऐसी बाता । कोटिक ससि इकरोम लजाता ॥
एक रोमकी सोभा ऐसी । और बदनकी बरणौ कँसी ॥
ऐसे पुरुष कान्ति उजियारा । हंसन सोभा कहों बिचारा ॥
एक हंस जस षोडस भाना । अगर वासना हंस अधाना ॥
तब कबहुँ जामिनि नहि होई । सदा अँजोर पुरुष तन सोई ॥
कहा कहों कछु कहत न आवे । धन्य भाग जे हंस सिधाये ॥
ताहि देसते हम चलि आये । करुणामय निज नाम धराये ॥
सतयुग त्रेता द्वापर आये । तोसन वचन कहों सुखदाये ॥
जुगन जुगनमें मैं चलि आवों । जो चेत तेहि लोक पठावों ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु औरो जुग तुम आये । कौन नाम उन जुगन धराये ॥
करुणामय वचन ।
सतजुगमें मैं सतनाम कहायो । त्रेता नाम मुनीन्द्र धरायो ॥
अब करुणामय नाम धरावों । जो चीन्हे तिहि लोक पठावों ॥
कबीरवचन धर्मवास प्रति ।
धरमदास तेहि कहयो बुझायी । सतयुग त्रेता कथा सुनायी ॥
सोसुनि अधिक चाह तिन कीन्हा । और बात सो पूछन लीन्हा ॥
उत्पति परलय और बहु भाऊ । जमचरित्र सब वरनि सुनाऊ ॥
जेहि विधि षोडश सुत प्रगटाने । सो सब भाष सुनाया ज्ञाने ॥
कूर्म विदार देवी उत्पानी । सो सब ताहि कहा सहिदानी ॥
ग्रास अष्टंगी और निकासा । जेहि विधि भये मही आकासा ॥
सिन्धु मथन त्रय सुत उत्पानी । सबही कहे पाछिल महिदानी ॥
जेहि विधिजीवन जमठगिराखी । सो सब ताहि सुनायउ भाखी ॥
मुक्त ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरन गहे अनुरागा ॥
इन्द्रमती वचन ।
जोरि पानि बोली बिलखाई । हे प्रभु जमलेहु छुडाई ॥
राज पाट सब तुमपर वारों । धनसम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु सरन मुहि दीनदयाला । बंदिछोर मुहि करहैं निहाला ॥
करुणामय वचन ।
इन्द्रमती सुनु वचन हमारा । छोरों निश्चय बन्दि तुम्हारा ॥
चीन्हेंउ मोहि परतीत दिढाना । अबदे हूँ तोहि नाम परवाना ॥
कराइ आरति लेहु परवाना । भागे जम तब दूर षयाना ॥
चीन्हो मोहि करो परतीती । लहु पान चलु भौजल जीती ॥
आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥
धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावनयहि जग आवा ॥
धन सम्पति परमारथ लायी । करहु सन्त सन्मान बतायी ॥
सकल जीवहैं साहिब केरा । मोह विवस जिवपरे अंधेरा ॥
सब घट पुरुषअंश कियो बासा । कहीं प्रगट कहि गुप्तनिवासा ॥
छन्द— सब जीवहैं सतपुरुषके, बस मोह भरम विमानहो ।
जमराजको यह चरित सब भ्रम, जालजमपरधान हो ॥
जीवकाल बसहो लरत मोसे भ्रम वश मोहिन चीन्हही ।
तजि सुधा कीन्हो नेह विषसे, छोड़िघृत अँचवे मही ॥
सोरठा—कोई इकविरला जीव, परखि शब्द मोहिचीन्हई ॥
धाय मिले निज पीब, तजे जारको आसरो ॥
इन्द्रमती वचन ।
इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुन खानी ॥
मोहि अधमको तुमसुख दीन्हा । तुव परसाद आगम ममचीन्हा ॥
हे प्रभु चिन्हतोहि अब पाहूँ । निश्चय सत्य पुरुष तुम आहूँ ॥
सत्य पुरुष जिन लोक सँवारा । करहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हिरदय अस हम जाना । तुमते अधिक और नहिं आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरति भाऊ । जो चहिय सो मोहि बताऊ ॥