कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
उद्भिजसे मनुष्य होनेका चिन्ह पिंडजसे मनुष्य होनेका चिन्ह
है। अपने कार्योंसे आप अनभिज्ञ है इस कारण इसको तू दूसरेका लेख बताता है। तथा अज्ञानसे दूसरेका किया और लिखा हुआ जानता है।
यथा—उसी अंग्रेजी पुस्तकमें एक पादरीकी कहानी लिखी है। यह बात प्रसिद्ध थी, कि, वह पादरी सोंते सोंते बड़े बड़े आश्चर्य कौतुक किया करता था। एक दिवस गिरजाघरमें एक मुरदा स्त्री आई। उसके लिये यह पादरी प्रार्थना करने गया। वह पादरी प्लेटफार्म पर खड़ा होकर प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना कर चुकनेके बाद उस स्त्रीको कब्रमें गाड़ने ले चले। उसने देखा कि उस स्त्रीके हाथमें एक अंगूठी थी। यह अंगूठी उस मुरदेके किस काम आवेगी, यदि निकाली जावे तो धर्मशालाके कामोंमें लगे। अपने मनमें यह सोचता हुआ पादरी तो धर्मशालामें गया, लोग उस स्त्रीको गाड़कर चले गये। फिर वह पादरी जब सो गया तब थोड़ी देर पीछे उठ खड़ा हुआ। उठकर कबिरस्तानकी ओर चला, मुरदा स्त्रीकी कब्रपर पहुँचा चाहा कि, कब्र खोदकर उस स्त्रीके हाथसे अंगूठी निकाल लूँ। लोगोंने उसको यह काम करते देखा तो पकड़ लिया कहा कि, ऐसा काम क्यों करते हो? उसकी नौंद टूटी वह जाग गया। अपनेको कब्र खोदता पाकर लज्जित हुआ कहा कि, मैं तो स्वप्नावस्थामें यह काम करता था। लोगोंको मालूम भी था कि, उसका स्वप्न वैसाही था।
एक दिवस उस मनुष्यने एक ऐसा घृणित कार्य किया जिससे उसे बड़ी लज्जा आई। उसने एक क्वारी लड़कीके साथ सम्भोग किया। लोगोंने उसको पकड़कर जज साहबके सामने खड़ा किया। उससे प्रश्नोत्तर होने लगा, उस समय उसकी निद्रा भङ्ग हुई। अपनेको जजके सामने खड़ा पाकर पूछने लगा कि, मुझको यहाँ कैदकर क्यों लाये हो? मुझको तनिक भी सुधि नहीं। लोगोंने कहा कि, तू एक महाकुकर्मके दोषमें फँसा है। उसने कहा कि, मुझको सुधि नहीं। स्वप्नावस्थामें मुझसे यह कार्य हुआ है। मैंने इच्छापूर्वक नहीं किया है। जजने उसको स्वप्न स्थिति जाना। विदित होगया कि, इस पादरीके स्वप्न विचित्र हैं। उस पादरीने स्वप्नावस्थामेंही अनेकों पुस्तकें लिखी थी। उसके स्वप्नका हाल जानकर छोड़ दिया उसको किसी प्रकारका दण्ड नहीं दिया।
इसी प्रकार यह जीव चारों अवस्थाएँ जागृत, स्वप्न, सृषुप्ति और तुरियामें बँधा हुआ सब कार्य करता है। भूलकर अपने कार्योंको नहीं जानता। दास, स्वामी दोनों इन्हीं चारों अवस्थाओंमें फँसकर सब कार्य करते हैं भूल जाते हैं, यहीं कर्ता तथा कर्म होकर सब कौतुक कर रहा है, भ्रमसे दूसरा कर्ता मानता है। अपना कर्तव्य भूल गया है। जागृत अवस्थामें जो कुछ यह करता
है तब कुकर्मं सुकर्मंका हिसाब देता है पर स्वप्नावस्थाका हिसाब किताब नहीं होता । क्योंकि, मनुष्य जागृतवस्थामें अधिकृत है । इसीसे उसका लेखा होगा, पशु स्वप्नावस्थामें है इससे उनका हिसाब न होगा । ये चारों अवस्था जीवके भ्रम तथा अज्ञानको हैं । इन्हींमें बँधा हुआ यह आवागमन किया करता है । ईश्वर तथा जीव इन चारों अवस्थासे पृथक नहीं । पूर्वोक्त संन्यासी जब संन्यासी था तब भी चारों अवस्थामें फँसा था । जब वह बहुत बड़ा तपस्वी साधु तथा महादेवजी हो गया तब भी चारों अवस्थामें फँसाही रहा । इन चारों अवस्थासे जीव छूटा न शिव छूटा । पर वही छूटा जिसको स्वयम् सत्यगुरुने छुड़ाया । शेष सब आवागमनमें रहे । इन चारों अवस्थाकी विद्या अर्थात् सत्यज्ञान भूमिका और इन चारोंके सब कार्य, भ्रम तथा अज्ञानरूप उस विद्यार्थी तथा पादरीके समान हैं । यह कुछ करता नहीं और सब कुछ करता है । ज्ञानी वही है कि, जिसने भली भांति देख लिया और अन्तर दृष्टिसे जान लिया, क, मैं कैसे करता हूँ और कैसे नहीं करता ? उसने अहंकार छोड़ दिया और जब अहंकारको छोड़ दिया तब सब कुछ छूट गया ।
७३—आत्मा बादशाह है और चौरासी लाख योन उसका राज्य है । यह मणिमाणिक जड़ें महलोंमें रहता है और कभी कभी उजाड़ जंगल तथा बयाबानमें जा बैठता है । स्थान परिवर्तनके निमित्त यह दूसरा कुछ कदापि नहीं बनता । जो हो यह वही, राज्य राज्येश्वर तेजोमय शाहंशाह है । जो मनुष्य, पशु, स्थावर, जंगल सबमें एकही आत्मारूप है । पशु मनुष्यसे किसी बातमें कम नहीं । केवल आकारोंकी विभिन्नता है । सब बात एकही हैं कुछ विभिन्नता नहीं ।
७४ स्वाभाविक चेतना—प्राकृतिक नियम सब जीवोंमें समान रूपसे उपस्थित है, उसके लिये पिता तथा शिक्षकका कोई प्रयोजन नहीं है । जब बालक उत्पन्न होता है तो आपसे आप अपनी माताके स्तनोंको पकड़कर चूसने लग जाता है । आपही अपना करता है । सिखलाने तथा पढ़ानेकी कोई आवश्यकता नहीं होती । जिस योनिमें जाता है आपसे आप उस योनिका कार्य करने लग जाता है क्योंकि, यह सब योनियोंके स्वभाव तथा कर्मसे भली प्रकार अवगत है । सबका अनुभवी तथा अभ्यासी है । क्योंकि, सब योनियोंमें यह फिर चुका है । सबका जाननेवाला है । कुछ सिखाने पढ़ानेकी आवश्यकता नहीं रखता । सब जीव आपही आप वही गुण रखते हैं । पर चारों अवस्थाओंने उसको भुला दिया । स्त्रियोंको देखो कि, वह ऐसी मक्कारी (कपट) करती हैं । कि, पुरुषों-
को उल्लू बना देती हैं। कौसाही बुद्धिमान् और चतुर मनुष्य क्यों न हो पर त्रिया-
चरित्र तथा इनकी धूर्तताके आगे वह मूर्ख तथा अज्ञानके बराबर हैं। यह त्रिया-
चरित्र संसारमें प्रख्यात है, इस कलाको सीखनेके लिये कौन पाठशाला कौन
शास्त्र और कौन गुरु है? स्वयम्ही आपसे आप यह सब गुण उत्पन्न होते हैं।
यह सबका जानने तथा देखनेवाला है। भाग्य प्रत्येकको अपने आप सिखा देता
है। किसी शिक्षककी आवश्यकता नहीं रहती। सब जीव अपनी जातिकी बोली
तथा इन्द्रित चिन्होंको समझते हैं। पशु ऐसे ऐसे विचित्र कार्य करते हैं जिन्हें
कि, देखकर मनुष्यकी बुद्धि चकराती है जैसे चीनके लोगोंकी बोली लेपलेण्डर
और फारसीसियोंकी बोली हबशी नहीं समझते एक कूएँके मेढककी बोली दूसरे
कुएँका मेढक नहीं समझता इसी प्रकार सभी अपनी योनिके अनुरागी होते हैं
उसी भाषाको समझते हैं दूसरीको नहीं जानते।
पुण्यपापके फलका संक्षेप।
७५—इस संसारमें जितने मनुष्य हैं, किसीका आकार किसीसे मेल
नहीं रखता क्योंकि, सबसे पूर्वकर्म पृथक् पृथक् ढङ्गके बने हुये हैं। जैसा कि,
कृष्णचन्द्र और कबीरसाहबने कहा है मनुसंहिता इत्यादिमें लिखा है जो कपड़ा
चुरावे वो कोढ़ी होगा। घोड़ा चुरावे सो लंगड़ा हो। प्रदीप चुरावे वो अन्धा
हो। जो अप्रतिष्ठा सहित प्रदीप बुझावे सो काना हो। जो जल चुरावे वो पन-
डुब्बी हो। जो तेल चुरावे वो पतंग हो। जो हिरण चुरावे वो भेड़िया हो, जो
फल चुरावे सो बन्दर हो। जो पंडितका धन चुरावे सो घड़ियाल हो, अपवाद
लगानेसे मुँहमें दुर्गन्धि हो, रक्त चुरानेसे वनस्पती हो, दुराचारी मतका कीड़ा
होता है। क्रोधित तथा बदला लेनेवाला मनुष्य शेर हो। बहुत भोजन करने-
वाला मनुष्य सूअर हो। जो परस्त्रीके साथ गमन करे वह अन्धा हो। जो वेश्या
गमन करे वह गद्दा हो। जो दूसरेका धन लूटे वह भिखारी हो। जो मनुष्यका
वध करे वह कोढ़ी हो। जो सुवर्णदान करे वह सुवर्ण पावे। जो पृथिवी दान करे
वो हाथी घोड़ा पावे। जो अन्न दान करे तो मनुष्य देह पावे। जो किसीका ऋण
लेकर चुकता न करे तो उसकी स्त्री मर जावे। जो मिष्ठान्न दान करे वह स्वरूप-
मान हो। जो गुरुकी सेवा करे वो पवित्र तथा स्वच्छ हो। जो कोई अपने
आत्मीय स्वजनकी हत्या करे वह नशा खानेवाला हो। जो अपना उच्छिष्ट
भोजन दूसरेको करावे वो कुत्ता बिल्ली हो। जो कोई अपनी विद्या दूसरे को
न सिखावे वो बहरा हो। जो कोई गुप्त दान करे वह अपनी मनोकामना पावे।
जो गायका दान करे वो पवित्र हो। तीर्थ स्थानसे उच्च घरानेमें जन्म ले।