कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
१५ अध्याय कबीर साहबके कलियुगके शिष्य
गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥
कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन विहण्ड ।
गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण औ पिण्ड ॥
बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार ।
गरीब दास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ।
तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सद्गुरु हम हंस ।
गरीब दास तुम रूप विनु, और न पूजो बंस ॥
मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश ।
गरीब दास अविगत मिले, मिटी मनकी प्यास ॥
दोनों ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय ।
गरीबदास हमकारने, उतरे मगम जोय ॥
बोले रामानन्दजी, सुनु कबीर सुजान ।
गरीबदास मुवित भयी, उधरे पिण्ड ओ प्राण ॥
गुष्ठि रामानन्दसे, काशीनगर मझार ।
गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥
पृ. २९६ में कबीर साहिबके १२ पन्थोंका सामान्य परिचय दिया जा चुका है अनुरागसागरकी भूमिकामें इनका विस्तारके साथ वर्णन किया है तथा उनकी परंपराभी दिखाई है उन्हींके विषयमें कथन है कि, बारहों पन्थोंके आचार्य हंस कबीर हैं। वे सब सद्गुरुके धामको पहुँचेंगे।
रहन सहन
भारतवर्षमें कबीर साहबके अनुयायी बहुत हैं। वे लोग वेद धर्मियोंके साथ मिले मिलाये रहते हैं। वे भ्रम भूतकी पूजासे दूर भागते हैं। वे तीर्थोंमें श्रद्धाके साथ जाते हैं। दान पुण्य आदि करते हैं। जो ठीक कबीरपन्थी नहीं, नाममात्रको कबीरपन्थी बन बैठे हैं उनके विचार तथा ध्यान दूसरेही प्रकारके हैं। कबीर साहबका कथन है कि, हे धर्मदास ! जिसमें तुम ऐसे चिन्ह पाओ उसको उपदेश दो। जिसमें भक्ति, दीनता, साधुसेवा, गुरुसेवा न हो उसको अपने हंसोंमें भूलकर भी स्थान न देना। जिस समय मित्र आदि रविदासजीके जब सब सहायक हार मान गये तब रविदासजीने सत्यगुरुको पहचाना। कपटियोंका भरोसा छोड़कर कबीर साहबके शिष्य हो परमानन्दमें बहने लगे।
भारतवर्षमें बहुत लोग हैं, जो अपनेको कबीरपन्थी कहते हैं, परन्तु उन लोगोंको आज्ञा है कि तुमलोग जब धर्मदास साहबके बचन चूड़ामणिदासकी
शरणमें आओगे तब तुम्हारे सब अपराध क्षमा किये जायँगे, तब तुम मुक्ति पाओगे जबकि सब एक रङ्ग हो जावेंगे । जितने लोग कबीर साहबकी आज्ञापर चलते हैं उनकी धर्म पुस्तक स्वसंवेद है । यह स्वसंवेदही यथेष्ट है अन्यान्य सभी नकल है । जितने शास्त्र तथा विद्या हैं वो सब स्वसंवेदसे हैं । स्वसंवेद एक नदी है । जिससे एक बूंद निकल कर सर्व संसारमें फैल रहा है । उसीमें चिड़िया एक चोंच भरकर प्यास बुझा लेती है । इसी प्रकार सारे पृथ्वीसे परमेश्वर और संसारभरके आचार्य इस स्वसंवेदका कोई भाग अथवा कोई टुकड़ा निकालकर अपना शास्त्र बनाके बैठे हैं । स्वसंवेदहीसे सभीने श्रेष्ठता पाई है परन्तु अपने पिताकी प्रतिष्ठा तथा मर्यादाको किसीने न जाना । इसकी सूक्ष्मता तथा स्वच्छतासे कोई विज्ञ नहीं । सहस्रोंने पन्थ चलाया चलाते हैं वो सब कबीर साहबकी वाणीका आसरा लेकर अपने अपने पन्थको प्रचलित कर रहे हैं । कितने तो ऐसे हुये और होते हैं कि, कबीर साहबके ग्रन्थ तथा वाणी देखकर अपनी वाणी बनाते और अपनेको कबीर साहबके बराबर अथवा बढ़कर ठहराते हैं । ऐसे कृतघ्न स्वार्थियोंको कभी भलाईकी आशा न करनी चाहिये ।
जिस प्रकार भारतवर्षमें हैं इसी प्रकार अरब, फारस, काबुल, तुर्कस्तान, तातार इत्यादिमें कबीर साहबके अनेक धर्मावलम्बी हैं । शेख जुम्नेद बुगदादी और हसनबशरी इन बड़े बड़े शेखोंमें कितनेसे एक तो शेख कबीरका धर्म मानते हैं । कितने मुसलमानी धर्म मानते हैं । पर आपसमें मिले रहते हैं परन्तु इन दोनों प्रकारके शेखोंमें बड़ा भेद है । दोनोंकी रीति न्यारी न्यारी हैं । कबीर साहब प्रत्येक ध्यानपर एक समान भावसे उपस्थित रहते हैं । एक देशसे गुप्त होते हैं फिर दूसरे देशमें प्रगट रूपसे फिरा करते हैं । जैसे एशियाके रहनेवालोंपर दया होती है, उसी तरह अफ्रिका, अमेरिका और योरोप तथा अन्य द्वीपोंके निवासियोंपर भी कृपा हुआ करती है, परन्तु आपका भेद कोई नहीं जान सकता । कहीं से छिपते हैं तो कहीं प्रगट हो जाते हैं । सहस्रों स्थानोंपर कब्र तथा समाधियाँ हैं न कभी जन्म लेते हैं और न कभी मरते हैं । सर्व ब्रह्मण्डोंमें स्वच्छन्द लीला करते हुए अधिकारियोंको उपदेश किया करते हैं ।
सन् १८५२ ई. का वृत्तान्त है । मैं उस समय सेयालकोट था, उसी समय मुझको एक कबीरपन्थी साधु मिला जब मैंने उसको देखा तो उसके पैरकी उँगलियाँ झरी दिखाई दीं । मैंने उससे पूछा कि, तुम्हारे पाँवकी उँगलियाँ कैसे झर गयीं ! उसने उत्तर दिया कि, जब दोस्त मुहम्मदख़ाँ अमीर काबुल जीवित था । अंग्रेजी सैन्य युद्धके निमित्त काबुलपर चढ़ गयी थी, उस समय मैं भी काबु-
लमें गया था। उस सालमें बहुतही बरफ पड़ी, मारे ठण्डके मैं अपना पाँव सेकने लगा, जब बरफकी सरदीके उपरान्त गरमी लगी तो मेरी उँगलियाँ झड़ गयीं। फिर वह साधु मुझसे कहने लगा कि, मैंने सुना है खैबरके ऊपर कबीर साहबकी कब्र है। उसके सैयद अहमद कबीरकी कब्र ऊपर नियत समय पर मेला लगा करता है। एवं बहुतसे दर्शक वहाँ आते जाते हैं। यह बात सुनकर मेरी कामना कब्रके दर्शन करनेकी हुई। तब मैं दूँढ़ता हुआ वहाँ जा पहुँचा तो देखा कि चारों ओर बड़ा सन्नाटा छाया है। कहीं कोई मनुष्य नहीं है, वहाँ केवल एक कब्र बनी हुई थी। उस कब्रके ऊपर एक वृद्ध जिसकी बहुत लम्बी श्वेत दाढ़ी थी बैठा था। उस वृद्धको देखकर मैंने झुककर दण्डवत प्रणाम किया तब वह वृद्ध दयालुहुआ उसने मुझको एक सेबका फल प्रसादमें देकर कहा कि, तुम अब यहाँसे चले जाओ। मैं उस फलको लेकर अपने डेरे चला आया उस फलको एक ताकपर धर दिया कि, दूसरे समय खाऊँगा। थोड़ी देर बाद देखा तो उस फलको उस ताकपर न पाया, वह गायब हो गया था। मैंने बहुत खेद किया वह फल न मिला, इसे मैं अपना दुर्भाग्य समझकर चुप चाप कबीर साहिबका ध्यान करने लगा। पश्चिम देशोंमें कबीर साहिब स्थान स्थानपर सैयद अहमद कबीर और शोख कबीरके नामसे प्रसिद्ध हैं। शोख कबीरके जो अनुयायी आचार्य हैं उनकी भजनकी रीति भाँति मुसलमानी आचार्योंसे निराली ही है कबीर साहबके धर्मपर चलनेवाले प्रत्येक देशमें सभी स्थानोंपर मौजूद हैं। उनका भेद किसीको मालूम नहीं है न मनुष्य उनको यह पहचानही नहीं सकते हैं कि, ये ही कबीर साहब समस्त संसारमें छाये हुए हैं, या कोई दूसराही है। उसका पहचानना बड़ा कठिन है। वह स्वयं जिसपर दया करता है वह पहचान सकता है। दूसरेकी क्या सामर्थ्य है कि, उसको जान सके। इस ब्रह्माण्डके भीतर जितने लोक और बस्तियाँ हैं, जितने ब्रह्माण्ड तथा संसार अन्यान्य स्थानोंमें हैं सभीमें कबीर साहब उपस्थित रहते हैं सबके द्रष्टा हैं, प्रत्येक जीवधारीकी सुध लेते रहते हैं। वे सबको याद करते हैं उनको सभी याद करते हैं। समस्त ब्रह्माण्डोंका रचयिता जो प्रत्येकके साथ रहता है उसीका नाम सत्य कबीर बन्दीछोर है। उसीकी रक्षायें सब रट रहे हैं।
गुरुकी कृपा
जो वस्तु प्रयत्नसे किसी प्रकार भी प्राप्त नहीं हो सकती वह गुरुकी कृपासे प्राप्त होती है, बिना गुरुकी पूर्ण कृपाके वासनाएँ धूलमें मिला देती हैं। शोख फरीद जैसे सच्चे वेदान्ती गुरुके विमुख होते ही इतने विषयोंमें फँसे कि,
विवाह करके संसारी हो गये । विषय वासनाके सामने उनकी तपस्या किस काम आई ! हाँ सच्चे गुरुके पूरे भक्त बने रहते तो भवसागरके पार हो जाते । जो सच्चे गुरुको पहिचानकर उसकी शिक्षाके अनुसार सत्यलोकको पा सकता है । स्वसंवेदका यही सार है कि, गुरुके चरणोंको दृढ़तासे गहे रहे । क्योंकि, बिना उसकी पूजाके कुछ न प्राप्त होगा । सदा गुरुकी सीख माननी चाहिये उसकी कृपामें ही सर्वस्व है कबीर साहिबका तो वारंवार यही कथन है कि, गुरुकी मूर्तिमें मुझको पाजाओगे । जबतक दममें दम रहे गुरुको मानता रहे, गुरुकी मूर्तिमें मुझे समझकर उससे सब कुछ माने अणुमात्र भी अभिमान न करे, अपने कल्याणका उपाय सत्य गुरुकी भक्तिही समझे ।
जो सत्यगुरुसे प्रेम तथा श्रद्धा करेगा उसको सत्य शब्द मिलेगा उसे सब कुछ प्राप्त होगा । जिसकी गुरुपर श्रद्धा नहीं है वह शून्य रहेगा । गुरुका प्रेम श्रद्धाही धर्मकी जड़ है । सत्यगुरुका मत निर्गुण तथा सगुणसे अलग है । दोनों कार्य्य सिद्ध हो नहीं सकते । गुरुमें भक्ति करोगे तो जगत् छोड़ना पड़ेगा । यदि लोगोंसे प्रेम करोगे तो भक्तिमें विघ्न होगा । मुरीद नाम मुरदेका है । इसका तात्पर्य यह है कि जैसा गुरु कहे वैसाही करे । अपनी बुद्धि न लगावे और जब तक यह अवस्था न हो तब तक आपको जीवित तथा संसारी समझे । नाम तो समस्त संसार जप रहा है पर जो नाम सत्यगुरु द्वारा मिलता है वही सच्चा है । सहस्रों ब्रह्मा तथा ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर आदि हो गये हैं वे सब विषयकी अग्निमें जल रहे हैं परम अभिमानमें डूबे हुए हैं, इस कारण उनको सत्यगुरुके दर्शन नहीं होते जिसमें सत्यगुरुका प्रेम तथा विश्वास है वही मुक्तिका अधिकारी है । मनुष्योंमें वही भाग्यवान् है जो सत्यगुरुकी सेवा करता है दर्शनको जानेसे पग पवित्र होते हैं । दर्शनसे नेत्र पवित्र होते हैं, जल भरनेकी सेवासे शरीर पवित्र होता है, वचन सुननेसे अन्तःकरण पवित्र होता है । इसी प्रकार समस्त पवित्रता प्राप्त होती है । यदि नाममें बल होता तो सहस्रों मनुष्यों नाम जप रहे हैं । किसीको तो फल मिलता ? इससे जान पड़ा कि, यथार्थ बल सत्यगुरुमें ही है जो सत्यगुरुकी सेवा करता है । इस कारण उसीका दोनों लोकमें कल्याण है । गुरुमुख उसीका नाम होता है जो सत्यगुरुको सबका मालिक समझता है । इसी विषय पर एक दृष्टान्त देते हैं कि, दक्षिण देशमें एक परम श्रेष्ठ महात्मा अपने शिष्यों सहित रहते थे । एक दिन सत्संग हो रहा था, उसी स्थानपर एक मुसलमान भोलबी आगया, वह मक्का जाने को प्रस्तुत था, उसने मक्केकी यात्राकी बहुत प्रशंसा करके कहा कि, "शाहसाहब ! मक्का अत्यंत श्रेष्ठ
स्थान है वहाँ आपके शिष्योंको भी जाना उचित है।” उस समय महात्माके शिष्य अत्यन्त रुष्ट हुए, बड़े चलेने मोलवीकी गरदन पकड़ कर उसका शिर महात्माके चरणोंपर धर कर कहा कि, देख ! करोड़ों मक्के इन चरणोंमें हैं। महात्मा नित्य किया करने गये उस समय मोलवीका उस शिष्यसे बहुत वाद विवाद हुआ। जब महात्मा आये तब मोलवीने शिकायत की। उस समय महात्माने अपने शिष्यको समझाया कि, मक्काके विषयमें मोलवीका कहना बहुत ठीक है। वह पवित्र स्थान दर्शन योग्य है। तू भी मोलवीके साथ मक्काके दर्शनको चला जा। वह शिष्य गुरुमुख था, हाथ बाँध कर खड़ा होगा, उसी समय मोलवीके साथ जहाजपर सवार हो गया। थोड़ी दूर जहाज चला था कि, एक तूफान आया जिससे जहाज टूट गया, सब आदमी डूब गये, पर वह चेला एक तख्ते पर बैठा रह गया, वह भी डूबनेके समीप भी था ही उसी समय समुद्रसे एक हाथ निकलक साथ शब्द हुआ कि, यदि तू अपना हाथ मुझे पकड़ा दे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हो ? फिर शब्द आया कि, मैं पैगम्बर साहब हूँ। उस चलेने जवाब दिया, मैं नहीं जानता कि, पैगम्बर साहब कौन हैं ? मैं केवल अपने गुरु महाराजको जानता हूँ दूसरेसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखता। तब वह हाथ छिप गया, वह गुरुमुख तख्तपर बैठा हुआ डूबकी खाता जाता था। कुछ कालके पीछे एक हाथ और निकला, शब्द हुआ कि, मुझे अपना हाथ पकड़ादे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हैं ? तब उत्तर आया, कि मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ। गुरुमुखने उत्तर दिया कि, मैं अपने गुरुके सिवाय दूसरे किसीको भी नहीं मानता। मेरा परमेश्वर तो मेरा गुरु है, दूसरे परमेश्वरको मैं नहीं जानता। तब वह हाथ भी छिप गया। कुछ कालके पीछे तीसरा हाथ निकला उसने पुकार कर कहा कि, तू अपना हाथ मुझको पकड़ा मैं तेरा दादा गुरु हूँ। इसने उत्तर दिया कि, मैं अपना हाथ अपने गुरुको पकड़ाऊँगा दूसरेको हाथ कदापि न दूँगा। चाहे जीवित रहूँ या मर जाऊँ। तब वह हाथ भी विलुप्त हो गया। इसके पीछे स्वयम् सत्यगुरु आये। इस शिष्यको हृदयसे लगा लिया उसे तुरंतही अपने स्थान पर लेआये गुरुमुखकी पूरी परीक्षा हो चुकी। सर्व शब्द उन्हीं गुरु महाराजके ही थे। जो शिष्यकी पूर्ण परीक्षाके लिये प्रकट किये थे। इस कथनका परिणाम यह है कि, चाहें कोई किसी भी प्रकारके तीर्थ व्रत करे दान पुण्य यात्रा कर्म उपासना ज्ञानकी पूर्णता प्राप्त करे, कठिनसे कठिन तपस्या करे शुभकर्मोंको सीमा पर्यन्त पहुँचावे परन्तु मुक्ति केवल गुरुमुखकी ही होगी बाकी सारा संसार भवसागरमें डूब जावेगा।
गुरुमुख सांसारिक पदार्थोंपर ध्यान नहीं देता । जैसे हो वैसेही करलेता है, किसीसे राग द्वेष नहीं रखता, प्रत्येक बातमें सत्यता तथा स्वच्छता बर्तता है, अपने गुरुसे ऐसा प्रेम करता है जैसा कि, जलसे मछली करती है, वो प्राकृतिक मनुष्योंसे कम प्रेम रखता है । गुरुमुख जो कार्य करता है । वो केवल गुरुकी प्रसन्नताके लिये गुरुकी आज्ञाके अनुसार करता है । गुरुमुख अपना अहङ्कार छोड देता है सब कार्य सत्यगुरुकी ओरसे जानता है । वह काम सब सत्यगुरुके अर्पण करता है । गुरुमुख सदैव आलस्य तथा नींद आदिसे पृथक् रहता है । वह सदैव अपने सत्यगुरुकी प्रशंसा तथा कृतज्ञता स्वीकार किया करता है । गुरुमुख जो कार्य करता है वो परमार्थके लिये करता है वो धैर्यको कभी नहीं छोडता । मनमुखके जितने काम होते हैं वो सब गुरुमुखके विपरीत हैं । ग्रन्थ लोक संदेशासे थोडा यहाँ लिखता हूँ—
धम्मदास बचन
चौ० — धम्मदास जी बिनती लावे । संशय एक मेरे दिल आवे ॥
काया मध्य बहुत अस्थाना । कौन वस्तुका धरिये ध्याना ॥
कौन ताल और कौन द्वारा । कहैं होई हंसा करे बिहारा ॥
कहिये सत्गुरु मोहिं अरथाई । देखूं तो मो मन पतियाई ॥
सत्यगुरु बचन
जैसे दूधमें घीव रहाई । ऐसे पुरुष है तनके माहीं ॥
सद्गुरु पहले भेद बतावे । शब्द विदेह हंस घर आवे ॥
शब्द चढ़ि सो हंसा आवे । तबही पुरुषको दर्शन पावे ॥
छांडो धरती छाड अकाशा । छांडो पाँच तत्वको बासा ॥
कह कबीर निरन्तर घर पावे । हंसा घर होई सुरति लगावे ॥
विदेह नामको अङ्क जो पावे । यमसे जीव जान मुक्तावे ॥
सप्त स्वर्ग और सप्त पताल । चौदह भुवन तजि होइ निराला ॥
शब्दै धरती शब्द प्रकाशा । शब्द सँग हंसा देखि तमाशा ॥
शब्द ले हंसा करहू बाता । ताको आद्या करै न घाता ॥
ररा शब्दको देव वहाई । अमी शब्द मैं बैठो आई ॥
अमी शब्दकी बोलें बानी । तहवाँ सुरति करो पहचानी ॥
जब हंसा देही गुण त्यागे । तबनहिं चोर धर्मरायको लागे ॥
हम धर्मरायसे बाचा हारा । सौंप दीन्ह सकलो संसारा ॥
नतगुण होई जीवको बासा । सो सब रहे तुम्हारे पास ॥
जब लगिजीव गुण छूटेनाहीं । तबलगि रहे चौरासी माहीं ॥
जब लगि पाप पुण्यकी आशा । तब लगि लेई गर्भमें वासा ॥
कोटिन ज्ञान कथ दिखलावे । कोटिन ध्यान समाधि लगावे ॥
धर्मरायसे छूटे नाहीं । गुणतत जब लगि जीवके माहीं ॥
धर्मदास बचन
धर्मदास विनती तब लाई । अचरज बात जो कहो गोसाई ॥
देहीके गुण जो कैसे छाँडे । कैसे निगुण उलटे माँडे ॥
कैसे तन आपा विसरावे । कैसे जीव परम पद पावे ॥
ततगुण बिनु काया नहिं चाले । कौन जुगुतसे उनको पाले ॥
कैसे मनुवा अस्थिर होही । कैसे हंसा होय विदेही ॥
आठ काठसे देह बनाई । उनको कैसे दे विसरा ॥
निःअक्षरको कैसे पावे । कैसे गुणको मार ढहावे ॥
सब जिव तुम सौपे धरमराये । हंसको पन्थ दृढावन आये ॥
एको जीतन होय उबारा । मोसे चलै न पन्थ तुम्हारा ॥
साखी- तत्त्वगुण छुट न देहको, कैसे होय उबार ।
पन्थ तुम्हारा कठिन है, धर्मराय बरियार ॥
सत्यगुरु बचन
चौ० -धर्मदास तू परमहित मोरा । तुम्हरो पला न पकरै चौरा ॥
जिते जीव परवाना पावे । तब सो हंसा लोक सिधावे ॥
लोक जानमें भेद है भाई । कोई न पूछै चित्त लगाई ॥
सहज अठासी द्वीप सुधारा । जहां सब हंसा करे विसारा ॥
जैसे चाल चलै संसारा । तैसे तैसे द्वीप मझारा ॥
सर्व मूल तोहि देउँ बताई । तुमसे कछू न राखुँ छिपाई ॥
द्वीप अंशके हैं बड़े भारा । सकल हंस उन द्वीप मझारा ॥
निःतत्त्वी जाय पुरुष दरबारा । सकल द्वीपसे द्वीपसो न्यारा ॥
पुरुष हजूर जौ चाह रहाई । सो जिव आप दिये विसराई ॥
एक छन मांहि अमर घर जाई । छनहा हंस देउँ पहुँचाई ॥
जब सद्गुरु मन्दिर पग देई । चरण धोइ चरणामृत लेई ॥
सेवाकरत सुरति चल आई । तबहि काल घर बजै बधाई ॥
धर्मदास मैं कहूँ पुकारा । विरला जाय पुरुष दरबारा ॥
साखी - शब्दको खोज करें नहीं, चिन्ता देह शरीर ॥
बिना शब्द पहुँच नहीं, अस कथ कहैं कबीर ॥
बिना अहारी जीव है, बिना अग्नि बिन पान ।
बिना पिण्ड हंसा चलै, है छन कर पहचान ॥
चित्र हंस बिना पिण्डका, उदय सो देखो नाम ।
भेद जो दे गुरु समर्थ, तब देखो वह ठाम ॥
शब्द—धरमनि वहि देश हमारो बासा ।
अमर पुरुष जहाँ आप विराजै हंसा करत विलासा ॥
विष्णु विरञ्जि औ शिव सनकादिक थके ज्योतिके पासा ।
चौदह खण्ड वसै यम चौदह यह सब काल तमशा ॥
सात सुरतिके आगे समरथ श्वेत भूमि परकाशा ।
संशय लोक नहीं है बाकी खुले केवडा बारह मासा ॥
वहांके गये बहुरि नहिं आवे आवागमनको नाशा ।
सदा आनन्द होत है वा घर कबहू न होत उदासा ॥
चन्द्र न सूर दिवस नहिं रजनी नहिं धरणी आकाशा ।
अमृत भोजन हंसा पावे रहत पुरुष के पासा ॥
कहैं कबीर सुनो धरमदासा छाडो खलक की आशा ।
सत्यगुरु कबीर साहब कहते हैं कि, जो जीव पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग हो वही सत्यपुरुषके दरबार पहुँचता है । परन्तु जितने जीव सत्यगुरुके शरणमें आते हैं उन सब पर साहबकी दया होती है । उनको रहने को उत्तम स्थान दिये जाते हैं, जहाँ वे सुखपूर्वक निर्भयतासे रहते हैं, परन्तु पुरुषका दर्शन नहीं पाते । जो पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग होते हैं, वही त्रिगुणातीत लोग सत्यपुरुषके दर्शनके अधिकारी होते हैं । इसी कारण सत्यगुरुने कहा है कि, सत्यलोकमें अट्ठासी सहस्र द्वीप हैं, उन सब द्वीपोंमें हंसोंका स्थान होता है, जहाँ वे आनन्द पूर्वक रहते हैं । जो कोई उसमें कर्म करता है, वह सत्यगुरुकी दयासे पाँच तत्त्व तथा तीन गुणसे छूट जाता है । बिना पाँच तत्त्व तीन गुणसे छूटना अत्यन्त असम्भव है । युगों युगोंमें सत्यगुरुके हंस अपने कर्तव्योंसे सत्यपुरुषोंके लोकके मार्गका उपदेश देकर जीवोंको सत्यलोकके पथपर करते हैं । पीछे अपने कथनको चरितार्थ करते हुए अपनी चर्यासे सिद्ध करके दिखाते हैं कि, सत्यपुरुषके हंस ऐसे होते हैं, कलियुगके हंसोंने भी इस कराल युगमें सिद्ध करके दिखा दिया है कि, इस कराल युगका भी सत्य पुरुषके हंसोंपर कोई असर नहीं होता ।
उनका शास्त्र
कबीर साहिबकी स्वसंवेद वाणी है क्योंकि, उसमें परमार्थका निरूपण है यही वाणी सभी हंसोंके लिये नियत है स्वच्छ तथा निर्मूल है अनेक स्थानोंपर स्वसंवेदकी भिन्न २ पुस्तकें मिलती हैं सन्त महन्त उनके बड़ी सावधानीसे रक्षा करते हैं कि, उनमें किसी प्रकारका उलटफेर न हो जायें एवं जो मिथ्या पक्षपाती जनोंने अपनी ओरसे कुछ मिला दिया हो तो वो जाननेमें आजावे इस कारण पूरी चौकसी की जाती है। इतना करने पर भी छली लोग छलसे नहीं चूकते। इसी कारण कबीर साहब कुछ सताद्वियोंके पीछे अपनी पुस्तकोंको रद्दकर देते हैं। वर्तमान कालमें कबीर पन्थियोंके पास सत्ययुग, त्रेता, और द्वापर युगोंकी पुस्तकें नहीं हैं। उसका भी मुख्य कारण यही बात है गरीबदासजी अपने अर्जनाम में यही बहुत लिखते हैं कि—
है सतगुरु मेहवीन अविनत' कबीर । छुटे इस्मके 'नालजनम की जञ्जीर ॥
वाबन लाख वाणी जो दीनी डुबोय । सुने रामानन्दा रहे मुख गोय' ॥
अगम धन्य ध्यानं अमानं अमाँ । स्वसम्बेद साखी सुरती कर वयौ' ॥
स्वसम्बेद पढिये जो पूरन मुराद' । स्वसम् पर स्वसम्बाच लागी समाध ॥
है सत्यपुरुष साहब दयाके जो मूल' । गरीबदास झूले समाधान फूल ॥
किन्हीं २ छला कपटी, तथा विद्वोही गुरुविमुखियोंने स्वयं ग्रन्थबनाकर उसमें अपने मतलबकी सारी बातें रखदी हैं पर उनमें वक्ता कबीर साहब और श्रोता धर्मदासजीको ही लिखा है। सद्गुरुके हंस लोग तो उन छलियोंके छल को शीघ्रही पहचान लेते हैं, कितने एक सरल दृश्यके भोले भाले लोग उन ग्रन्थोंको पढ सुनकर भटक जाते हैं। इस प्रकार कालपुरुष तथा उसके पुत्रलोग बड़ा छल करके स्वच्छ अमृतको विषमय करनेका उद्योग करते हैं। परन्तु बुद्धिमान सचेत लोग तुरन्तही पहिचान लेते हैं स्पष्ट जान लेते हैं कि, जो कबीर साहबके प्राचीन ग्रन्थ तथा वाणी हैं उसके विरुद्ध यह बात कैसे हो सकती है। इस कारण स्वसंवेद पाठ करनेवालोंको सदा सावधान रहना चाहिये कि, जब सत्यगुरुके ग्रंथ तथा वाणीको पढे अथवा सुनें तो उसपर भली प्रकार शोध विचार किया करें। जहाँ कहीं कबीर साहबके वाणीके विरुद्ध पावें तो तुरन्त समझ लें कि, यहाँ तो काल के पुत्रोंमेंसे किसीकी कबीरके नामसे बनावट है कि, वो कितनेही कबीर पन्थी कबीर साहब तथा धर्मदासजीके नामसे धूर्तता करके कबीर पन्थियोंको भटकाया चाहते हैं वही यमके दूतोंकी धूर्तता है। कालके पुत्रोंने अनेक युक्तियाँ