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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

४ अ. कबीरजीका आत्मविकास । सिकन्दर लोधीका काशीमें आना, कबीर साहिबका वहां बुलावा जाना, उनके दर्शन बादशाहकी जलन दूर होना, सुलतानका उनपर विश्वास लाना

कबीर साहबके कमालीके मस्तकपर हाथ रखतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया । उसे आरंभसे अन्ततकका सार समयोंका वृत्तान्त प्रगट हो गया । उसकी जिह्वासे ज्ञानके फौव्वारे छूटने लगे । वो सब वृत्तान्तोंका विवरण करने लगी कन्नसे बाहर आतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया उस समय वह ये शब्द बोली कि —

हंसा निकल गया मैं न लडीसी ।

पाँच सहेली संग है मैली, पाँचोंसे मैं अकेली खडीसी

नौ दरवाजे बंदकरलीने, दशबीं मोरी खुली जो पडीसी ।

न मैं बोली न मैं चाली, औठ दोपट्टः किनारे खडीसी ॥

कहत कमाली कबीरकी बालकी, सादीसे मैं कुमारी भलीसी ॥

जी दुनियाँके फन्देसे निकल गया मैं लडी हुई नहीं हूँ, मनकी पाँच वृत्ति ही मैली सहेलियाँ हैं, इस कारण मैं उनके उद्देगको छोड कर उनसे अकेली खडीसी दीख रही हूँ मेरे शरीरके नौऊ दरवाजे समाधि लगानेके लिये बन्द करलेने पर भी दशम द्वार मेरे लिये खुलासा पडा है जब चाहूँ जब उससे शून्य शिखरमें आसन लगालूँ । उस अवस्थामें मेरे संसारके व्यवहार बन्द हो जाते हैं मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर दुनियाँके किनारे खडीसी लगती हूँ ।

इसी प्रकार धर्मदास साहबकी स्त्रीका नाम माई अमीन था । उसके शिर पर कबीर साहबने हाथ रक्खा जिससे उसकी जिह्वासे ज्ञानलोत बहने लगा । एवं वह भी सब वृत्तान्त कहने लगी कि —

साधो नाम सभन से न्यारा लखि पुरन गुप्त विसतारा ।

जानेगा कोई जाननहारा ॥

जब नहिं अंशवंश निर्मायो, नहिं कुछ किया पसारा ।

चर और अचर चार चर नाहीं, नहिं मनको विसतारा ॥

जब नहिं पुरुष नहीं तब ज्ञान, यह मन सबसे न्यारा ।

जब नहिं पाँच अमी निर्माया, नहिं सोहँग विस्तारा ॥

धर ओ अधरधार धर नाहीं, नहीं पुरुषकी काया ।

तब नहिं कूरम नहिं जलरंगी, नहिं तब जलकी छाया ॥

फुप दीपलीला दहजा हैं, नहिं अदली औतारा ।

करमन कहै सुनो धर्मदासा, यह मत सब से न्यारा ॥

जब अंश और वंश नहीं बनाया न कुछ संसारकी रचना ही की थी । स्थावर

जंगम जड़ चेतन कुछ नहीं था, न मानसिक ही कल्पनाएँ थीं। न अक्षर निरंजन या न ज्ञानी ही थे। हमारा यह विचार सबसे निराला है क्योंकि दूसरे उस समय भी कुछ मानते हैं। न देशसे हंगकाही विस्तार था एवं न पांच अमरही बनाये थे। जमीन आसमान और पुरुषका प्रतिबिम्ब जीव भी नहीं था। न कूर्मजी जल-रंगजी और जलकी छायाही थी। फुप दीपलीलाके दहजेमें न कोई अदल करने वाला औतार था। करमन कहती है कि, ए धर्मदास ! यह मत सबसे भिन्न है। इसी प्रकार राजा चन्द्रविजयकी इन्द्रमती, राजा रावणकी मन्दोदरी, राजा वीरसिंहकी माणिकवती, राजा योगधरकी लीलावती पुरंती आदि पचासों स्त्रियाँ राजा अमरसिंहकी रानी, राजा उदयपुरकी रानी। मीराबाई, क्षेमश्रीगवालिन तथा और भी अनगिनत स्त्रियाँ जिनके कि, शिरपर कबीर साहबने हाथ रक्खा व सब हंसस्वरूप होकर परमधामको चली गई। तथा सिधार जायँगी। उन बातोंके लिखनेकी सामर्थ्य मेरी लेखनीमें नहीं है। न किसी मनुष्य तथा देवताओंमें ही लिखने और कहने सुननेकी सामर्थ्य है। कबीर साहबकी लीलाएँ कबीर साहबही जानें या उसके परम भवतगणही जान सकते हैं।

गजल ।

यह लिखना माजिजातका यह भी अबस हुवा ।
और कहना इस सिफ़ातका यह भी अबस हुवा ॥
नाकारः नतिकिः न कहा जाय उससे कुछ ।
फिर कहना पाकज तका यह भी अबस हुवा ॥
दिनमें सके न देख जिसे दूरबीनसे ।
फिर दीद उसका रातको यह भी अबस हुवा ।
जिस बन्दगान कुदरतसे है बन्दः बेखबर ।
क्या लिखना उह बरातका यह भी अवस हुवा ॥
वह खालिके जहाँ है जो चाहे करे सोई ।
फिर जिक्र वारदात का यह भी अवस हुवा ॥
नाम और निशों मकौ है न जिसका कोई कहीं ।
बतलाना उस समातका यह भी अबस हुवा ॥
मौजिब कोई न जान कभी जिसका आजतक ।
जोयन्दः मोजिबातका यह भी अवस हुवा ॥
आजिज न पाया भेद है जो यारिफां जमौ ।
फिर करना उसकी बातका यह भी अवस हुवा ।