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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

अम्र ब्रह्म, दृष्टान्त

हुई है । हुजूरशाहजीने धूलीशाहके कब्रको जाकर देखा सलाम करके चले आये । इसी प्रकार सहलों साधू फकीर प्रगटमें तो मर गये हैं पर दूसरी जगह फिर प्रगट होकर फिरा करते हैं । यह सारा संसार बाजीगरका कौतुक है । उदाहरण लिखता हूँ ।

एक दिन ये ही हुजूरशाह साहब कहने लगे कि, गरमीका समय था । कड़ाकेकी धूप पड़ रही थी, दोपहर होने आया था, उस समय एक अघोरी मेरे पास आया । अभ्यागतोंको सम्मान देना सबको उचित है पर उस समय पास खानेका पदार्थ कुछ नहीं था । मेरे हृदयकी बातको अघोरी समझ गया और कहींसे कुछ गुड़ लाया, वह गीला होनेके कारण उसमें बहुतसी मक्खियाँ चिपटकर मर गईं थीं, जिसको देखकर मुझे बहुत घृणा हुई पर मक्खियोंके साथही उसने गुड़ भी घोल कर पी लिया । मक्खियें साथ पी लेनेके बाद वह हुक्का पीने लगा । तम्बाकू पीते पीते धूँवाँ निकालता तो दो चार मक्खियाँ मुखसे निकल कर हवामें उड़ने लग जातीं, इसी प्रकार सब मक्खियोंको उसने धूँवाँकी राहसे बाहर निकाल दिया ।

इसी प्रकार काल निरञ्जन समस्त संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश किया करता है । अघोरी लोग निरञ्जनके मुख्य सेवकोंमें हैं, जब इनका साधन पूर्णताको पहुँचता है तब ये काल निरञ्जनसे मिलकर उसीके रूप हो जाते हैं ।

राजा लवण ।

उत्तरीय भारतके प्रसिद्ध महाराजा हरिश्चन्द्रके वंशमें लवण नामक एक राजा हुआ था । वह सर्वाङ्ग सुन्दर, विद्या, कला कोशलमें पूर्ण, राजकीय कार्योंमें निपुण, सदाचारी, न्यायी, शत्रुओंपर दया भी करने वाला, सेवकोंपर पुत्रके समान दृष्टि रखनेवाला, समानके राजाओंसे द्वेष रहित प्रीति करनेवाला और छोटे तथा पड़ोसके राजाओंकी रक्षा करनेवाला था, सब देशके वणिज लोग स्वतन्त्रता पूर्वक उसके राज्यमें वाणिज्य किया करते थे ।

एक दिन राजा सिंहासनपर बैठा दरबार कर रहा था कि, एक बाजीगर आया, यथायोग्य नमस्कार करके कहने लगा कि, मैं कामरूपदेशसे आया हूँ, बंगालेकी जादूगरी सीखा हूँ, विचित्र खेल दिखला सकता हूँ, यदि आज्ञा है तो कुछ कौतुक दिखलाऊँ । राजाकी आज्ञा पाकर तमाशा दिखलाने लगा । हाथमें एक मुछल लिया, उसको इधर उधर हिलाकर आकाशकी ओर फेंक दिया । वो आकाशमेंही लोप हो गया । बहुत देर न हुई थी कि, सिन्धदेशका एक दूत एक घोड़ा लिये हुये आया कहने लगा कि, यह घोड़ा समुद्रसे निकला

है, मेरे राजाने यह आपके लिये भेंट भेजी है। राजाने दूतको यथायोग्य प्रतिष्ठा दी। राजाने उसे आनन्द पूर्वक स्वीकार कर ली। बाजीगरने कहा कि, महाराज ! इस घोड़ेपर सवार हूँजिये, इसका तमाशा देखिये। राजाने उस घोड़ेकी ओर दृष्टि की। दृष्टि करतेही राजाकी टकटकी बँध गई ऐसा चुप बैठ गया मानों सक्तासी आ गई है। राजाकी यह दशा देखकर सब दरबारी लोग आश्चर्यमें थे, राजाके शरीरको निर्जीव अनुमान करने लगे थे। इस अवस्थामें दो घड़ी रहनेके बाद चैतन्य हुआ, सब लोगोंकी जानमें जान आई। राजाने कहा कि, जिस समय बाजीगरने अपना मूर्छल हिलाया था घोड़ा आजानेपर जैसेही बाजीगरने उसपर चढ़नेको कहा वैसेही मैंने अपनेको उस घोड़ेपर सवार हुए घोर वनमें शिकार खेलते हुये पाया था। वहांसे चलते चलते एक ऐसे वनमें पहुँचा जहां किसी भी जीवधारीका पता नहीं था। आगे चलकर एक ऐसे भँदानमें पहुँचा जहां कि, वृक्ष तो क्या ? घास भी नहीं देख पड़ती थी, दिनभर उसीमें फिरता रहा, रात हुई तो उससे बाहर हुआ। बाहर होना क्या था ? एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा। उस जङ्गलमें नानाप्रकारके जीवधारी इधरसे उधर फिर रहे थे, जगह जगह मीठे पानीके तालाब भरे हुये थे, नानाप्रकारके सुन्दर और फलदार वृक्ष स्थान स्थान पर खड़े थे। मैंने वृक्षकी डाली पकड़ ली वृक्षपर चढ़ गया। घोड़ा भी उसी जङ्गलमें चरता रहा। वह रात मुझे कल्प समान बीती। क्योंकि, दिनभरका थका हुआ भूखा, प्यासा, ऐसे अपरिचित वनमें पड़ा हुआ था। सबेरा होनेपर मार्गको ढूँढ़नेके लिये इधर उधर भटकते भटकते एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा, उसमें बड़े वृक्ष तथा जलका अभाव था, पर कुछ दूर आगे चलनेपर एक लड़की, हशियाँ काली, जैसी भँसकीसी मोटी और शूकरकीसी मैली, अपने हाथमें भोजन लिये हुये जल्दी जल्दी कहींको जाती देख पड़ी। मैं कई दिनका भूखा था, धैर्य न रख सका, उसीसे कहा कि, पर उपकार करना सर्वोत्तम गुण है, किसी भूखेको तृप्त करादेनाही पुण्य है, मैं कई दिनोंका भूखा हूँ, तू अपने भोजनमेंसे थोड़ा मुँ भी देदे। बहुत प्रकारसे बिनती करनेपर कठोर हृदयाने मेरी कुछ भी न सुनी, वरन् भयानक होकर कहने लगी कि, मैं भड़्गिनकी लड़की हूँ, इस वनमें मेरा पिता खेतका काम कर रहा है, उसीके लिये भोजन लिये जाती हूँ, इसमेंसे मैं तुझको नहीं दे सकती। हाँ ! उस दशामें कि, तू मुझसे विवाह करना स्वीकार कर ले तो आधा तुझको दे दूँ, क्योंकि, पति पितासे भी अधिक प्यारा होता है। राजाने कहा कि, आवश्यकतामें प्रतिष्ठा और पवित्रताका ध्यान नहीं रहता, आवश्यकता मनुष्यको किस घाटका पानी नहीं पिलाती