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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कलियुगमें शानीजीका पृथ्वीपर सत्य कबीर, सैयद अहमद कबीर व शेख कबीर, जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे पृथ्वीपर प्रगट होकर मनुष्योंके उद्धार करनेका वृत्तान्त, उत्थानिकां श्वपंचको सुदर्शन चेताना कलियुगका प्रमाण

और नाईसे कहा कि, इन पाँचोंमेंसे जिसको चाहे तू काट ले । यह व्यवस्था देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया और आपका खुतनः नहीं हुआ ।

तेतालीसवाँ प्रकरण ।

कुरबानी ।

एकबार आप छोटे छोटे बच्चोंके साथ खेल रहे थे, उस समय काजीने गायकी कुरबानीका प्रबंध किया—जिस समय गऊको जबह करने लगे । उस समय कबीर साहबने, जो बालकोंके साथ खेल रहे थे जान लिया कि, काछी गौके जबह करनेको तय्यार हैं—तब आप तुरन्त बालकोंके साथका खेलना छोड़कर गौकी ओर दौड़े । जब तक, आप गायके समीप पहुँचे तबतक तो काजीने गऊको समाप्त कर दिया । कबीर उसाहब आकर उस काजीको अनेक उपदेश देके अत्यन्त धिक्कारा और लज्जित किया तब यह काजी लजाकर अपने अपराधके निमित्त क्षमाका प्रार्थी हुआ । फिर आपने उस गऊको जीवित कर दिया और आप अन्तर्धान होगये । प्रमाण बृहंतकबीरकसौटी—

कबीर साहबकी सुन्नतका । (बृ. क. कसौटी)

एक तो नीरूके घर सिद्ध बालकको देखकर उसकी प्रसिद्धीसे लोग जलते थे । दूसरेही मांसाहारी मुसलमानोंके विरुद्ध नीरूने सदाके लिये मत्स्य-मांसको अपने घरमें न लानेकी प्रतिज्ञा करली थी । इससे मूर्ख मुसलमानोंने उसे अपने धर्मसे भ्रष्ट होते समझकर उसे सुधारनेकी फिक्र करना आरम्भ किया—

काशीके जोहलन मिली, आनि कियो परपंच ।

सबै कहैं नीरू तुम, क्या बैठे निश्चिन्त ? ॥

बेटेकी तुम सुन्नति कराओ । पंचोंका तुम हाथ धुलाओ ॥

काछी मुलनाको बुलवाओ । गैनी^१^ और शराब मँगाओ ॥

इस प्रकारकी उनकी बात सुनकर नीरूने कानपर हाथ रखकर कहा—

नीरू कहै सुन्नति करवाओं । पै नहिं गैनी गला कटाओं ॥

तब उसके जाति विरादरीबालोंने उससे क्रोध करके कहा—

जोलहा सब तब कहैं रिसाई । क्या नीरू तुम अकिल गवाईं ॥

अपने कुलकी रीति न छाड़ो । कुल परिवार करिहैं सब भांडो ॥

गैनी बिना कैसे बनै, मुसलमानकी रीति ।

पीर पैगम्बर रुठिहैं खता खाहुगें मीत ॥

बह सुनकर नीरूने कहा—

नीरू कहै सुनौ रे भाई ! ऐसो करौं तो पूत गवौई ॥

एक बार घर आमिष आना । तेहि कारन सुत भया बिगाना ॥

क्या रुठे क्या खुशी हो, पीर पैगम्बर झारि ।

गौघात में ना करौं, नीरू कहै पुकारि ॥

कबीर साहबके अन्तर्धान हो जानेकी बात तो प्रथमसे ही सबपर जाहिर होगयी थी, इसलिये सब विद्वेषियों और पक्षपातियोंने मिलकर नीरूको बहकाकर उसके द्वारा गोहत्या कराना चाहा, जिससे कबीर साहब नीरूके घरसे रुष्ट होकर चले जावें; तब नीरूकी नामवरी भी जाती रहे और काजी मुलना जो कबीर साहबको अपने धर्मका निकन्दन करनेवाला समझते थे, उनका कांटा भी निकल जावे। किन्तु जब सब जुलाहों तथा काजी मुलनाओंने देखा कि, नीरू तो फन्देमें नहीं आता तब वे एक चाल चले और छलसे कहा—

जोलहन मिली छलसे कह्यो, और करू सब साज ।

नीरू तुमरे कारने, गैनी आयउ बाज ॥

उन लोगोंने अपने मनमें विचार किया कि, नीरूके अनजानमें गाय जबह करेंगे जिसको देखकर कबीर नीरूका घर त्याग देगा। उधर नीरू तो सुन्नतका सामान इकट्ठा करने लगा और इधर मुल्ला काजियोंके साथ मिलकर उसके जाति बिरादरीवालोंने, एक गाय मँगाकर चुपचाप जबह करनेका निश्चय किया। नीरू इस काण्डसे एकदम अजान रहा।

उधर सब सामान दुरस्त हो जानेपर जब नाई छुरा लेकर कबीर साहबका सुन्नत करने गया तब कबीर साहबने लंगूटी खोलकर नाईको पाँच लिंग दिखलाकर कहा, इसमेंसे तेरी जो इच्छा हो सो काट ले। यह आश्चर्य देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया। किन्तु जुलाहों तथा काजीसहित अन्य मुसलमानोंने, अवसर पाकर उसी समय जब नाई कबीर साहबका सुन्नत करने गया, गायको जबह कर दिया। यद्यपि उन दुष्टोंके इस गुप्त काण्डको किसी दूसरेने नहीं जाना, परन्तु अन्तर्यामी सर्वज्ञ कबीर साहबने इस बातको जान लिया। नाईके भाग जानेपर आप बच्चोंके साथ खेलने चले गये थे, सो खेल छोड़ कर वहाँसे दौड़े और गोहत्याके स्थानपर पहुँचकर काजीसे कहा—

हो काजी यह किन फरमाये, किनके मता तुम छुरी चलाये ॥

जिसका छीर जु पीजिये, तिसको कहिये माय ।
तिसपर छुरी चलायऊ, किन यह दिया दिढाय ॥

तब काजीने उत्तर दिया—

सुन कबीर वडन सो, होत आइ यह बात ।
गौस कुतुब औ औलिया, हजरत नबी जमात ॥

यह सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया, हे क्राजी ! और मुल्ला तथा सब मुसलमानो ! तुम किस भूलमें पड़े हो ! जरा विचार तो करो, तुम्हारा दीन थोड़े दिनोंसे चला है, जिसमें तुम इतना जोर जुल्म करके नाना प्रकारसे जीवोंको सतानेमें धर्म मानते हो; तुम गफलतमें पडकर असल मार्गसे भटक कर नर्कका मार्ग क्यों साफ कर रहो हो !

सुनो जब—

आदम आदि सुधि नहि पायी । मामा हौब्बा कहैंते आयी ॥

तब नहि होते तुरुख औ हिन्दू । मायको रुधिर पिताको बिन्दू ॥

तब नहि होते गाय कसाई । तब विसमिल किन फरमायी ॥

तब नहि रहो कुछ औ जाती । दोज्रख विहिश्त कहाँ उत्पाती ॥

मन मसलेकी खबर न जाने । मति भुलान दो दीन बखाने ॥

संजोगेकर गुण रवे, बिन जोगे गुन जाय ।

जिह्वा स्वादके करने, कीन्हे बहुत उपाय ॥

कबीर साहबकी बातको सुनकर पक्षपातसे अन्धे हुए क्राजी और मुल्ला मारे क्रोधके थरथर कांपने और कहने लगे कि, नीरूका यह लड़का महा काफिर हो गया, नबी पैगम्बर पीर औलिया सबको यह तुच्छ समझता है, आपही बड़ा ज्ञानी बनकर आया है ! और वे सब अज्ञानी थे । उनके क्रोधको देखकर नीमा और नीरू तो डरसे बहुत घबराने लगे । किन्तु कबीर साहब निभंय होकर विनय-पूर्वक क्राजीसे पूछने लगे—

केहि कारण तुम इहवां आये । यहि जगह किन तुमहि बुलाये ॥

काजीने कहा—

जोलाहन मोहि बुलायऊ, तोहरे सुन्नत काज ।

अब तुम मुसलिम होयके, रोजा करहु निमाज ॥

कलमा पढ़ौ नबीका, छोड़हु कुफुरकी बात ।

तब तुम बिहश्तहि जाहुगे बैठहु नवी जमात ॥

इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—