कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अजमेघ, बलि प्रदानकी रीति
हिंसाबका ध्यान मूसलमान लोग किया करते हैं। इस बातपर मैं एक उदाहरण देता हूँ :—
उदाहरण :—एक नगरमें कोई बड़ा बादशाह अथवा साहूकार हो, इस बादशाहकी समस्त प्रजा जो नगरमें बसती हो सब ऋषि हो, उन नगरवासियोंमेंसे कुछ एक नगरको छोड़कर किसी दूसरे स्थानको जावे अथवा भाग जाना चाहे तो उस नगरका राजा उन भगोड़ोंका हिंसाब उसी समय लेगा या जब समस्त नगर भाग जावेगा तब लेखा लेगा। निस्संदेह वह राजा उनको कदापि न जाने देगा, जबलों उनका पूरा हिंसाब न कर ले. अतः प्रत्येक दिवस तथा प्रत्येक क्षण प्रलय और महाप्रलय होता रहता है। जो लोग इस बातको नहीं मानते और सदैव आवागमनका सिलसिला नहीं समझते तो जो कुछ उनका विश्वास और ध्यान है, उसीके अनुसार उनका हिंसाब होगा। जैसा कुछ उनका ध्यान है इसीके अनुसार उनको दिखाई देगा। पर सत्य किसीके बशका नहीं है।
यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या झूठ एवं व्यर्थके बाँधनू हैं पिण्ड ब्रह्माण्डके समस्त पदार्थ झूठे हैं जो साम न पिण्ड और ब्रह्माण्डमें हैं वे सब बाँधनूमात्र हैं। बेजड़के तथा अस्थायी हैं, जिसने गुरु तथा पीर पिण्ड ब्रह्माण्डके भीतर खेल रहे हैं वे दूसरोंको खेला रहे हैं। समस्त कौतुक जलका बताशा है उसकी कोई जड़ तथा स्थिरता नहीं। समस्त खेल कौतुक जादूगरीका है। निरञ्जनकी जादूगरीमें समस्त ऋषि मुनि पड़े डुबुकियों लगा रहे हैं। जबतक अपने प्राकृतिक स्वरूपका ज्ञान न होगा तबतक समस्त जीवोंकी यही दशा रहेगी। ज्ञान केवल पारख गुरुद्वारा प्राप्त होवेगा दूसरेसे नहीं।
ब्रह्माण्ड पागलखाना है।
इस ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंहीका एक स्वरूप है। कुछ विभिन्नता नहीं। एक घेराव अण्डाकार है दूसरा घेराव उससे छोटा अण्डाकार है। कभी तो पिण्ड ब्रह्माण्ड बन जाता है। कभी ब्रह्माण्ड पिण्ड बन जाता है। जब इस पिण्डमें वह विद्या होती है तो यह ब्रह्माण्ड बन जाता है। जब इसकी विद्या जाती रहती है तब फिर यह पिण्ड हो जाता है। जब इसका ज्ञान न्यून हो जाता है तब इस ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टि जीवको अपना सर्जनकर्ता मानने लगता है। इस जीवको इस ब्रह्माण्डके भीतर सैकड़ों प्रकारके सैर और कौतुक दिखाई देते हैं जितने जीव इस ब्रह्माण्डके भीतर बंद हैं वे सबके सब बँधे हुए तथा पूरे पशु हैं। इनमें तनिक भी मनुष्यता नहीं है। जिनको मनुष्यताका ज्ञान हुआ वे ब्रह्माण्डके पार चले जाते
हैं, फिर वे बंधुवे नहीं रह सकते । जितने गुरु तथा चले इस ब्रह्माण्डके भीतर रहनेवाले हैं वे सब अपने असलसे अनभिज्ञ हैं, वे अनजान अनजानोंसे सूचना देते हैं । जो अंधे अंधोंको पथ दिखलाते हैं वे दोनों कुएँमें गिर पड़ते हैं । गुरु और चले दोनोंमें से एकको भी सुध नहीं कि, वास्तवमें बात क्या है ? यह ब्रह्माण्ड पागलों का घर है । पागलोंका काम पागलोंसे पड़ रहा है । भौति भौति के कौतुक हो रहे हैं । पागलपनकी अवस्थामें सहस्रों प्रकारके कौतुक तथा पाप पुण्य सभी कुछ कर रहा है । इनसे नितान्तही अनभिज्ञ है कि, भलाई बुराई तथा नरक वैकुण्ठ क्या वस्तु है ? जो कुछ मैं मान रहा हूँ सो क्या है ? यह अपनी अवस्थाको बिलकुल जान नहीं सकता । न चिन्ता तथा सोच करता है । न समझता है न सच्चे गुरुका उपदेश स्वीकार करता है अपने अज्ञानमें अपनेको ज्ञानी जानता है । अपनी दुर्बुद्धितापर तनिक भी ध्यान नहीं देता । जैसे मनुष्य अपना मुंह अपनी आँखोंसे देख नहीं सकता है । इस कारण दर्पण जब सामने रखता है तब अपना मुंह देखता है । वह मूर्ख है जो बिना दर्पणके अपना मुंह देखना चाहता है । इसी प्रकार यह मनुष्य अपने यथार्थ स्वरूपको देखने जाननेके निमित्त सदैव सत्य-गुरुके अधीन है । कारण यह कि, ब्रह्माण्ड पागलखानेके सदृश है । समस्त जीव इसमें जन्म भरके लिये बंधनमें पड़े हैं । जबलों उनको ज्ञान न हो जावेगा तब लों वे उसीमें पड़े रहेंगे । जब उसका ज्ञान ठिकाने आवे यह आपको तथा अपने मित्रोंको भली भाँति पहचाने सच्चे वैद्यकी कसौटीमें पक्का उतरे तब यह इस पागलखानेसे बहिर्गत किया जावे उसका एक उदाहरण मैं देता हूँ—
उदाहरणः—सन् १८४४ ईस्वीमें मैं काशी नगरीमें था काशीका पागल-खाना नगरसे बाहर बहुत दूर बना हुआ था । एक दिवस मैं उस पागलखानेके देखनेको गया जब उसके घिरावके भीतर गया तो बहुतसे पागल दिखलाई दिए । वे सब भौति भौतिके कौतुक कर रहे थे । कोई गाता, कोई नाचता, कोई हँसता, कोई रोता, कोई भूमिपर लिखता, कोई मुहँपर कालिखमल कर हँसता तो हँसताही जाता । रोता तो रोताही जाता । अनेक प्रकारके कौतुक हो रहे थे, मैं कहौतक लिखूँ ! कोई बकता है तो बकताही जाता है । कोई आनकर मुझसे बुद्धिमानीकी बातें करता है किसीमें थोड़ा पागलपना है किसीमें अधिक । अनेक प्रकारके पागलपनोंके ढङ्ग दिखाई दिए कैसे रङ्ग मैं देखता फिरा । वहाँपर एक राजाका पुत्र मुझको दिखाई दिया जो पूर्वकालमें मेरा परिचयी था । वह एक बड़े सुधर मकानमें था । उसके चारोंओर नौकर चाकर फिरते थे । जब मैं उसके पास गया तो वह बुद्धिमानी बातें करने लगा । मेरे