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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

चौथी पुस्तक कुरान अल्लोपनिषद् कुरानका सूक्ष्मसार

थाली लोटाको जूँठा पाकर बडाही क्रुद्ध हुआ । मीरमाधवको मार कूटकर थाली लोठा ले आया । जब स्नान करके ठाकुर पूजने गया मन्दिर द्वार खोला तो देखा कि, ठाकुरोंकी बुरी दशा है । मूर्तिपर धूल पडी है कपडे फटे हैं । बडे दुःखमय आकारमें दिखाई दी । यह अवस्था देखकर पुजारी बडा चिन्तित हुआ । इसी सोचमें पुजारी जब रातको सो गया तब ठाकुरने स्वप्नमें कहा कि, मीरमाधवको जो तुमने मारा सो समस्त मार मुझपर पडी । मीरमाधवसे मुझमें तनिक भेद न समझो । प्रातःकाल होतेही वह पुजारी मीरमाधवके चरणोंपर गिरकर अपने अपराधको क्षमा कराया ।

मिरजा खुशदिलका भी ऐसाही वृत्तान्त है भक्तमालमें देखो ।

नरसीभक्त मग्न होकर ठाकुरके सामने नाच रहे थे । उनकी स्त्री भी नाचने लगी । पुत्री भी नाचने लगी । इन तीनोंको प्रेममें नाचते देखकर मूर्तिमेंसे कृष्णजी भी निकलकर उनके साथ नाचने लगे । नरसीकी कामना पूर्ण हुई ।

पीपाजी द्वारकाको गए । उनकी स्त्री साथ थी, लोगोंसे पूछा, पहली द्वारका कहाँ है ? तब डोंगोपर चढ़ाकर मल्लाह ले गया । जहाँ पहली द्वारका समुद्रमें डूब गई थी वह स्थान दिखलाया । देखतेही पीपाने समुद्रमें बुडकी मारी । पीपाके कूदतेही पीपाकी स्त्री भी समुद्रमें कूद पडी । जब वे दोनों जलके गर्भमें चले गए तब उनको वहाँ असली द्वारका दिखाई दी । कृष्णचन्द्रने अपने एक हाथपर पीपा और दूसरे हाथपर सीताको लेकर कुछ दिवसोंपर्यन्त अपने पास रक्खा । फिर कहा कि, अब तुम पृथ्वीपर जाओ । यद्यपि पीपाने बहुत कहा कि, अब मैं जाना नहीं चाहता पर कृष्णजीने कहा कि, तुम निश्चय जाओ । पीछे छाप देकर कृष्णजीने पीपाको बिदा किया । पीपा भक्तकी छाप आज भी द्वारिकामें प्रसिद्ध है ।

एक वेश्या वैरागियोंके उपदेशसे ठाकुरसेवामें लगी । उसने बडे प्रेम सहित कई सहस्र रुपया लगाकर एक मुकुट बनवाया । वह मुकुट लेकर ठाकुरके शीशपर धरना चाहा, पर ठाकुरकी मूर्ति बहुत ऊँची थी । उसका हाथ वहाँलों नहीं पहुँचा । तब ठाकुरकी मूर्तिने अपना शिर झुका दिया । उस कुँजडीने ठाकुरके शीशपर मुकुट रख दिया । सुनते हैं कि उस मूर्तिके शिर अभीतक झुका हुआ है ।

नामदेव और धन्ना भक्तको मूर्तिमेंसे ठाकुर प्रगट हो गए और बिटठल देवको कुत्तेमेंसे प्रकट हो दर्शन दिये ।

तुलसीदासजी वृन्दावन गए तब राधेकृष्णको दण्डवत् प्रणाम नहीं किया ।

कहा कि, यदि यह सीतारामकी मूर्ति हो तो मैं दंडवत् करूँ । तुलसीदासके देखतेही देखते वह राधेकृष्णकी मूर्ति सीता रामकी हो गई । तुलसीदासजीका—

दोहा—कह वारणो छवि आज का, भले वने हो नाथ ।

तुलसी मस्तक तव नवे, धरो धनुष शर हाथ ॥

कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपिनको साथ ।

तुलसी जिनके कारणें, नाथ भये रघुनाथ ॥

सैन भक्तके निमित्त ठाकुरने नाऊ बनकर राजाकी सेवा की । ऐसे सहस्रों उदाहरण हैं ।

संन्यासी विष्णु और शिव दोनोंको एक स्वरूप जानते हैं । विष्णुकाञ्ची और शिवकाञ्चीका विवरण है कि, विष्णुकाञ्ची जो आचारी हैं वे शिवका दर्शन नहीं करते । एक दिवस एक संन्यासी विष्णुकाञ्चीमें जाकर विष्णुकी मूर्तिके सामने शिवस्तुति करने लगा । तब उस विष्णुमूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकल पड़ा । जब वह संन्यासी मन्दिरके बाहर निकल गया तब लोगोंने देखा कि, ठाकुरकी मूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकला हुआ है । तब आचारियोंने कोलाहल मचाया कि, यह क्या हुआ ठाकुरके शिरमेंसे शिवलिङ्ग निकल पड़ा । इस संन्यासीको दृढ़कर ले आये और बहुत कुछ प्रार्थना की कि, इस बुराईको विलोपित करो । तब उस संन्यासीने विष्णुके सामने दंडायमान होकर विष्णुकी बड़ी स्तुति की तो शिवलिङ्ग विलोपित हो गया । केवल विष्णुमूर्ति रह गई ।

एक प्रामाणिक पुरुष द्वारा प्रगट हुआ है कि, अम्बाला प्रांतके शाहाबादमें कितने मन्दिर और कितने समाधालय दिखाई दिये—वहाँपर किसी श्रेष्ठ पुरुषकी क़ब्र थी । उस क़ब्रपर शिवलिङ्ग था । मुसलमानलोग उस लिङ्गको भङ्ग करने लगे । तब उस शिवलिङ्गसे ऐसी रक्तधारा प्रवाहित हुई कि, समस्त मनुष्य भयभीत हुए । उन लोगोंकी इच्छा हुई कि, उस लिङ्गको खोदकर फेंक दें । तब उन लोगोंने सौ गजपर्यंत खोदा, पर उस लिङ्गकी हद नहीं मिली । तब विवश होकर उसको छोड दिया । अब हिन्दूलोग उसको पूजते हैं ।

सन् १८५५ ई० की यह बात है और यह आश्चर्यमय व्यापार देखकर सबलोग चकित रह गए ।

सन् १८१० ई० में सहारनपुर जिलेके अन्तर्गत पठानपुरामें एक आलयसे शिवलिङ्ग निकला । वह आलय मुसलमानका था । मुसलमानलोग वैसे उसपर भ्रष्ट जल डालते । उन लोगोंने सौ हाथपर्यन्त खोदा । उसको मकानसे