कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सदगुरुको प्राप्त हो
सामा न सरे देखिये इस अहद हमारे ॥
सब फितनः भरे देखिये इस अहद हमारे ॥
कोई न सुने पन्द न पहचान न देखे ॥
अन्धे भरे देखिये इस अहद हमारे ॥
इल्म व अमल सब है अबस बाद फरोशी ।
गोया घरे देखिये इस अहद हमारे ॥
है कौन गुरु और कहाँ धर्म खुदा है ।
कोई न डरे देखिये इस अहद हमारे ॥
नेकीसे भगे सारे है बेपार बदीका ।
जब सबको घरे देखिये इस अहद हमारे ॥
इस अहदके आदमके अमल पर जो नजर कर ।
कोई न तरे देखिये इस अहद हमारे ॥
आई जो खिजा बाद गुलिस्तां में सब गुल ।
पजमुर्दा पड़े देखिये इस अहद हमारे ॥
जब आकर अन्न तेरी बारिशो वारा ।
सूखे लहर देखिये इस अहद हमारे ॥
आजिजको बशारत हैं यह सतगुरु शब्दसाख ।
सब खुशक हरे देखिये इस अहद हमारे ॥
मुखम्मस ।
जुज मिहर तुम्हारी कहीं आराम न होवे ।
इस दार फना नेक सरन्जाम न होवे ॥
तदबीर व तकदीरसे कुछ काम न होवे ।
निस जायमें इकता वह गुलन्दाम न होवे ॥
दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ।
जब किशवरे हस्तीसे चले हंस अदमको ।
किस शान व शौकतसे लिये शब्द अमलको ॥
तत्र ब्रह्म विचारा फिर जा चूम कदमको ।
बाजारमें आकरके जो पहचान सनमको ॥
फिर आशिके सौदा यह कभी खाम न होवे ।
बहदत है तुझे और नहीं कोई है सानी ।
सब ओर भ्रम लावूत इस देर दुखानी ॥
गह खुशम गहें सब्ज गहे सुबक गिरानी ।
वे वर्ग सपर बाम चले बाद खिजानी ॥
पुर खार वह गुल्शन जहाँ गुलफाम न होवे ।
गल्तान सदहा विसमिले नखचीरमें देखे ।
मुरगां बकफस जेरके जंजीरमें देखे ॥
जर्ब जखम व कारी इसतीरमें देखे ।
तासीर अजब जालिमें रहगारमें देखे ॥
वह राह था मुझको जहाँ दाम न होवे ।
ऐ मेरे खिजर हाथ पकड़ आन हमारा ।
जुज्ज तेरे करम फ़ज़ल नहीं हमको सहारा ॥
है तेरी पनह आजिजे मिसकीं विचारा ।
दिन गुजर गया यों है न कुछ काम सिधारा ॥
रख अपना दिखा जल्दतर शाम न होवे ।
अब्र नसियां करम तेरे असर है कि नहीं ॥
सदफे बहर तेरे कोई गोहर है कि नहीं ॥
वागबां बागमें ऊल्फत का शजर है कि नहीं ॥
कोई नखले मुहब्बतमें समर है कि नहीं ॥
मन मिसकीं की तरफ तेरी नजर है कि नहीं ॥
ढूँढे मुल्क आदम और जिन्नो परी ॥
तुझ विन नहीं चैन सद आफात भरी ॥
शबे फुरकत न कटी हाय कटी उम्र मेरी ॥
वस्लकी रातकी हैहात न तू बात करी ॥
इस सबे हिज्जका आखिरको तो संहर है कि नहीं ॥
गौवास जो सद गोतः लगातेही मुआ ।
मुहरा हाथ लगा और न कुछ काम हुआ ॥
जब बहर करम लुफ़ तेरा मौजमें आया ।
बैठेही साहिल पर न सो न अम इनआम दिया ॥
दिल रियामें तेरे कोई लहर है कि नहीं ।
ऐबख्त बख्वाब होवे बेदार कभी ॥
मुझ गुनहगारको हो यार की दीदार कभी ॥
ऐ परदः नशी राज कर अफशार कभी ॥
निगह नेक होवे सोई गिरफ्तार कभी ॥
इस बन्देपर अगर्लासी मिहर है कि नहीं ॥
दर पैसे सफर मुझको वफाकेश जता ॥
शाफी मेरे हामी मेरे कर इल्म अता ॥
मुजरिम हूँ तेरा गरक गुनहगार खता ॥
ऐ चश्मये फँज व रहमत मुझको बता ॥
आजिजका तेरी राहमें गुजर है कि नहीं ॥
तरजीब बन्द ।
जबान मेरी बयान नुत्क असर दे । बदीद जाहिर व वातिन बसर दे ॥
न भूलूँ एक पल तुझे रहे तेरी याद । शबो रोज हर शामो सहर दे ॥
जो नेमत दो जहां सो सब खदफ़ है । खदफ़ कर दिल सदफ़ नाम घरदे ॥
नसदीं दिन बदिन गर्मी तरक्की । मुहबत मुशैद अब्दुल देहरदे ॥
खुदीको भूलकर बाखुद हूँ सरमस्त । शराबे इश्कका अपने खुमरदे ॥
न जाहिर जिवलः दिखलाता परीरू । उठाता इश्क आतश बात परदे ॥
रुख खुर छिप रहा है अब अन्दर । खुश औं वक्तके बुक़रा दौरे दिहरदे ॥
न मुझसा और नालायक व नादार । तू सब लायक है खाली पूर करदे ॥
हमारे बद अमल पर मत नजर कर । सरन और नाम अपनेका अजरदे ॥
बहुत दिनका सगेदर हूँ मैं तेरा । न दुर दुर कर न दूर कर पेट भरदे ॥
न जाऊँ दर बदर इक दर उम्मीद । बचाले जान और जिवदान बरदे ॥
मिहरकी बहर तू बेहद न पाय न । मिहर कीजे मिहर कीजे अपनी लहरदे ॥
सगेदरको फ़िरा हरगिज न दर दर । मिहर कीजे मिहर कीजे मिहर कर ॥
तुही कुनसे किया कोनों मकांको । तुही बरपा किया सब जिस्म व जांको ॥
तुही सत पुर्ष ज्ञानी नाम तेरा । तुही बतला दिया नामे निशांको ॥
किया तूहीने मलकुल मौत पैदा । तुही भेजा है मुरशिद मिहरबांको ॥
कहरेके वास्ते कर काल जब्बार । मिहरकर फिर किया अमनो अमांको ॥
बनजमे इस जहां निरगुण बनाना । किया पैदा हरी हर वेदख्वांको ॥
किया मकबूल और मकरुह व मरदूद । तुही खूबी दिया जन्नत जनांको ॥
तेरे सब नाम है आराम बख्शे । चले सब वस्फ सतनाम सुबहांको ॥
तेरे औसाफ लायक न मलायक । है क्या इमकान इन्सांकी जबांको ॥
न जानां भेद कुछ हम्दे सरायां । बयां किस तौर कीजे लाबयांको ॥
तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार । तुही बख्शे अद् और दोस्तांको ॥
अलख तूही है कोई लख न पाया । न जाने भेद तुझे राजे निहांको ॥
तुही सब कुछ किया है सबमें मौजूद । तुही देता है हरकस हर जमांको ॥
बहर खान व बहर शान व बहर शै । तुही था और तुही होगा तुही है ॥
हज्जारी पीर पैगम्बर बनाये । जुदा सब मजहबो मिललत चलाये ॥
नहीं वह नूर सद मामूर तारे । मिहर तुझ रख मिहर दैजूर जाये ॥
नहीं लमअ सोसद शमाअ शविस्तां । कि बरकत तेरीदिन मशअल जलाये ॥
शरीअत शाखकर सारी मुखालिक । न जाते राह इन्सांको बताये ॥
नबी पीरां फकीरां कैल फरजन्द । सभी औतार धर अल्लह बताये ॥
सभोंमें बरतरीं हैं राम और कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥
जिते मजहब हैं इस आलममें जारी । नराहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥
नहीं मजहबसो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूना चलाये ॥
किया मुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरह दिलको झुकाये ॥
फँसे उसदाममें आराम जानां । जपे सब राम नहिं सत नाम पाये ॥
पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें उधर छूरी उठाये ॥
किया तब रहम तू मुशिद हकीकी । जो साहब था सत सुकृत कहाये ॥
करे सब जीवके दुख दन्द तू दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥
तेरी मस्तोंकी महतीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और दिवाना ॥
अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह अनलहक का बहाना ॥
कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई अन्दर जमींके जा छिपाना ॥
कोई गावे बजावे तान तोड़े । नकल भाँडोंकी सबने अकल ठाना ॥
हुए बेगानः सब अपने अमलसे । न पहचाने कोई अपना यगाना ॥
तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पिया । लिया सौ जान मुर्दोंका जिलाना ॥
नहीं भगवाँ तिलक कण्ठी न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥
हुआ जब अस्लसे वह वस्ल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥
तेरी बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकल आदमकी ठिकाना ॥
मुअत्तर मगज उसबूसे हुआ जब । तो दानाई को खो बैठे हैं दाना ॥
हुए बेखुद खुदीको खोये बैठे । न अब तक तीर पहुँचा वर निशाना ॥
कितें पर पा किये परवाज बाला । जमींपर फिर फिर उनको है आना ॥