कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
दूसरी व्याख्या
पुत्री निरंजन लागि सिधाऊ । तुमको समरथ सदा सहाऊ ॥
तब कन्या निरंजन लग आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥
देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।
उपज्यो मोहऊ प्रेम तब, विप्रित मनमें बाढ़ि ॥
पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥
कहै कैल सुनो तुम बानी । मो कारन तुहि पुरुष उत्पानी ॥
हम तुम कीजै स्लिस्ट पसारा । तीनहि लोक सकल महिभारा ॥
तब अस्टंगी कैलसों कहाई । मोर तोर नहि होय सगाई ॥
मैं तोरि बहिनी तू मोर भाई । सो अनरीति सब दीन चलाई ॥
कहैं कैल सुनु आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥
जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निरन ठानौ ॥
तब अस्टंगी कहै बुझाई । बिन अज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥
बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अंत करि दीन्हा ॥
देखि स्वरूप कन्यहि को, मनमें रोष भराय ।
मनमें रोष भरयो जब, कन्यहिं लीन्हीं खाय ॥
लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हिये सम्हारा ॥
तब सुरति बनाते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै वहि वारा ॥
यहि प्रपंच अच्छर सब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥
कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥
पिता पिता कैल सो कहेऊ । मदन प्रचंड कैल छन भयेऊ ॥
अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥
कियो संयोग भयो त्रैवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णुकुमारा ॥
तीजे संभु विस्तुते छोटा । येक निरंजनही के ढोटा ॥
जैसे रूप निरंजनही, तैसे तीनों भाय ।
यह उत्पत है कैलकी, आगे स्लिस्ट उपाय ॥
करि परपंच सूत्र में गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥
यहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते स्वासा सुरति उठाई ॥
तेहि स्वासाते वेद कढ़ि आई । रूप निधान चारों बने भाई ॥
हाथन पोथी सुरसुर बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥
चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अच्छर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचंड भयो बरियारा । तब अच्छरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अच्छर चलै अचिन्त लगि गयऊ । महासूत्र छोडि तब दयऊ ॥
तब अचित्य अच्छर समझावा । यह अविगति गति काहु ननपावा ॥
तुम तो सुरति हमारहि भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लच्छ जीव नित करै अहारा । सवा लच्छ नितप्रति विस्तारा ॥
अंसवंस मिलि एक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप है भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समरथको ध्यान लगावो । अंतर गति समरथ सुख पावो ॥
चारि ज्ञानमें निरनय कीन्हा । सो निरनय चारि अंशको दीन्हा ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ॥
तीन सुरतिको खेल भयो, चौथे हंस उबार ॥
धर्मदास उवाच ।
धरमदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसो विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अंतकी निरणय ठानी ॥
कौन है अंड कौन है अंसा । कोहै अंस कौन है वंसा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन स्निस्ट कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जनि राखो ॥
विन देखी सबही कहै, सुनि पाई हम कान ।
सोई अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥
सतगुरु कबीर उवाच ।
सुनि सतगुरु मनमें बिहँसानै । तुमसों धर्मनि निरनय ठानै ॥
तेज अंड है अच्छर बंसा । अचित्य अंस सोहं है हंसा ॥
निरंजन कैल चारि गुन धारी । तिन स्निस्ट अविगति संचारी ॥
तेज अंड अचित्त है अंसा । ओहं अंड जोहं है हंसा ॥
सत्य अंज जोहं है अंसा । सोरह तिनके उपज्यो वंसा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपांजी तिनको बैठारा ॥
तिसरो अंड छमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥
अकहनामते सताविसै बंसा । तिन्हके सकल और हैं अंसा ॥