कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
चारों गुरुकी प्रशंसा, उर्दूशेर ४२ वंशकी प्रशंसाके उर्दू शेर
जीवोंको नूहके भोजनको दिया और कहा कि, मनुष्यके रक्तका बदला लिया जावेगा, दूसरे जीवका नहीं। अपने समयका यह चिह्न दिया और नूहसे कहा। (३) आयत, मैं अपने धनुषको बदलीमें रखा है। वह मेरे तथा पृथ्वीके मध्य, प्रणका चिह्न होगा और ऐसा होगा कि, जब मैं पृथ्वीपर बादल लाऊँ तो मेरा धनुष बादलमें दिखाई देगा। (१५) मैं अपने प्रणको जो मेरे ओर तुम्हारे और प्रत्येक प्रकारके जीवोंमें है स्मरण करूँगा तूफानका जल फिर ऐसा न होगा कि सत्यानाश करे। (१६) कमान बादलमें होगी। मैं उपर वृष्टिपात करूँगा। जिसमें उस सदैवके प्रणको जो मेरे और पृथ्वीके समस्त जीवोंमें है स्मरण करूँ। (१७) निदान परमेश्वरने नूहसे कहा कि, यह उस प्रणका चिह्न है जिसको मैं अपने और पृथ्वीके समस्त जीवोंके मध्य स्थिर करता हूँ।
इसी प्रकार खुदाबन्द आदमके समान ही नूहको भी सब बतलाता रहा।
फिर देखो इसी किताबका (१८) बाब इबराहीमके साथ इसी प्रकार खुदाबन्द रहा। (१) फिर खुदाबन्द ममरीके बलूतोंमें उसे दिखलाई दिया। वह दिनके समय गरमीके दिनोंमें अपने खेमेंके द्वारपर बैठा था। (२) उसने अपनी दृष्टि उठाकर देखा। क्या देखता है कि, तीन आदमी उसके पास खड़े हैं। वह उन्हें देखकर खेमेंके द्वारसे उनसे मिलनेको भगा पृथ्वीपर्यंत उनके आगे झुकी। (३) वो बोला कि, ए खुदाबन्द ! यदि मुझपर दया है तो अपने सेवकके समीपसे न चले जाईये। (४) थोडासा पानी लाया जावे आप अपने पैर धोकर उस वृक्षके नीचे आराम कीजिये। (५) मैं थोडीसी रोटी लाता हूँ ताजा दम हो जाइये, इसके उपरान्त आगे जाइएगा। क्योंकि, आप इसीके निमित्त अपने सेवकके यहाँ आये हैं तब उन्होंने कहा कि, वैंसाही कर जैसा तूने कहा। (६) इबराहीम खेमेंमें सरःके पास दौडा गया और कहा कि, आटा लाकर शीघ्र गूँध, फुलके बना। (७) इब्राहीम पशुओंकी झुण्डकी ओर दौडा एक मोटा ताजा बकरा लाकर एक युवकको दिया, उसने उसको तैयार किया। फिर उसने घी दूध और उस बकरेको जो उसने पकवाया था लेकर उनके सामने रक्खा, आप उनके समीप वृक्षके नीचे खड़ा रहा और उन्होंने खाया।
ईसाई लोग अनुमान करते हैं कि, उन तीनों मनुष्योंमें दो फारिस्ते थे एक खुदाबन्द यहवाह जुलजलाल था।
जैसे खुदाबन्द इन साहबोंके साथ था उसी प्रकार मूसाके साथ रहा और मूसाको समस्त धर्म कर्म बतलाया। मूसाने बनी इसराईलको सब नियम सिखलाया। जिसमें बनीइसराईल इस नियम पर चले। इस नियमावालीका
नाम तौरैत पुस्तक ठहरा । वह तौरैत पहली पुस्तक है जो पश्चिमी पैगम्बरों (अनागत वक्ताओं) को मिली अनेक बेर खुदाबन्द ने मूसा से बातें की और मित्र की भाँति सब कुछ सिखलाया मूसाने खुदाबन्दको स्वच्छभुसे देखा, देखो मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोज चौबीस बाब ९ आयत ।
तब मूसा, हारूँ, नहब अबीद तथा सत्तर इसराईली श्रेष्ठ पुरुष ऊपर गये (१०) और उन्होंने इसराईलके परमेश्वरको देखा । उसके पैरोंके नीचे नीलमके पत्थरकी गचकारी थी, उसका स्वेच्छ शरीर आकाशके सदृश था । (१०) बनी इसराईलके अमीरोंपर उसने अपना हाथ न रक्खा उन्होंने खुदाको देखा और खाया पीया ।
यह आसमानी रङ्गका परमेश्वर समस्त संसारपर शासन करता है । उसका भेद कोई नहीं जानता । हों कोई कोई संत उस खुदाके भेदको जानते हैं वे मायाके दगासे बच जाते हैं । नहीं तो सांसारिक मनुष्योंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, बच सकें । केवल सत्यगुरुकी दया जिसपर हो वह बच सके एवं वही पहचान सकता है ।
इस खुदाकी ठीक तसबीर सूरत शकल सवारी इत्यादी खरकैल नबीकी पुस्तकमें देखो ।
प्राचीन नियमपत्र बखरकैल नबीकी पुस्तकका सार ।
तीसवें वर्षके चौथे महीनेकी पाँचवी तारीख को ऐसा हुआ कि, जब मैं नहर कबीरके किनारे आस्तीरोंके बीचमें था तो आकाश खुल गया मैंने खुदाबन्दका तेज देखा (२) उस महीनेके पाँचवे दिवस यानी यहपकीन बादशाहके बंदी होनेके पाँचवें वर्षमें (३) ऐसा हुआ कि, खुदाबन्दका वचन बोजीकाहनके पुत्र खरकैलको, कसदियों के देश में नहर कबीरा के किनारे पर था पहुँचा । वहाँ खुदाबन्दका हाथ उसपर था (४) मैंने दृष्टिपात किया तो क्या देखता हूँ कि, उत्तरसे एक बगूला उठा एक बड़ी घटा एक आग जिसकी लवें आपसमें लपटी जाती थीं, जिसके गिर्द प्रकाश चमकता था और उसके मध्यमें यानी उस आगमेंसे पालिश की हुई पीतलकीसी मूर्ति दिखलाई दी । (५) उसके मध्य चार जीवोंकी एक प्रतिमा दिखलाई दी । उनकी सूरत यह थी कि, वो मनुष्यसे मिलती जुलती थीं । (६) प्रत्येकके चार २ पंख थे । उनके पैर जो थे वो सीधे थे । उनके पावोंके तलुवे बछरूके पावोंके तलवेसे थे । मंजे हुए पीतलके सदृश झलकते थे । (८) उनके चारों ओर पंखोंके नीचे मनुष्यके हाथ थे । मुंह तथा पंखभी इन चारोंके थे । (९) उनके पंख आपसमें एक दूसरेसे मिले
थे, और वे चलते हुए मुड़ते नहीं थे, वरन् वे सब बराबर सीधे आगेको चले जाते जाते थे। (१०) यही उनके चेहरेकी मिलान तथा समानता, सो उन चारोंमें एक का चेहरा मनुष्यका, एकका चेहरा शेरका उनकी दाहिनी ओर एकका चेहरा बैल तथा एकका चेहरा उकाबका था। (११) उनके चेहरे यों हैं। उनके पंख ऊपरसे फैलाये हुये थे। प्रत्येकके दो पंख दूसरेके दो पंखोंसे जुटे हुए थे। दोनोंसे उनका शरीर ढका हुआ था। (१२) उनमें से प्रत्येक आगेको सीधा चला जाता था। जिधर आत्मा जाती थी वे जाते थे। वे चलते हुये फिरते न थे। (१३) रही उन जीवोंकी सूरत, सो उनकी सूरत आगके सुलगे हुये कोयलों और जलते हुये प्रदीपके सदृश थी। वह उन जीवोंके बीच इधर उधर आती जाती थी। वह अग्नि तेजमय थी। तथा उस अग्निमें से बिजली वर्हिगंत होती थी। (१४) वे जीव दौड़ जाते थे और पलट आते थे। जैसे बिजली चमक जाती है।
(१५) सो जब मैं उन जीवोंको देख रहा तो क्या देखता हूँ कि, उन जीवोंके पास एक पहिया चार मुंह वाला पृथ्वीपर है। (१६) रही इन पहियोंकी सूरत और उनकी बनावट, जो वह पत्रेकीसी दिखाई देती थी, उन चारोंका डौल एकही था। उनकी सूरत तथा बनावट ऐसी थी मानों पहिया पहिएके बीचमें था। (१७) जब वे चलते थे तो वे चारों ओर ढलते थे ढलते हुए पीछे न फिरते थे। (१८) उनका घेरा जो था सो ऐसा ऊँचा था कि, भय जान पड़ता था। इन चारोंके घेरेमें चारों ओर आँखें फिरी हुई थीं। (१९) जब वे जीव चलते थे तो पहिये उनके साथ चलते थे। जब वे जीव पृथ्वीसे उठाए जाते थे तो पहिए भी उन्हीके साथ उठाए जाते थे क्योंकि, पहिएमें जीवोंकी आत्माएँ थीं। (२२) उस प्रकाशकी सूरत जो उन जीवोंके मस्तकोंपर थी ऐसी थी जैसे डरावने बिलौर का प्रकाश होता है। वह उनके मस्तकों पर फैला हुआ था। (२३) उससे नीचे उनके समपर थे। एक दूसरेकी ओर था। प्रत्येकके दो दो थे। जिनसे उनके शरीरोंका एक रुख और दू दू पहने उनसे दूसरा रुख ढका रहता था। (२४) मैंने उनके परोका शब्द सुना मानों बहुत पानियोंका शब्द आवज्जद क्रादिर मुतलक्का शब्द है। जब वे चलते थे, ऐसे शोरकी आवाज हुई जैसे लश्करकी आवाज है। जब ठहरते थे अपने परोको लटका देते थे। इस फ़िजामेंसे जो उनके मस्तकों के ऊपर थी एक प्रकारका शब्द होता था। (२५) उस फ़िजासे ऊँचे पर जो उनके शिरोंके ऊपर था सिंहासनकी सूरत सूरत थी, उसका दिखावा नीलमके पत्थरकासा था, उस सिंहासनके समान