कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
१३ अ० ज्ञानीजी महाराज
सुवर्णके घड़ेमें तालाबसे जल लेकर राजाको नहलाया करती थी। वह लौड़ी जल भरनेको उस तालाबपर आई घड़ा जलमें डुबोया, कबीर साहबने उसको ऐसा कौतुक दिखलाया कि, जब वह घड़ा भरकर जलसे बाहर निकालने लगी तो वह न निकला, उसने बड़ा बल किया पर उससे कुछ नहीं हुआ। अनेक लोग पकड़कर उस घड़ेको अपनी ओर खींचने लगे पर वह घड़ा अपने स्थानसे नहीं हिला, फिर बीस सहस्र मनुष्य पकड़कर उस घड़ेको खींचने लगे तरे भी घड़ेमें तनिक हील डोल उत्पन्न नहीं हुई। राजा रानीको समाचार मिला, रानीको भय उत्पन्न हुआ। राजाभी बड़ाहो आश्चर्यान्वित हुवा स्वयम् अनेक मनुष्यों सहित उस तालाबपर आया, हाथीयोंको बुलवाकर वह घड़ा खिंचवाने लगा। एक हजार हाथी तथा चार लाख मनुष्य लगकर वह घड़ा खींचने लगे। घड़ेने तनिक भी अपनी जगह नहीं छोड़ी। हाथीवान् हाथियोंको मारता था, सब हाथी चिड़घाड़ मारते थे पर कोई लाभ नहीं हुआ। राजाके मनमें बड़ा संदेह उत्पन्न हुआ। तब अपने मंत्रियों तथा सभासदोंसे कहने लगा कि, अब कौनसी युक्ति करनी चाहिये? यह वृत्त अम्बुसागरमें इस निम्न छन्दसे पहिले गाया। यहाँ उसीका सार हिन्दीमें कह दिया गया है।
छन्द— राव पेखत भयो व्याकुल बारिजल बहु नीर ही ।
आज अचरज भयो अति यह घडाकह यह किन गही ॥
सहस कुंजर लाग मानुष नहीं खिंचत सो टरचो ।
कीन्ह बहुत उपाय हान्यो अभय देखत जीव डन्यो ॥
सोरठा— मंत्री करो विचार, मम घट अति संशय भयो ।
व्याकुल चित्त हमार, कीजै कौन उपाय अब ॥
चौ०— मंत्री कहै सुनिये महाराजा । बचन कहत मोहि आवे लाजा ॥
सिद्ध एक आवा दरवाजा । तापर आप कीन्ह एतराजा ॥
सो स्वामी यह चरित दिखावा । हमरे चित्त भिरती यह भावा ॥
उद्धृत छन्दसे लेकर चौपाई तकका तात्पर्य थोडेमेंही लिखे देते हैं— कबीर साहब धम्मदासजीसे कहते हैं कि, इस राजाके मनमें जब अत्यंत व्यग्रता उत्पन्न हुई अपने मंत्रियों तथा मुसाहबोंसे कहा कि, अब कौनसी युक्ति करें इसका क्या कारण है कि, घड़ा नहीं निकलता? तब उन बुद्धिमानोंमेंसे एकने सोच समझकर कहा कि, महाराज! हमको तो यह जान पड़ता है कि, यह स्वामी जो आपके द्वारपर आया था, आप उसपर कुछ हुए थे उसका ही यह कौतुक है।
“यहि अन्तर । यक कीन्ह तमाशा सो चरित्र भाषों धर्मदासा ।” यहाँ से लेकर “सकलजीव कीन्हें परमाना, अब सब साहिब सुधरे कामा” यहाँतक जो कुछ प्रकरण अम्बुसागरमें आया है उसका सार यहीं लिखते हैं कि, फिर कबीर साहब धर्मदासजीसे कहते हैं कि, ए धर्मदास ! हमने एक फिर ऐसा कौतुक दिखलाया कि, उस तालाबके भीतर एक वटवृक्ष था, उस वृक्षपर मैं तोता होकर बैठ गया । इस तोतेको देखकर शिकारी दौड़ आया, तोतेके ऊपर तीर चलाया । वह तीर तोतेको तो नहीं लगा, पर शिकारीकी ओर पलट आया, वह शिकारी भयभीत होकर भाग गया, उसने जाकर दो चार मनुष्योंसे इस तोतेका समाचार दिया । तब अन्यान्य कितनेही लोग दौड़कर आए गुलेल द्वारा तोतेको मारने लगे ! जिन लोगोंने गुलेल चलाया सबकी गुलेल टुकड़े टुकड़े हो गई । दश बीस पचास मनुष्य खड़े कौतुक देख रहे थे । तालियों बजा बजाकर उस तोतेको उड़ाते पर वह न उड़ता लोग ढोल बजाते तो भी वह अपनी जगहसे न उड़ता । लोगोंने राजाको समाचार दिया कि, महाराज ! वटवृक्षपर एक अतिसुन्दर तोता बैठ रहा है । न उसको तीर गुलेल इत्यादि लगता है; न वह तालियों ढोल आदि बजानेसे उड़ता है; तात्पर्य यह कि, किसी युक्तिसे वह अपने स्थानसे नहीं उड़ता । इतना सुनतेही वो राजा वहाँ आ पहुँचा उस तोतेको वृक्षपर बैठा देखकर चोबदारोंको आज्ञा दी कि, शिकारियोंको बुलावो । सब शिकारी तुरंत आकर उपस्थित हुए । चिड़ीमारोंसे राजाने कहा कि, जो कोई इस तोतेको फँसाकर मेरे पास लावेगा वह जो कुछ माँगेगा, मैं उसको दूंगा । तब सारे शिकारी उस तोतेको फँसाने लगे । वे लोग बड़ा फँदा बनाते तो वह तोता छोटा हो जाता । जब वह फँदा छोटा करें तब वह तोता बड़ा हो जाता । सहस्रों युक्तियों की गई पर वह तोता पकड़नेमें नहीं आया । राजा उस तोतेका सौंदर्य देख ऐसा आसक्त हुवा कि, सात दिवसोंपर्यंत भोजन नहीं किया । वह तोता वटवृक्षपरसे उठकर राजप्रसाद पर आ बैठा । इस तोतेका शरीर ऐसा तेजोमय तथा कान्तियुक्त था कि, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, राजाने जान लिया कि, यह तो वही शुक्र है जिसके निमित्त मैंने बड़े यत्न किए थे । तब रानीने दूध चावल, सुवर्णकी कटोरीमें इस शुक्रके सामने रक्खा । वह आकर रानीके हाथपर बैठ गया, उस समय राजा तथा रानीको बड़ा हर्ष हुवा । सुनारोंको बुलाकर आज्ञा दी कि, तुममें जो बड़ा निपुण हो वह इस शुक्रके लिये पिंजरा बनावे । पच्चीस सहस्र अशरफियों सोनारोंको दीं, सुनार पिंजरा बनाने लगे । उस पिंजरेमें सवालाख हीरे तथा मोती लगे ।