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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

उपदेश, अंग्रेजी वर्णमाला

कच्चे होना ।

जब इसने अपनी सुन्दरताका विचार किया तो इसको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ यह आनन्दमें निमग्न हो गया । अपने शरीरकी भी सुधि जाती रही । अपनी देहकी सुधि भूलनेसे असली देह पलट गई, पक्कीसे कच्ची हो गई । तत्व प्रकृति सब बदल गये, अर्थात् धैर्यसे आकाश उत्पन्न हो गया । शीलसे अग्नि, विचारसे जल, दयासे वायु और सत्यसे पृथिवी हो गई । इसी तरह पक्के गुणोंसे कच्चे गुण होगये, फिर तो पच्चीस प्रकृति आदि कच्चे आकारका प्रादुर्भाव हुआ । जीवको कच्ची देह मिलतेही भ्रममें पड़ गया । इसी भ्रमको धारण करके वेद शास्त्र आदि वर्णित सच्चिदानन्द कैवल्य भूमिपर अधिष्ठित होकर सारे संसारका अधिष्ठाता एवं हर्त्ता कर्त्ता और स्वामी हुआ ।

मायासे संयोग – जिस समय देहकी ज्योति प्रभाव और प्रकाशको देखकर आनन्दमें बसुध होनेके बाद फिर सचेत होतेही इसने आँख उठाकर देखा । दृष्टिसे देखतेही इसे अपनी छाया शून्यमें देख पड़ी, वही स्त्री स्वरूप होकर इसके निकट आई दोनोंका संयोग हुआ इसीको माया और ब्रह्म का संयोग कहते हैं, इसीसे समस्त संसारकी रचना हुई, इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसारमें पूजा और भक्ति होती है ।

पतन – जीवसे अहंकार उत्पन्न हुआ यह जानने लगा कि, सब मैंही हूँ । फिर स्वाभाविक “एकोऽहं बहुस्याम्” की फुरना उठी, इसी ब्रह्म सच्चिदानंदकी बात सब वेद शास्त्र, किताब, कुरान आदि करते हैं पर इसके यथार्थ स्वरूपको स्वसम्बेदके अतिरिक्त दूसरा कोई भी नहीं जानता । यह सच्चिदानन्द ब्रह्म स्वयं बन्धनमें है । जबसे यह जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा तबसे बहुत प्रकारके स्वरूप पाये और इसकी अवस्ति ही होती गई जबसे इसको अहं फुरता है तभीसे यह नीचेकी ओर गिरता जाता है । जबसे यह सूक्ष्मसे स्थूल देहमें आया, तबसे अनन्त भ्रममें पड़ गया उसी अवस्थामें वेद किताब ग्रन्थ आदि वाणी बनायी, जिनका कि, कुछ पारावारही नहीं । जब सर्वोत्कृष्ट मनुष्य शरीरको प्राप्त हुआ, तो नाना प्रकारके मत मतान्तरोंकी स्थापना की । ब्रह्म, जीव, माया, सब कुछ ठहराया । योग समाधि और नवधा भक्ति आदि नानाप्रकारके उपाय और युक्तियोंसे इसी ब्रह्मके पदको प्राप्त करता है, फिर नीचे गिर जाता है । जब कभी भाग्य उदय होता है। सद्गुरु पर पूर्ण श्रद्धा होती है तब सत्यगुरुकी दया होती है । तभी यह सत्य पन्थका अधिकारी होता है उसी समय यह ज्ञान प्राप्तकर इस ब्रह्म सच्चिदानन्दसे सम्बन्ध छोड़ सत्य पदको प्राप्त हो सर्वदाके लिये आवागमनका सम्बन्ध नाशकर, सच्चे आनन्दके पदपर स्थित होता है ।

इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसार कथा करता है, सारा संसार इसीमें उत्पन्न होता, स्थित रहता और नाश हो जाता है। यह सच्चिदानन्द इस जीवका केवल भ्रम मात्र है, यह जीव भ्रमकोही ब्रह्म मानकर उसकी भक्ति और पूजा करता है। इसीके भ्रमने इसको अधा कर रखा है। सच्चे सन्त और गुरुकी सेवा बिना इसका छुटकरा होना असम्भव है; जैसे कस्तूरी मृग, अपनी कस्तूरीके सुगन्धको दूसरे पदार्थोंमें जानकर इधर उधर घासोंको सूँघता फिरता है, महान कष्ट उठाता है, पर जबतक अपनी कस्तूरीको नहीं पहचानता तब तक वैसेही घूमा करता है।

उन्नति और अवनतिके कारण — जब यह एकसे अनेक होता है तब अज्ञानी हो जाता है, जब अद्वैतकी ओर मुख फेरता है आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करता है, तो इसमें ज्ञानका प्रकाश आजाता है संसार लय हो जाता है। क्योंकि, जिसकी ओर ध्यान न होगा वह अवश्यही नाश हो जावेगा। सन्त लोग इसी कारण बाहर की वृत्तियोंका निरोधकर अन्तरमुखी वृत्ति करलेते हैं। जिस प्रकार कछुआ अपने हाथ पाँवको समेटकर एक जगह बैठ जाता है, उसी प्रकार सन्त लोग अपनी वासनाओंका निरोधकर ब्रह्मपदमें बैठ जाते हैं समय पाकर कछुआके समान हाथ पाँवोंको बाहर निकालते हैं संकल्प करके सृष्टि रचते हैं। इसी प्रकार अनन्त वार हुआ करता है। जबतक वासनाका बीज नष्ट नहीं होता जबतक जीव सूक्ष्मसे स्थूल स्थूलसे सूक्ष्म हुआ करता है। यह सर्वदा अपने कम्मोंके वश हो कभी ऊपर और कभी नीचे आता है, कभी मध्यमें लुढ़कता हुआ ठोकरें खाता फिरता है। जब यह अन्तिम देह स्थूल शरीर पाकर उत्तम कम्मोंसे ईश्वरकी भक्तिमें प्रवृत्त होता है, तो पुनः शनैः शनैः ऊपरको चढ़ जाता है। जब यह अशुभ कम्मोंकी ओर झुकता है तो चौरासी योनियोंमें भटकता हुआ विकल और दुःखित रहता है।

तत्त्वमसिका अर्थ — जब यह प्रथम अपने सत्यस्वरूपसे गिरा, “तत्त्वमसि” में इसने अपना घर बनाया, यह “तत्त्वमसि सामवेदका महावाक्य है। तत्त्के अर्थ ईश्वर और त्वं—जीवको कहते हैं—असि—दोनोंका एकता करने वाला ब्रह्मपद है। तत्—पद जैसे समुद्र—त्वं—पद जैसे कुवा और तालाब आदि और असि—पद जैसे दोनोंमें जल। तत्—पद—ब्रह्म अविनाशी ज्ञानी और पूर्ण है। त्वं पद जीव नाशमान और अल्पज्ञ है। असि—पद शुद्ध ज्ञान स्वरूप है

खण्डन — ये दोनों उपाधि छूटे तो आत्मा जैसेका तैसा हो। ये तीनों पद वेदने ठहराये हैं, इन्हीं तीनों पदोंमें सब जीव फँस रहे हैं। आगेकी सुधि किसीको भी न मिली, इसी तीनों पदोंतक संसारका ज्ञान है। अरब और फारस आदिकके

पेगम्बर आदि यहांही तक पहुँचे हैं। हक्कुल यकीन — और मारफतका पद भी यही है। ज्ञानीके लिये किसी प्रकारका आवर्ण नहीं सब ब्रह्मका प्रकाश है। ज्ञानी को किसी प्रकारकी रक्षावट नहीं जहां देखो वहां वही उपस्थित है। जीव विचारा अज्ञानके कारण बंध रहा है, इसे अज्ञानके अंधेरेमें कोई राह नहीं सूझती। इस अवस्थामें यह एक द्वारसे बाहर हो सकता है, वह द्वार शास्त्र है, शास्त्रके बिना कोई मार्ग नहीं मिलता। शास्त्र माताके दूधके समान है; जिस समय बालक दूध पीता होता है वह केवल अपनी माँके स्तनोंसेही दूध पीना जानता है उसको दूसरी कोई युक्ति नहीं सूझती, जब वही बालक अपनी अवस्थाको पहुँचता है तो स्तनों का कुछ काम नहीं पड़ता, अपने आप अपनी शरीर यात्राका उपाय कर लेता है। इसी प्रकार यह जीव दूधपी वा बच्चेके समान है और ईश्वर युवकके समान। जीव और ईश्वर दोनों आवरण और विशेष शक्तियोंमें बंधे हैं। जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है, विद्या और अविद्यामें दोनों बंधे हैं। यह जीव नाना प्रकारके प्रयत्न और युक्तियोंसे ईश्वर हो जाता है, ईश्वर अपनी भूलसे जीव हो जाता है। इसका कारण ब्रह्म और जीव दोनों एकही बात है, ब्रह्म बिना जीव नहीं, जीव बिना ब्रह्म नहीं। जब ब्रह्मके पदपर स्थित हो जाता है—तो सृष्टिका कर्ता हर्त्ता कहलाता है, इसी पदतक इसकी पहुँच है, यही जीवन मोक्षका पद है। अपने उपायों और युक्तियोंसे ज्ञानानि को उठाता है ज्ञानाग्नि प्रगट होकर कम्मेंके बनको जला देती है। वह आग बहुत प्रबल होता है, जिस प्रकार लाल अंगारा अपनी चमक दमकमें एकही होता है पर अंगारेकी अग्नि शनः शनः ठण्डी होती जाती है, अन्तमें पूर्ण ठण्डी हो जाती है। इसी प्रकार यह जीव ब्रह्मपदको प्राप्त करके भी फिर जीव पदको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार बारम्बार जीवसे ब्रह्म और ब्रह्मसे जीव हुआ करता है। कभी लाभ और कभी हानि उठाया करता है, इसको कभी सुख नहीं मिलता। ज्ञान प्राप्त होनेपर नाममात्रके लिये जीवन्मुक्त कहते हैं, सर्वदा वन्धनमें रहे उसको जीवन्मुक्त कहनेसे क्या फल? वह तो सर्वदा जीव-नबन्ध है। इस हेतु “तत्त्वमसि” के उक्त तीनों पद भ्रम और धोखा है। क्योंकि उसे स्थिरता नहीं है। कभी होता है कभी जाता है।

जीवन्मुक्त तथा विदेहमुक्त — इस प्रकार जीवन्मुक्त और विदेह मुक्त केवल इस जीवका भ्रम मात्र है। इस जीवन्मुक्तका वृष्टान्त ऐसा समझना चाहिये कि, जैसे एक बन्दरको जङ्गीरमें बाँससे बाँध देते हैं, कभी वह बाँसके ऊपर चढ़ता है, कभी नीचे उतर आता है, इसी प्रकार जीवन्मुक्त अपने कम्मेंके बन्धनमें बाँधा हुआ कभी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है, कभी नीचे गिर जाता है। जब यह नीचेसे