कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
निर्बुद्धिताके अंगकी साखियां
गण वचन ।
शब्दके गुण दीन जगाई । खुलगई तारी देखन लाई ॥
तब गण अस्तुति बिनने लीना । बारबार दंडवत सो कीना ॥
ज्ञानी अंश पुरुषके आगर । अरु जलसङ्गसाथ तेहि नागर ॥
कोटिन हंस संग तिन लाए । पुरी तुम्हार ठाढ़ भय आए ॥
कुण्टम् वचन ।
ज्ञानी जलरैगहि लेओ बुलाई । तिनके सङ्ग और नहिं आई ॥
गण वचन ।
दोनों हंस सुनो मतिवाना । पंछी वचन सुनहु परमाना ॥
सेना सकल छोड़ तुम देहू । द्वै अंश दर्शन तब लेहू ॥
उभय अंश पहुँचे तब जाई । पंछी दर्शन तत्छिन जाई ॥
आदर बहुत भौति तिन कीन्हा । सिंहासन रचि बैठक दीन्हा ॥
दृष्टि पसार देख्यो जलरङ्गा । बहुत ज्योति छीके अङ्गा ॥
देखि देह शोभा अधिकाई । रवि शशि कोटिन राम लजाई ॥
कुण्टम् वचन ।
पंछी कहै सुनो हो ज्ञानी । केहि कारण तुम इहवा आनी ॥
तुम तो अंश पुरुषके आगर । केहि कारण पगधारैउ नागर ॥
बडे भाग हम दर्शन पावा । अति आनन्द मोहिंचित आवा ॥
हम पंछी सुमति नहिं जाना । तब कीरति प्रभु आदि पुराना ॥
तुम्हरी सुद्धि न कोई पाई । कीन किरतारथ मन्दिर आई ॥
जलरङ्ग वचन ।
तब जलरङ्ग बूझ चित लाई । केतिकयुग इहवों भए भाई ॥
ऐते संशय हम चित लाओ । सत्य वचन मोहिं भाष सुनाओ ॥
आदि अन्त तुम जानो बाता । मोसे भाष कहो विख्याता ॥
महापुरुष परलय जब कीना । कौन अधार कहाँ तुम लीना ॥
उलड पलट नभ धरनी जाई । तब सब जीव कहाँ ठहराई ॥
कुण्टम् वचन ।
सुन जलरङ्ग वचन हम भाखौं । युगकी कथा गोई नहिं राखौं ॥
महाप्रलय होवै जेहि बारा । तीनों लोक होहिं जरि छारा ॥
पृथ्वी जरि होवे भर पानी । स्वर्ग पताल जलाहल आनी ॥
दश योजनलों उठे तरङ्गा । महाप्रलय होवे जिव भङ्गा ॥
तीन लोक जब परलय कीन्हा । हम तब जलमें पग नहिं दीन्हा ॥
जैसे फेन जलहि उतराना । ऐसे बैठि पुरुष धर ध्याना ॥
उतपति परलय भाष सुनाई । हम कबीरके अंश कहाई ॥
साखी- जब पक्षी मुख बोलिया, अचरज भया प्रसंग ।
कोट रूप लखि आपनो, दृष्टि देख जलरङ्ग ॥
चौ०- कला देखि चक्रित तब भयऊ । मनको गर्व टूट सब गयऊ ॥
तब कबीर निरखै चितलाई । कौतुक लखि जलरङ्ग जनाई ॥
जलरङ्ग बचन ।
लीला देखि शीश धरदीना । तब कबीरकी अस्तुति कीना ॥
देही धरि हम रहे भुलाना । सत्य पुरुष हम तुमहिं न जाना ॥
आदि अन्त तुम पुरुष हमारा । अस्तुतिकर जलरङ्ग अपारा ॥
हम अपने मनमें बड होई । नाम कबीर पुरुष है सोई ॥
यह कौतुक हम देखा जाना । तुमही पुरुष और नहिं आना ॥
हंस वचन ।
अस्तुति करत हंस सब ठाडे । कौतुक देखि हर्ष चित बाढे ॥
धन्य धन्य तुम आदि गोसाई । पंछी देखि कहो किमिपाई ॥
यही वचन तुम कहो विचारा । तब तुम कर्ता सर्जनहारा ॥
कुष्ठम् वचन ।
पंछी कहै सुनो हो भाई । पूरब कथा कहूं समझाई ॥
हम कबीर आज्ञा नहिं कीन्हा । ताते पंछी तनु धरलीन्हा ॥
देह धरे भा युग दश लाखा । सत्य वचन हम तुमते भाखा ॥
सहस सताइस परलैंकीता । हम आगे इतना युग बीता ॥
हो जलरङ्ग कहाँ लगि कहूं । शून्य असंख्य दीपमें रहूं ॥
वहाँ बैठि परलय हम देखा । बूढे सब जीव परलैं पेखा ॥
पुरमनि युगकी कथा सुनाई । देखि हंस हरष मन आई ॥
हीरा यान जलरंगहि दीन्हा । कुष्ठम दरश जोहि दिन कीन्हा ॥
हिल मिल भेद एक करजाना । तीनों अंश बहुत सुखमाना ॥
अब पंछी को नाम सुनाऊ । सात नाम मैं प्रकट बताऊं ॥
साखी- जीवसागर आनन्द सुख; हंस उबारण धाम ।
परलय देखे विविधविधि, दायर कुष्ठम नाम ॥
जलरङ्ग वचन ।
चौ०—जलरंग पायो हीरा पाना । संशय गत हर्षित मन आना ॥
तुम लीला स्वामी अवगाहा । अंश हंस नहीं पावैं थाहा ॥
छन्द—तव चरित अगम अपार पावन लिखि न काहूको पन्यो ।
मम चित्त गर्व घटावनो वे गुण देह पंछीको धन्यो ॥
तुम कला जान परी न हमको धरयो अमित स्वरूप हो ।
वहां पुरुष यहां अंशहौ हमजान हसन भूप हो ॥
सोरठा—चरणकमल बलिहार, कीह दंडवत विनय करि ॥
हरषित भये अपार, रङ्ग महानिधि जिमि लह्यो ॥
चौ०—हंस खडे सब पौरि द्वारा । तिन सबही मिलि विनती धारा ॥
कारण कवन दरश नहीं पाये । तुम हंसन नायक प्रभु आये ॥
गए सठिहार हंस लै आवा । तब पीछेको दरश करावा ॥
देखि रूप अति हरष समाना । तब ज्ञानीकी अस्तुति ठाना ॥
छन्द—तुम आदि पुरुष अखण्ड अविचल पतित पावन नाम हो ।
जीव बंधन काटि फंदन जात ले निज धाम हो ।
योगजीत कबीर ज्ञानी नाम जग महँ गाह्यौं ।
अकह अभय अपार तुम गति भाग जिन पद पाह्यौं ॥
सोरठा—जोरें हंस बहुवृन्द, भूलिरहे अरविन्द जिमि ।
गति यामिनि सुखकन्द अरुण चरण लिखि अमिय कर ॥
विनय कीन बहुवार, पदपंकजको ध्यान धर ।
हे प्रभु तुम बलिहार, करें दण्डवत हंस सब ॥
जलरंग वचनसे लेकर अन्तके सोरठा तक जलरंगजी ज्ञानीजी कुष्ठम्
ऋषि गण और हंसोंका वार्तालाप आया है इसका तात्पर्य साधारण रूपसे
नीचे कहे देते हैं —
जलरङ्गजी पातलमें रहते हैं सत्य पुरुषके पुत्रोंमें हैं । उनको आज्ञा
मिली है कि जो कोई पृथ्वीपर जावे वो जलरङ्गजी को सूचित करके पृथ्वीके
मनुष्योंको मुक्तिका पान दे परमधामको पहुँचावे । साहबने जलरङ्गजीकी बड़ी
मर्यादा बढ़ाई है ।
जब कबीर साहब पृथ्वीपर आए सात लाख हंसोंको मुक्तकर अपने साथ
लेकर लोकको चले उस समय जलरङ्गजीके स्थानको गये । जलरङ्गजीने
पूछा कि आप कौन अंश हो यहाँ कैसे आये हो ? कबीर साहबने कहा कि हम