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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मिश्रपन्योंके संस्थापक शिष्य

तीन सत्य जब परगटें, विषका अमृत होय ॥
कहैं कान्ति छबि बरणौं, बरणत बरणि न जाय ।
कबीर-चिकुरनके' उंजियारते' विधु' कोटिक' शरमाय' ॥
जहां पुरुष सतभाव है, तहां हंसनको वास ।
नहीं यमनको नाम है, नहि तृष्णा नहि आस ॥
हर्ष शोक वहि घर नहीं, नहीं लाभ नहि हान ।
हंसा परमानन्दमें, धरें, पुरुष को ध्यान ॥
नहि देवी नहि देव है, नहीं वेद उच्चार ।
नहीं तीरथ नहि वरत है, नहि षट्कर्म' अचार ॥
उत्पत्ति प्रलय वहां नहीं, नहीं पुण्य नहि पाप ।
हंसा परमानन्दमें, सुमिरैं सद्गुरु आप ॥
नहि सागर संसार है, नहीं पवन नहीं पानि ।
नहि धरती आकाश है, नहीं ब्रह्मा नहीं निशानि ॥
चन्द सूर वा घर नहीं, नहीं करम नहि काल ।
मगन होय नामहिं गल्हो, छुटि गयो जञ्जाल ॥
सुरति सनेही होय तासु, यम निकट नहि आवे ।
परम तत्व पहिचान, सत्य साहब मन भावे ॥
अजर अमर विलसे नहीं, परम पुरुष परकाश ।
केवल नाम कबीरका, गाय कहें धर्मदास ॥

गोरखजीका प्रश्न

कवित्त-कर्त्ताको स्वरूप कौन, अण्डका स्वरूप कौन, अण्डपार कौन नाद
बिंद योग कौन है । जीव ईश्वर भोग कौन, भूमि औतार कौन, निराकार कौन
पाप पुण्य करे कौन है ॥ वेद औ वेदान्त कौन, वाच और अवाच कौन, चन्द्र सूर्य
भास कौन, ओहं सोहं कौन है । पञ्चमं प्रपञ्च कौन, स्वर्ग नर्क बसे कौन । पिण्ड
ब्रह्माण्ड कौन जरा मृत्यु कौन है ? आत्म, परमात्म, काल, गुरु सिख बोध कौन,
क्षर अबर अक्षर निरक्षर कौन है ? ॥

गोरखके प्रति कबीरजीका उत्तर

कवित्त-जाते भयो अण्ड स्वप्नरूप बसें अण्डमार्हिं, कर्त्ताको स्वरूप नार्हिं
अण्डको स्वरूप हैं । नादबिन्द योग स्वप्नजीव ईश भोगस्वप्न, भूमिआव तार
निराकार स्वप्नरूप है ॥ पाप पुण्य करे स्वप्न वेद औ वेदान्त स्वप्न वाचा औ

अवाचा स्वप्नरूपसो अनूप हैं । चन्द्रसूर्यभासस्वप्न पञ्चमँ प्रपञ्चस्वप्न स्वर्ग नकँ
बीच बसै सोऊ स्वप्नरूप है ॥ १ ॥ ओहँ और सोहँ स्वप्न पिण्ड और ब्रह्माण्ड
स्वप्न आत्मा परमात्मा स्वप्न रूपसो अरूप हैं । जरामृत्युकालस्वप्न गुरु शिष्य
बौध स्वप्नअक्षर निअक्षरआत्मा स्वप्नरूप है ॥ कहत कबीर सुन गोरख वचन
मम, स्वप्नते परे सत्य सत्यरूप भूप है । सोई सत्यनाम सत्यलोक बीचवास करँ,
नहीं कहँ आवे नहीं जावैं सत्यरूप है ॥ २ ॥

इस कलियुगमें गोरखनाथ जैसा प्रतापी योगी कोई नहीं हुआ, उन्होंने
कबीर साहबसे बहुत वादविवाद किया था पर अन्तको जब सद्गुरुने भली भाँति
समझाया और दिखलाया कि, तेरी सब योगशक्ति मिथ्या है, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड
दोनों स्वप्नवत् मिथ्या है । जो कुछ कहा सुना जाता है वो स्वप्नके तुल्य संकल्प-
मात्र है । जब गोरखनाथजीने सद्गुरुकी बातें समझीं तब चरणोंपर गिरकर शिष्य
होगये । ऐसेही दत्त दिगम्बर जो संन्यासियोंके गुरु पूर्ण विरक्त अवधूत और
यती पुरुष थे, सत्यगुरुका ज्ञान सुनकर साहबके चरणोंपर गिरकर सांसारिक
वासनाओंसे मुक्त हुए । इसी प्रकार बड़ेही प्रसिद्ध तपस्वी दुर्वासा ऋषि सत्यगुरु
की कृपादृष्टिसे वांछित स्थानपर पहुँचे, अनगिनती ऋषि, मुनि उसी साहबकी
दयासे उच्च श्रेणीको प्राप्त हुए हैं । जितने सत्यगुरुके सांसारिक शिष्य हुए वे
सब भी उसी श्रेणीपर अधिकृत हुए हैं जहाँकि, ऋषि मुनि पहुँचते हैं। सब सांसारिक
लोग जिन पर कि, सद्गुरुकी पूर्ण कृपा होगी अपने बालबच्चे सहित उसी लोकको
पहुँचेंगे ।

साखी—कबीर साहब सबका बाप' है, बेटा किसीका नाहिं ।

बेटा होकर ऊतरा, सोतो साहब नाहिं ॥

कबीर—जन्म मरनसे रहित है, मेरा साहब सोय ।

बलीहारी उस पीवकी', जिन सिरजा सब कोय ॥

कबीर—पिण्ड प्राण नहिं तासुके, ढम देही नहिं सीन ।

नादविन्द आवे नहीं, पांच' पचीस' न तीन' ॥

कबीर—मुहँ माथा जाके नहीं, नाही रूप कुरुप ।

पुष्प वासते पातला, ऐसा तत्व अनूप ॥

कबीर—देही माहिं विदेह' है, साहब सुरति स्वरूप ।

अनन्त लोकमें रम रहा, जाको रङ्ग न रूप ॥

कबीर—चारभुजाके भजनमें, भूल रहे सब सन्त ।

कबीर सुमिरो तासुको, जाकी भुजा अनन्त ॥

कबीर—रूप रेख जाके नहीं, अधर धरे नहि देह ।

गगन मंडलके मध्यमें, रहता पुरुष विदेह ॥

कबीर—बूझो कर्ता आपना, मानो बचन हमार ।

पांच तत्त्वके भीतर, जिसका यह संसार ॥

कबीर—पानी हू ते पातला, धूवाँ हूँ ते छीन ॥

पवन वेग उतावला, दोस्त कबीरा कीन्ह ॥

पुष्प वासते पातला धूवे हूँ ते छीन ।

कबीर तासों मिल रहा, ज्यों पानी ते मीन ॥

प्रासंगिक

इस संसारमें कबीर साहब और हंस कबीरोंका तो यही वृत्तान्त है कि इधर मनुष्योंकी बुद्धिको कालपुरुषने ऐसी अन्धो कर दिया है कि, कोई भी सत्य पुरुषकी भक्तिमें नहीं लगता । जो कोई सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश करता है उसके उत्तम बर्ताव होते हैं कि, मनुष्य कैसे मुक्ति पावे ? सबको अंधकार मय पथ पसन्द है, उसी ओर आग्रह पूर्वक दौड़ते हैं, इन्द्रियनिग्रह तथा देवीप्यमान, ज्ञानके मार्गसे भागते हैं । जो कोई उनको अंधकारसे निकालना चाहता है उसके साथ प्रेम करनेके वनस्पति बैरी होजाते हैं ।

जो कुछ कबीर साहबने पांच वर्षकी अवस्थामें गुरु रामानन्दजीसे कहा था । वही बात अन्तिम समयतक सब लोगोंसे कहते चले आये हैं कि, मैं स्वयम् सत्य-पुरुष एवं सर्व शक्तिमान हूँ, मेरे ऊपर दूसरा कोई नहीं है । जिस किसीको कुछ सन्देह हुआ उसका सन्देह उसी समय मिटा दिया, उसके साथ साथ अनेकानेक कौतुक दिखाते आये वे मनुष्यके कार्यों कभी नहीं होसकते । कबीर साहबका देह केवल उनकी शक्तिका प्रकाश था । वास्तवमें वह देह नहीं था । वह तो केवल देखने मात्रको शरीर था । वास्तवमें तो वह तेजका पुंजही था, उस शरीरकी कोई प्रशंसा नहीं कर सकता कि, वह क्या था । यदि तेजःपुंज कहूँ, तो मनुष्य तो उसको देख नहीं सकता, परन्तु वह देह देखी जा सकती थी, वह ऐसा प्रकृतिका कौतुक था जो कि मनुष्यके ध्यानमें किसी प्रकारसेभी न आसके, प्रत्यक्षमें देह दिखाई देती थी पर वास्तवमें वह देह नहीं थी । ये भगवान् रामके सच्चे भक्त थे, इन्हें रामको भरोसा था, ये रामके थे, राम इनका था । किसी भी समय राम इन्हें और ये रामको नहीं

भूले थे, ये बिलकुल रामरूपही हो चुके थे, रामने इन्हें इतना अपनाया था कि, रामकी अनन्तबातें इनमें आगई थीं। वे क्या थे किस भूमिका पर पहुँचे थे इसका भेद तो वे ही सन्त जान सकते हैं। जिन्हें कबीर साहिबकी तरह रामने अपना रखा हो अथवा रामके भक्तोंके भक्तोंने जिन्हें अपनी सच्ची दासकोटी दे रखी हो, संसारी झूठे पुरुषोंमें ऐसी बुद्धि कहाँ है जो उस सच्चेका पता पासकें। जो अन्धे हैं अविद्यामेंही रहेगा। यदि अविद्या न होती तो यह संसारही न होता, जब अविद्या दूर हुई तो फिर संसार कहाँ है। यह सच्ची भक्तिसेही दूर हो सकती है। कबीर सर्वज्ञ तथा सारे संसारकी मुक्तिका कारण है। वह गुप्त है उसका पता संतोंद्वाराही प्राप्त होता है, वह कबीर अद्वितीय तथा अमर है। वह कबीर सबसे परे है, वह कबीर समस्त वासनाओंसे न्यारा है, वह कबीर किसीसे मैत्री अथवा द्रोह नहीं रखता वह पवित्र है, पालनकर्ता है। पाप तथा कुत्सिततासे पृथक् रहता है, वह कबीर वही है जिसने धर्मदासका गुरु बनकर संसारमें बयालीस वंश स्थापित किये उस कबीरको जो कोई पहचानेगा उसका बेड़ा पार होजायगा। जिसको उस कबीरका ज्ञान होगा वही दोनों लोकोंमें परमपद पाकर उच्च स्थितिपर आरूढ होजायगा।

यह कबीर पहचाना नहीं जाता, कारण यह कि—स्वास्थ्योंने उस सत्य कबीर को छिपा रखा है। जैसे पहले वैसेही अबके लोग भी कबीरके नामको छिपाते हैं, जहांतक होसके इस कबीरकी श्रेष्ठतापर और उसके नाम पर परदा डालते हैं। कितने तक तो ऐसे हैं जो साहबका नाम सुनकर जल भरते हैं। क्योंकि, वैसे सब मनुष्य झूठ तथा काम क्रोधादिकी वासनाको हृदयसे चाहते हैं। इसी कारण सत्यपुरुषकी भक्तिसे भागते हैं एवं कालपुरुषकी भक्तिको पसन्द करते हैं। असत्य पन्थ, भयानक, संकीर्ण, एवं सत्यपूर्ण प्रकाशमय तथा मुक्तिप्रद है।

उल्लू, छुलूँ दर और चमगीदड़ इत्यादि जितने इस प्रकारके जीव हैं उनको प्रकाशसे बड़ीही घृणा है, वे अन्धकारको ही चाहते हैं। अन्धकारमेंही उनका समस्त कार्य होता है। जबतक प्रकाश रहता है तबतक वे किसी अन्धकारमय गड्ढेमें छिपे रहते हैं। जब अन्धकार होता है तब हर्ष सहित बाहर निकलते हुए अपना कार्य करते हैं। इसी प्रकार सब पामर पुरुष स्वसंवेदकी शिक्षासे भागते हैं। इन जीवोंकी आंखे प्रकाश देखना स्वीकार नहीं करती, उनके हृदयमें वह सत्य बल नहीं है। सांसारिक वासनाओंने उनको नितान्तही अयोग्य कर दिया है, इस कारण वे विवश हो रहे हैं।

कबीर साहबने पहलेसे कहा है कि, मैं समस्त संसारका उद्धार कर सकता हूँ। मेरे ही द्वारा मनुष्य मुक्ति पाता है। कोई दूसरी युक्ति नहीं है। वही बात नीरू जुलाहे और नीमा जुलाहीसे कही। जब कि, कबीर साहब केवल एक

दिवसके बालकके समान थे। जब कबीर साहब पाँच वर्षके बालकके स्वरूपमें रामानन्द स्वामीके समीप थे वही बात कहते रहे, वही बात धर्मदास तथा राजा वीरसिंह इत्यादिसे भी कही। वही बात नब्बे वर्षकी अवस्थामें शाह सिकन्दर लोदोसे कही है। वही बात मुहम्मद साहबसे मोरआजके समय कहीं, उनको कोई सन्देह नहीं रह गया। मुहम्मद साहबसे प्रतिज्ञा हो गयी कि, जब आप मुझको फिर मिलोगे तब मैं आपके साथ लोकको चलूंगा। मुहम्मदसाहबको मुक्तिपानका बीड़ा दिया और कहा कि, अब तो तुम यह बीड़ा लो फिर तुम्हारे अनुयायियोंको मिलेगा और सब मुक्ति पावेंगे, तुम अब इसलाम धर्मको प्रचलित करो, तुम्हारे ऊपर जगदीश्वरी कृपा है, मैं अब भारतवर्षमें जा, रामानन्दको अपना गुरु बनाकर अपना धर्म प्रचलित करूँगा। यही बात सुलतान इबराहीम अहम इत्यादिसे कहते चले आये हैं कि, मैं समस्त संसारका मुक्तिदाता हूँ, इसी प्रकार अधिकारियोंको भी अपना तेज दिखाते आये हैं। यह बात सदैवसे होती चली आई है कि, जिन लोगोंने कबीर साहबका पूरा पता पाया वे तो समस्त काम क्रोधादिपर अधिकृत हुये पर जिन्हें पूरा चिन्ह न मिला योग्यता में कुछ न्यूनता रह गई उनको भी भविष्यके लिये आशा दिलायी गयी। इस सत्यगुरुका प्रताप तीनों कालमें समान रूपसे छा रहा है। यदि अन्धा सूर्यको न देखे तो इसमें सूर्यका क्या दोष है।

जिन्हें अपने पुण्यका घमण्ड हुआ है तथा सद्गुरुके शरणमें न आये वे सभी फँसे रहे एवं जो लोग अपनी योग युक्ति और समाधि आदिका गर्व रखते हैं वे ध्यानपूर्वक देखलें कि, गोरखनाथसे बढ़कर इस संसारमें कोई नहीं हुआ उन्होंने भी बाहर भीतरकी चारों ओरोंसे देखकर इस साहबकी शरण ली और पूर्वकालमें बढ़कर जो योगी हुये थे उन्होंने भी कबीर साहबकी शरण लेकर मुक्ति पथ पाया है। दूसरी युक्तिसे किसीको राह नहीं मिली। संन्यासियोंमें दत्तदिगम्बरसे बढ़कर भी जो कोई संन्यासी हुआ वे भी सद्गुरुकी ही शरण ली। वैष्णवोंमें रामानन्द सबसे श्रेष्ठ हैं। उन्होंने भी साहबको शिष्यके रूपमें स्वीकार किया, जैनियोंमें ऋषभनाथसे बढ़कर कोई नहीं हुआ वे भी सत्यगुरुको पहचानकरही भ्रमसे अलग हुये। षट्दर्शन तथा छचानवे पाखंडमें जिन लोगोंने सद्गुरुको पहचानकर शरणली, उनको सुख मिल गया। इसी प्रकार विदेशीय मनुष्योंमेंसे भी जिनने उसे पहचाना वे आनन्दको प्राप्त हो गये मुहम्मदसे बढ़ कर कोई मुसलमान नहीं हुआ उनको भी उसीने श्रेष्ठ पद दिया। जितने पीर पैगम्बर इस पृथिवीपर प्रगट हुए, जिसको उसने उबारा तथा प्रतिष्ठा

प्रदान की वही प्रतिष्ठित हुआ । जिस किसीपर उस परमेश्वरकी दया होती है वह किसी समय किसी अवस्थामें भी हो किसी जगहमें हो नियचय सौभाग्य और स्वतन्त्रता प्राप्त करता है । कोई किसी धर्ममें क्यों न हो जब उसका पुण्य पूर्ण होता है उसको तब सद्गुरुकी कृपासे सत्यपुरुष अपना दर्शन देकर समझाते हैं कि, मुझको पहचान में समस्त सुकर्मोंका फल देनेवाला हूँ । मैं सब ईश्वरोंका ईश्वर सर्व श्रेष्ठोंका श्रेष्ठ और सब खुदाओंका खुदा हूँ । मैं ही तुझे मुक्ति देनेवाला हूँ दूसरा कोई नहीं । यदि उस मनुष्यने कहना मान लिया तो उसका कार्य पूरा हो गया, जिसने कहना न माना वह गया बीता होकर कालका भोजन बना, चौरासी लाख योनिमें पड़ा गेता खाया । कितने महान् तपस्विओंने उस सत्य गुरुका उपदेश तो सुन लिया परन्तु उसके अनुसार न चले उस कारण उनका छुटकारा न हुआ । जो कोई अपने कार्योंपर भरोसा रखता है उस सत्य-गुरुकी शरणमें नहीं आता, वह न छूटा और न कभी छुटकारेकी राहही प्राप्त कर सकेगा ।

मन तथा इन्द्रियोंके जितने जीव वशमें हैं वे अवश्यही फँसे रहेंगे । उनसे उनकी वासना कदापि पृथक् न होगी, वे सदैव कालपुरुषकी गुलामी करेंगे । जो लोग मन तथा इन्द्रीके बन्धनसे छूट गये हैं वे ही मुक्त हैं । मन तथा इन्द्रीका बन्धन कबीर साहबकी दया बिना कभी भी न छूटेगा । मायाके बन्धनमें पड़े हुये लोगोंका परमेश्वर कालपुरुष है, मायासे मुक्तोंका ईश्वर सत्यपुरुष है । यही दो धर्म इस संसारमें हैं तीसरा धर्म कोई नहीं है । कच्छी देह तो कभी भी वासनासे पृथक् न होगी पक्की देह बिना कबीरसाहबकी कृपाके न मिलेगी ।

किसी मनुष्यको सुधि नहीं कि, वह कौन जान और किस ध्यानमें है जिससे मनुष्यकी मुक्ति हो । शरीरअत (कर्मकांड) तरीकत (उपासना काण्ड) हकीकत (ज्ञानकाण्ड) और मारफत (विज्ञान काण्ड) तककी सबको सुधि है, आगे कोई क्या जाने कि, किस विद्यासे मनुष्यकी मुक्ति होती है ? सो ये चारों विश्वास बन्धनही हैं । इन चारों श्रेणियोंके जीव कालपुरुषके बन्धनमें पड़े हैं । कबीर साहबने दश श्रेणियाँ बताई हैं जिसकी दशवीं तथा अन्तिमकी श्रेणीमें सारशब्द है । जब जिस किसीको इस सार शब्दका ज्ञान प्राप्त हो तो उसकी मुक्तिकी आशा हो सकती है । जब तक वह सारशब्द प्राप्त न हो तबतक लोक वेद तथा कालपुरुषके बन्धनमें ही पड़ा रहेगा । ऐसा कौनसा सिद्ध साधु पीर पैगम्बर इस पृथिवीपर है जो बिना कबीर साहबके सारशब्दका समाचार कह सके । वह सारशब्द तो केवल उसीके आधीन है दूसरा कोई नहीं जानता ।

जिस किसीने पाया उसीसे पाया और दूसरा कोई गुरु इस पृथिवीपर नहीं कि, उस सारशब्दका पता देसके, संसारी मनुष्य तो जानतेही नहीं कि, सारशब्द क्या पदार्थ है ? कहाँ है, किस प्रकार किस गुरुके द्वारा प्राप्त हो सकता है ? शब्दको तो सब मानते हैं परन्तु सार शब्दको कोई नहीं जानता । शब्द तथा वाक्यादि तो मन इन्द्रीकी पकड़में आता है परन्तु सारशब्द तो मन इन्द्रीकी पकड़के नितान्त बाहरकी बात है ।

मनुष्य बेचारा क्या करे मन इन्द्री आदि तो सब मिथ्या हैं उनके साथ यह भी बिलकुल मिथ्याका रूप बना हुआ है सत्यताको कैसे स्वीकार कर सकेगा क्योंकि, जब यह सत्यकी ओर झुकता है तो देह और जगत सब छोड़ना पड़ता है । मिथ्याकी ओर मनको फेरता है तो सच्चाईकी सूरत भी दिखाई नहीं देती, आखेट उसके हाथ नहीं आती । यह अपने शरीरके भयसे गहरे जलमें गोता नहीं मारता । जबतक गहरे जलमें गोता न मारे तबतक वह सफल मनोरथ न होगा । देखो कैसे कैसे बादशाह लोग और सिद्ध साधुगण कबीर साहबके शिष्य हुये उन सबोंने सांसारिक धन देह तथा संसारकी सर्व मामग्रियोंको तृणके समान तथा घृणित वस्तु समझकर त्याग दिया । जिन लोगोंने संसारसे प्रेम किया वे फँसे रहे यह संसार झूठा है उसके बनानेवालेकी जादूगरीका खेल है । जो कोई इस खेलमें फँसा हुआ है उसको कदापि सत्यता दिखाई न देगी । यदि मनुष्योंको प्रत्यक्षमें सत्यका स्वरूप दिखाई देता तो वे मिथ्याको भी स्वीकार न करते । सत्यताका यथार्थ स्वरूप छिपा रहनेके कारण लोग मिथ्याको सत्य करके मान रहे हैं झूठकोही सत्य जान रहे हैं यदि सत्य प्रत्यक्ष होता तो संसार न होता । जैसे सूर्यके सामने रात नहीं ठहरती इसी प्रकार सत्यके सामने मिथ्या नहीं ठहर सकती ।

इस पृथिवीपर जितने मनुष्य हैं सो सबके सब वृत्तपरस्त^१^ हैं । कोई परमेश्वरकी पूजा नहीं जानता, जिसको कबीर साहबने परमेश्वरकी पूजा सिखाई है वही परमेश्वर पूजक हुआ है शेष सब बुतपर हैं । जितने लौकिक नाम हैं वे सब उसी मूर्तिके हैं कोई परमेश्वरका नाम नहीं जानता परमेश्वरका नाम वही जानेगा जिसको स्वयम् कबीर साहब बतावें । जितनी सांसारिक भजन तपस्यायें हैं वे सब विषय भोगके लिये की जाती हैं । जितने फल, दान,


^१^ सत्य पुरुष परमात्मासे अतिरिक्त जो कुछ है उसको वृत्त कहते हैं उसके माननेवालेको वृत्तपरस्त कहते हैं । यद्यपि मुसलमान या दूसरे धर्मवाले हिन्दुओंको वृत्तपरस्त कहते हैं, परन्तु विचार करके देखा जाय तो सभी मतोंवाले वृत्तपरस्त ठहरेंगे जो विषय वासनाके वश हो स्त्री आदि व्यभिचारके साधनोंमें लगे रहते हैं वे एक राग मानके वशमें हैं ।

पुण्य, यज्ञ और प्रार्थना इत्यादि सांसारिक शुभ कर्म हैं । उन सबका लक्ष इसी ओर है । जो कोई परमेश्वर की पूजा किया चाहे वह कबीर साहबके चरण पकड़े क्योंकि, बिना उस सत्यगुरुकी दयाके किसीको परमेश्वरकी पूजा मालूम नहीं होती । सब मनुष्य गपाटामें लग रहे हैं, । किसीको सत्यकी सुधि नहीं कि, सत्य वस्तु क्या है ?

अनगिनती ब्रह्माण्डोंका रचयिता स्वामी जो जगद्गुरु जगदीश्वर है वो अपनेको एक साधारण मनुष्यके सदृश संसारमें छिपाये फिरता है । वह परमेश्वर अपनी सृष्टिमें ऐसा छिप रहा है कि, जैसे दूधमें घी छिपा हुआ है । वह प्रत्यक्षमें हाँक मार मार कर कहता और पुकारता फिरता है कि, ऐ मनुष्यों ! तुम मुझको पहचानो, मैं समस्त संसारका रचयिता तथा परमेश्वर हूँ । मेरी शरणमें आओ, मैं तुमको यमकी फाँसीसे बचा दूंगा । दूसरे किसीमें ऐसा सामर्थ्य नहीं है कि, तुम्हारा छुटकारा कर सके । वह जो कुछ कहता है सो प्रत्यक्षमें अपने ऐश्वर्य का तेज प्रगट दिखलाभी देता है किसी दूसरेमें यह सामर्थ्य नहीं सहस्रों जन परमेश्वरीका दावा करते हैं पर दिखला नहीं सकते, इसी कारण उनका दह दावा झूठा है, इस कारण वे कालके जालमें फँसेंगे उसके अनुयायी नष्ट भ्रष्ट होंगे । उसीका दावा करना सच्चा है जो दावा करे वही प्रत्यक्षमें दिखला भी दे । जो दावा करके दिखला न सके वह दावा करनेवाला झूठा है । वह अवश्यही आपत्तियोंमें फँसेगा उसके पीछा करने वाले भी उसीके समान नष्ट होंगे । वही एक सच्चा साहब है जो कुछ कहता है वह कर दिखाता है, वही अद्वितीय है और वही समस्त हंसोंका पार उतारनेवाला है सिवा उसके दूसरा कोई नहीं है ।

समस्त संसारके रचयिताने तीन युग अर्थात् सत्ययुग, त्रेता, द्वापरमें इस प्रकार स्वयम् स्थान स्थान पर फिर कर लोगोंको मुक्ति प्रदान की, जब चौथा युग कलियुग आया निरञ्जनके साथ नै वचन हो चुका था वह पूरा हो गया तब साहबने अपना पन्थ पृथिवीपर प्रचलित करना चाहा अपने विशेष अंशोंको पृथिवीपर भेजकर धर्म प्रचारकी इच्छा की । तब सुकृतिजी (धर्मदास) को पहले आज्ञा दी कि, तुम चलकर संसारमें अब सत्यपन्थका प्रचार करो । तुम्हारे बयालीस वंश पृथिवीपर पन्थ चलावेंगे, जगत्की गुरुवाई करेंगे । उस सब स्वामियोंके स्वामीकी आज्ञानुसार धर्मदासजी पृथिवीपर आये, बाँधो गढ़में प्रगट हुये । साहबने देखा कि, हंसोंका बादशाह धर्मदास पृथिवीपर जा चुका है । तब सत्यगुरुने रामानन्दजीको भेजा कि, बनारसमें जा रहो, मैं तुम्हें अपना गुरु करके भक्तिका प्रचार करूँगा ।

इस संसार में दो सम्प्रदाय हैं—एक दैवी सम्प्रदाय और दूसरी आसुरी सम्प्रदाय । दैवी सम्प्रदायके आचार्य विष्णुजी हैं और आसुरी सम्प्रदायके आचार्य गुरु शिवजी हैं । विष्णु सम्प्रदायमें समस्त देवते और साधु इत्यादि संयुक्त हैं । शिव सम्प्रदायमें भूत, प्रेत, राक्षस और दैत्य इत्यादि हैं । दैवी सम्प्रदाय द्वारा भक्ति तथा मुक्ति की राह मिलती है, आसुरी सम्प्रदाय आवागमनके बन्धनमें फँसाती है । यही कारण है कि, आसुरी सम्प्रदाय को छोड़कर सद्गुरुने दैवी सम्प्रदायका महत्त्व दिखानेके लिये इसी संप्रदायकी दीक्षा ली । जम्बूद्वीपमें अपना पन्थ स्थिर किया, धर्मदासजीके वंशको समस्त संसारकी गुरुआई प्रदान की ।

समस्त पृथिवीमें भारतवर्ष देश धर्म कर्म और ज्ञान ध्यानका स्थान है । उसके समान कोई देशही नहीं है, न कहीं ऐसा धर्म स्थान ही है । पहले समस्त संसारमें वृत्तपरस्ती प्रचलित थी, किसी को तनिक भी सुधि नहीं थी कि, परमेश्वर पूजा कैसे कहते हैं वो क्या है ? किस रीतिसे होती है ? सब मनुष्य वृत्तपरस्त हो गये थे । परमेश्वरी पूजा संसारसे उठ गयी थी । परन्तु भारतवर्षमें उस समय भी कहीं कहीं दैवी सम्प्रदायके लोग विष्णु तथा राम-कृष्णकी भक्ति करते थे । शेषमें हनुमान, भैरव, चण्डी, भूत, प्रेत, देवी, देवता और अनगिनती प्रकारके भ्रमभूत पूजे जाते थे इसी प्रकार मिथ्या पूजाकर करके भी मनुष्य कालके प्राप्त बनते जाते थे । समस्त भारतवर्षमें प्रायः भ्रमभूतकी पूजाका प्रभाव फैल रहा था केवल द्राविड़ देशमें रामकृष्णकी भक्ति ही रही थी । उस देशसे रामानन्दजी भक्ति लेकर आये तथा अन्यान्य देशोंमें प्रचार किया । इस भक्तिद्वारा मनुष्य सत्यपुरुषकी भक्तिपर अधिकृत होजाता है । यह सतोगुणी भक्ति सीधी मुक्ति मार्ग है । जब कोई मनुष्य इस सतोगुणी भक्तिकी पूर्णताको पहुँचता है तब वह विशुद्ध परमात्मा प्रसन्न होकर अपनी यथार्थ भक्ति प्रदानकर परमधामको लेजाता है । रामानन्द स्वामीने सतोगुणी भक्तिका पहले भारतवर्षमें प्रचार किया । इसी कारण कहा करते हैं कि—

साखी— भक्ति द्राविण ऊपजी, लाये रामानन्द ।

प्रगट कियो कबीरने, सातद्वीप नौखण्ड ॥

जब रामानन्दने भक्तिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया तब सत्यपुरुषकी दया हुई उनको उच्च पदवीपर आरूढ़ किया स्वयम् आप उनके शिष्य बन गये । उनका नाम समस्त संसारमें प्रकाशित कर दिया । रामानन्दकी श्रेष्ठता स्वर्ग पर्यन्त पहुँची । धर्मदासके बयालीस वंशको यह श्रेष्ठता प्रदान की जो कि,

सब हंसोंका सरदार बनाया जिससे वे समस्त भ्रम और बुतपरस्तीका बीज पृथिवीसे मिटा दें । जिससे कि, कोई भी मनुष्य भ्रम भूतकी पूजा करके काल-पुरुषके बन्धनमें न पड़ने पावे ।

इस संसारमें दो सम्प्रदाय ठहराये हैं प्रत्यक्षमें भी दोनों प्रकारके मनुष्य दिखाई देते हैं । दैवी सम्प्रदायमें कदाचित् कोई कुकर्म करता होगा पर आसुरी सम्प्रदायका व्यक्ति कदाचित्ही कोई सुकर्म करता होगा । इसी प्रकार कितने योगी तथा सन्यासी अच्छा करते हैं परन्तु उनके भीतरी रीति व्यवहारपर जब दृष्टि जावेगी तब चित्तको अत्यन्त घृणा होगी । संन्यासियोंमें दण्डी तथा दिगम्बर ये अच्छे सन्यासी हैं । परन्तु उनका अहं ब्रह्म मानलेना बन्धनका कारण है । इसी कारण आसुरी सम्प्रदाय सर्वथा त्याज्य है । जिन लोगोंने काम क्रोध आदि सब वासनाओंको त्याग दिया, अभिमान ईर्षा, भ्रान, बड़ाई, सब छोड़कर धर्मदासजीके समान सत्यगुरुके चरणोंकी धूल हुये वे पवित्र हो गये, वेही हंस कबीर हैं ! जिन लोगोंने अपनी श्रेष्ठता चाही सत्यगुरुके नामको छिपाया, सांसारिक कामनाओंसे मन लगाया, उनको वह पद कभी भी प्राप्त न होगा । हाँ ! सत्यगुरुके शरणका फल उनकी भक्तिके अनुसार उन्हें अवश्य मिल जावेगा ।

धर्मदासजीने सब अभिमान त्याग दिया था, भान बड़ाईको छोड़ दिया था, सांसारिक वासनाओंको शेष न रखा था, वार पार सत्यगुरुके सिवाय दूसरे किसीको भी न जाना था इस कारण कबीर साहबने धर्मदासजी और उनके वंशको अपना स्थानापन्न किया, अपना अधिकार उनको प्रदान करके जीवोंके कल्याण करनेकी आज्ञा दे दी थी ॥

अध्याय १७.

बन्धनके कारण ।

हृदय

अपने मनको देखो इसपर विचार करो कि, यह किससे उत्पन्न हुआ क्या है, यदि पूरा विचार करोगे तो पता चलेगा कि, यह सर्व शक्तिमान् है । प्रत्येक मनपर इस मनकाही राज्य है । सब मन इसके वशमें हैं, इसी मनके बनाये हुये यही मन सबके हृदयोंमें है । जब अपना मन वशमें आ जाता है तब यह मन मृत कहलाता है । जब अपना मन मृत्यु हो जाता है तो समस्त संसारके मन नष्ट हो जाते हैं । न फिर काल है न मैं हूँ न तू है । सब एक रङ्ग और ही