सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

आद्या और कबीर नाम मालाका संक्षेप

लगी तो निश्चयही काट खावेगी जिससे मनुष्य मर जावेगा । जीवित रहनेकी आशा न रह जावेगी । केवल उसके विषका औषध यही है कि, तन मन धनसे साधु सेवा करे तो बचेगा नहीं तो अवश्यही मर जावेगा । अतः यह हथियारबन्द अस्त्री समस्त संसारको मारने तथा खानेके लिये बनी है ।

मनने तनको बनाया और तनने धनको बनाया । इस कारण तन और धन दोनोंका रचयिता मन है । तन और धन जब दोनोंको छोड़दे और परमेश्वरमें लीन होजावे तब वस्तुतः मन पर विजय पानेकी आशा देख पड़ती है । जबतक मनके सत्वका इच्छुक रहेगा तबतक अवश्यही मनका गुलाम बना रहेगा । कुण्डलिनी शक्ति और मनका मुंह नीचेकी ओर है । यह स्पष्ट प्रगट करता है कि, मेरे साथ प्रेम करनेवाले मनुष्य नीचेके स्थानोंको जायेंगे अर्थात् नरकको पावेगे और सदैवके लिये आवागमनके बखेड़ेमें फँसे रहेंगे मेरे विषकी औषध कदापि उनके हाथों न पड़ेगी । इस विषकी औषध तो केवल पारखगुरुकी दया है । पारखगुरु उसके विषको पृथक् कर सकता है दूसरा कोई नहीं कर सकता । पारखगुरु साधुसेवासे दयालु होता है । जब सुकृत अथवा सुकर्म पूर्णताको पहुँच जाते हैं तब उसकी कृपा प्राप्त होती है । इस नागिन तथा नागके भेदको केवल हंस कबीर जानते हैं दूसरा कोई जान नहीं सकता । इस नागिनीने सब जीवोंको डंक लगाया है सभी अचेत तथा बधिर हो रहे हैं । यह कुण्डलिनी महामाया वासनास्वरूप है । जिसका ध्यान उसकी ओर होता है वह कामनाओंसे भर जाता है ।

इसी इच्छा अथवा वासनास्वरूप स्त्रीका समस्त कारखाना है । जो वासनाओंसे भरा हुआ है वो सब इसी महामायाका खेल और कौतुक है । इसी बाजीगर और बाजीगरनीने अपना कौतुक दिखाके सब जीवोंको अन्ध कर रक्खा है । जो इस बाजीगरको पहचान सकेगा उसके बन्धनमें न आवेगा वही मन मायाके पार जानेका पथ पावेगा । जो कोई योग युक्तिसे कुण्डलिनीको जगाकर सुषुम्नाके द्वारको निरापद बना लेगा वही उत्तम योगीराज वासनाओंको जीतकर निष्कंटक हो जायगा ।

कच्चे गुरुवोंने इसको वेद तथा शास्त्रके यथार्थ अभिप्रायको तो न समझाया दूसरी रीति पर समझाकर भ्रममें डाल दिया है ।

कर्म

जब कालपुरषने सृष्टिकी उत्पत्ति की तब कर्मका जाल बनाया । वे कर्म दो प्रकारके हैं । एक शुभ दूसरा अशुभ । ये दोनों कर्म बड़ी बेड़ी हैं । इन दोनों

कर्मोंकी बेडीने समस्त सृष्टिको बाँध लिया है। जो कोई शुभ कर्म करता है वो सांसारिक धन स्वर्ग वैकुण्ठ इत्यादि सब सुखकी सामग्री पाता है उस पुण्यका अन्तिमफल अन्तःकरणकी बुद्धि है। इससे अधिक नहीं। ऋषीश्वरोंने कठिन तपस्या की और योग समाधि तथा पूजादिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया। दाससे स्वामी बन गये तो भी कर्मक्षय न होनेके कारण बन्धन न छूटा आवागमनमें फँसे रहे। कालपुरषने सबको इन्हीं दोनों कर्मोंमें बाँध लिया है। इस कर्मके तीन भेद हुए हैं। कर्म, अकर्म, विकर्म। कर्म तो मनुष्यको करना उचित है। अकर्मसे दूर भागना और विकर्मसे मनुष्य अपनेको मुक्त और भाग्यवान् बनाता है। जो शास्त्रानुसार कर्म ईश्वर निमित्त किया जाता है वह विधि है। दूसरा अकर्म। जिससे लोक परकलौमें कहीं सुखकी प्राप्ति नहीं होती है, उसे शास्त्रसे निषेध कहते हैं, यह अकर्म ईश्वरके विरुद्ध है। विकर्म उसको कहते हैं जिसके करनेसे कर्मसे छूटे बंधनकी पाश टूटे और ज्ञान लाभ हो पहिले स्वर्ग आदिका लालच दिखाकर कर्म करवाते हैं। इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादिके सुखका त्याग है। जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़डू दिखाकर औषधि देता है उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिका लालच मनुष्योंको दिखाया गया है। फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ है। सञ्चित प्रारब्ध और क्रियमान। सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षा पूर्वक रखा हुआ हो। यह सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा। दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं। इसी प्रारब्ध कर्मके अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है अर्थात् अपने पूर्व कर्मानुसार शरीर बना है जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है। अहम्के अर्थ मैं हूँ। अहम् बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है। जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है जो वृक्षोंके पत्तों पर रहता है। जब यह एक पत्तेको छोड़कर दूसरे पत्ते पर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पँरोंको पत्ते पर जमा लेता है। जब उसके अगले पँर दूसरे पत्ते पर भली प्रकार जम जाते हैं तब वह अपने पिछले पँरोंको भी खींचकर दूसरे पत्ते पर जमा लेता है और अगले पत्ते पर भली प्रकार जमकर बैठ जाता है। पिछले पत्तेसे सम्बन्ध छोड़ देता है। इसी प्रकार उस जीवका भी आवागमन हुआ करता है। ब्रह्मासे लेकर सर्व जीवोंमें अहंकार भरा हुआ है। जिसमें अहंकार नहीं उसका आवागमन नहीं। अहम् बोलनेसे उसके आवागमनका सम्बन्ध बराबर जारी रहता है। वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावों

में चारोंखानमें समा रहा है । अहम् कम्मोंका आकर्षण है । जो एक योनिसे खींच कर दूसरीमें ढाल देता है जैसे कि, चूर्मक लोहेको खींच लेता है ।

तीसरा क्रियामाण कर्म वह है जो अब कर रहे हैं । यदि यह क्रियामाण कर्म बलवान् होकर शुभ वा अशुभकी ओर झुका तो वह अपना रङ्ग दङ्ग दिखला देता है । यदि वह शुक्कर्मकी ओर झुककर सुकम्मकी पूर्णता करले तो वह अपने स्वरूपको प्राप्त करा देता है । यदि अशुभकी ओर झुका तो जड़योनिमें जा समाता है, नरकके समस्त दुःखों तथा अत्यन्त कष्टोंमें अपनेको डालकर कंकड़ पत्थरकी तरह बेकाम कर देता है फिर उसको सुपथ नहीं मिलता । सुपुरुष महाकर्ता, महाभोगी और महात्यागी इन भेदोंसे तीन प्रकारके होते हैं । महाकर्ता उसको कहते हैं कि, जो कर्म करता है और अपनेको कर्ता नहीं मानता । महाभोगी उसको कहते हैं कि, जो सब भोग भोगता है और अपनेको भोगता नहीं मानता । महात्यागी उसको कहते हैं जो अहंकारको त्याग दे । इस त्यागका गुण तब जाना जाता है जब उसको अन्तरदृष्टि होती है । जबतक इन बातोंका गुण भली प्रकार नहीं जाना जाय तबतक वेद और पुस्तक पाठसे कोई लाभ नहीं होगा । अन्तर दृष्टिसे जाना जाता है कि, ये तीनों क्या बात हैं ।

महाकर्ता तो यह तब होता है कि जब यह अन्तर दृष्टिसे भली भाँति देखता है कि, मैं कुछ करही नहीं सकता, मैं किसी कार्य्यका कर्ता नहीं हूँ, केवल मैं अपनी मूर्खतावश आपको अपने कार्य्यका कर्ता समझ रहा हूँ । यह समस्त संसार कलके सद्गुण चल रहा है । मेरा और किसीका कोई वशही नहीं कि, कोई काम करे । न मालूम वह कौन है जो मुझको तथा समस्त संसारको चला रहा है । जब मैं कुछ करताही नहीं और न मेरा किया कुछ हो ही सकता है । ऐसी अवस्थामें यह अपनेको कम्मोंका कर्ता नहीं मानता, जब यह अपनी अंतर दृष्टिसे भलीप्रकार देख लेता है तब फिर यह दूसरी ओर ध्यान नहीं देता, जानता है कि, जब मैं किसी कार्य्यका कर्ता ही नहीं तो मैं व्यर्थही अपनेको क्यों कर्ता ठहराऊँ । तब वह इस अज्ञानतासे पृथक होता है । संसारी इसी अज्ञानतामें फँसा रहकर आपको अपने कम्मका कर्ता समझ कर दुःख सुखमें धक्के खाता है । मैं क्यों अहम् बोलता हूँ नहीं जाने मुझे कौन अहम् बुलाता है, कौन डोलाता है । अतः इससे जाना गया और प्रमाणित हुआ कि, मुझको मेरे कार्य्यके बन्धन अहम् बोलाते हैं और दूसरा कोई नहीं । जब मैं अपने कम्मोंके बन्धनसे छूट जाऊँगा तो मेरा अहम् बोलना भी छूट जायेगा । जबतक यह आपको कार्य्यका करनेवाला मानता है तब तक यह क्रियामें आपको स्वतन्त्र समझता है । जब यह

अन्तर दृष्टिसे भली भाँति निगाह कर लेता है कि मैं अपने कर्म्मोंका कर्त्ता नहीं तब अपने शुभ अशुभ कामोंको परमेश्वरको सौंप उसके शरणमें होकर उससे सहायता माँगता है, जान लेता है कि, मेरे कार्य्य भुझको बचाने योग्य नहीं, मैं सत्यगुरुकी शरण लूँ, इसके अतिरिक्त और छुटकारेका कोई उपाय नहीं है। अपनी अज्ञानताके कारण मैं अपने कार्य्योंका कर्त्ता आपको जानता था परन्तु आगे ऐसा कदापि न करूँगा। यदि यह स्वतन्त्र होता तो सब कुछ कर लेता। फिर अपनेको दीनता तथा दुर्दशामें कदापि नहीं फँसाता। एक दिनका वृत्तान्त है कि, एक पादरी साहब आकर मेरे पास बैठे और बाद विवादपर प्रस्तुत हुये। उसने कहा कि, मनुष्य अपने कार्य्योँमें स्वतन्त्र हैं। इसपर मैंने उत्तर दिया कि, यह बात कदापि नहीं कर्म स्वतन्त्रता किसीको प्राप्त नहीं। सब कलके समान गतिमान हैं। सुतरां तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तक देखो जब आदम उत्पन्न हुआ खुदाने उसको मना किया कि, तू यह कार्य्य कदापि न करना और इस वृक्षके फलको न खाना। आदमने न माना और खाया। जिससे वह ऐसा दुर्दशा प्रस्त हुआ कि, फिर न संभला।

यदि आदम कर्म करनेमें स्वतन्त्र होता तो ऐसा कदापि न होता। फिर आदमके पुत्र काबील और हाबील हुए वे भी तो ऐसेही थे। क्योंकि दोनोंने एक दिवस परमेश्वरके समक्ष भेंट चढ़ाई। छोटे भाईकी भेंट तो स्वीकृत हुई पर बड़े काबीलकी अस्वीकृत हुई इस कारण काबील अत्यंत क्रुद्ध हुआ। परमेश्वरने कहा कि, ऐ काबील ! तू क्यों क्रोध करता है ? यदि तू अच्छे मनसे देता तो क्या तेरी भेंट स्वीकार न की जाती ? परन्तु तू अपने भाईपर जय पावेगा। काबीलने अपने भाईपर जय पाई उसको मार डाला। परमेश्वरने उससे पूछा कि, तेरा भाई हाबील कहाँ है ? तब उसने उत्तर दिया कि, मैं नहीं जानता क्या मैं अपने भाईका रख-वाला हूँ। इसपर खुदाने उत्तर दिया कि, तेरे भाईका खून मुझे पुकारता है। अब तू हत्यारा तथा दोषी हुआ यह कहकर खुदाने उसको श्राप दिया। भलाजी ! यह न्यायकी बात थी कि, खुदाने तो स्वयम् कहा कि तू अपने भाईपर जय पावेगा। उससे जय पाई और उसको मार डाला। फिर वह दोषी कैसे ठहरा ? यदि अपने भाईको न मारता तो खुदा झूठा होता और मारा तो दोषी हुआ, हजूरसे दूर किया गया। वह तथा उसकी सन्तान पापिष्ठी ठहरी।

ऐसाही नूहके विषयमें जानना चाहिये कि, नूह सिखाते सिखाते विवश हो गया। किसीने उसका कहना न माना। अन्तको बाढ़ आई और समस्त मनुष्य डूब मरे। कोई जीव सिवा उनके कि, जो नूहकी नावपर था नहीं बचा। फिर