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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तेरहवीं बेर शेख मन्शूर आदिको बोध करनेका वृत्तान्त कबीर साहिबके काशीमें चौदहवीं बेर प्राकटयकी उत्थानिका सत्य पुरुषकी आज्ञा, सत्य पुरुषके तेजका लहर तालावमें उतरना

यह खुशवक्त दौरों दिखाया हमें । परम पुरुष पैगाम आया हमें ॥
जमीं सारी सतनामकी हांक है । तो दर कामको मुक्तिकी झाँक है ॥
हुई सारे आलममें यह धूम धाम । तअस्युयतजो और भजो सत्यनाम ॥
जमीं सारी पर हुक्मरानी हुई । बाहर कौमपर मेहरबानी हुई ॥
यहूदी दितार मुसलमा हिन्दा । पढ़े कलमये सत्यनामे हुरूदा ॥
चार्तक^१^नाम साहबका एकदूसीस दौर । जमींपर न बाकी रहे यमका जोर ॥
बत्तीसवें बरामद हुए आदि^२^नाम । हुए सारे नफसानी हरकत गुलाम ॥
हैं तैतीसवें वेद^३^नामें बुजुर्ग । कि जिस सामने हो न शौता सतर्ग ॥
साहब आदि^४^नाम हुए तीस चार । कि उस महसे जीव हों कामकार ॥
महा^५^नाम साहब हैं पैंतीसवों । जमींपर हुवा है अमन ओ अमों ॥
छतीसवें हैं निज^६^नाम साहब खदीन । न बाकी रहे रेव कुछ नफस देन ॥
साहब^७^दास साहबका सैंतीस अक्ष । दियबारश इनसानके जिसने वक्ष ॥
उदय^८^दास साहस हों अडतीस पुशत । इलम दिलम सबमें न कोई दुरश्त ॥
कुरद^९^नाम साहबका नौतीस वक्त । बहरहो जहांजिनको है ताजो तख्त ॥
चेहेले दूग^१०^मुनि साहब नामले । तो सत्यलोकके आदमी सब चले ॥
महा^११^मुनि साहब नाम चालीस एक । बदी बेखकुत आदमी सारे नेक ॥
बयालीस^१२^मुक्तामनी साहब है । आखिर जमां सत्पुरुष नायब है ॥
यह जबतक बयालीस पीढ़ी रहे । परमधामकी जगमें सीढ़ी रहे ॥
बयालीस का जबतलक नाम है । न कब्बीर का जगत में काम है ॥
यह सद्गुरुके सब हंस हैं जानशीं । परम पुरुषके सार शब्द अभीं ॥
बयालीस जबतक रहेंगे बजीर । जहां में न जाहिर फिरें फिर कबीर ॥
बहर एक फरमाँ रवाई खिताब । कहे हैं खुदावन्द ऐसा हिसाब ॥
बरस इनके पच्चीस ओ बीस रोज । हरके तख्तपर होवें रौनक फिरोज ॥
हजार एक ऊपर दो पञ्जाही साल । महे तीन दिन बीस गद्दी बजाल ॥
इतें रोज सतपुर्ष फरसान है । जो आवे शरन सोई निर्बान है ॥
जो सतपुरुषके हंस गायब हुए । न हों बहरः वर कोई जो साय बहुए ॥
यह कलियुगमें सतयुग गुजर जायगा । पुरुष कालका अहद तब आयगा ॥
करे आदमी फिर जो तदबीर कोट । कभी सो सके नाबचा यमकी चोट ॥
मेरी बात जो कोई जाने दरोग । कभी फेर उसको न होवे फरोग ॥