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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कुरबानी

२८—नर्क स्वर्ग तथा अन्य सर्व लोक अज्ञानियोंके हेतु ठहराये गये हैं जिसको सत्य आत्मज्ञान प्राप्त हुआ उसके हेतु सब असत्य और भ्रम मात्र हैं ।

२९—सारशब्दके बिना मुक्तिका द्वार कोई भी नहीं है ।

३०—निन्दा, ईर्षा, वैमनस्य, छल, कपट, अभिसान आदि मुक्तिके बँरी हैं ।

३१—अधीनताके द्वारा सब शुभ गुण और पुण्य प्राप्त हो जाते हैं ।

३२—मुक्तिमार्ग बहुत सांकरा और नर्कका मार्ग बहुत चौड़ा है ।

३३—कबीर साहब विदेह हैं उनका देह कभी नहीं कल्पे है ।

३४—कौसीही विपत्ति क्यों न आपडे अपने सत्यगुरुको छोड किसी दुसरेकी सहायताका ध्यान न करे । सत्यगुरुके अतिरिक्त किसीसे भी किसी प्रकारकी आशा न रखे ।

३५—जो कोई सतगुरुकी शरणमें आवे उसे शरणके नियमोंको भली प्रकार पूर्ण करना उचित है । पूर्ण विश्वास रखे कि, सत्यगुरु अवश्य कालके जालसे निकालेंगे और दुखसागरसे पार करेंगे ।

३६—सत्यगुरुकी कृपाका धन्यवाद कभी न भूले क्षण क्षणमें धन्यवादही देता रहे । ऐसा नहीं कि, प्रथम तो प्रार्थना करे पीछे भूल जावे कृतघ्नी कभी मुक्त नहीं होता ।

३७—ईश्वरीय भय मुक्तिका चिह्न है । मृत्युको सदा स्मरणमें रखे ।

३८—सच्चे प्रेमके बिना भक्ति निष्फल है ।

३९—धन्य हैं वे जो शरीरका मोह छोडकर भक्तिमें लगते हैं ।

४०—उदारताके बिना कोई भी भक्तिका पद प्राप्त नहीं कर सकेगा । उदार दोनों लोकोंमें सुखी होता है । उसका थोडा पुण्यभी बहुत फलदायक होता है । कृपणके भजन और तपस्या निष्फल होते हैं चाहे वह जितना भक्ति और भजनका ढोंग करे । कृपण दोनों लोकोंमें दुःखकाही भागी होता है ।

४१—मौन परम उत्तम गुण है । आवश्यकताके अनुसार यथाअवसर बोलें, निरर्थक बकबक न करे । मिथ्या प्रलाप करनेसे आत्मा शरीर सबकी हानि है ।

४२—सत्य गुरु (कबीर साहब) की वाणीका पाठ करे, बारम्बार मनन करे, उनके आशयके ऊपर विचार करे, उनके भेदको भली प्रकार सोचे, समझे सदा काल उन्हींका चिंतन रखे । उनके आशय समझनेमें कोई भी युक्ति उठा नहीं रखे । सत्य गुरुके शब्दोंको यथा अवसर गावे और कीर्तन करे । सत्यगुरुकी प्रशंसा और प्रार्थना सदा करता रहे ।

४३—जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं ऐसा कबीर पन्थियोंको ध्यान करना चाहिये, परन्तु उनके मुक्ति दाता तो स्वयम् (कबीर साहब) और चार गुरु तथा उनके वंशोकोही ठहराया गया है, दूसरेको नहीं कहा ।

४४—किसीको कभी शाप न देना, किसीसे कुवचन न बोलना, एवं किसीका अहित चिंतन न करना चाहिये ।

४५—परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेको तुल्य जाने ।

४६—अभिमानी कभी परमात्माको ध्यापक नहीं देख सकता ।

४७—गुरुकी आज्ञाकारिताही परम तपस्या है ।

४८—जबतक शरीरसे लाड प्यार है उसके पोषणमें वृत्ति लगी हुई हैं इसमें आज्ञाकारिता असम्भव है ।

४९—मूर्ख, शठ तथा विद्याहीनको मुक्ति पद कभी नहीं मिलता ।

५०—जबतक शरीरका भय और चिंतन यानी देहाभिमान है तबतक विदेह पद कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो विदेहको प्राप्त हो ।

कबीर साहबके लोक तथा हंसोंकी कथा ।

कबीर साहबका वह लोक है जिसके कि, गुण कहने सुननेसे बाहर है । केवल स्वसंवेदही थोडासा विवरण करता है । जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समयके उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता । भला उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका कि एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान् है, जिसके कि सामने करोड़ों सूर्य छिप जावें, उन हंसोंके मनमें तनिक भी वासना नहीं रहती । निरञ्जन, आद्या, ब्रह्मा, यम, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाकेही आधीन हो बारम्बार अवतृत होते हैं—राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्मवासनासे अवतार लेते हैं ।

जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर चलकर प्रथम विष्णुको निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है । जब हंसकबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्द्वारा अपने पूर्ण बलसे ऊपरकी ओर चढे चले जाते हैं, ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं, तब धर्मराजकी तीन-सौ साठ कन्या मिलती हैं, जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण करूँ ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है

जो कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे । वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालें, जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्षद्वारा उनको सौहित करना चाहती हैं । परन्तु वे उनकी ओर तनिकभी ध्यान न देते हुए कहते हैं कि, दूर हो चली जा ? तुम्हारी तनिक भी इच्छा हमको नहीं है । तब वे निराश होकर लौटती हैं । भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं । जब हंस उनको अनादर करके चलते हैं, तब आगे धर्मराय मिलते हैं दंडवत् प्रणाम करते हैं, पीछे हंस ऊपरकी ओर चले जाते हैं । जब सत्यलोकको पहुँचते हैं, तब सत्यलोकके हंस उनकी अगवानीके निमित्त बाहर निकलते हैं, प्रत्येक हंस अपने हृदयसे लगाता, मिलता और प्रसन्न होता है, कहता है कि, बहुत दिवसोंके पृथक् हुये हंस आज हमसे आकर मिले । सभी हंस मिलकर उनको सत्यपुरुषके पास ले जाते हैं वे हंस सत्यपुरुषका दर्शनपा दंडवत् प्रणाम करके कृतार्थ हो लोकमें वास करते हैं ।

शोर' ।

भुर्गू रूह आखिरीं नफसको । जब छोडे इस उनसरी कसफको ॥
सतलोग सिधार साथ सतसाज । उस वक्त करे बुलन्द परवाज ॥
दर सिम्त शुमाल सर बसर जाय । बासुरअत सो उबूर कर जाय ॥
वह नूरो जलाल बेबयों है । गुप्ततारे कबीरमें आयों है ॥
जब सुकृत लोक रखरवों हो । रागोरंग देखते दवों हो ॥
देखे कहीं सज्जः लाल जारों । बाहुस्नो जमाल गुलअजारों ॥
सदहा गुलशन चमनबहारी । शीरीं नहरेँ पुर आब जारी ॥
गहे बर्क बदन है नाजनीनाँ । है खूब लगी बजारे मीनाँ ॥
है फिरते कहीं ये हूरो गिलमाँ । बैठे कहीं जाहिदो मुसलमाँ ॥
सैकड़ों प्रकारकी बस्तियाँ और सृष्टिकी रचना देखते हुए ऊपरको चलते हैं । स्वर्ग तथा वैकुण्ठकी सैर करते हुए समस्त बस्तियों और शून्यको पार करके पीछे सत्यलोकको पहुँच जाते हैं ।

कबीर साहबकी मङ्गलवाणी ।

चल हंसा सतलोक हमारे, छोडो यह संसारा हो ॥
यहि संसार काल है राजा, कर्म को जाल पसारा हो ॥
चौदह खंड बसे वाके मुखमें, सबहीं को करत अहारा हो ।

जारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥
ब्रह्मा विष्णू शिवतन धरिया, और को कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छलछल मारे, ले चौरासीमें डारा हो ॥
मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।
ताका रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भान उजियारा हो ॥
श्वेतस्वरूप शब्द जहां फूले, हंसा करत बिहारा हो ॥
कोटिन चांद सुरज छिपि जहँ, एक रोम उजियारा हो ।
वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृतधारा हो ॥
कहे कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥

इस सत्यलोककी मनोहरता और हंसोंका रहन सहन और रीति व्यवहार सूक्ष्मवैदके पढनेसे जाना जा सकता है ।

मुस'दस ।

यह हरदो जहां काल पुरुष के हैं इजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वैद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहां तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पाबन्द हुवा तिफली जवानी व वृद्धापा ॥
सब पर है लगा मलिक मौत मोन्ह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥
जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥२॥
अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत ।
एक इश्क जदः भई है एक हुश्न है औरत ॥
हर कौन कियों भौन है यह मोहिनी मूरत ।

१—यह मुसदस कबीर साहब की मंगलवाणीके भावका विशद अनुवाद है "चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो—“चल हंस अचल मोलिदो आताद हमारे” यह अनुवाद है। “यहि संसार काल है राजा, कर्मको जाल पसारा हो—इसका “यह हरदो जहाँ” यहाँसे “तलवार दो धारे” यहाँतक अनुवाद है, पर कुछ भाव बढाकर किया है। इसी तरह प्रत्येक पावके भावका कल्पना के साथ अनुवाद किया है विस्तारके भयसे पूरा नहीं मिलाते।

दिल पारः हुवा पारः बमह पारए सूस्त ॥
बाजार खड़े मार व वीमार नजारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ३ ॥
कैलास चलेगा व जिन् लोक् चलेगा ।
अमरावती अलकावती गोलोक चलेगा ॥
सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा ।
जो हृद जनो मर्द में सो लेछा चलेगा ॥
वोभी चल जावे जहां नौलाख सितारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ४ ॥
कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा ।
आवे जो वहांसे सो खबर उसकी कहेगा ॥
सब कौल कर शमः अजिले सोल बहेगा ।
जिसको वह नजर आवे सो फिर कुछ न चहेगा ॥
निश्चल सो रहे कायम जहां अमृत धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ५ ॥
हंसोंकी हुस्न खूबी कही जाए सो कैसे ।
यह नातिकः गुम सुम्म बर्या कीजिए ऐसे ॥
एक मूय मुनौविर कह इस नूर का जैसे ।
छिप जायें करोड़ों महेश्वर तलअत तैसे ॥
सब हंस पुरुषरूप पुरुष उनको दुलारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ६ ॥
जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा ।
सोहङ्ग ढुरै चँवर करे पुरुष अनन्दा ॥
यक मुरत सारे न खुदावन्द न बन्दा ।
इस मंजिल नजदीका नहीं कालका फंदा ॥
जिस लोक हमेशः को परमहंस पधारै ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ७ ॥
सतगुरुकी शरण लेके चलो बहूके उस पार ।
वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ।
कर पलमें सुबुकदोश उठा उसका गर्रा बार ।
पहुँचावे बतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥

आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ८ ॥

अध्याय ६.

कबीर साहबकी कुछ लीलाएँ ।

कबीर साहबकी लीलाएँ असीम तथा अनन्त हैं, जिनका कि विवरण किसी प्रकार किया नहीं जा सकता । क्योंकि, जब जब सृष्टि होती है तब तब कबीर साहब पृथ्वीपर प्रगट होते हैं, लोगोंको शिक्षा देनेके लिये कौतुक दिखलाते हैं, सत्ययुग त्रेता द्वापर और कलियुग इन चारों कालोंमें आपकी लीलाएँ एक तरहकी प्रगट होती हैं, उनकी गणना कौन कर सकता है, आप उत्पत्तिके आरंभसे महा प्रलयपर्यन्त मनुष्योंको सिखलाते और शिक्षा देते रहते हैं, अगणित लीलाएँ आपसे प्रगट होती हैं, प्रत्येक स्थानपर जा जाकर आप पुकारते हुए मनुष्योंको शिक्षा देते फिरते हैं, कोई कोई भाग्यवान् मान लेता है, नहीं तो प्रायः लोग आपकी बातों को सुनकर घृणा करते हुए भागते हैं । क्योंकि, समस्त मनुष्योंकी बुद्धिपर कालपुरुषने ताला चढ़ा रखवा है, इस कारण सत्यगुरुकी बातोंको कोई २ पसंद करता है । कालपुरुषका विष सबमें प्रवेशित हो रहा है । जैसे नीमके कीड़ेको नीमही पसंद है । मिश्री तथा चीनी उसके दक्किर नहीं होती । न नीमके अतिरिक्त और किसी वस्तुसे उसकी तृप्ति होती है । सहस्रों लीलाएँ देखते हैं, तो भी उनको विश्वास नहीं होता । समस्त कालोंमें जो लीलाएँ आपसे होती हैं, उनको लिखनेवाला कोई नहीं है । यदि समस्त समुद्रोंकी मसि बनावे, समस्त पृथ्वीका कागज करे, समस्त वृक्षोंकी कलमें हों, समस्त देवतागण लिखें तो कदाचित् कुछ लिख सकें तो लिख सकें । मुझसे तुच्छ मनुष्यमें क्या सामर्थ्य है कि, लिख सकें । क्योंकि, वह समस्त जगतका रचयिता और समस्त लोकोंका मालिक है । समस्त परमेश्वरोंका परमेश्वर है । उसके सामनेकी लीलाओंकी क्या गणना है ? जो समस्त महामान्योंका महामान्य है उसकी लीलाका विवरण व्यर्थ है । फिर भी अपने पाठकगणोंके मनोविनोदके लिये कुछ कौतुक नीचे लिखता हूँ ।

गरीबदासजीकी बाणी इत्यादिमें लिखा है कि, सम्मन नामका एक भक्त था । कबीर साहब शेख फरीद और कमाल सहित उसके घर गये उस समय सम्मनके घरमें भोजनके लिये कुछ नहीं था । सम्मनकी स्त्रीका नाम नेकी और पुत्रका नाम सीब था । सम्मनने अपने पुत्र और पत्नीसे परामर्श किया कि,