कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextचलती हुई नावपर बैठे हुये मनुष्योंको किनारेके वृक्ष आदि चलते हुये देख पड़ते हैं पर वे चलते नहीं यथार्थमें नौकाही चलती है ।
वे लोग यह भी कहते हैं कि, चन्द्रमा स्वयम् प्रकाशित नहीं है पर सूर्य के प्रकाशसे प्रकाशित है ।
पश्चिमी लोगोंका उपरोक्त कथन मुझे ठीक नहीं जान पड़ता वे लोग भारतीय विद्वानोंकी बातोंको प्रमाण न करनेमें पुराणके कुछ वचनोंकी विरोधताका प्रमाण देते हैं जैसा पृथ्वीके विषयमें भिन्न भिन्न पुराणोंमें लिखा है ?
(१) पृथ्वी अण्डाकार है ।
(२) पृथ्वी कमलाकार है ।
(३) पृथ्वी कमल पत्रके आकारकी है ।
(४) पृथ्वी चौकोर है ।
(५) पृथ्वी चिपटी है ।
इसी प्रकारके परस्पर विरोधी वचनोंको देखकर योरोपियन्स भारतीय विद्वानोंकी सम्पत्तिको सत्य नहीं मानते । इस कारण भारतीय विद्वानोंके मतको पुष्ट करनेवाली युक्ति और अनेक प्रमाण लिखता हूँ ।
(१) पृथ्वीके गोल होनेमें तो सब एक मत हैं ।
(२) पृथ्वी कमलाकार है यह बात भी सत्य है क्योंकि, कमल बहुत तरहका होता है कोई गोल, कोई लम्बा ।
पृथ्वीको गोल कहनेमें जो बुद्धिकी सूक्ष्मता है उसको योरोपीय विद्वानोंने नहीं समझा वास्तविक बात यह है कि, जल गोल है पृथ्वी नहीं है क्योंकि, पृथ्वीसे पूर्व जल था, जलका आकार गोल है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि, समुद्रका पानी भंवरमें ऊंचा उठा हुआ जान पड़ता है, उसका कारण केवल यही है कि, जलका आकार गोल है । जैसा समुद्रवैसाही बुन्द, दोनोंका रूप एक समानही गोल होगा । कोई बड़ा कोई छोटा भलेही हो पर आकारमें कुछ भेद नहीं होगा जैसे पिण्ड और ब्रह्माण्डदोनोंका रूप एकही है ग्रन्थोंमें कबीर साहबने कहा है कि, पृथ्वीसे पहिले जल था, जिस प्रकार दूध यर मलाई जमती है उसी प्रकार जलपर पृथ्वीकी सृष्टि हुई । यही बात सबमें है कि, पहले पानी था, उस गोल पानीके ऊपर पृथ्वी जमाई गई इसी कारण पृथ्वी गोल दिखाई देती है । पानीकी गोलाईके कारण पृथ्वी गोल जान पड़ती है । जैसे घड़ेके ऊपर कुछ गाढ़ा तरल पदार्थ जमादेनेसे घड़ेकी गुलाईके कारण वह भी गोल दीख पड़ता है पर यथार्थमें गोल नहीं होगा । इसी प्रकार पृथ्वी जलके फेनके समान जमकर