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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

विज्जूओंका परस्पर प्रेम उपसम, चूहा, श्वेत चूहा

भी इसकी प्रेम कहानी कह ही डाली है कि, "बुलबुलोंकी कबर बागहीमें बनती हैं" उर्दूका साहित्य तो इससे भरा ही पड़ा है।

बुलबुलोंकी मानुषी वाचा - डाक्टर गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल हिस्ट्री में लिखा है कि, एक पथिक पथमें चला जाता था। सांझ होते ही सरायमें उत्तर पड़ा। वहाँ बुलबुलके तीन पिंजरे लटकते थे। पथिकको बीमारीके कारण रातको नींद नहीं आई। बेचैनीकी अवस्थामें पड़ा करवटें लेता रहा चुपचाप था। आधी रात बीत गई चारों ओर सन्नाटा छा गया। मनुष्य अचेत होकर सो गया। समान अन्तर पर लटकाई हुई तीनों बुलबुलें आपसमें मनुष्योंकी भाषामें बातें करने लगीं। तीनोंने मनुष्योंकी भाषामें तीन कहानियां कहीं पहिली बढईकी कहानी थी दो और दूसरी कहानियां थीं उन बुलबुलोंकी कहानियां पथिक सुनता रहा। वे चुप होगई। सबेरा हुआ सरायका स्वामी उठा। पथिकने पूछा कि, तुमने इन बुलबुलोंको बातें करना सिखाया है? उसने उत्तर दिया कि, नहीं। मुसाफिरने कहा कि, ये तीनों बुलबुलें ठीक मनुष्योंके समान बातें करती हैं। इन्होंने आपसमें बहुत हँसी मसखरीकी तीन कहानियां कही हैं। मैं चुपचाप पड़ा सुनता रहा। क्योंकि, रोगकी वेदनासे मुझको रात भर नींद नहीं आई।

यह बात सुनकर सरायवाला अचंभा करने लगा कि, ये तो मेरे सामने कभी नहीं बोलीं न मैंने इनको बोलनाही सिखाया है। वे आपही बोलती होंगी, मैंने इनको कभी बातचीत करते नहीं देखा।

चण्डूल ।

चण्डूल बहुत चालाक पक्षी है बहुत सतर्कतासे अपना घोंसला बनाता है। बहुत युक्ति सहित घास फूसका घोंसला ऊंचे खजूरके वृक्षपर बनाता है वह बहुत बारीकीसे कोठडियां तैयार करता है नीचेकी ओर घोंसलोंका मुँह रखता है कैसी ही वृष्टि क्यों न हो उसके घोंसलेमें एक भी बूँद नहीं जाती उसके भीतर ओस इत्यादि भी नहीं घुस सकते। धूपकी गरमी जाड़ेकी सरदीका प्रवेश भी नहीं हो सकता।

चण्डूल और सांप - चण्डूलने वृक्ष पर अपना घोंसला बनाया। उसमें सांप घुस गया। चण्डूलके बच्चोंको खाकर उसीमें बैठ रहा। चण्डूल आया विपत्ति से सूचित हुआ। सांपको बैठे देख जान लिया कि, उसने मेरे बच्चोंको खा लिया है। दोनों चण्डूलोंने यह युक्ति की कि, जल्दी जल्दी घास फूस लाकर घोंसलेके द्वारको बन्द कर दिया उसमेंसे सर्प बाहर न निकल सका घोंसलेका मुँह बन्द हो चुका तब उन्होंने घोंसलेकी जड़ काट कर पृथिवीपर डाल दिया। उसको हिलते डोलते

देख कर लोगोंने जाना कि, इस खोतेके भीतर कुछ है जिसके कारण यह हिलता है । फड़ाके देखा तो सांप निकल पड़ा लोगोंने उसको मार डाला । इस युक्तिसे चण्डूलने सांपको अपने बच्चोंके बदलेमें मार लिया ।

विचित्र कर्तव्य — फिरोजपुरमें एक मनुष्यने चण्डूलको विचित्र कर्तव्य सिखाया था । उसके पास सोने चाँदीकी दो अँगूठियाँ थीं, वह दोनों अँगूठियोंको दूर रख कर कहता कि, चाँदीकी अँगूठी ला वह चाँदीकी अँगूठी लाता । जब वह कहता कि, सोनेकी अँगूठी ला तो सोनेकी लाता कुछ भी फर्क न पड़ता था ।

समझदार चिड़िया — फिरोजपुरके दूधगांवमें साहूकारके चौबारे पर एक साधू रहता था एक छोटी चिड़िया उसके समीप आकर अत्यन्त मधुर स्वरमें बोला और गाया करती थी । एक दिन वहाँ मुसलमान आ बैठे उस समय भी वहाँ चिड़िया आकर बोलने लगी । मुसलमानने कहा कि, मैं इसको फँसाऊंगा । चिड़ियाने यह बात सुनली । वह उस दिनसे उस जगह आना छोड़ दिया । दूर दूर बोलती पर उस जगह कभी न आती थी ।

थसकी बोली — एक प्रकारकी चिड़िया होती है उसका प्राकृतिक गुण यह है कि, बहुत मधुर भाषी होती है । भांति भांतिके मोठे राग गाया करती है नाना प्रकारकी बोलियाँ बोलती है । वह कुत्तोंकी तरह भूकती और बिल्लीकी तरह म्याँव २ भी करती है । मनुष्यके स्वरमें स्वच्छ बोलती है । बोरडरप साहबने स्वयम् अपने मित्रों सहित सुना था कि, वह बोलती थी । 'मेरी प्यारी । मेरी सुन्दरी प्यारी । मेरी छोटी सुन्दरी प्यारी ।'

सुर्खसीना ।

एक पक्षी होता है इसका खोता पुष्पके बरतनोंके पास था उसी जगह एक सांपने आकर उसका घोंसला घेर लिया । चिड़िया बागवानके मोड़े पर बैठ कर उच्च स्वरसे बोलने लगी । अपने खोतेकी ओर दौड़ती । पहले तो मालीने उस चिड़ियाके इशारेको न समझा । चिड़िया उसके मोड़े पर आबैठी उसी प्रकार बोलने लगी । मालीने बिचारा कि, यह निडर चिड़िया मेरे मोड़े पर आकर शब्द करके फिर अपने घोंसलेकी ओर दौड़ जाती है इसका कोई अवश्य कारण है, यह कुछ कहती है । उसने जाकर देखा त्हे उसका खोता सर्प द्वारा घिरा हुआ था । तब तक उसके बच्चोंको किसी प्रकारका कष्ट नहीं पहुँचा था । मालीने सर्पको मार डाला धन्यवाद देनेके बदले चिड़िया मधुर गाना गाने लगी ।

बड़ीआबाबील ।

कप्तान ब्राउन साहब कहते हैं कि, बड़ी जातिकी एक आबाबील थी उसके