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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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बैठा । गजराजने दयासे द्रवित हो शसाके दब जानेके विचारसे पग नीचे नहीं रखा । तीन पगपर खड़ा रहा । तीन दिनके पीछे जब अग्नि शांत हुई तो सब जीवोंके साथ शसाके चले जानेपर गजराजने पग सीधा करना चाहा पर अत्यन्त कष्ट सहित तीन पग परही खड़ा रहनेके कारण शारीरिक परिश्रम व रगोंके चढ़ जानेसे सीधा पग नहीं हो सका बरण मुंहके बल गिरकर मर गया । उस दयाके प्रतापसे गजराज मरकर मगध देशका चक्रवर्ती राजा हुआ । जिसदिन महाराजा श्रेणकके घर उसका जन्म हुआ उसी दिन इतनी वर्षा हुई कि, वर्षोंसे अवर्षणके कष्टको सहती हुई प्रजाको महान् सुख प्राप्त हुआ इसी कारण कुमार का नाम मेघकुमार रखा गया ।

पश्चात् बहुत कालतक सुख भोगकर संसार विरक्त हो मोक्षका भागी हुआ इसी प्रकार दयाके बहुत दृष्टान्त हैं । धन्य हैं, वे जीव, जो दयाको अपना धर्म जानते हैं । उनके ऊपर धिक्कार है जो शक्ति रहते हुये भी दया नहीं करते ; परोपकारसे भागते हैं । धिक्कार उनकी अवस्थापर शोक और बारम्बार है जो कि, सहस्रों प्रकारकी हिंसा करते हुये भी स्वर्गकी आशा रखते हैं ।

मनुष्यको चाहिये कि, किसी प्रकारका दुःखी रोगी और दुर्बल, बुद्धि आदि जीवकी रक्षा करे अपनी शक्तिके अनुसार कभी पीछे पग न टारे ।

धर्मके चार वैरी ।

जिस प्रकार धर्मके चार मूल बतलाये हैं, उसी तरह धर्मके चार शत्रु भी हैं । उनका नाम-१ काम, २ क्रोध, ३ लोभ और ४ मोह है ।

काम-ऐसा प्रबल शत्रु है कि, मनुष्यको अंधा बना देनेमें इससे बढ़कर दूसरा कोई भी नहीं है । आठ प्रकारके मैथुनसे बचना अत्यन्त कठिन काम है । बड़े २ सिद्ध साधु तपस्वी महात्मा किसी न किसी प्रकार कामके वश हो जाते हैं । सहस्रों ऋषि मुनि और तपस्वियोंको इसने वारंवार नीचा दिखलाया है ।

मुसद्दस ।

मलिक व जिन्न व इन्स और इशरात । सारा आलम है तेरेही बरकात ॥
तुझसे कायम तनासुल आलात । रूह सारे फँसे व मज खूर फ़ात ॥

१ यह कथा जैन धर्मग्रन्थोंमें आई है मेघकुमारके श्रान्त होनेपर महावीर स्वामीने उसे इसके पूर्वजन्मकी कथा सुनाई थी वह थकनका मारा महावीर, स्वामीसे कह उठा था कि, महाराज ! अब मुझसे इस घाममें नहीं चला जाता, अब निर्गन्थियोंकी तपस्याके कष्ट नहीं उठाये जा सकते । उस समय चौबीसवें तीर्थंकरने उसके पूर्व जन्मकी कथा तथा उसी पुण्यसे राजकुमार होनेका वर्णन किया था । जैन साहित्य ऐसीही दिव्य कथाओंसे भरा पड़ा है । सच पूछिये तो वास्तविक जैन मत तो दया है ।