कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
विविध उपदेश संग्रह
ईश्वरका भक्त अथवा सेवक कहे तो उसने झूठा संसारको ठगनेका मार्ग निकाला जब तक समस्त संसारकी वासनासे रहित न हो तब तक परमात्माका भक्त नहीं हो सकता तबही संसारसे रहित हो सकता है जब अपना आपा न रहे। ईश्वरके अतिरिक्त अन्य कुछ उसकी दृष्टिमें शेष न रहे। ईश्वरच्छामें ही संतुष्ट रहे। भक्तिमें पूर्ण सत्यता यही है जिसको वह पद प्राप्त नहीं है, वह सत्यधारी भी नहीं है।
तीसरी—सत्यता भावनामें है जिसकी भावना शुद्ध है वह ईश्वरको प्राप्त कर सकता जिसको ईश्वर प्राप्त करनेकी दृढ़ इच्छा हो उसकी भावना शुद्ध होनी चाहिये। यदि भावना शुद्ध न हो तो सब भाव भक्ति व्यर्थ हो जावेगी।
चौथी सत्यता—प्रतिज्ञामें होती है; जैसे कोई पुरुष ऐसी प्रतिज्ञा करे कि, जब मैं राज्य पाऊँगा न्यायसे वर्तूंगा। ऐसी प्रतिज्ञा कभी तो दृढ़ और कभी निर्बल होती है। दृढ़ प्रतिज्ञाको ही सत्य कहते हैं।
पाँचवीं—प्रतिज्ञा पालनमें सत्यता होती है। जैसे कोई पुरुष युद्धके समय प्रतिज्ञा करे कि, मैं रणभूमिमें जाकर सच्ची शूरता दिखलाऊँगा। जिन्हे २ लड़ाई करूँगा, यदि वह समय पर अपने वचनका पालन करे तो सच्चा नहीं तो झूठाही है।
छठी—सत्यता यह है कि, जैसा—अपने अंतरमें हो वैसाही बाहर भी जाहिर करे। यह बात अंतःकरणकी शुद्धता और सरलतासे होती है। जिसका भीतर बाहर समान है वही सत्यधारी है। जो अपने हृदयगत भावको छिपा कर दूसरा प्रगट करता है; वह कपटी झूठा; दाम्भिक होता है ऐसे नर पशुओंको सत्यका मार्ग नहीं प्राप्त होता। ऐसे दाम्भिक मखोंने जगत्को भ्रष्ट कर रक्खा है। दान और दयाकी दुर्दशा ऐसे ही धूर्तोंने की है।
सातवीं सत्यता—वहाँ होती है जहाँ कि धार्मिक नियमों अत्मिक विचारोंमें केवल दूसरोंके वचन अथवा शास्त्रोंके वाक्यों परही भरोसा न रखकर अपने अन्तःकरणमें भी विचार और तर्कद्वारा उसकी सत्यताको ज्ञान बूझकर उसे स्वीकार करे। अपने आत्माके विरुद्ध किसीभी कर्ममें प्रवृत्त न हो। जिसमें संयम, संतोष, आशा, भय अनुराग, प्रोति, भक्ति आदि गुण शुद्धता और अंतरीय भावपूर्वक हो उसे सत्यधारी कहते हैं। जिसका विश्वास निर्बलता रहित दृढ़ धर्म परायण हो उसेही सत्यधारीकी पदवी शोभती है। जैसे यदि किसीको किसी प्रकारका भय हो तो उसका मुख सूख जाता है, मुखका रंग पीला हो जाता है, खान पान अच्छा नहीं लगता, चित्तमें व्यग्रता रहती है। यदि इसी
प्रकार कोई परमात्मासे भय करे तो उसका भय सच्चा कहा जा सकता है । यदि कोई कहे कि, मैं पापसे डरता हूँ और पाप भी करता जावे तो वह झूठा है ।
ऊपर कही हुई रीतियोंसे सत्यताकी अवस्थाओंमें भेद है । इन सातों अवस्थाओंमें जो दृढ़ताको धारण कर सत्य परायण हो वही पूरा सत्यधारी हो सकता है । अन्य सत्यताके सब भेद इन्हीं सातोंके अन्तर्गत हैं । जितनी जिसमें सत्यता बढ़ती जायगी उतनीही उसकी उच्चता बढ़ेगी ।
सब सांसारिक, तपस्वी, विद्याभिमानी आदि नष्ट और दुःखी हैं यदि उनमें शुद्धता और निष्कामता न हो । सत्यता और शुद्धता कांक्षा (नियत) में होती है । जो कोई ऋण लेकर पीछे देनेकी कांक्षा न रखे तो वह चोर है । यदि शुभकर्म करनेका बल न हो तो शुभ कांक्षा रखे । शुभ इच्छाका फल बहुत है जब कांक्षामें ही भेद आया तो सब नष्ट हुआ ।
शौच या शुद्धि ।
शौच नाम शुद्धिका है; दो प्रकारकी होती है । एक बहिरङ्ग तथा दूसरी अन्तरंग है । बहिरङ्गशुद्धि जल मिट्टी आदिसे होती है । अन्तरंग विवेक और विचारसे । ईर्षा, कपट, छल शत्रुता आदि आसुरी गुणोंको विवेक विचारके बलसे त्याग कर अन्तरंग शुद्धता प्राप्त करनाही सब धर्मोंवाले सामान्य भावसे मानते हैं । शुद्धतासे रहना ईश्वर सेवा और अर्थ धर्म है ईश्वर शुद्ध और स्वच्छ लोगोंको स्वीकार करता है इससे यह न समझना चाहिये कि, शरीरकी शुद्धि और स्वच्छतासे आशय है वरण शुद्धताकी चार श्रेणी हैं ।
प्रथम—ईश्वरके अतिरिक्त हृदयमें दूसरेको स्थान न दे यानी परमात्माके सिवा सब लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंसे असक्ति उठा दे.
द्वितीय श्रेणी—यह है कि, अन्तःकरणको ईर्षा, कपट, अभिमान, दम्भ आदिसे शुद्ध रखे नम्रता, धैर्य, सन्तोष, पश्चात्ताप, ईश्वरी भय, प्रेम आदि शुभ गुणोंको धारण करे । देवी सम्पत्तिसे पूर्णता प्राप्त करे । यही संयमियोंका कर्तव्य है ।
तृतीय—चुगली करना, अधर्मका खाना, विश्वासघात करना, पराई स्त्रीको कुट्टितसे देखना आदि घृणित पापोंसे अपनी इन्द्रियोंको शुद्ध रखे । यह तपस्वियोंका पद है । भोजनादि शुभ और स्वच्छ रखना अत्यन्त आवश्यक है । भूलसे भी अखाद्य अथवा निषिद्ध वस्तुको ग्रहण न करे । क्योंकि, जैसा भोजन होता है वैसेही बुद्धि होती है ।
चतुर्थ श्रेणी—शौचकी वस्त्र और स्थानादिकी स्वच्छता है यद्यपि वर्हि-
ग शौच अन्तरङ्गकी अपेक्षा तुच्छ कहा जाता है तो भी इसकी बहुत श्रेष्ठता
है, पर बहिर शौचमें नीचे लिखी बातोंका अवश्य ध्यान रखना चाहिये ।
प्रथम^१^ बहिरंग शौच स्नानादिमें इतनी अधिकता न करे कि, उससे
किसी आवश्यक काममें हानि हो। प्रायः पाखण्डी लोग बारंबार स्नान करके भी
अपनेको अशुद्धही मानते हैं, दिनभर विक्षिप्त चित्तोंके समान सन्देहमेंही पड़े
रहते हैं । ऐसे लोगोंसे लोक परलोकका कुछभी उत्तम साधन नहीं होसक्ता ।
जैसे विद्यार्थी अथवा परिश्रमी जिनको [ स्वयम् परिश्रम करके रोटी उपार्जन
करनी पड़ती है ] “पुरुषों” को शौच स्थानमें अधिकता करना हानिकारक है ।
द्वितीय—दम्भ और पाखण्डसे बचता रहे, स्नादिकी अधिकतासे दम्भी
मनुष्य अपनेको संसारमें बड़ा माहात्मा एवं शुद्ध प्रगट करते हैं अज्ञानी लोग
उनको प्रशंसा और बड़ाई करते हैं जिससे वे बारंबार उसीमें अधिक प्रवृत्त होते
हैं । जैसा कि कुछ लोग करते हैं ।
तृतीय—अवकाश और सामर्थ्य रहते हुये आलसादि कारणोंसे स्नानादि
शौचकी क्रियाका कभी त्याग न करे ।
चतुर्थ^२^—जिस शौचादि क्रियासे किसी जीवधारीको दुःख होता हो उसे
त्याग देना चाहिये क्योंकि, वह शुचि हिंसाजनक होनेसे अधर्म है । कोई पुरुष
१—कोई कोई पुरुष संशय युक्त चित्तबाले होते हैं उनके मनमें सन्देहही बना रहता है कि,
न जाने यथार्थ शुद्ध हुई कि, नहीं ? ऐसे सन्देह में पड़ा हुआ मनुष्य शुचिके यथार्थ साधनों को
छोड़कर पाखण्डमें फँस जाता है । जैसा कि, प्रथम तो भोग और कामको अशुचि — जान
उसके संयममें लगता है फिर उसमेंभी सन्देह उठाकर भोग और कामकी प्रवृत्तिकोही शुचिका
हेतु समझकर उसकी प्रवृत्तिमें लग जाता है । फिर क्या या धृष्टताके साथ खुल ख़ेलता है
अपने उत्तम पदसे पतित हो जाता है । ऐसे पुरुषोंको कोई योग्य महात्मा पुरुष यथार्थ शुचिताका
उपदेश करे तो उसमें संशययुक्त हो बारम्बार संकल्प विकल्प करता हुआ मनही मन विचार
करता है कि, न जाने यह यथार्थ स्नान है कि, नहीं ? इस स्नानसे मैं शुद्ध होऊँगा कि नहीं ?
जो मुझे उपदेश करता है वह स्वयम् पवित्र महात्मा है कि नहीं ? ऐसे २ संशय करके उसके
उपदेशको छोड़ दूसरेकी शिक्षा सुननेमें लग जाता है । इसी प्रकार होते होते किसीकी बाहिरी
चटक मटक और गपोड़में फँसकर उसके दोषोंको न विचारता हुआ अनाचार्यमें प्रवृत्त हो पापका
भागी बनता है । दुःख पड़नेपर उससे विरक्त हो अन्यके पास जाता है वहाँसे भी दूसरेकी
शरण लेता है । ऐसे संशयात्मक पुरुषोंको कभी भी पवित्रता नहीं दीखती कभी न सुखकीही
प्राप्ति होती है वरन् सर्वदा शोकित रहता है ।
२ आजकल प्रायः दाम्भिक लोग ऐसा करते हैं कि, उनकी मण्डलीमें कोई किसी रोगके
कारण नहा न सके तो उसे छूनेमेंभी पाप समझते हैं । जबतक वह स्नान न करले तबतक
चाहे वह प्याससे मर भी जाय पर जल देना नहीं चाहते वरन् उसे भ्रष्ट, अशुद्ध आदि कठोर
शब्दोंसे दुखी करते हैं ।
किसीसे मिलना चाहता हो पर वह अपने शुद्धिके अभिमानमें उससे घृणा करे तो यह कुकर्म हैं इसे त्यागना उचित है ।
पंचम—भोजनमें संयम आवश्यक है । शुद्ध भोजन ग्रहण करे अशुद्ध न करे ।
षष्ठम—संयममें इतनी अधिकता न करे जिससे दूसरोंको हानि पहुँचे । कोई तो किसीके आवश्यक कामको छोड़ करभी खड़ा रहे पर यह स्नान करनेमेंही दो चार घण्टा लगा दे ।
स्नानके भेद—स्नान दो प्रकारका है १ अन्तरङ्ग, २ बहिरङ्ग । अन्तरङ्ग । स्नान तीन प्रकारसे होता ॥ १—अन्तरङ्ग स्नान यह कि, सब अंगोंको पापसे शुद्ध रखे ।
दूसरा—बुरी आदतोंसे अन्तःकरणको शुद्ध रखे ।
३—ईश्वरके सिवा दूसरेको न देखे ।
बहिरङ्ग शुद्धि—भी तीन प्रकारकी है ?
१—देह गेहूको मृत्तिका जलादिसे शुद्ध रखे ।
२—बिना माँगे किसीके पदार्थमें स्वत्व न रखे ।
३—शारीरके बाल, नख आदि पदार्थोंसे शुद्ध रखे, आँख, कान, नाक आदिको शुद्ध करता रहे । बहिरङ्ग शुद्धि जल और मिट्टीसे होती है । अन्तरङ्ग शुद्धि विचार और विवेकसे होती है ।
सूर्य, चन्द्र तथा देवस्थान अथवा किसी प्रतिष्ठित स्थानकी ओर पीठ करके मुत्र पुरीष करने न बैठे । अग्नि, जल, राख, पृथ्वीका छिद्र, कठिन और तपी हुई पृथ्वी, गौली पृथ्वी आदिमें भूलसे भी मल मूत्र न त्यागे ।
धर्मका तीसरा चरण—दान है । दान बहुत तरहके हैं । यदि दान सुपात्रको
१—काममें तीन दोष प्रधान हैं वे चोरी, व्यभिचार और हिंसा ये हैं ।
वाणीमें तीन दोष हैं—निन्दा, गाली और मिथ्या लाप ।
मनके—क्रोध, ईर्षा, मान, छल ये चार दोष हैं ।
२ दीन पुरुषोंपर दया करके अन्न, वस्त्र, धन आदिसे सहाय करनेको “दान” कहते हैं यद्यपि इसमें देशकाल पात्रका भी विचार आवश्यक है तो भी यथार्थ दाता इस विलम्बको योग्य नहीं समझता क्योंकि, मनका स्वभाव है कि, क्षणमात्रमेंही अनेक संकल्प विकल्प कर लेता है, क्या जाने कुछ क्षण पीछे देनेका संकल्पही जाता रहे । इसी कारण उदार पुरुषको जिस समय दानकी बुद्धि होती है उसी समय दान करता है विलम्ब नहीं करता ।
दो प्रकारका दान है ।
एक उत्तम और दूसरा अनुत्तम । वह उत्तम दान है जो कि, दीनको देखकर द्रवित-
दिया जाये तो अति उत्तम हो, बहुत पदार्थोंका दान दिया जाता है, वे चीजें—हाथी, घोड़ा, गाय, बैल, सोना, चांदी, वस्त्र, अनाज और कन्या पुस्तक आदि हैं। यदि दान गुप्त दिया जाये तो अति उत्तम हो। अपनी शक्ति और योग्यके अनुसार दान देना चाहिये। दानका पद बड़ा पुण्यमय है। दान पात्रको दान दिया हुआ उत्तम फल दायक है। जैसे सुपच सुदर्शनजीके पाँच कौल खानेहीसे महाराजा युधिष्ठिरका यज्ञ पूरा हो गया। यदि कोई ऐसा विचार करता रहे कि, सुपच सुदर्शनजी जैसा कोई साधु मिलेगा, तो दान देंगे, यह उसकी भूल है। इस प्रकार उदारता न करके तर्क वितर्क उठानेसे मनुष्य कृपण होकर दान जैसे उत्तम कर्मसे वंचित रहकर पापका भागी होता है। जो कृपणताके वश हुआ वह महानीच पापी होता है।
उससे उचित है कि, शूरवीर, धर्मबन्धु, सुकृत, विरक्त, दीन दास, दासी, विद्यार्थी, ऋणी आदि सब प्रकारके मनुष्य अथवा कोई भी जिसको जिस पदार्थकी आवश्यकता हो उसे दान दे। क्योंकि वही दानका अधिकारी है। मनुष्यको उचित है कि—
जो काहूके होय उपकारी । मन वच कर्म करि लेई विचारी ॥
पशुआ होयसो आँख छिपावे । मानुष बुद्धि सपने नहीं पावे ॥
दरिद्रतामें पड़े हुये किसी प्रतिष्ठित आदमीको, अपने धर्ममें आने वालेको चाहिये कि, अपने बालबच्चों, परिवार और सम्बन्धी, पड़ोसी और अतिथि आदि सब प्रकारके पुरुषोंकी सहायता कामना बिना करे। दुःखी पथिक अर्थात् अपने देशसे दूर देशमें किसी प्रकारसे दुःखी पड़े हुये मनुष्योंकी सहायता सब प्रकारसे करे। इसी प्रकार आवश्यकतानुसार बहुत प्रकारके दान हैं देशकालको विचारकर अवश्य इस अमूल्य पुण्यका संचय करे।
दान देनेकी रीति ।
१ दान देनेमें जहाँतक हो शीघ्रता करना चाहिये।
२ किसी पुण्य तिथिपर अथवा जब दान देना हो गुप्तदान दे। क्योंकिक गुप्तदानका फल अनन्त है।
—होकर दिया जाता है। अनुत्तम दान वह है जो कि, मान अथवा व्याप्तिके लिये अथवा किसी दूसरे दाताको जीतनेको बदलेकी आशा रखकर दिया जाय। दान केवल धन मात्रसेही नहीं होता वरन् विद्या दान, निर्भयता दान, मान दान आदि अनेक प्रकारके दान हैं जिन्हें निर्धन भी कर सकते हैं। यदि दानके विशेष विवरण देखने हों तो स्मृति ग्रन्थोंको देखो तथा उच्च कोटिके साहित्य देखो।
३ दान देनेमें दम्भ और पाखण्ड न करे ।
४ किसीको दान देतीवार अपनी कृतज्ञता प्रकट न करे ।
५ दान लेनेवालेको तुच्छ न समझे बरन् श्रेष्ठ समझकर निरभिमान हो अपना हाथ नीचे रखकर दे ।
६ अपनेको दाता जान अभिमान न करे बरन् ऐसा समझे कि, "लेनेवालेकी अत्यन्त कृपा है कि, जो मेरे दानको स्वीकार कर रहा है ।"
७ अपने धनमें जो उत्तम पदार्थ हो वही दानमें दे ।
जिसके घरसे भिक्षुक निराश फिरकर जाता है वो अपना सब पाप वहाँही छोड़कर जाता उस घरमें देवता सात दिनतक दृष्टि नहीं देते घरवालेका सब पुण्य फिरे हुये भिक्षुकको प्राप्त होता है ।
दान लेनेवालेका कर्तव्य ।
दान लेनेवालेको दान लेनेके प्रथमही विचार करलेना चाहिये कि, दान किस प्रकारका है। दाता किस लिये दान देता है जहाँतक हो सके सकाम दानको न ले । जो श्रद्धाहीन पुरुष केवल अपनी बड़ाई और ख्यातीके लिये अथवा लोक निन्दाके भयसे दान देता हो उसको न ले । जो कठोर वचन कहकर दान दे अथवा भोजन करावे उसका भी न ग्रहण करे । ऐसी ही बहुतसी बातोंका विचार करना चाहिये ।
गुरुकी आज्ञानुसार दान पुण्य करना चाहिये सब कर्तव्योंसे यदि गुरुकी सेवा और आज्ञाकारिता हो । उदार पुरुषोंका पद अत्यन्त श्रेष्ठ है । जो लोग अपनी आवश्यक वस्तुको भी देकर दूसरोंकी आवश्यकता पूर्ण करते हैं वे श्रेष्ठ उदार पुरुष ईश्वरके पूरे कृपापात्र होते हैं । उदार दानी पुरुष ईश्वरके मित्र हैं ऐसे पुरुषके सब अपराध क्षमा किये जाते हैं । दानीको जब किसी प्रकारका कष्ट उपस्थित होता है तो उसकी सहायता स्वयम् परमात्मा करता है । जिस पदार्थको देनेकी सामर्थ्य रखनेपर भी जो न दे उसे कृपण कहते हैं, जो संग्रह करनेके पदार्थको अवसर बिना व्यय करे उसे फजूल खर्ची कहते हैं ।
ईश्वरके मार्गमें अपने तन मन धनका मोह न करनाही सर्वोच्च उदारता है । जो निष्काम होकर उदारताका अवलम्बन करता है वह धन्य है । धन्य है वह पुरुष जो मृत्युको नहीं भूलता क्योंकि, ऐसा पुरुष कृपण नहीं हो सकता ।
दया ।
सब धर्मोंमें दया सबसे शिरोमणि है । किसी भी प्रकारकी तपस्या एवं भजन क्यों न करे यदि दयामें कुछ भी न्यूनता हुई, तो सब निष्फल हो जावेंगे ।