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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मंगलाचरण

दर्शन पाया है तो तेरे साथ चलूंगा । तब गायत्रीने मनमें विचार किया कि, मैंको सामने मिथ्या साक्षी देना तो महापाप है तो भी, परमार्थके निमित्त मैं मिथ्या भाषण करूँगी । इसके उपरान्त उसने ब्रह्मासे कहा कि, मैं तेरी साक्षी दूँगी; इतनेमें पुष्पावती नामनी एक दूसरी स्त्री जिसको गायत्रीने उत्पन्न किया था उस स्थान पर उपस्थित हुई । ब्रह्माने उससे भी कहा कि तू भी मेरी साक्ष देना । उसने भी स्वीकार किया कि, मैं भी तेरी साक्षी दूँगी । तब ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावती तीनों मिलकर तथा एक मत होकर अद्याके पास चले ।

तैत्तिरीयसूत्र प्रकरण

ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावती तीनोंका अद्याके पास जाना
और अद्याका उन्हें शाप देना ।

जब ब्रह्मा गायत्री तथा पुष्पावती सहित अद्याके सामने पहुँचे, तब तीनोंने माताको दंडवत् प्रणाम किया । तब माताने कहा कि, हे ब्रह्मा अपना कुशल समाचार कहो और अपने पिताके दर्शनका वर्णन करो कि, कैसे पिताका दर्शन किया ? तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, हे माता ! मैंने अपने पिताका दर्शन भली भाँति किया और पुष्प तथा अक्षत द्वारा उनकी पूजा की, गायत्री तथा पुष्पावती मेरे साक्षी हैं । तब अद्या गायत्रीकी ओर फिरी और कहा कि हे गायत्री ! तू सत्य सत्य कह कि, ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन पाया और भलीभाँति उसका पूजन किया ? तब गायत्रीने उत्तर दिया कि, हों माता ! मैंने स्वच्छभुसे देखा कि, ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन पाया और उसकी भलीभाँति पूजा की । फिर अद्याने पुष्पावतीसे पूछा—हे पुष्पावती ! तू सत्य बता कि, क्या ये दोनों सत्य बोलते हैं ?— तब पुष्पावतीने कहा कि हों माता ये दोनों सच्चे हैं मैंने अपनी आँखों देखा कि ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन किया और उसकी पूजाकि । तीनों की यह बात सुनकर अद्या सोचने लगी कि, अलखनिरञ्जनने तो मुझसे कहा था कि, मेरा दर्शन कोई न पावेगा; उसको यह क्या हुआ कि, इनको दर्शन देदिया ! जब सोचकर २ कुछ समझमें नहीं आया तो अद्याने घबराकर अलख निरंजनका ध्यानकरके उससे पूछा कि, ये तीनों जो कहते हैं, इनमें कहाँतक सचई है सो तुम बताओ । तब निरञ्जनने अद्यासे ध्यानमेंही कहा कि, ये तीनों ही झूठे हैं इन्होंने मेरा दर्शन नहीं पाया है, अपनी बड़ाईके लिये तुमसे असत्य कहते हैं । देखो अनुरागसागर ।

“ब्रह्मा मोर दरस नहिं पाया । झूठसाख इन आन दिखाया ॥
तीनों मिथ्या कहें बनायी । जनि मानहु यह है लबरायी ॥

(अनुरागसागर)

जब इस प्रकार कालनिरञ्जनसे पूछकर अध्याने मालूम कर लिया कि, ये तीनों झूठ बोलते हैं। तब वह अत्यंत क्रुद्ध होकर पहले ब्रह्माकी ओर मुड़ी और कहने लगी, हे ब्रह्मा ! तू झूठा है और झूठकी खान है—इस कारण तेरी पूजा संसारसे उठ जावेगी और तेरी संतति द्वार २ पर ठोकरें खायेगी तथा जैसा तू झूठा है वैसीही तेरी सन्तान भी झूठी होगी। स्वार्थ सिद्ध करनेके निमित्त सदा झूठ बोलेंगी, निज स्वार्थके निमित्त कथा पुराण सुनावेगी, परमार्थके निमित्त नहीं, दूसरे मनुष्य जो उसके कथा के श्रोता होंगे उनके मनमें तो ज्ञान तथा वैराग्य उत्पन्न होगा, पर वह स्वयं इससे बञ्चित रहेंगी उसके हृदयोंपर कालिमा छायी रहेगी, उसके मनमें भक्ति कभी नहिं उपजेगी—देखो, अनुरागसागर।

यह सुनि माता कीन्हीं दापा । ब्रह्माको तब दीन्ही शापा ॥
पूजा तोर करै कोउ नाही । जो मिथ्या बोल्यो मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिरलीन्हा ॥
आगे होइहै जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रकट करहि बहुनेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्त सो करिहै हंकारा । ताते परि है नरक मँझारा ॥
कथा पुरान औरिहैं समुझैं हैं । चाल विहून आपन दुख पैहैं ॥
उनते और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहैं परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल घर जैहैं ॥
जाकहैं शिष्य करैं पुनि जायी । परमारथ तेहि नाहि लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार्थ अर्थ सवैं समुझहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिढैहैं ॥
आप ऊँच औरिहै कह छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

(अनुराग सागर)

इस प्रकार ब्रह्माको शाप देकर तब्र अद्या गायत्रीकी ओर फिरी और कहा कि, हे गायत्री ! तूने जो मिथ्या साक्षी दी उससे चार पैर की गाय हो जावेगी और तेरे अनेक पति होंगे—तथा तू विष्ठा और निषिद्ध वस्तुओंको खाती फिरेगी। फिर अद्या पुष्पावतीकी ओर फिरी और कहने लगी कि, हे पुष्पावती ! तू जो ऐसा झूठ बोली इससे तू जाकर पृथ्वी पर पुष्प बनेगी और केवडा

तथा केतकी तेरा नाम होगा, लोग तुझको गंदे स्थानमें लगावेंगे—और जो कोई तुझको लगावेगा वह निर्बंश होगा ।

चोतीसवाँ प्रकरण

निरंजनका अद्याको शाप देना ।

इस प्रकार अद्याने तीनोंको शाप तो दिया किन्तु फिर अपने मनमें चिंता करने लगी, कि, मैंने तीनोंको शाप देकर आपत्तिमें फँसाया । मैंने तनिकभी धीरज नहीं रखा । ये तीनों दुःखी हो गये । इस कारण न जाने निरञ्जन मुझको क्या कहेगा ? यह बात अद्या अपने मनमें सोच रही थी कि, निरञ्जनकी ओर से आकाशवाणी हुई कि, “हे भवानी ! मैंने तुझको सृष्टिके फैलाव करनेके निमित्त नियुक्त किया था, उसके विपरीत तूने किया—अर्थात् इन तीनोंको शाप देकर दुःखी कर दिया, सो जो कोई बलवान किसी निर्बलको दुःख देगा या सतायेगा तो मैं उसका परिशोध करूँगा । किसीका बदला कदापि नहीं छोड़ूँगा । सो तूने जो इन तीनोंको शाप दिया है—इस कारण जब द्वापरयुग आवेगा तब तेरा अवतार होगा और तेरे पाँच पति होंगे और तू भी दुःख पावेगी । सो द्वापरमें अद्याका द्रौपदीका अवतार हुआ । जब इसप्रकार निरञ्जनने अद्याको शाप दिया—तब आकाशवाणी सुनकर बड़ेही दुःखसे वह विलाप करने लगी और कहने लगी कि, हे निरञ्जन ! मैं तेरे वशमें हूँ तेरे मनमें आवे सो कर ।

पैंतीसवाँ प्रकरण

विष्णुका पिताके दर्शनको जाना, गौरसे श्याम होना और तीन लोकका राज्य पाना ।

फिर भवानी विष्णुके समीप गयी और उससे कहा कि, तुमभी जाओ और पिताका दर्शन करो और उसके दर्शनका हाल मुझसे कहो । तब विष्णु पाताल लोकको चले, जाते २ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ शेषनाग थे, शेषनामकी फुँफकारके विषसे विष्णु अचेत हो गये और उसी विषके प्रभावसे विष्णुका रङ्ग बदल गया नहीं तो उसके पूर्व उनका रंग गोरा था, सो नीला आसमानी रङ्ग हो गया और विषकी उष्णतासे घबराकर वे पीछे पलट पड़े । उस समय निरञ्जनकी ओरसे विष्णुको आकाशवाणी हुई कि, हे विष्णु ! तुम अपनी

माताके पास जाकर सत्य २ कहो— सावधान झूठ न बोलना । जब विष्णु पातलसे पलट आये और माताने पूछा कि, हे विष्णु ! अपने पिताके दर्शनका विवरण कहो । तब विष्णुने कहा कि, माता मैंने अपने पिताका दर्शन तो नहीं पाया उलटा शेषनागके विषकी तीक्ष्णताके कारण मैं अचेतहो गया और मेरे शरीरका वर्ण बदल गया । यह बात सुनकर अच्छा अत्यंत हर्षित हुई और कहा कि, वत्स ! तूने नितान्तही सत्य बात कही—मैं तुझको तेरे पिताका दर्शन करादूंगी । इसके उपरान्त उसने विष्णुका मुंह चूमा और बड़ा लाड प्यार किया और आशीर्वाद देकर कहा कि बेटा ! तू त्रिलोकका राज्य करेगा समस्त मनुष्य तथा देवता तेरी बंदना करेंगे और तू सकल सृष्टिका पालक होगा, सब तेरे अधीन तथा आज्ञाकारी होंगे, ब्रह्मा तथा शिव दोनों तेरी आज्ञा मानेंगे और तेरी अधीनता करेंगे ।

छतीसवाँ प्रकरण

विष्णुको पिताका दर्शन होना

हे पुत्र ! मैं तुझको तेरे पिताका दर्शन, दोनों रीतियोंसे कराती हूँ तू अपने पिताको अपने मनके भीतर भी देख और जहाँ वह सिंहासनाखूढ है उस स्थानको भी देख । इतना कहकर अद्याने विष्णु पर अति प्रसन्नतासे निरञ्जनका दर्शन करा दिया । देखो अनुरागसागर ।

पुनि कहि अस आदि भवानी । अथ मुनहु पुत्र प्रिय मम वानी ॥
देखु पुत्र तोहि पिता भेटाऊँ । तोरे मनकर धोख मेटाऊँ ॥
प्रथम ज्ञान दृष्टि कर देखो । मोर वचन हिये परेखो ॥
मन सरूप कर्ता कहैं जानो । मनते दूसर और न मानो ॥
स्वर्ग पताल दौड मन कोरा । मन इस्थिर मन कहे अनेरा ॥
छन महैं कला अनन्त दिखावे । मन कहैं देखि कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनही आश दिवस निश्चिरहिये ॥
देखहु पलटि शून्यमहैं जोती । जहवाँ झिल मिलि झालर होती ॥
फेरहु श्वास गगन मह धाओ । मार्ग आकाशहिं ध्यान लगाओ ॥
पुनि माता काँह विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज बारा ॥
अहो विष्णु तुम लेहु असीसा । सब देवन महैं तुमही ईसा ॥