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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बादशाह का जहर रेशमका कीड़ा

अनेकों देह धरेंगे । ऋषिही क्यों ? देवगण भी पशुपक्षी तथा जलचर आदिके रूपमें मृत्युलोकमें विचरते हैं तथा कर्म वश आवागमन करते रहते हैं जो जाने सो । दूसरे अज्ञानियोंको क्या पता हो सकता है । ऋषिमुनि ही क्यों, अनेकों मनुष्य देहधारी प्राणियोंके स्वभाव पशुओं जैसे हैं । गोल्डस्मिथ साहिबने लिखा है कि, एक कुटुम्बके सब मनुष्य उगाल किया करते थे । बिना इसके खाना भी हजम न होता था ।

पशु पक्षी आदि जीव धारियोंका भजन ।

सहस्रों ऐसे जीव हैं कि, पशुका रूप पाया है उनकी श्रेष्ठताका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है । सहीह बुखारी व मुसल्लभमें रवायत अबूरीरासे है कि—

चींटियोंका भजन—एक बार हजरत मूसाने खुदासे अर्ज की कि—“ऐ परव रदिगार ! तू गुनहगारोंके गॉवको नष्ट करता है पर उसके साथ कितने अच्छे भी होते हैं, वह भी बिना अपराध उसके साथ नष्ट हों जाते हैं ।” उस समय खुदाके पाससे कुछ उत्तर नहीं आया । एक दिन मूसाको गर्मी मालूम हुई जिसको सहन न कर सके, एक हवादार वृक्षके नीचे जाकर बैठ गये । वहाँ एक चींटीने काट लिया मूसाने क्रोधमें आकर सब चींटियोंको आग लगाकर जला दिया उस समय खुदाने कहा कि हे मूसा ! तू अपनी ओर नहीं देखता कि, एक चींटीके अपराधके कारण सब चींटियोंको जला दिया । यद्यपि ये सब चींटियाँ भजनमें निमग्न हो रही थीं ।

मूसा और पक्षी—किसी दूसरी किताबमें देखा था कि, मूसाको अपने भजनका बड़ा अहंकार था, एक साँसमें चारसौ नाम जपता था । एक दिन जंगलने वृक्षके नीचे बैठा था झरना बह रहा था । मूसाकी दृष्टि वृक्ष पर गई । देखा कि, एक पक्षी बैठा है, वह एक स्वासमें चार हजार नाम लेता है, उसको देखतेही मूसाका अभिमान जाता रहा उस पक्षीसे कहा कि, कुछ सेवा बतलाओ ? पक्षीने कहा कि पानी पिलाओ मूसाने नीचे चशममें पानी दिखा दिया । पक्षीने पानीके ऊपर दृष्टि डाली पर भजनसे निवृत्त हुए बिना पानी पीनेको न उतरा । सामवेद सम्बन्धी किसी पुस्तकमें पशुओंके भजनके विषयमें जो सुना था । वो यहाँ लिखे देता हूँ—

बकरी—भजन करती है कि, हे प्रभु ! मुझको मेरे शत्रुओंसे बचा, मेरा कल्याण कर । वारम्बार उसका यही भजन और आशीर्वाद है ।

तोता—वह भजन करता हुआ कहता है कि, हे प्रभु ! मैं तेरा कृतज्ञ

हूँ, क्योंकि तूने मेरा रंग हरा और चौंचे लाल बनायी है, माधव २ कहके मैं तेरा भजन करता हूँ।

भेड़—वीर २ कहकर पुकारती हैं कि, हे परमेश्वर ! मैंने क्या अपराध किया है कि, मैं विष्ठा खाती हूँ, हे प्रभु ! मुझको बचा ।

बैल—भजन करता है कि, ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले ! ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर !! मुझको इस योनिसे मुक्त कर ।

चील्ह—भजन करती है कि, परमेश्वर ! न तेरा जन्म है न मरण, न तू कभी जाता है न आता है, तू सबका कल्याण कर्ता है । यह निरङ्कार निरङ्कार करके भजन करता है ।

पशुओंके भजनका वर्णन कौनकर सकता है ? सब गुप्तमें ईश्वरके भजनमें लगे रहते हैं, प्रगट भी उन लोगोंकी बोलीसे जान पड़ता है कि, सब भजन कर रहे हैं । जैसे तोता बोलता है तूही तुही तुही । पण्डुक बोलती है तू तू तू । मोर बोलता है या कयूम । सारस बोलती है या अजीज ।

कलगीदार छोटी चिड़या —जो गौरयेंसे भी छोटी होती है, उसके शिर-पर कलगी होती है और जहाँ आदमी कम आते जाते हैं, उजाड़ होती है वहाँ रहा करती है । उसका मुख्य भोजन सूखी और नरम मिट्टी है । कभी कभी खरबूजा आदिकका बीज मिलजाय तो उसे भी खाती है । यह पक्षी ऐसी निर्भय होती है कि, मनुष्य उसके निकट फिरा करे तो भी नहीं डरती, यह रात-भर भजन किया करती है । उसका शब्द है—तुही तुही निरङ्कार-तुही तुही निरङ्कार, पहर रात शेष रह जाती है ब्रह्म मूहूर्तका समय होता है । तो पृथ्वी और वृक्षको छोड़कर आकाशमें उड़ा करती है और “तुही निरङ्कार तुही निरङ्कार” ऐसा शब्द सूर्य निकलने तक किया करती है । दिन निकल आता है, थककर पृथ्वीपर गिर पड़ती है बहुत देर तक अचेत पड़ी रहती है, मुर्दोंके समान शरीरका कुछ भी चेत नहीं रहता, यहाँ तक कि, यदि किसी मनुष्य अथवा पशुके पगके तरे दब जाय अथवा कोई हिंसक पशु खा जाय तो भी कुछ चेत नहीं करती । कहते हैं कि, यदि कुत्ता उसको खाजाय तो पागल हो जाता है । वह अचेतसे सचेत होती है तब फिर अपने नित्यके भजनमें लग जाती है । ऐसे भजनानन्दीके समक्ष मनुष्योंका तपस्या कुछ नहीं है । यह पक्षी उजाड़में छोटे २ जलके डबरोंके किनारे रहती है उसका जल सूख जाता है तो उसकी नरम २ मिट्टी खाती है ऐसे समयमें भजन करती है कि, जिस समय तपस्वी और ताधु लोग नींदके वशमें पड़के अचेत सोये होते हैं । यह सत्य पुरुषकी ओरसे भजना-